Bijnor News: बिना ATS पहुंचे 10,056 वाहनों को फिटनेस! बिजनौर से यूपी की ऑटोमेटिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल

Bijnor News: बिजनौर में जनवरी से मार्च 2026 के बीच 10,056 वाहनों को बिना ATS पहुंचे फिटनेस प्रमाणपत्र देने का मामला सामने आया। झांसी, फिरोजाबाद और गाजियाबाद के मामलों के बाद यूपी की ATS व्यवस्था पर सवाल उठे।

Newstrack Network
Published on: 13 Aug 2026 11:56 PM IST (Updated on: 13 Aug 2026 11:56 PM IST)
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Bijnor News (Image Credit-Social Media)

लखनऊ। व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस जांच को पारदर्शी, मशीन आधारित और मानवीय हस्तक्षेप से लगभग मुक्त बनाने के लिए शुरू की गई स्वचालित परीक्षण स्टेशन यानी ATS व्यवस्था स्वयं गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर में एक निजी ATS की जांच में आरोप सामने आया कि जनवरी से मार्च 2026 के केवल तीन महीनों में 10,056 ऐसे वाहनों के फिटनेस प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए जिनकी स्टेशन पर आने की प्रविष्टि तक उपलब्ध नहीं थी। जांच के बाद संबंधित स्टेशन का पंजीकरण प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया गया और उसकी ₹5 लाख की बैंक गारंटी भी जब्त कर ली गई। इससे पहले झांसी और फिरोजाबाद के ATS पर भी अनियमितताओं के कारण कार्रवाई हो चुकी है।

यह मामला इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि ATS की पूरी अवधारणा ही इस दावे पर खड़ी की गई थी कि वाहन मशीनों के सामने वास्तविक रूप से जाएगा, ब्रेक, सस्पेंशन, साइड-स्लिप, हेडलाइट और दूसरे निर्धारित मानकों की जांच होगी, कैमरे और डिजिटल प्रणाली परीक्षण का रिकॉर्ड बनाएंगे और उसके बाद फिटनेस प्रमाणपत्र जारी होगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इन केंद्रों को कैमरा आधारित, स्वचालित और डेटा दर्ज करने वाली प्रणाली के रूप में बढ़ावा दिया था ताकि मानवीय विवेक और भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम हो। लेकिन बिजनौर की घटना ठीक उलटा सवाल खड़ा करती है—यदि वाहन ही सेंटर नहीं पहुंचा तो मशीन आधारित फिटनेस हुई कैसे?

10,056 प्रमाणपत्रों का खेल तीन महीने में

बिजनौर के मेसर्स एफएस ट्रेडर्स द्वारा संचालित ATS की जांच में जनवरी 2026 में 1,796, फरवरी में 3,757 और मार्च में 4,503 वाहनों के संबंध में ऐसी विसंगति मिली। कुल संख्या 10,056 हुई। जांच अधिकारियों ने CCTV और स्टेशन के रजिस्टर का मिलान किया और पाया कि जिन वाहनों को फिटनेस प्रमाणपत्र जारी हुआ, उनकी सेंटर पर वास्तविक उपस्थिति का रिकॉर्ड नहीं था।

मामला तब खुला जब लखनऊ के दो वाहनों के बारे में शिकायत हुई कि वे बिजनौर ATS गए ही नहीं, फिर भी उनकी फिटनेस हो गई। इसके बाद बरेली परिक्षेत्र के उप परिवहन आयुक्त की अध्यक्षता में समिति गठित हुई और उसने 23 अप्रैल को रिपोर्ट दी। परिवहन आयुक्त ने बाद में स्टेशन का पंजीकरण निरस्त कर दिया।

यह संख्या इतनी बड़ी है कि इसे किसी एक कर्मचारी की छोटी चूक मानना कठिन है। तीन महीने में औसतन प्रतिदिन सौ से अधिक संदिग्ध प्रमाणपत्र बैठते हैं। इसलिए जांच का अगला स्वाभाविक प्रश्न यह होना चाहिए कि डिजिटल प्रणाली में इन वाहनों के टेस्ट डेटा आखिर कैसे दर्ज हुए।

सबसे बड़ा खतरा—10 हजार प्रमाणपत्र रद्द हुए या वाहन अब भी सड़क पर?

बिजनौर ATS का लाइसेंस रद्द करना एक कार्रवाई है, लेकिन उससे बड़ा प्रश्न उन 10,056 वाहनों का है जिन्हें कथित रूप से बिना जांच फिटनेस मिल गई।उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार शुरुआती कार्रवाई के समय इन सभी वाहनों के प्रमाणपत्र स्वतः रद्द नहीं किए गए थे। इसका अर्थ यह हो सकता है कि ऐसे वाहन सड़क पर चलते रहे जिनकी वास्तविक यांत्रिक स्थिति की जांच ही नहीं हुई थी।

यहीं प्रशासनिक कार्रवाई अधूरी दिखाई देती है।यदि फिटनेस प्रमाणपत्र की प्रक्रिया संदिग्ध पाई गई तो संबंधित वाहनों को दोबारा ATS बुलाकर पुनः परीक्षण कराना चाहिए। क्योंकि उनमें कुछ वाहन वास्तव में बिल्कुल फिट भी हो सकते हैं और कुछ गंभीर रूप से अनफिट। जांच किए बिना दोनों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।

फिरोजाबाद में अनफिट बसों को फिटनेस देने का आरोप

समस्या बिजनौर तक सीमित नहीं रही। फिरोजाबाद में ATS पर अनफिट स्लीपर बसों को फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करने की शिकायत के बाद स्टेशन के संचालन पर कार्रवाई की गई। झांसी में भी फिटनेस प्रक्रिया में कथित अवैध वसूली और अनियमितता के मामले में दस लोगों के खिलाफ FIR दर्ज होने तथा स्टेशन बंद होने की जानकारी सामने आई। बिजनौर, झांसी और फिरोजाबाद—तीनों मामलों को मिलाकर देखें तो यह अलग-अलग केंद्रों की समस्या से आगे बढ़कर निगरानी व्यवस्था पर प्रश्न बन जाता है। गाजियाबाद में भी जुलाई 2026 में ऐसा मामला सामने आया जिसमें टैक्स बकाया होने के बावजूद वाहन को ATS से फिटनेस प्रमाणपत्र जारी कर दिया गया, जिसके बाद आरटीओ प्रशासन ने जांच के लिए मामला उच्चाधिकारियों को भेजा।

ATS क्यों लाया गया था?

पुरानी व्यवस्था में व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस आरटीओ या निरीक्षण केंद्रों पर मोटर वाहन निरीक्षक द्वारा की जाती थी। शिकायतें रहती थीं कि परीक्षण में मानवीय विवेक बहुत अधिक है, वाहन बिना पर्याप्त जांच पास हो जाते हैं और दलाल तथा रिश्वत का नेटवर्क सक्रिय रहता है।इसीलिए केंद्र सरकार ने फिटनेस परीक्षण को मशीन आधारित करने की दिशा में ATS व्यवस्था विकसित की। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में बदलाव कर विभिन्न श्रेणियों के वाहनों के फिटनेस परीक्षण को चरणबद्ध तरीके से पंजीकृत Automated Testing Stations के माध्यम से कराने की व्यवस्था बनाई। सिद्धांततः ATS में मशीन परिणाम तय करती है, व्यक्ति नहीं। ब्रेक की क्षमता कितनी है, पहिए एक दिशा में चल रहे हैं या नहीं, सस्पेंशन कैसा है और हेडलाइट सही कोण पर है या नहीं—इन मानकों को उपकरण मापते हैं।यही वजह थी कि इसे भ्रष्टाचार घटाने वाली व्यवस्था बताया गया।

लेकिन ‘ऑटोमेटिक’ का मतलब इंसान बिल्कुल गायब नहीं

यहीं एक आम भ्रम है। ATS मशीन आधारित है, लेकिन पूरी प्रक्रिया में मानव निगरानी समाप्त नहीं होती।केंद्र सरकार ने नवंबर 2025 में Inspection & Certification Centres और Automated Testing Stations के संचालन संबंधी निर्देशों में यह अपेक्षा रखी कि स्वचालित परीक्षण और दृश्य परीक्षण से प्राप्त डेटा, तस्वीरों सहित, केंद्रीय सर्वर पर भेजा जाए।

यानी केवल मशीन पर किसी नंबर की एंट्री कर देने से फिटनेस पूरी नहीं मानी जा सकती। वाहन की पहचान, उसकी वास्तविक मौजूदगी, दृश्य जांच, टेस्ट डेटा और डिजिटल रिकॉर्ड एक-दूसरे से जुड़ना जरूरी है।यदि इनमें से एक कड़ी काटी जा सके तो पूरी स्वचालित प्रणाली को भी धोखा दिया जा सकता है।

अगस्त 2023 की यूपी SOP पर विवाद क्यों

आपकी उपलब्ध सामग्री के अनुसार उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग ने अगस्त 2023 में मानक संचालन प्रक्रिया जारी की थी जिसमें ATS की परीक्षण प्रक्रिया को सक्षम परिवहन अधिकारी के अनुमोदन के बाद ही फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करने और इसके लिए अधिकतम दो कार्य दिवस का समय रखने की व्यवस्था थी।इस विशिष्ट SOP का पूरा आधिकारिक दस्तावेज मुझे सार्वजनिक परिवहन विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं मिला, इसलिए इसके प्रत्येक शब्द को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया जा सका। लेकिन यदि यह प्रावधान लागू था तो मौजूदा मामलों में महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या फिटनेस परिणाम का विभागीय अनुमोदन वास्तव में हुआ, या प्रमाणपत्र स्वतः जारी हो रहे थे?यदि 10,056 संदिग्ध फिटनेस प्रमाणपत्र तीन महीने में निकले तो अनुमोदन की पूरी डिजिटल श्रृंखला का ऑडिट होना चाहिए।

वाहन की वास्तविक मौजूदगी साबित करने का सबसे आसान तरीका क्या?

आज तकनीक के रहते वाहन की ATS पर वास्तविक उपस्थिति साबित करना कठिन नहीं है।प्रवेश द्वार पर नंबर प्लेट पहचान कैमरा, GPS समय, प्रवेश और निकास CCTV, वाहन की चारों तरफ की तस्वीरें, चेसिस नंबर का डिजिटल मिलान और हर मशीन पर परीक्षण के समय की फोटो-वीडियो को एक ही रिकॉर्ड से जोड़ा जा सकता है।इसके बाद ऐसा प्रमाणपत्र जारी होना लगभग असंभव होना चाहिए जिसमें वाहन सेंटर आया ही न हो।यदि फिर भी प्रमाणपत्र बन रहा है तो या तो सॉफ्टवेयर नियंत्रण कमजोर है, या किसी स्तर पर डेटा को मैनुअल तरीके से बदलने की अनुमति है।यही सिस्टम ऑडिट का असली विषय होना चाहिए।

सड़क दुर्घटना से फिटनेस का संबंध कितना?

हाल में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे सहित कई मार्गों पर बस हादसों के बाद वाहनों की फिटनेस जांच भी सवालों में आई है। विभाग यह देख रहा है कि दुर्घटनाग्रस्त बसों को फिटनेस किस ATS ने दी थी और वे वास्तविक परीक्षण के लिए पहुंची थीं या नहीं।लेकिन यहां सावधानी जरूरी है—किसी दुर्घटनाग्रस्त वाहन के पास वैध फिटनेस प्रमाणपत्र होना यह स्वतः सिद्ध नहीं करता कि दुर्घटना फिटनेस घोटाले के कारण हुई।

हादसा चालक की थकान, तेज गति, मौसम, सड़क की स्थिति, टायर फटना, ब्रेक विफलता या अन्य कारणों से भी हो सकता है।सही जांच में दुर्घटना के वास्तविक यांत्रिक कारण का उस वाहन की अंतिम फिटनेस रिपोर्ट से मिलान होना चाहिए। यदि रिपोर्ट में ब्रेक 90 प्रतिशत प्रभावी बताए गए हों और दुर्घटना के बाद जांच में लंबे समय से खराब ब्रेक मिलें, तभी बड़ा प्रश्न बनेगा।

फिटनेस टेस्ट वास्तव में क्या जांचता है

व्यावसायिक वाहन की फिटनेस केवल प्रदूषण प्रमाणपत्र नहीं है।ATS में आम तौर पर ब्रेक की कार्यक्षमता, सस्पेंशन, स्टीयरिंग और साइड स्लिप, हेडलाइट की दिशा, गति मापक, ध्वनि, टायर और दूसरे सुरक्षा तत्वों की जांच की जाती है। कुछ दृश्य परीक्षण भी जरूरी रहते हैं।यह प्रमाणपत्र मूलतः इस बात का सरकारी सत्यापन है कि वाहन सड़क पर चलने योग्य स्थिति में है।इसलिए बिना वास्तविक परीक्षण फिटनेस जारी करना केवल राजस्व अनियमितता नहीं बल्कि प्रत्यक्ष सड़क सुरक्षा जोखिम है।

लखनऊ में अजीब स्थिति—दोनों ATS एक ही इलाके में

लखनऊ में अभी दो निजी ATS संचालित होने की जानकारी है और दोनों बख्शी का तालाब क्षेत्र में स्थित हैं। राज्य में जुलाई 2026 तक 27 जिलों में 34 ATS स्थापित होने की जानकारी सामने आई थी। यहां ट्रांसपोर्टरों की आपत्ति भौगोलिक है।लखनऊ का ट्रांसपोर्टनगर भारी व्यावसायिक वाहनों का प्रमुख केंद्र है। वहां से ट्रक को बख्शी का तालाब तक ले जाने में शहर के कई हिस्सों की नो-एंट्री समय सीमा आड़े आती है। ट्रांसपोर्ट संगठनों का कहना है कि जाने और लौटने में कभी-कभी दो दिन तक लग जाते हैं।यदि शहर में तीन ATS तक खोलने की अनुमति है, तो दो केंद्र कुछ ही दूरी पर क्यों स्वीकृत हुए—यह योजना संबंधी वैध सवाल है।

ट्रांसपोर्टनगर का I&C सेंटर बंद, मशीनें बेकार

लखनऊ के ट्रांसपोर्टनगर में पहले Inspection & Certification Centre यानी I&C सेंटर में वाहनों की फिटनेस जांच होती थी। नई व्यवस्था में व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस केवल ATS से अनिवार्य किए जाने के बाद यह सुविधा बंद हो गई।उत्तर प्रदेश में फरवरी 2026 तक केवल 18 ATS चालू थे और ATS न होने वाले जिलों में वाहन मालिकों को दूसरे जिले तक जाने की समस्या इतनी गंभीर हुई कि स्वयं परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने केंद्र सरकार से पुरानी फिटनेस व्यवस्था अस्थायी रूप से बहाल करने की मांग की थी। लखनऊ के ट्रांसपोर्टर अब चाहते हैं कि ट्रांसपोर्टनगर के I&C सेंटर को ही ATS मानकों के अनुरूप उन्नत कर दोबारा खोला जाए।उनका तर्क है कि यहां पहले से करोड़ों रुपये की मशीनें, परीक्षण लेन और आधारभूत ढांचा मौजूद है, इसलिए पूरी नई सुविधा बनाने की जरूरत कम होगी।

I&C और ATS में फर्क क्या है?

दोनों का उद्देश्य वाहन फिटनेस जांच है, लेकिन कानूनी और तकनीकी ढांचा अलग हो सकता है।पुराने I&C सेंटर सरकारी या निर्धारित संस्थागत ढांचे के तहत चलते थे। ATS के लिए केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में अलग पंजीकरण, उपकरण, सॉफ्टवेयर, डेटा हस्तांतरण, कैमरा और परीक्षण प्रोटोकॉल निर्धारित हैं। इसलिए केवल पुरानी मशीन मौजूद होना किसी I&C को स्वतः ATS नहीं बना देता।उसे मौजूदा मानकों के अनुसार प्रमाणित और पंजीकृत करना होगा।इसीलिए ट्रांसपोर्टनगर सेंटर को फिर से शुरू करने के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की स्वीकृति मांगी गई है।

केंद्र ने पुरानी मैनुअल फिटनेस क्यों रोकी

दिसंबर 2025 के केंद्रीय निर्देश के बाद उत्तर प्रदेश में उन जगहों पर भी पुरानी मैनुअल फिटनेस बंद हो गई जहां स्थानीय ATS उपलब्ध नहीं था। फरवरी 2026 में विधान परिषद में राज्य के परिवहन मंत्री ने स्वीकार किया कि इससे वाहन मालिकों को दिक्कत हो रही है और कुछ जिलों के वाहन फिटनेस के लिए दूसरे जिलों तक भेजने पड़ रहे हैं। यानी ATS व्यवस्था की समस्या दो तरफ है।जहां स्टेशन नहीं है वहां दूरी की समस्या है।और जहां स्टेशन है, वहां कुछ मामलों में प्रमाणपत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।

निजी ATS का आर्थिक मॉडल भी जांच का विषय

जब फिटनेस जांच निजी स्टेशन करते हैं तो स्टेशन की आय प्रत्येक वाहन परीक्षण से जुड़ी होती है।यह अपने आप गलत नहीं है—दुनिया में अनेक निरीक्षण सेवाएं निजी लाइसेंसधारी एजेंसियां करती हैं। लेकिन आर्थिक हित और नियामकीय शक्ति एक जगह आने पर मजबूत स्वतंत्र निगरानी जरूरी होती है।यदि स्टेशन अधिक से अधिक वाहन पास करने से कमाई बढ़ाता हो और असफल वाहन पर पुनः परीक्षण की व्यवस्था अलग हो, तो हितों के टकराव की संभावना का विश्लेषण होना चाहिए।

यही कारण है कि रैंडम ऑडिट, गुप्त निरीक्षण और केंद्रीय डेटा विश्लेषण ATS व्यवस्था में अनिवार्य होने चाहिए।

हर ATS की ‘फेल रेट’ सार्वजनिक हो

एक बहुत सरल तरीके से संदिग्ध स्टेशन पहचाने जा सकते हैं।यदि किसी ATS पर 99.9 प्रतिशत वाहन फिट हो रहे हों जबकि उसी क्षेत्र के दूसरे स्टेशन पर 15-20 प्रतिशत वाहन विभिन्न परीक्षणों में असफल हों, तो यह असामान्य पैटर्न होगा।इसी तरह एक मशीन एक घंटे में तकनीकी रूप से जितने वाहन जांच सकती है, उससे कहीं अधिक फिटनेस प्रमाणपत्र निकल रहे हों तो सिस्टम स्वतः अलर्ट दे सकता है।इस तरह की डेटा एनालिटिक्स से 10 हजार प्रमाणपत्र तीन महीने बाद नहीं बल्कि पहले सप्ताह में पकड़े जा सकते हैं।

CCTV केवल रिकॉर्डिंग नहीं, प्रमाणपत्र से लिंक हो

बिजनौर प्रकरण में CCTV और रजिस्टर से विसंगति पकड़ी गई। लेकिन बेहतर व्यवस्था यह होगी कि हर फिटनेस प्रमाणपत्र से उस वाहन का समय-मुद्रित CCTV क्लिप या फोटो रिकॉर्ड स्वतः जुड़ा हो।प्रमाणपत्र संख्या क्लिक करते ही अधिकारी देख सके कि वाहन कब प्रवेश किया, किस टेस्ट लेन से गुजरा और कब बाहर निकला।

इससे जांच के लिए महीनों बाद अलग रजिस्टर खंगालने की जरूरत नहीं पड़ेगी।केंद्र के 2025 निर्देशों में परीक्षण और दृश्य जांच के फोटो सहित डेटा सर्वर पर भेजने की बात इसी प्रकार के डिजिटल नियंत्रण की दिशा में है।

बिजनौर के 10,056 वाहनों की दोबारा जांच जरूरी

यदि जांच में यह साबित हो चुका है कि वाहनों की स्टेशन पर उपस्थिति नहीं थी, तो उन सभी प्रमाणपत्रों का अलग ऑडिट होना चाहिए।इसमें वाहन मालिकों की जिम्मेदारी भी अलग-अलग हो सकती है।कुछ मालिकों ने जानबूझकर दलाल या स्टेशन से मिलीभगत कर बिना वाहन ले जाए प्रमाणपत्र लिया हो सकता है। लेकिन संभव है कुछ ने किसी एजेंट को वाहन कागज दिए हों और उन्हें पता ही न हो कि वास्तविक परीक्षण नहीं हुआ।इसलिए सभी वाहन मालिकों को अपराधी मानने के बजाय वाहन को तत्काल दोबारा फिटनेस परीक्षण के लिए बुलाना पहला कदम होना चाहिए।इसके बाद भुगतान और डिजिटल रिकॉर्ड से मिलीभगत की जांच अलग हो सकती है।

झांसी-बिजनौर-फिरोजाबाद के बाद राज्यव्यापी ऑडिट क्यों नहीं?

तीन अलग जिलों में स्टेशन बंद या कार्रवाई के दायरे में आ चुके हैं। गाजियाबाद में भी नई शिकायत सामने आई है। ऐसी स्थिति में केवल शिकायत आने पर जांच करना पर्याप्त नहीं दिखाई देता।प्रदेश के सभी ATS का कम से कम छह महीने का डिजिटल ऑडिट किया जा सकता है—कितने वाहन बुक हुए, कितने सेंटर में कैमरे पर दिखे, कितने पास-फेल हुए, औसत टेस्ट समय कितना था और कितने प्रमाणपत्र रात या असामान्य समय पर जारी हुए।यदि यह डेटा ‘वाहन’ पोर्टल पर पहले से मौजूद है तो कई अनियमितताएं कंप्यूटर स्वतः पकड़ सकता है।

ऑटोमेशन भ्रष्टाचार खत्म नहीं करता, उसका रूप बदल सकता है

ATS की स्थापना का मूल तर्क था कि मशीन रिश्वत नहीं लेती। यह बात सही है।लेकिन मशीन में डेटा डालने वाला, कैमरा नियंत्रित करने वाला, सॉफ्टवेयर का अधिकार रखने वाला और अंतिम प्रमाणपत्र जारी करने वाला इंसान ही होता है।

यदि व्यवस्था में ‘बैकडोर’ या मैनुअल ओवरराइड बचा हो तो पुराने भ्रष्टाचार का स्थान डिजिटल हेरफेर ले सकता है।इसलिए ऑटोमेशन का सही अर्थ मानवीय विवेक खत्म करना नहीं, हर मानवीय हस्तक्षेप को रिकॉर्ड और ऑडिट योग्य बनाना होना चाहिए।

सबसे खतरनाक फिटनेस घोटाला वह है जो दुर्घटना के बाद पता चले

किसी अनफिट बस का ब्रेक फेल होने के बाद यह पता चले कि उसे महीनों पहले बिना जांच फिट घोषित कर दिया गया था, तब कार्रवाई बहुत देर से होगी।फिटनेस व्यवस्था का पूरा उद्देश्य दुर्घटना होने से पहले खराब वाहन सड़क से रोकना है।इसीलिए ATS में भ्रष्टाचार किसी सामान्य प्रमाणपत्र घोटाले से अधिक गंभीर है। यहां गलत कागज सीधे दर्जनों यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ सकता है।

लखनऊ की समस्या का समाधान—तीसरा ATS सही स्थान पर

लखनऊ में दोनों मौजूदा ATS यदि बख्शी का तालाब में हैं तो ट्रांसपोर्टरों की मांग व्यावहारिक रूप से विचार योग्य है कि शहर के दूसरे हिस्से, विशेषकर व्यावसायिक वाहन केंद्र ट्रांसपोर्टनगर में सुविधा हो।पुराने I&C सेंटर को मानकों के अनुरूप ATS में बदलना संभव है या नहीं, इसका तकनीकी परीक्षण MoRTH को करना होगा। इसे केवल इसलिए चालू नहीं किया जा सकता कि मशीनें पहले से मौजूद हैं।लेकिन करोड़ों रुपये के सार्वजनिक संसाधन निष्क्रिय पड़े हों और दूसरी तरफ ट्रकों को शहर पार कर कई घंटे या दिन गंवाने पड़ें तो इसकी लागत-लाभ समीक्षा अवश्य होनी चाहिए।

अब पांच सुधार जरूरी

इस पूरे प्रकरण से व्यवस्था में पांच बुनियादी सुधार स्पष्ट दिखाई देते हैं—वाहन की वास्तविक उपस्थिति को नंबर-प्लेट कैमरा और समय-मुद्रित तस्वीर से अनिवार्य रूप से जोड़ना; हर परीक्षण डेटा को केंद्रीय सर्वर पर भेजना; असामान्य पास दर और असंभव परीक्षण संख्या पर स्वतः अलर्ट; संदिग्ध प्रमाणपत्र वाले वाहनों की अनिवार्य पुनः जांच; और प्रत्येक ATS की प्रदर्शन रिपोर्ट सार्वजनिक करना।इससे स्टेशन का नाम, प्रतिदिन परीक्षण संख्या, पास-फेल अनुपात, शिकायतें और नियामकीय कार्रवाई नागरिक भी देख सकेंगे।

ATS व्यवस्था इसलिए शुरू की गई थी कि वाहन मालिक और अधिकारी के बीच सौदेबाजी खत्म हो और मशीन तय करे कि वाहन सड़क पर चलने लायक है या नहीं। लेकिन बिजनौर में यदि वास्तव में 10,056 वाहन मशीन के सामने आए बिना फिट घोषित हो गए, तो समस्या मशीन में नहीं बल्कि उस व्यवस्था में है जिसने मशीन के परिणाम को भी दरकिनार करने का रास्ता छोड़ दिया।

अब सवाल केवल यह नहीं कि बिजनौर का लाइसेंस क्यों रद्द हुआ। असली सवाल यह है कि पूरे उत्तर प्रदेश में कितने फिटनेस प्रमाणपत्र ऐसे हैं जिनके पीछे वास्तव में कोई परीक्षण हुआ ही नहीं। जब तक राज्य के सभी ATS के डिजिटल रिकॉर्ड, CCTV और वाहन उपस्थिति का स्वतंत्र ऑडिट नहीं होता, तब तक ‘ऑटोमेटिक फिटनेस’ का प्रमाणपत्र अपने आप सड़क सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता।

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