BJP History in UP: कैसे बदली UP की सियासत? जनसंघ से BJP के शिखर तक का सफर

BJP History in Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश में भाजपा की पूरी राजनीतिक यात्रा जानिए—जनसंघ से 1991 की सत्ता, कल्याण सिंह, राम मंदिर आंदोलन, 2002-12 के हाशिये, मोदी-शाह की वापसी, योगी सरकार और 2024 के लोकसभा झटके तक।

Yogesh Mishra
Published on: 9 Aug 2026 7:16 PM IST
BJP History in Uttar Pradesh
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BJP History in Uttar Pradesh 

BJP History in Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की यात्रा स्वतंत्रता के बाद किसी भी राजनीतिक दल के सबसे नाटकीय उत्थान, पतन और पुनरुत्थान की कहानियों में से एक है। इसका आरंभ 1980 में भाजपा के गठन से नहीं। बल्कि 1951 में स्थापित भारतीय जनसंघ से होता है। जनसंघ ने उत्तर प्रदेश में शहरी हिंदू मध्यवर्ग, व्यापारियों, शिक्षित सवर्णों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों और कांग्रेस की नीतियों से असंतुष्ट राष्ट्रवादी मतदाताओं के बीच धीरे-धीरे स्थान बनाया। 1952 में केवल दो विधानसभा सीटों से शुरू हुई यह धारा 1967 में 98 सीटों तक पहुँची, 1977 में जनता पार्टी में समाहित हुई और 1980 में भारतीय जनता पार्टी के रूप में पुनर्गठित हुई। भाजपा ने 1980 में 11 और 1985 में 16 विधानसभा सीटों से शुरुआत की।लेकिन अयोध्या आंदोलन, लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और कल्याण सिंह के पिछड़ा–सवर्ण सामाजिक गठबंधन के सहारे 1991 में 221 सीटों का बहुमत प्राप्त कर लिया।

इसके बाद भी भाजपा की यात्रा सीधी नहीं रही। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उसकी सरकार गई।1993 में सपा–बसपा गठबंधन ने उसे सत्ता से रोका। 1996 से 2002 के बीच बसपा के साथ तीन बार सत्ता-साझेदारी हुई। कल्याण सिंह और पार्टी नेतृत्व के बीच संघर्ष ने संगठन तोड़ा और 2002 से 2012 के बीच भाजपा 88 से घटकर 47 विधायकों तथा लगभग 15 प्रतिशत मत तक सिमट गई। इस अवधि में उत्तर प्रदेश की राजनीति सपा और बसपा के बीच केंद्रित हो गई और भाजपा कई चुनावों में तीसरे स्थान की पार्टी बन गई।


2014 के लोकसभा चुनाव ने इस स्थिति को उलट दिया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, अमित शाह की संगठनात्मक रणनीति, गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों तक विस्तार, हिंदुत्व, कांग्रेस-विरोध, कल्याणकारी योजनाओं और बूथ प्रबंधन ने भाजपा को उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 लोकसभा सीटें दिलाईं। 2017 में उसने 312 विधानसभा सीटें जीतकर ऐसा बहुमत प्राप्त किया, जो 1991 की राम लहर से भी बड़ा था। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और 2022 में भाजपा ने 255 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश में लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई—यह उपलब्धि राज्य में दशकों बाद किसी सत्तारूढ़ दल को मिली।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें 62 से घटकर 33 रह गईं और राज्य का मत लगभग 50 प्रतिशत से घटकर करीब 41 प्रतिशत रह गया। पार्टी सत्ता में बनी रही। उसका मत आज भी किसी एक दल में सबसे बड़ा है। पर समाजवादी पार्टी–कांग्रेस गठबंधन, संविधान और आरक्षण का प्रश्न, बेरोजगारी, पेपर लीक, प्रत्याशी-विरोध, दलित–पिछड़ा पुनर्संयोजन तथा स्थानीय असंतोष ने उसकी अजेयता को चुनौती दी। अगस्त, 2026 में भाजपा के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में 257 सदस्य, विधान परिषद में 79 सदस्य, लोकसभा में उत्तर प्रदेश से 33 सांसद और राज्यसभा में उत्तर प्रदेश कोटे के लगभग 24 सदस्य हैं। यह राज्य की सबसे बड़ी संगठनात्मक और विधायी शक्ति है। लेकिन 2027 का विधानसभा चुनाव तय करेगा कि 2024 एक अस्थायी झटका था या उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया संतुलन बनने की शुरुआत।

भारतीय जनसंघ की स्थापना और उत्तर प्रदेश में उसकी जड़ें

भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक और संगठनात्मक पूर्वज भारतीय जनसंघ थी। जिसकी स्थापना डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जनसंघ को कार्यकर्ता, संगठन और वैचारिक आधार दिया। उत्तर प्रदेश जनसंघ के लिए प्रारंभ से महत्वपूर्ण था, क्योंकि राज्य में संघ की शाखाओं, हिंदीभाषी शहरी मध्यवर्ग, व्यापारी समुदाय, शिक्षण संस्थानों और कांग्रेस-विरोधी हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति के लिए पर्याप्त सामाजिक आधार मौजूद था। अटल बिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख, दीनदयाल उपाध्याय और बाद में लालकृष्ण आडवाणी व डॉ मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं की राजनीतिक यात्रा में उत्तर प्रदेश का केंद्रीय स्थान रहा। दीनदयाल उपाध्याय उत्तर प्रदेश से निकलकर जनसंघ के प्रमुख संगठनकर्ता और वैचारिक मार्गदर्शक बने; उनके ‘एकात्म मानववाद’सको बाद में भाजपा ने भी अपनी आधिकारिक वैचारिक प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया।

जनसंघ का प्रारंभिक आधार मुख्यतः शहरों, व्यापारियों, बनिया–कायस्थ–ब्राह्मण मतदाताओं और विभाजन के बाद आए शरणार्थी समुदायों में था। कांग्रेस उस समय स्वतंत्रता आंदोलन की सर्वव्यापी शक्ति थी। इसलिए जनसंघ के लिए गाँवों, दलितों, पिछड़ी जातियों और किसानों के बीच स्थान बनाना कठिन था। फिर भी संघ के अनुशासित कैडर, हिंदी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, कश्मीर के पूर्ण एकीकरण, समान नागरिक संहिता, गौ-संरक्षण तथा कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की आलोचना ने उसे धीरे-धीरे विशिष्ट पहचान दी।

जनसंघ का विधानसभा प्रदर्शन

पुराने चुनावों में उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल सीटें और परिसीमन आज से अलग थे। फिर भी जनसंघ की बढ़ती शक्ति को चुनावी परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाते हैं।

विधानसभा चुनाव जनसंघ की जीती सीटें मत-प्रतिशत राजनीतिक स्थिति


1952 2 लगभग 6.45% सीमित शहरी उपस्थिति

1957 17 लगभग 9.84% मुख्य विपक्षी धाराओं में प्रवेश

1962 49 लगभग 16.64% प्रमुख विपक्षी शक्ति

1967 98 लगभग 21.67% कांग्रेस-विरोधी सरकार में भागीदारी

1969 49 लगभग 17.93% विभाजित विपक्ष

1974 61 लगभग 17.12% मजबूत किंतु सत्ता से दूर

चुनाव आयोग आधारित चुनावी संकलन में 1980 में भाजपा की 11 सीटों से 2017 की 312 सीटों तक की यात्रा दर्ज है। 2022 में भाजपा की सीटें 312 से घटकर 255 हुईं। लेकिन उसका मत 39.67 प्रतिशत से बढ़कर 41.29 प्रतिशत हो गया। इसका अर्थ है कि सीटों में गिरावट के बावजूद पार्टी ने मतदाताओं की कुल संख्या और वोट हिस्सेदारी बढ़ाई।

1980 और 1985—कमल खिलने से पहले का संघर्ष

1980 में भाजपा ने लगभग पूरे उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ा। लेकिन उसे केवल 11 सीटें और 10.76 प्रतिशत वोट मिले। जनता पार्टी का विभाजन, इंदिरा गांधी की वापसी और भाजपा की अस्पष्ट वैचारिक दिशा उसके नुकसान के कारण थे। पार्टी न पूरी तरह जनसंघ के पुराने हिंदुत्व पर थी, न ही ‘गांधीवादी समाजवाद’ की नई भाषा से गरीब और पिछड़ा मतदाता जुड़ रहा था।

1984 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर चली और भाजपा पूरे देश में केवल दो सीटें जीत सकी। उत्तर प्रदेश में उसे कोई सीट नहीं मिली। 1985 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 16 सीटों और 9.83 प्रतिशत वोट पर सीमित रही। इस पराजय के बाद भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के भीतर यह बहस तेज हुई कि नरम और अस्पष्ट वैचारिक राजनीति से कांग्रेस का विकल्प नहीं बना जा सकता।

यहीं से लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व, विश्व हिंदू परिषद के राम जन्मभूमि अभियान और अयोध्या प्रश्न की राजनीति ने भाजपा का मार्ग बदलना शुरू किया।

अयोध्या आंदोलन और भाजपा का विस्फोटक उत्थान

अयोध्या में राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद बहुत पुराना था।लेकिन 1980 के दशक में विश्व हिंदू परिषद ने इसे राष्ट्रव्यापी आंदोलन बनाया। 1984 की राम जन्मभूमि यात्रा, 1986 में विवादित स्थल का ताला खुलना, 1989 का शिलान्यास और 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा ने मुद्दे को चुनावी राजनीति के केंद्र में ला दिया। रथयात्रा ने भाजपा के कार्यकर्ताओं, संघ परिवार और धार्मिक संगठनों को विशाल जन-अभियान में बदल दिया।उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव सरकार ने अक्टूबर–नवंबर 1990 में अयोध्या की ओर बढ़ रहे कारसेवकों को रोकने के लिए पुलिस बल का प्रयोग किया। गोलीबारी में लोग मारे गए। भाजपा ने इन घटनाओं को हिंदू आस्था पर राज्य दमन के रूप में प्रस्तुत किया। मुलायम सिंह की मुस्लिम समर्थक और धर्मनिरपेक्ष नेता की छवि मजबूत हुई, लेकिन हिंदू मतों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर ध्रुवीकृत हो गया।

1989 के विधानसभा चुनाव में 57 सीटें जीतने वाली भाजपा 1991 में 221 सीटें और 31.45 प्रतिशत वोट लेकर स्पष्ट बहुमत में आ गई। यह वृद्धि केवल दो वर्षों में 164 सीटों की थी—उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास की सबसे तेज राजनीतिक छलाँगों में से एक।

कल्याण सिंह—भाजपा के पहले मुख्यमंत्री और सामाजिक विस्तार के निर्माता

24 जून, 1991 को कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने। वे लोध समुदाय से आते थे। पर भाजपा को उसके पारंपरिक ब्राह्मण–ठाकुर–वैश्य आधार से बाहर पिछड़ी जातियों तक ले जाने वाले पहले बड़े नेता थे। उनकी छवि कठोर प्रशासक, राम मंदिर आंदोलन के समर्थक और पिछड़ा वर्ग के स्वाभिमानी नेता की थी।


कल्याण सिंह सरकार ने नकल-विरोधी कानून, प्रशासनिक अनुशासन और अयोध्या में मंदिर निर्माण के अनुकूल राजनीतिक वातावरण को प्रमुखता दी। शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के कार्यकाल में नकल अध्यादेश ने सरकार को कठोर प्रशासन की पहचान दी। दूसरी ओर, अयोध्या आंदोलन सरकार के हर निर्णय पर छाया रहा।

6 दिसंबर, 1992 को कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद ढहा दी। राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र को विवादित संरचना की सुरक्षा का आश्वासन दिया था। ढाँचा गिरने के बाद कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और केंद्र ने उत्तर प्रदेश सरकार बर्खास्त कर दी। भाजपा समर्थकों के बीच वे उस नेता के रूप में स्थापित हुए जिसने राम मंदिर आंदोलन के लिए सत्ता का त्याग किया, जबकि आलोचकों के अनुसार उनकी सरकार संवैधानिक दायित्व और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रही। भाजपा की अपनी आधिकारिक जीवनी भी उन्हें उत्तर प्रदेश का पहला भाजपा मुख्यमंत्री और बाद में पार्टी से अलग होकर राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाने वाला नेता दर्ज करती है।

1993—वोट बढ़ा, लेकिन सत्ता चली गई

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 177 सीटें और लगभग 33.30 प्रतिशत मत प्राप्त किए। यह 1991 के 31.45 प्रतिशत से अधिक था। लेकिन सीटें 221 से घटकर 177 हो गईं। इसका कारण समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का ऐतिहासिक गठबंधन था।

सपा–बसपा ने पिछड़े, दलित और मुस्लिम मतों को एक साथ लाकर भाजपा के हिंदू सामाजिक गठबंधन का मुकाबला किया। प्रसिद्ध नारा चला—“मिले मुलायम–कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।” भाजपा सबसे बड़ा दल बनी। लेकिन सरकार नहीं बना सकी। मुलायम सिंह यादव बसपा और अन्य दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री बने।यह परिणाम भाजपा के लिए पहला बड़ा सबक था कि केवल कुल मत बढ़ना पर्याप्त नहीं है।विपक्षी सामाजिक समूह यदि एकजुट हो जाएँ तो सीटों का गणित बदल सकता है। यही स्थिति किसी दूसरे रूप में 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर दिखाई दी।

1995 में भाजपा–बसपा गठबंधन

जून, 1995 में बसपा ने मुलायम सिंह सरकार से समर्थन वापस लिया। लखनऊ गेस्ट हाउस कांड के बाद भाजपा ने मायावती को समर्थन दिया। वह पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। यह गठबंधन वैचारिक रूप से असामान्य था—राम मंदिर आंदोलन की भाजपा और आक्रामक दलित राजनीति वाली बसपा सत्ता में साथ थीं।भाजपा की रणनीति समाजवादी पार्टी को सत्ता से हटाना, दलित मतदाताओं तक पहुँच बनाना और सरकार में प्रभाव कायम रखना थी। बसपा के लिए भाजपा समर्थन मुख्यमंत्री पद तक पहुँचने का साधन था। लेकिन अविश्वास, प्रशासनिक टकराव और सत्ता-साझेदारी के विवाद के कारण सरकार कुछ महीनों में गिर गई।


यह पहला अवसर था जब भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपने मुख्य वैचारिक विरोधी सामाजिक आधार वाले दल से सत्ता के लिए समझौता किया। आने वाले वर्षों में भाजपा–बसपा गठबंधन दोबारा बना और फिर टूटा।

1996 का चुनाव और छह-छह महीने का समझौता

1996 के विधानसभा चुनाव में भाजपा लगभग 32.5 प्रतिशत वोट और 174 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी।लेकिन बहुमत नहीं मिला। सपा को 110 और बसपा को 67 सीटें मिलीं। लंबे राष्ट्रपति शासन के बाद भाजपा और बसपा ने सत्ता साझा करने का समझौता किया। व्यवस्था के अनुसार मायावती और भाजपा नेता छह-छह महीने मुख्यमंत्री बनने वाले थे।

मार्च, 1997 में मायावती मुख्यमंत्री बनीं। छह महीने बाद भाजपा के कल्याण सिंह ने सत्ता संभाली। इसके तुरंत बाद बसपा ने समर्थन वापस लेने का प्रयास किया। लेकिन उसके विधायकों का एक गुट टूटकर कल्याण सिंह सरकार के साथ आ गया। कांग्रेस और जनता दल के भी कई विधायक अलग-अलग गुट बनाकर भाजपा सरकार को समर्थन देने लगे।कल्याण सिंह ने व्यापक लेकिन वैचारिक रूप से असमान गठबंधन के सहारे सरकार बचाई। यह सरकार बहुमत जुटाने की असाधारण राजनीतिक क्षमता का उदाहरण थी।लेकिन दलबदल, मंत्री पदों के वितरण और शासन में अस्थिरता के आरोपों से घिरी रही।

भाजपा की सबसे बड़ी आंतरिक टूट—कल्याण सिंह का जाना

1998–99 तक भाजपा के भीतर कल्याण सिंह और पार्टी के अन्य नेताओं के बीच संघर्ष बढ़ गया। एक ओर कल्याण सिंह अपने लोध और पिछड़ा आधार तथा मुख्यमंत्री पद की लोकप्रियता के कारण स्वयं को अपरिहार्य मानते थे। दूसरी ओर पार्टी के ब्राह्मण–ठाकुर नेता, केंद्रीय नेतृत्व और अटल बिहारी वाजपेयी के निकट गुट उनसे असंतुष्ट थे। प्रशासन, कानून-व्यवस्था, टिकट वितरण, अटल बिहारी वाजपेयी की लखनऊ सीट के चुनाव प्रबंधन और कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह की भूमिका को लेकर तनाव बढ़ा।

नवंबर, 1999 में कल्याण सिंह को हटाकर रामप्रकाश गुप्त मुख्यमंत्री बनाए गए। इसके बाद कल्याण सिंह भाजपा से बाहर हो गए और दिसंबर 1999 में राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई। 2002 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने चार सीटें और लगभग एक प्रतिशत मत प्राप्त किया। कल्याण सिंह स्वयं अतरौली से जीते। पार्टी का राज्यव्यापी प्रभाव सीमित रहा। लेकिन लोध-बहुल क्षेत्रों में उसने भाजपा को नुकसान पहुँचाया। उनकी आधिकारिक भाजपा जीवनी और समकालीन अभिलेख राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के गठन की पुष्टि करते हैं। यह भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई की सबसे महत्वपूर्ण वास्तविक टूट थी। इससे पार्टी को एक ऐसा पिछड़ा नेता खोना पड़ा जिसने उसे 1991 में बहुमत तक पहुँचाया था। भाजपा की छवि फिर अधिक सवर्ण-केंद्रित दिखने लगी और गैर-यादव पिछड़ों में उसका विस्तार धीमा पड़ गया।

रामप्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह का दौर

कल्याण सिंह को हटाने के बाद रामप्रकाश गुप्त को मुख्यमंत्री बनाया गया।लेकिन वे जनाधार और प्रशासनिक नियंत्रण के मामले में कमजोर माने गए। अक्टूबर, 2000 में राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने। राजनाथ सिंह ठाकुर समुदाय से आने वाले शिक्षित, संघ पृष्ठभूमि वाले और संगठन तथा प्रशासन का अनुभव रखने वाले नेता थे। उन्होंने किसान, कानून-व्यवस्था और आरक्षण के भीतर अति पिछड़ों तथा अति दलितों के लिए अलग हिस्सेदारी जैसे प्रश्न उठाए।


राजनाथ सिंह का प्रयास भाजपा को केवल राम मंदिर और सवर्ण राजनीति से आगे सामाजिक न्याय की दिशा देने का था, लेकिन उनके पास बहुत कम समय था। कल्याण सिंह के जाने, सरकार की अस्थिरता, लंबे शासन से पैदा सत्ता-विरोध, भाजपा–बसपा के पुराने टकराव तथा सपा की मजबूत वापसी ने 2002 के चुनाव में पार्टी को भारी नुकसान पहुँचाया।

2002—88 सीटें और भाजपा के दीर्घ हाशिये की शुरुआत

2002 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 88 सीटों और 20.08 प्रतिशत मत पर आ गई। यह 1996 की 174 सीटों से लगभग आधी थी। समाजवादी पार्टी 143 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी, जबकि बसपा ने 98 सीटें जीतीं।भाजपा ने चुनाव के बाद फिर बसपा का समर्थन किया और मायावती मई 2002 में मुख्यमंत्री बनीं। इस सरकार में भाजपा की भूमिका कनिष्ठ सहयोगी की थी। अयोध्या आंदोलन के शिखर पर राज्य चलाने वाली पार्टी अब दूसरे दल को मुख्यमंत्री बनाने पर निर्भर थी।

अगस्त, 2003 में भाजपा–बसपा संबंध फिर टूट गए। मायावती ने इस्तीफा दिया और मुलायम सिंह यादव ने बसपा के बागी विधायकों तथा अन्य समूहों के समर्थन से सरकार बना ली। भाजपा न सरकार बना सकी, न प्रभावी विपक्ष की केंद्रीय शक्ति बन पाई। यहीं से 2002–2012 का वह दशक शुरू हुआ जिसमें उत्तर प्रदेश की राजनीति मुख्यतः सपा और बसपा के बीच घूमती रही।

2004 लोकसभा चुनाव—वाजपेयी के बावजूद गिरावट

अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ से सांसद और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का सबसे स्वीकार्य चेहरा थे। इसके बावजूद 2004 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा केवल दस सीटें जीत सकी। उसका मत लगभग 22 प्रतिशत रहा। ‘इंडिया शाइनिंग’ अभियान ग्रामीण संकट, बेरोजगारी और स्थानीय सामाजिक समीकरणों को पूरी तरह संबोधित नहीं कर पाया।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की समस्या यह थी कि अटल बिहारी वाजपेयी की व्यक्तिगत लोकप्रियता को प्रदेशव्यापी संगठनात्मक ऊर्जा में नहीं बदला जा सका। राम मंदिर प्रश्न तत्काल चुनावी उभार देने की स्थिति में नहीं था। कल्याण सिंह का पिछड़ा आधार कमजोर हो चुका था। सपा ने मुस्लिम–यादव तथा बसपा ने दलित–सर्वजन गठबंधन विकसित कर लिया था और भाजपा के पास स्पष्ट मुख्यमंत्री चेहरा नहीं था।

2007—सपा और बसपा के पीछे तीसरे स्थान पर

2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जनता दल यूनाइटेड और अपना दल के साथ समझौता किया। भाजपा ने लगभग 350 सीटों पर चुनाव लड़ा।लेकिन केवल 51 सीटें और 16.97 प्रतिशत मत प्राप्त किए। बसपा ने 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल किया और सपा 97 सीटों पर रही।

भाजपा के पतन के प्रमुख कारणों में कल्याण सिंह के बाद मजबूत ओबीसी नेतृत्व का अभाव, प्रदेश नेतृत्व की गुटबाजी, ब्राह्मण मतों पर बसपा की सफल पहुँच, सपा के विरुद्ध बसपा को अधिक सक्षम विकल्प मानना, राम मंदिर मुद्दे की चुनावी थकान और स्थानीय संगठन में निष्क्रियता शामिल थे। मायावती ने दलित–ब्राह्मण सामाजिक इंजीनियरिंग से भाजपा के पारंपरिक ब्राह्मण आधार में सेंध लगाई। सतीश चंद्र मिश्र के नेतृत्व में ब्राह्मण सम्मेलनों ने भाजपा के उस वर्ग को बसपा की ओर आकर्षित किया जो राज्य में सत्ता और प्रतिनिधित्व चाहता था।

2009—लोकसभा में केवल दस सीटें

2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर उत्तर प्रदेश में केवल दस सीटें जीत सकी और उसका मत लगभग 17.5 प्रतिशत रहा। राष्ट्रीय स्तर पर लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। लेकिन उत्तर प्रदेश में पार्टी के पास ऐसा सामाजिक गठबंधन नहीं था जो सपा, बसपा और कांग्रेस तीनों को पीछे छोड़ सके।

इसी चुनाव से पहले कल्याण सिंह दूसरी बार भाजपा से अलग हुए। जनवरी 2009 में उन्होंने पार्टी पर उपेक्षा और अपमान का आरोप लगाकर इस्तीफा दिया और समाजवादी पार्टी के साथ निकटता बनाई। वे एटा से निर्दलीय सांसद चुने गए। मुलायम सिंह के साथ उनकी निकटता से सपा के मुस्लिम मतदाताओं में असंतोष हुआ, पर भाजपा को भी लोध-बहुल क्षेत्रों में नुकसान पहुँचा।

2010 में कल्याण सिंह ने अपने पुत्र राजवीर सिंह के नेतृत्व में जन क्रांति पार्टी बनवाई। इस दल ने 2012 का विधानसभा चुनाव लड़ा। लेकिन उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। जनवरी 2013 में जन क्रांति पार्टी और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का भाजपा में विलय हो गया।

2012—47 सीटें और भाजपा का विधानसभा न्यूनतम

2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 398 सीटें लड़ीं।लेकिन केवल 47 सीटें और 15 प्रतिशत मत प्राप्त किए। पार्टी सपा, बसपा और कांग्रेस–रालोद गठबंधन के बाद कई क्षेत्रों में तीसरे या चौथे स्थान पर थी। समाजवादी पार्टी 224 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत में आई।

यह भाजपा के लिए विचित्र स्थिति थी। उत्तर प्रदेश ने अटल बिहारी वाजपेयी, राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, डॉ मुरली मनोहर जोशी और अनेक राष्ट्रीय नेता दिए थे। लेकिन पार्टी के पास राज्य स्तर पर स्वीकार्य मुख्यमंत्री चेहरा और व्यापक जातीय गठबंधन नहीं था। अलग-अलग चुनावों में उमा भारती, कलराज मिश्र, सूर्य प्रताप शाही, रमापति राम त्रिपाठी और राजनाथ सिंह जैसे नाम सक्रिय रहे, पर नेतृत्व सामूहिक और अस्पष्ट दिखाई देता रहा।

भाजपा हाशिये पर क्यों गई

2002 से 2012 के बीच भाजपा के हाशिये पर जाने के कुछ स्पष्ट कारण थे। कल्याण सिंह को हटाने से पिछड़ा आधार कमजोर हुआ।राम मंदिर आंदोलन की तीव्रता घट गई। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद भावनात्मक रूप से उत्तर प्रदेश से जुड़ा सर्वमान्य राष्ट्रीय चेहरा नहीं था। सपा और बसपा के पास स्पष्ट सामाजिक आधार और मुख्यमंत्री चेहरे थे। भाजपा के प्रदेश नेताओं में गुटबाजी थी। ब्राह्मण मत कभी बसपा और कभी कांग्रेस की ओर गया। गैर-यादव पिछड़े छोटे दलों और स्थानीय नेताओं में बँटे हुए थे। तथा पार्टी नगर निकाय और कुछ संसदीय क्षेत्रों तक सीमित होती जा रही थी।

नरेंद्र मोदी, अमित शाह और 2014 की ऐतिहासिक वापसी

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। उन्होंने वाराणसी से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। इस निर्णय ने उत्तर प्रदेश को चुनाव अभियान का केंद्र बना दिया। अमित शाह को राज्य का चुनाव प्रभारी बनाया गया। उन्होंने बूथ प्रबंधन, जातीय गणना, उम्मीदवार चयन, संघ समन्वय और क्षेत्रवार रणनीति पर काम किया।


भाजपा ने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, कांग्रेस-विरोधी माहौल, भ्रष्टाचार, महँगाई, विकास और मजबूत नेतृत्व की माँग को एक अभियान में जोड़ा। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन टिकट वितरण और सामाजिक प्रतिनिधित्व में था। पार्टी ने केवल ब्राह्मण–ठाकुर–वैश्य आधार पर निर्भर रहने के बजाय कुर्मी, लोध, मौर्य, शाक्य, सैनी, कुशवाहा, निषाद तथा अन्य गैर-यादव पिछड़ी जातियों को बड़ी संख्या में प्रतिनिधित्व दिया।

2014 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 लोकसभा सीटें जीतीं। सहयोगी अपना दल ने दो सीटें जीतीं और एनडीए का कुल आँकड़ा 73 रहा। भाजपा का मत लगभग 42.6 प्रतिशत था। 2009 की दस सीटों से 71 सीटों तक पहुँचना आधुनिक उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी संसदीय छलाँग थी।

2014 की विजय किन कारणों से मिली?

2014 की विजय पाँच स्तरों पर बनी। पहला, नरेंद्र मोदी ने पिछड़ी जाति से आने वाले नेता और विकास समर्थक राष्ट्रीय चेहरे—दोनों की पहचान को जोड़ा। दूसरा, अमित शाह ने निर्वाचन क्षेत्र और बूथ स्तर तक जातीय तथा संगठनात्मक सूक्ष्म प्रबंधन किया। तीसरा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं में लंबे समय बाद पूर्ण समन्वय बना। चौथा, समाजवादी पार्टी सरकार के विरुद्ध कानून-व्यवस्था, दंगों, परिवारवाद और कथित यादव पक्षपात का मुद्दा प्रभावी रहा। पाँचवाँ, बसपा ने पर्याप्त वोट प्राप्त किए। लेकिन कोई सीट नहीं जीत सकी, जिससे विपक्षी मतों के विभाजन का बड़ा लाभ भाजपा को मिला। 2014 ने भाजपा का सामाजिक चरित्र बदल दिया। वह उत्तर प्रदेश में केवल सवर्ण और शहरी पार्टी नहीं रही। गैर-यादव पिछड़े और गैर-जाटव दलित उसके नए निर्णायक आधार बने।

केशव प्रसाद मौर्य और 2017 की सामाजिक इंजीनियरिंग

2016 में केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाया गया। वे मौर्य–कुशवाहा–शाक्य जैसे बड़े गैर-यादव पिछड़ा सामाजिक समूहों के प्रतीक बने। पार्टी ने उनके नेतृत्व में पिछड़ा वर्ग सम्मेलनों, परिवर्तन यात्राओं और बूथ समितियों के माध्यम से यह संदेश दिया कि भाजपा केवल सवर्ण नेतृत्व की पार्टी नहीं है।

2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपना दल (सोनेलाल) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया। अपना दल ने कुर्मी–पटेल और सुभासपा ने राजभर मतदाताओं में भाजपा की पहुँच बढ़ाई। भाजपा ने स्वयं 384 सीटें लड़ीं और 312 जीतीं। अपना दल ने नौ और सुभासपा ने चार सीटें जीतीं। एनडीए की कुल संख्या 325 हुई।

भाजपा को 39.67 प्रतिशत वोट मिला। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस साथ थे। बसपा अलग थी और विपक्षी सामाजिक समूहों का मत तीन हिस्सों में बँट गया। भाजपा को किसी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिए बिना भी प्रचंड बहुमत मिला। इस चुनाव ने हिंदू सामाजिक एकीकरण, गैर-यादव पिछड़ा लामबंदी और मोदी की लोकप्रियता की शक्ति प्रदर्शित की।

मुख्यमंत्री कौन बने—योगी आदित्यनाथ का चयन

2017 की विजय के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए राजनाथ सिंह, मनोज सिन्हा, केशव प्रसाद मौर्य और अन्य नामों की चर्चा हुई। लेकिन भाजपा ने गोरखपुर के सांसद और गोरखनाथ मठ के महंत योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया। यह निर्णय भाजपा की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत था।


योगी आदित्यनाथ पूर्वी उत्तर प्रदेश में पहले से स्वतंत्र जनाधार रखते थे। हिंदू युवा वाहिनी के माध्यम से उनका अपना संगठन था।वे हिंदुत्व, गौ-संरक्षण, धर्मांतरण, सांप्रदायिक मुद्दों तथा कानून-व्यवस्था पर कठोर वक्तव्यों के लिए जाने जाते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा ने उनकी छवि को ‘कठोर प्रशासक’, ‘माफिया-विरोधी नेता’ और हिंदुत्व के प्रखर चेहरे के रूप में विकसित किया।

केशव प्रसाद मौर्य और डॉ. दिनेश शर्मा उपमुख्यमंत्री बनाए गए। इससे भाजपा ने मुख्यमंत्री पद पर ठाकुर–संन्यासी नेतृत्व, उपमुख्यमंत्री पदों पर पिछड़ा और ब्राह्मण प्रतिनिधित्व तथा मंत्रिमंडल में व्यापक जातीय संतुलन का प्रयास किया।

योगी सरकार का पहला कार्यकाल

योगी आदित्यनाथ के पहले कार्यकाल में कानून-व्यवस्था, पुलिस मुठभेड़ों, माफिया की संपत्तियों पर कार्रवाई, अवैध बूचड़खानों पर रोक, धार्मिक स्थलों और नगरों के नाम परिवर्तन, अयोध्या दीपोत्सव तथा हिंदुत्व आधारित सांस्कृतिक राजनीति प्रमुख रही। सरकार ने पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे की तैयारी, हवाई अड्डों, मेडिकल कॉलेजों और निवेश सम्मेलनों पर जोर दिया।

केंद्र की उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास, शौचालय, राशन, किसान सम्मान निधि और आयुष्मान जैसी योजनाओं तथा राज्य सरकार के वितरण तंत्र ने ‘लाभार्थी वर्ग’ तैयार किया। विशेष रूप से गरीब महिलाओं, राशन प्राप्त करने वाले परिवारों और आवास योजना लाभार्थियों में भाजपा ने जातीय सीमाओं से ऊपर समर्थन बनाने का प्रयास किया।

विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों ने पुलिस मुठभेड़ों, बुलडोजर कार्रवाई, नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शनों पर कार्रवाई, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए। भाजपा समर्थकों ने इन्हीं कार्रवाइयों को कानून-व्यवस्था और निर्णायक शासन के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया।

2018 के उपचुनाव—गोरखपुर और फूलपुर में चेतावनी

2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा खाली की गई गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के सहयोग से भाजपा दोनों सीटें हार गई। गोरखपुर कई दशकों से गोरखनाथ मठ का गढ़ था। इसलिए यह हार प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ी थी।

इस परिणाम ने फिर सिद्ध किया कि सपा और बसपा के सामाजिक मत यदि प्रभावी रूप से जुड़ें तो भाजपा को चुनौती दी जा सकती है। निषाद पार्टी से जुड़े प्रवीण निषाद ने सपा के चिह्न पर गोरखपुर जीता। हालांकि 2019 के आम चुनाव से पहले निषाद पार्टी भाजपा के साथ आ गई। लेकिन उपचुनाव ने विपक्षी एकता की संभावनाएँ स्पष्ट कर दी थीं।

2019 लोकसभा चुनाव—50 प्रतिशत वोट के करीब

2019 में सपा, बसपा और रालोद ने महागठबंधन बनाया। इसके बावजूद भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 62 सीटें और लगभग 49.98 प्रतिशत मत प्राप्त किए। सहयोगी अपना दल ने दो सीटें जीतीं और एनडीए का कुल आँकड़ा 64 रहा।


भाजपा की सीटें 2014 की 71 से घटकर 62 हुईं।लेकिन उसका वोट लगभग सात प्रतिशत बढ़ा। पुलवामा आतंकी हमला, बालाकोट वायु कार्रवाई, नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय सुरक्षा नेतृत्व, केंद्र की कल्याणकारी योजनाएँ, सवर्ण आर्थिक आरक्षण तथा लाभार्थी मतों ने भाजपा को मजबूत किया।

महागठबंधन का जातीय अंकगणित पूरी तरह जमीन पर स्थानांतरित नहीं हुआ। बसपा ने दस सीटें जीतीं। लेकिन सपा केवल पाँच पर रही। भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों में अपना प्रभाव कायम रखा।

राम मंदिर निर्णय और राजनीतिक परिणति

नवंबर 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या विवादित भूमि रामलला पक्ष को देने और मस्जिद के लिए अलग पाँच एकड़ भूमि उपलब्ध कराने का निर्णय दिया। अगस्त 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर का भूमि पूजन किया और जनवरी 2024 में मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई।राम मंदिर भाजपा और व्यापक संघ परिवार के लिए दशकों पुराने आंदोलन की राजनीतिक तथा सांस्कृतिक परिणति था। जनसंघ के सीमित आंदोलन से लेकर आडवाणी की रथयात्रा, कल्याण सिंह की सरकार और मोदी के हाथों प्राण प्रतिष्ठा तक की कथा भाजपा ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता पूरी करने के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत की।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या को समाहित करने वाली फैजाबाद सीट भाजपा हार गई। समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद की जीत ने यह दिखाया कि धार्मिक उपलब्धि अपने आप प्रत्येक स्थानीय चुनाव में विजय की गारंटी नहीं है। स्थानीय प्रत्याशी, दलित समीकरण, भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, रोजगार और सामाजिक प्रतिनिधित्व भी निर्णायक होते हैं।

2022—सीटें घटीं, लेकिन पहली बार लगातार दूसरी सरकार

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी के साथ एनडीए बनाकर चुनाव लड़ा। सुभासपा इस बार समाजवादी पार्टी के साथ थी। भाजपा ने स्वयं 255 सीटें और 41.29 प्रतिशत मत प्राप्त किए। अपना दल ने 12 और निषाद पार्टी ने अपने चिह्न पर छह सीटें जीतीं। एनडीए ने 273 सीटों के साथ सरकार बनाई।

भाजपा की सीटें 312 से घटकर 255 हुईं, लेकिन वोट 39.67 से बढ़कर 41.29 प्रतिशत हो गया। यह उत्तर प्रदेश में 1985 के बाद पहली बार था, जब कोई सरकार पूर्ण कार्यकाल पूरा करके बहुमत के साथ लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटी। चुनाव आयोग आधारित परिणाम-संकलन भाजपा के 255 सीट, 38,051,721 मत और 41.29 प्रतिशत हिस्से की पुष्टि करता है।

भाजपा दोबारा क्यों जीती?

कोविड काल में मुफ्त राशन, महिला लाभार्थी, आवास और शौचालय योजनाएँ।योगी की कानून-व्यवस्था छवि। भाजपा का गैर-यादव पिछड़ा और गैर-जाटव दलित आधार; राम मंदिर। कमजोर बसपा; तथा विपक्षी मतों का पूर्ण एकीकरण न हो पाना इसके प्रमुख कारण थे। किसान आंदोलन और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट असंतोष के बावजूद भाजपा ने पर्याप्त सीटें बचा लीं।

2024—62 से 33 लोकसभा सीटों पर गिरावट

2024 में भाजपा उत्तर प्रदेश की 80 में से 33 सीटें जीत सकी। उसका वोट 2019 के 49.98 प्रतिशत से घटकर 41.37 प्रतिशत हो गया। उसे 3.62 करोड़ से अधिक वोट मिले। सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल ने दो और अपना दल ने एक सीट जीती। एनडीए कुल 36 सीटों पर रहा। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं। भाजपा के लिए सबसे प्रतीकात्मक हार फैजाबाद थी। इसके अतिरिक्त अमेठी, सुल्तानपुर, लखीमपुर खीरी, मुजफ्फरनगर, चंदौली, इलाहाबाद, बाराबंकी, बस्ती, जालौन, मोहनलालगंज और कई आरक्षित तथा पिछड़ा-बहुल क्षेत्रों में उसे पराजय मिली।

हार के प्रमुख कारण

2024 की गिरावट के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। समाजवादी पार्टी ने पीडीए—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—रणनीति के अंतर्गत बड़ी संख्या में गैर-यादव पिछड़े और दलित उम्मीदवार उतारे। कांग्रेस के साथ गठबंधन ने भाजपा-विरोधी मतों का विभाजन कम किया। संविधान और आरक्षण बदलने की आशंका ने दलित तथा पिछड़े मतदाताओं के एक हिस्से को विपक्ष की ओर मोड़ा। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक, अग्निवीर योजना, महँगाई, ग्रामीण आय, स्थानीय सांसदों के प्रति नाराजगी और टिकट वितरण भी प्रभावी रहे।

भाजपा के ‘400 पार’ नारे को विपक्ष ने संविधान संशोधन और आरक्षण पर खतरे से जोड़ा। भाजपा इस धारणा का समय रहते प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सकी। कई क्षेत्रों में संघ कार्यकर्ताओं और भाजपा चुनाव तंत्र के बीच अपेक्षित समन्वय न होने की बात भी बाद के संगठनात्मक मूल्यांकन में सामने आई। 2024 की गिरावट के बाद संघ ने भाजपा–सरकार और जमीनी संगठन के बीच तालमेल सुधारने के लिए उत्तर प्रदेश में विशेष समन्वय व्यवस्था बनाई।

क्या 2024 भाजपा का पतन था?

सीटों के दृष्टिकोण से 2024 गंभीर पराजय थी—भाजपा 62 से घटकर 33 सीटों पर आ गई। लेकिन वोट के दृष्टिकोण से पार्टी अभी भी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी अथवा लगभग सबसे बड़ी व्यक्तिगत पार्टी बनी रही। उसे 41.37 प्रतिशत मत मिला, जबकि सपा को लगभग 33.6 प्रतिशत मत मिला। सपा–कांग्रेस गठबंधन ने संयुक्त रूप से भाजपा का मुकाबला किया।

एनडीए को उत्तर प्रदेश में 43.74 प्रतिशत और इंडिया गठबंधन को 43.57 प्रतिशत मत मिला, लेकिन बेहतर प्रत्याशी, सामाजिक वितरण और कम मत-विभाजन के कारण इंडिया गठबंधन को अधिक सीटें मिलीं। केवल 0.17 प्रतिशत संयुक्त वोट अंतर के बावजूद सीटों में सात का अंतर था।

इसलिए 2024 को भाजपा के जनाधार के पूर्ण पतन के बजाय सीट-रूपांतरण, सामाजिक गठबंधन में आंशिक टूट और विपक्षी एकता की सफलता कहना अधिक तथ्यपरक है।

लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश भाजपा का प्रदर्शन

लोकसभा चुनाव भाजपा की सीटें—उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश में वोट प्रतिशत राजनीतिक संदर्भ


1980 0 लगभग 7–8% नई पार्टी, सीमित असर

1984 0 लगभग 6–7% इंदिरा हत्या की सहानुभूति लहर

1989 8 लगभग 7–8% राम आंदोलन का प्रारंभिक प्रभाव

1991 51 लगभग 32–33% राम लहर

1996 52 लगभग 33% भाजपा सबसे बड़ी राज्य शक्ति

1998 57 लगभग 36.5% वाजपेयी–राम आंदोलन शिखर

1999 29 लगभग 27.6% कल्याण विवाद और गठबंधन असर

2004 10 लगभग 22.2% भाजपा का गिरता दौर

2009 10 लगभग 17.5% सपा–बसपा–कांग्रेस के पीछे

2014 71 लगभग 42.6% मोदी लहर

2019 62 49.98% भाजपा का सर्वाधिक वोट

2024 33 41.37% इंडिया गठबंधन से बड़ा झटका...आगे की खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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