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स्मृति-पुरी का पत्ता कटा, 5 टिकट OBC-दलित को…BJP की लिस्ट में ऐसा क्या है जो सीधे 2027 से जुड़ता है?
BJP Rajya Sabha List UP: बीजेपी ने यूपी की 10 राज्यसभा सीटों में 8 उम्मीदवार घोषित किए। 5 टिकट OBC-दलित चेहरों को मिले, जबकि स्मृति ईरानी, हरदीप पुरी और बीएल वर्मा सूची से बाहर रहे।
BJP Rajya Sabha List UP
BJP Rajya Sabha List UP: उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए BJP ने अपने आठ पत्ते खोल दिए हैं। लेकिन इस बार कहानी केवल उन आठ नामों की नहीं है जिन्हें टिकट मिला है। असली राजनीतिक कहानी उन नामों में भी छिपी है जो टिकट की चर्चा में थे लेकिन आखिरी सूची तक नहीं पहुंच पाए।
पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का नाम कई दिनों से चर्चा में था। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कार्यकाल खत्म हो रहा है, लेकिन उन्हें दोबारा मौका नहीं मिला। बीएल वर्मा भी बाहर हो गए। पार्टी के प्रदेश स्तर से भेजे गए संभावित नामों में बड़े चेहरे मौजूद थे, लेकिन दिल्ली से निकली अंतिम सूची में संगठन, जातीय समीकरण और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों से जुड़े चेहरों को प्राथमिकता मिली।
BJP ने धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है। इन आठ नामों को अलग-अलग पढ़ेंगे तो यह सामान्य उम्मीदवार सूची दिखाई देगी। लेकिन इन्हें जाति, क्षेत्र और संगठन के तीन खानों में रखकर देखिए तो 2027 की रणनीति की एक तस्वीर उभरती है।
3 OBC, 2 दलित, 2 ब्राह्मण और 1 ठाकुर। यानी आठ में से पांच टिकट पिछड़े और दलित समुदायों से आने वाले नेताओं को दिए गए हैं। साथ ही ब्राह्मण प्रतिनिधित्व और ठाकुर चेहरे को भी जगह मिली है।
सवाल है BJP ने ऐसा क्यों किया?
पहले समझिए स्मृति ईरानी और हरदीप पुरी का नाम क्यों महत्वपूर्ण है? राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा से पहले सबसे ज्यादा चर्चा जिन नामों की थी, उनमें स्मृति ईरानी और हरदीप सिंह पुरी शामिल थे।
स्मृति ईरानी 2024 में अमेठी लोकसभा चुनाव हारने के बाद संसद से बाहर हो गई थीं। ऐसे में उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेजे जाने की संभावना पर राजनीतिक चर्चा चल रही थी।
हरदीप पुरी का मामला अलग है। वह पहले से उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री हैं। उनका कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इसके बावजूद उन्हें उत्तर प्रदेश से दोबारा टिकट नहीं दिया गया। यही वजह है कि अंतिम सूची ने पहला बड़ा संदेश नामों से नहीं, बल्कि नाम काटकर दिया।
पार्टी ने इस बार राष्ट्रीय स्तर के चर्चित चेहरों के बजाय उत्तर प्रदेश के सामाजिक और संगठनात्मक समीकरण से जुड़े नेताओं को ज्यादा जगह दी है।
इसे सीधे यह मान लेना कि स्मृति ईरानी या पुरी की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका खत्म हो गई, सही नहीं होगा। खास तौर पर पुरी के भविष्य को लेकर केंद्रीय स्तर पर अलग फैसले संभव हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की आठ सीटों के चयन में BJP ने स्पष्ट रूप से राज्य के अपने राजनीतिक समीकरण को महत्व दिया है।
आठ टिकटों में 2027 का पहला संकेत, OBC पर सबसे बड़ा दांव
BJP की सूची में सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व OBC को मिला है। तीन अलग-अलग पिछड़ी जातियों के चेहरों को राज्यसभा का टिकट दिया गया है धर्मपाल सिंह लोधी समुदाय से, प्रकाश पाल पाल समुदाय से और श्रुति गंगवार कुर्मी समुदाय से आती हैं। यही इस सूची का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक हिस्सा है।
उत्तर प्रदेश में BJP की पिछले एक दशक की चुनावी सफलता में गैर-यादव OBC वोटों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी PDA पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के जरिए इसी सामाजिक आधार में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
ऐसे में BJP ने OBC के नाम पर किसी एक बड़ी जाति को तीन टिकट देने के बजाय तीन अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व दिया है। यानी संदेश सिर्फ ‘OBC को तीन टिकट’ का नहीं है। लोधी, पाल और कुर्मी। तीन टिकट, तीन अलग समुदाय और तीन अलग राजनीतिक संदेश।
धर्मपाल सिंह: मंत्री को दिल्ली भेजने के पीछे क्या?
धर्मपाल सिंह आंवला से BJP विधायक और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। वह लोधी समुदाय से आते हैं। लोधी वोटर उत्तर प्रदेश की OBC राजनीति में BJP के पुराने महत्वपूर्ण सामाजिक आधारों में शामिल रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत के कारण इस समुदाय और BJP का रिश्ता ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण रहा है।
ऐसे में धर्मपाल सिंह को राज्यसभा भेजना केवल एक मंत्री को संसद भेजना नहीं माना जाएगा। उनके राज्यसभा पहुंचने की स्थिति में उनकी विधानसभा सीट और प्रदेश सरकार में उनकी भूमिका को लेकर भी आगे नए राजनीतिक-संगठनात्मक फैसले करने पड़ सकते हैं।
इसलिए धर्मपाल का नाम इस सूची में दोहरा संदेश देता है एक लोधी समाज को और दूसरा BJP के भीतर आगे होने वाले संभावित फेरबदल को।
प्रकाश पाल: नाम में ही छिपा है BJP का OBC संदेश
प्रकाश पाल BJP के पिछड़ा वर्ग संगठन से जुड़े प्रमुख चेहरों में हैं और पाल-गड़रिया सामाजिक समूह से आते हैं।उनका चयन इसलिए ज्यादा दिलचस्प है क्योंकि BJP ने राज्यसभा के लिए केवल चुनाव जीत चुके बड़े नेताओं को नहीं चुना, बल्कि ऐसे संगठनात्मक चेहरे को भी संसद भेजने का फैसला किया है जिसकी राजनीतिक उपयोगिता OBC outreach से जुड़ी हुई है।
पाल, सैनी, शाक्य, मौर्य, कुशवाहा जैसे गैर-यादव OBC समूह उत्तर प्रदेश में BJP और SP दोनों की रणनीति के केंद्र में हैं। इसलिए प्रकाश पाल का टिकट एक व्यक्ति से ज्यादा एक सामाजिक समूह को दिया गया संदेश माना जा सकता है।
श्रुति गंगवार: एक टिकट में महिला, कुर्मी और रोहिलखंड
आठ नामों में श्रुति गंगवार सबसे दिलचस्प चयन में से एक हैं। वह झारखंड के राज्यपाल और लंबे समय तक बरेली से सांसद रहे संतोष गंगवार की बेटी हैं। बरेली-बहेड़ी क्षेत्र में सक्रिय श्रुति अर्बन कोऑपरेटिव बैंक की चेयरमैन भी हैं।
लेकिन उनके नाम में तीन राजनीतिक संकेत एक साथ हैं।पहला वह महिला हैं। दूसरा गंगवार यानी कुर्मी/OBC समुदाय का प्रतिनिधित्व। और तीसरा रोहिलखंड का क्षेत्रीय संतुलन।
संतोष गंगवार दशकों तक बरेली और आसपास BJP के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। अब उनकी बेटी को राज्यसभा टिकट देना उस राजनीतिक-सामाजिक नेटवर्क की निरंतरता के रूप में भी देखा जा सकता है।
हालांकि इसके साथ राजनीतिक परिवार से आने वाले नेता को मौका देने का सवाल भी उठेगा। BJP इसे संगठन और सामाजिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में रख सकती है, जबकि विरोधी दल राजनीतिक परिवारवाद के सवाल को उठा सकते हैं।
दो दलित चेहरे क्यों?
OBC के बाद सूची का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा दलित प्रतिनिधित्व है। BJP ने विद्यासागर सोनकर और प्रियंका सिंह रावत को उम्मीदवार बनाया है। यानी आठ में से दो टिकट अनुसूचित जाति समुदाय के नेताओं को मिले हैं।
यह चयन उस समय हुआ है जब समाजवादी पार्टी PDA रणनीति में दलित मतदाताओं पर भी विशेष जोर दे रही है और BSP अपने पुराने दलित आधार को फिर संगठित करने की कोशिश कर रही है। यानी 2027 में दलित वोट के लिए मुकाबला केवल BSP बनाम अन्य दल नहीं रहने वाला।
BJP भी अपने प्रतिनिधित्व के जरिए यह संदेश देने की कोशिश करती दिखाई देती है कि उसके सामाजिक गठबंधन में दलित नेतृत्व की जगह बनी रहेगी।
विद्यासागर सोनकर: पूर्वांचल + दलित + संगठन
विद्यासागर सोनकर BJP के पुराने संगठनात्मक नेताओं में हैं। वह लोकसभा सांसद रह चुके हैं और प्रदेश संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। वह सोनकर/खटीक समुदाय से आते हैं और जौनपुर सहित पूर्वांचल की राजनीति में उनकी पहचान रही है।
इसलिए उनका टिकट तीन स्तर पर काम करता दिखाई देता है। दलित प्रतिनिधित्व, पूर्वांचल का क्षेत्रीय संतुलन और लंबे समय से संगठन में काम करने वाले नेता को पुरस्कार।
2027 की लड़ाई में पूर्वांचल BJP और SP दोनों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र रहेगा। ऐसे में सोनकर का चयन केवल सामाजिक नहीं बल्कि क्षेत्रीय दृष्टि से भी पढ़ा जाएगा।
प्रियंका सिंह रावत: 2019 में लोकसभा टिकट गया, अब राज्यसभा से वापसी
प्रियंका सिंह रावत का नाम भी BJP की सूची की कहानी को दिलचस्प बनाता है। वह 2014 में बाराबंकी से लोकसभा सांसद बनी थीं। 2019 में पार्टी ने उन्हें लोकसभा टिकट नहीं दिया। इसके बाद वह संगठन में सक्रिय रहीं और प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली।
अब करीब सात साल बाद BJP उन्हें राज्यसभा भेजने की तैयारी में है। प्रियंका सिंह रावत के चयन में भी कई समीकरण एक साथ हैं।
वह दलित समुदाय से आती हैं, महिला हैं और अवध क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। यानी उनके एक टिकट से BJP ने महिला, दलित और अवध, तीन खानों को छूने की कोशिश की है।
दो ब्राह्मण चेहरे क्यों जरूरी समझे गए?
OBC और दलितों को पांच टिकट देने के बावजूद BJP ने अपने पारंपरिक सवर्ण आधार को नजरअंदाज नहीं किया।
राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडेय दोनों ब्राह्मण चेहरे हैं। यह भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व और इस समुदाय के राजनीतिक रुख को लेकर लगातार चर्चा होती रही है।
कांग्रेस ने भी हाल ही में आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर ब्राह्मण नेतृत्व को बड़ा स्थान दिया है। ऐसे समय BJP का राज्यसभा की आठ टिकटों में दो ब्राह्मण चेहरों को जगह देना सामाजिक संतुलन के नजरिए से महत्वपूर्ण है।
राधाकांत ओझा: राजनीति के साथ कानूनी दुनिया का चेहरा
राधाकांत ओझा इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनका नाम BJP की सूची को एक अलग आयाम देता है। वह केवल जातीय समीकरण का ब्राह्मण चेहरा नहीं हैं बल्कि प्रयागराज और पूर्वांचल के कानूनी तथा पेशेवर नेटवर्क से जुड़ी पहचान भी रखते हैं। राज्यसभा में पार्टियां कई बार ऐसे नेताओं को भेजती हैं जिनकी विशेषज्ञता चुनावी राजनीति से अलग क्षेत्रों में भी हो। ओझा का चयन इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।
गोपी कृष्ण पांडेय: दूसरा ब्राह्मण चेहरा, संगठन को संदेश
गोपी कृष्ण पांडेय लंबे समय से BJP संगठन से जुड़े हुए हैं और पूर्वांचल-अवध क्षेत्र में उनकी संगठनात्मक भूमिका रही है। उनका टिकट उस पैटर्न को मजबूत करता है जो पूरी सूची में दिखाई देता है बड़े राष्ट्रीय नामों के मुकाबले संगठन में काम करने वाले प्रदेश के नेताओं को जगह।
अगर BJP केवल जातीय संतुलन चाहती तो किसी चर्चित ब्राह्मण चेहरे को भी चुन सकती थी। लेकिन ओझा और पांडेय जैसे नाम यह संकेत देते हैं कि जाति के साथ संगठनात्मक पृष्ठभूमि को भी महत्व दिया गया है।
राम प्रताप सिंह चौहान: आठवां सामाजिक खाना
आठ उम्मीदवारों में राम प्रताप सिंह चौहान ठाकुर समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह BJP संगठन में लंबे समय से सक्रिय हैं और प्रदेश महामंत्री जैसी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनका चयन सवर्ण प्रतिनिधित्व में ब्राह्मणों के साथ ठाकुर समुदाय को भी जगह देता है। इस तरह आठ टिकटों का पूरा सामाजिक नक्शा बनता है 3 OBC + 2 दलित + 2 ब्राह्मण + 1 ठाकुर। यानी किसी एक सामाजिक समूह को पूरी तरह हावी करने के बजाय अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने की कोशिश।
आठ नामों की सबसे बड़ी कहानी, पुराने सांसदों में कोई रिपीट नहीं
इस सूची की एक और खास बात है। उत्तर प्रदेश से कार्यकाल पूरा कर रहे BJP के मौजूदा राज्यसभा सांसदों में से किसी को इसी सूची में दोबारा टिकट नहीं मिला।हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा जैसे केंद्रीय मंत्री भी इसमें शामिल हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि इन नेताओं की राजनीति खत्म हो गई। BJP उन्हें दूसरी भूमिका दे सकती है। लेकिन राज्यसभा टिकटों के स्तर पर पार्टी ने पुराने चेहरों को दोहराने के बजाय पूरी नई टीम उतारने का फैसला किया।और शायद यही सूची का सबसे बड़ा संगठनात्मक संदेश है। राज्यसभा की आठ सीटों को केवल नेताओं को समायोजित करने के साधन की तरह इस्तेमाल करने के बजाय पार्टी ने 2027 से पहले सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को फिर से व्यवस्थित करने का मौका बनाया है।
SP के PDA के सामने BJP का अपना सामाजिक जोड़
यहीं BJP की सूची को 2027 के बड़े राजनीतिक फ्रेम में रखकर देखना चाहिए। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी लगातार PDA पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की राजनीति पर जोर दे रही है। BJP की सूची में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व नहीं है, लेकिन पिछड़ा और दलित समुदाय से पांच उम्मीदवार हैं। इसके साथ तीन सवर्ण उम्मीदवार हैं।
इसे कुछ राजनीतिक रिपोर्टों में BJP का पिछड़ा-दलित-सवर्ण संतुलन कहा जा रहा है। लेकिन राज्यसभा टिकट मिलना और विधानसभा चुनाव में किसी समुदाय का वोट मिलना एक ही बात नहीं है।
टिकट सामाजिक संदेश दे सकता है, लेकिन उसका चुनावी असर संगठन, स्थानीय उम्मीदवार, सरकार के कामकाज, विपक्ष की रणनीति और मतदाताओं के मुद्दों पर निर्भर करेगा। इसलिए इसे अभी 2027 का सफल या असफल फॉर्मूला घोषित करना जल्दबाजी होगी।
स्मृति ईरानी बाहर क्यों? यही सवाल आगे भी बना रहेगा
सूची जारी होने के बाद भी एक सवाल खत्म नहीं हुआ स्मृति ईरानी का क्या होगा? अमेठी में 2024 की हार के बाद उनके राज्यसभा के रास्ते संसद में लौटने की चर्चा थी। उनका नाम संभावित दावेदारों में भी सामने आया।लेकिन अंतिम आठ में वह नहीं हैं। इससे दो बातें साफ होती हैं।
पहली - BJP ने उत्तर प्रदेश की इन राज्यसभा सीटों को केवल बड़े राष्ट्रीय नेताओं को संसद पहुंचाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया। दूसरी - स्मृति ईरानी की अगली भूमिका को लेकर सवाल अभी खुला है।
ठीक यही स्थिति हरदीप सिंह पुरी को लेकर भी है। केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद उन्हें उत्तर प्रदेश से दोबारा राज्यसभा टिकट नहीं मिला है। ऐसे में उनके संसदीय और केंद्रीय राजनीतिक भविष्य को लेकर आगे पार्टी के फैसले पर नजर रहेगी।
असली कहानी आठ उम्मीदवार नहीं, पांच सामाजिक संदेश हैं
BJP की पूरी सूची को एक लाइन में समझना हो तो नामों से ज्यादा उनका सामाजिक और क्षेत्रीय परिचय देखना होगा। लोधी को धर्मपाल सिंह। पाल को प्रकाश पाल।कुर्मी को श्रुति गंगवार। दलित समुदायों को विद्यासागर सोनकर और प्रियंका सिंह रावत। ब्राह्मणों को राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडेय। ठाकुर समुदाय को राम प्रताप सिंह चौहान।
साथ में दो महिलाएं, संगठन से जुड़े कई चेहरे और पूर्वांचल से लेकर रोहिलखंड, अवध और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की कोशिश। इसलिए BJP की राज्यसभा सूची केवल संसद के उच्च सदन की आठ कुर्सियों की कहानी नहीं है।
2027 से पहले पार्टी ने यह बताने की कोशिश की है कि वह अपने पुराने सवर्ण आधार को साथ रखते हुए गैर-यादव OBC और दलित समूहों में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की रणनीति जारी रखना चाहती है।
अब असली सवाल यह नहीं कि इन आठ में कौन राज्यसभा पहुंचेगा। बड़ा सवाल यह है कि राज्यसभा की टिकटों से दिया गया यह सामाजिक संदेश 2027 तक BJP की संगठनात्मक और उम्मीदवार चयन की रणनीति में कितना दिखाई देगा।


