BSP Political Journey: बसपा की पूरी कहानी, कांशीराम से मायावती तक, कैसे बदली उत्तर प्रदेश की राजनीति

Mayawati Rise and Fall: जानिए बहुजन समाज पार्टी (BSP) का पूरा इतिहास। कांशीराम से मायावती तक का सफर, 2007 का पूर्ण बहुमत, 2024-26 की गिरावट, चुनावी प्रदर्शन और भविष्य।

Yogesh Mishra
Published on: 6 Aug 2026 1:41 PM IST (Updated on: 6 Aug 2026 3:31 PM IST)
BSP History Wikipedia Hindi
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BSP Political Journey in Hindi: बसपा विधायक उमाशंकर सिंह का निधन एक विधायक का या फिर शून्य से शिखर तक यात्रा करने वाले किसी बड़े कारोबारी का केवल निधन नहीं है। यह डीएस-4 से देश के सबसे बड़े सूबे में सरकार बना लेने, दलित आंदोलन व अस्मिता के उभार का विराम स्थल है। उमाशंकर सिंह जीते भले बसपा थे। पर वह मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के पसंदीदा विधायकों में हमेशा बने रहे। वह मायावती व उत्तर प्रदेश की भाजपा के बीच सेतु रहे। शायद यही वजह है कि मायावती उमाशंकर सिंह के घर गयीं। जो मायावती की राजनैतिक शैली का हिस्सा नहीं है। मेरी पहली मुलाकात उनसे कल्याण सिंह की सरकार में आज के परिवहन मंत्री दया शंकर सिंह ने करवाई थी। उस समय वह राजनीति से दूर केवल कारोबार पर फ़ोकस कर रहे थे। उनके निधन से बसपा के सीधे चुने गये प्रतिनिधित्व का कोरम ख़त्म हो गया। बसपा की यात्रा को विराम लग गया। दलित राजनीति का प्रयोगशाला नतीजा विहीन हो गया। आज जब बसपा एक अपवाद को छोड़ देश के किसी भी सदन में प्रतिनिधित्व विहीन हो गयी है तब बसपा की पूरी यात्रा एक बार फिर विश्लेषण माँगती है—

बहुजन समाज पार्टी की कहानी केवल एक राजनीतिक दल के उत्थान और पतन की कहानी नहीं है। यह उन सामाजिक समूहों की राजनीतिक दावेदारी की कहानी है, जिन्हें स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक वोट-बैंक तो माना गया। लेकिन सत्ता-संरचना में उनकी स्वतंत्र हिस्सेदारी बहुत सीमित रही। कांशीराम ने सरकारी कर्मचारियों के संगठन, सामाजिक जागरण और चुनावी संगठन को क्रमशः जोड़ते हुए जिस आंदोलन की शुरुआत की, उसने उत्तर प्रदेश की राजनीति की भाषा, सत्ता-समीकरण और सामाजिक प्रतिनिधित्व को बदल दिया। इसी आंदोलन ने मायावती को चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया और 2007 में पहली बार किसी दलित नेता के नेतृत्व में किसी राष्ट्रीय दल को राज्य में स्पष्ट बहुमत दिलाया।


इसके विपरीत, 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उसका केवल एक विधायक निर्वाचित हुआ था और 5 अगस्त, 2026 को रसड़ा के विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद पार्टी उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी प्रतिनिधित्व-विहीन हो गई। फिलहाल पार्टी का संसदीय प्रतिनिधित्व राज्यसभा में रामजी गौतम तक सीमित है, जिनका कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त होना है।

कांशीराम की राजनीतिक प्रयोगशाला

रिपब्लिकन राजनीति से अलग रास्ता - डॉ. भीमराव आंबेडकर के निधन के बाद अनुसूचित जातियों की राजनीति मुख्यतः रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया और कांग्रेस के भीतर आरक्षित प्रतिनिधित्व के माध्यम से चल रही थी। कांशीराम का आकलन था कि दलित नेताओं का एक बड़ा हिस्सा स्थापित दलों पर निर्भर हो गया है और स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति खड़ी नहीं कर पा रहा। उन्होंने पहले शिक्षित और सरकारी सेवा में कार्यरत अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक कर्मचारियों को संगठित करने का रास्ता चुना।

कांशीराम की संगठनात्मक यात्रा सामान्यतः इन चरणों में समझी जाती है—

पहला चरण—कर्मचारी जागरण: 1970 के दशक में BAMCEF अर्थात Backward and Minority Communities Employees Federation का विकास। इसका उद्देश्य सरकारी सेवाओं तक पहुँच चुके वंचित समुदायों के शिक्षित वर्ग को सामाजिक परिवर्तन के लिए तैयार करना था।

दूसरा चरण—जनसंघर्ष: 1981 में डीएस-4 अर्थात दलित शोषित समाज संघर्ष समिति की स्थापना। इसका नारा था—‘ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस-4।’ इस चरण में कर्मचारी संगठन को आम जनता और राजनीतिक आंदोलन से जोड़ा गया।


तीसरा चरण—चुनावी सत्ता: 14 अप्रैल, 1984 को डॉ. आंबेडकर की जयंती पर बहुजन समाज पार्टी की स्थापना। कांशीराम ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यकों को मिलाकर ‘बहुजन’ राजनीतिक गठबंधन बनाने का लक्ष्य रखा। पार्टी की आधिकारिक सामग्री भी 1984 में कांशीराम द्वारा स्थापना की पुष्टि करती है।

कांशीराम का केंद्रीय सिद्धांत था—“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।” उनके लिए सामाजिक सम्मान का रास्ता राजनीतिक सत्ता से होकर जाता था। इसलिए उन्होंने आंदोलन को केवल सामाजिक सुधार तक सीमित न रखकर चुनाव लड़ने, वोट जुटाने और सत्ता में भागीदारी की रणनीति अपनाई।

मायावती का उभार

मायावती दिल्ली में अध्यापन कर रही थीं और प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रही थीं, जब कांशीराम ने उनकी वक्तृत्व क्षमता और राजनीतिक आत्मविश्वास को पहचाना।


धीरे-धीरे वे पार्टी की सबसे प्रमुख जननेता बन गईं। कांशीराम ने 2001 में उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया और 18 सितंबर, 2003 को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। कांशीराम के स्वास्थ्य में गिरावट के बाद संगठन का संपूर्ण नियंत्रण मायावती के हाथों में आ गया।

मायावती ने कांशीराम की बहुजन राजनीति को तीन अलग-अलग रूपों में आगे बढ़ाया—

1. प्रारंभ में दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान।

2. बाद में दलित–पिछड़ा या दलित–मुस्लिम गठबंधन।

3. और 2007 में ‘बहुजन से सर्वजन’ की ओर बढ़ते हुए दलित–ब्राह्मण–मुस्लिम–पिछड़ा सामाजिक संयोजन।

लोकसभा चुनावों में बसपा का प्रदर्शन

लोकसभा चुनावों का नीचे दिया गया मत-प्रतिशत पूरे भारत में पार्टी को मिले वैध मतों का प्रतिशत है। 1984 में पार्टी गठन के तुरंत बाद हुए चुनाव में बसपा ने सीमित स्तर पर उम्मीदवार उतारे लेकिन निर्वाचन-वार सुव्यवस्थित तुलनात्मक शृंखला 1989 से उपलब्ध है।

लोकसभा चुनाव उम्मीदवार जीती सीटें अखिल भारतीय वोट प्रतिशत


1989 245 3 2.07%

1991 243 3 1.80%

1996 210 11 4.02%

1998 251 5 4.67%

1999 225 14 4.16%

2004 435 19 5.33%

2009 500 21 6.17%

2014 503 0 4.14%

2019 383 10 3.62%

2024 488 0

ये आँकड़े निर्वाचन आयोग-आधारित चुनावी डेटाबेस के हैं। 2024 के आधिकारिक निर्वाचन आयोग के आँकड़ों में भी बसपा को कोई सीट नहीं मिली।

1989: पहली संसदीय सफलता

1989 में बसपा ने पहली बार तीन लोकसभा सीटें जीतीं। इस चुनाव ने प्रमाणित किया कि पार्टी केवल सामाजिक आंदोलन नहीं रही।बल्कि स्वतंत्र चुनावी शक्ति बन चुकी है। मायावती बिजनौर से लोकसभा पहुँचीं। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त पंजाब और मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों में भी पार्टी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू की।

1991: कांशीराम स्वयं लोकसभा पहुँचे

1991 में पार्टी ने फिर तीन सीटें जीतीं। कांशीराम इटावा से निर्वाचित हुए। यह जीत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इटावा पिछड़ा वर्ग की राजनीति का प्रमुख क्षेत्र था। इससे दलित–पिछड़ा राजनीतिक सहयोग की संभावनाएँ सामने आईं। कांशीराम बाद में 1996 में पंजाब की होशियारपुर सीट से भी लोकसभा सदस्य बने।

1996: राष्ट्रीय विस्तार

1996 में बसपा ने 11 लोकसभा सीटें जीतीं और राष्ट्रीय मत-प्रतिशत चार प्रतिशत से ऊपर पहुँच गया। इसी दौर में पार्टी उत्तर प्रदेश से बाहर पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी प्रभाव दिखाने लगी। निर्वाचन आयोग ने लोकसभा प्रदर्शन के आधार पर बसपा को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता दी।

1998: वोट बढ़ा, सीटें घटीं

1998 में पार्टी का राष्ट्रीय वोट 4.67 प्रतिशत हो गया।लेकिन सीटें घटकर पाँच रह गईं। यह भारत की निर्वाचन प्रणाली की उस विसंगति को दिखाता है जिसमें व्यापक लेकिन बिखरा हुआ वोट बड़ी संख्या में सीटों में नहीं बदल पाता।

1999: 14 सांसद

1999 में बसपा 14 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रही। उत्तर प्रदेश के बाहर भी उम्मीदवार उतारने की रणनीति जारी रही। पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और भाजपा से अलग तीसरे विकल्प के रूप में पहचान बनाने लगी।

2004: 19 सांसद

2004 में बसपा ने 435 उम्मीदवार उतारे, 19 सीटें जीतीं और 5.33 प्रतिशत राष्ट्रीय वोट प्राप्त किया। यह मायावती के स्वतंत्र राष्ट्रीय विस्तार का दौर था। पार्टी ने किसी राष्ट्रीय गठबंधन में स्थायी रूप से शामिल होने के बजाय चुनाव बाद रणनीतिक समर्थन की गुंजाइश खुली रखी।

2009: लोकसभा में सर्वोच्च प्रदर्शन

2009 का चुनाव बसपा का अब तक का सर्वोच्च लोकसभा प्रदर्शन था—

500 उम्मीदवार;

21 लोकसभा सीटें;

6.17 प्रतिशत राष्ट्रीय वोट;

वोट-प्रतिशत के आधार पर देश की सबसे बड़ी पार्टियों में स्थान।

हालाँकि मायावती को प्रधानमंत्री पद के संभावित विपक्षी उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन 21 सीटें सरकार निर्माण में निर्णायक भूमिका के लिए पर्याप्त नहीं थीं। फिर भी राष्ट्रीय वोट प्रतिशत के संदर्भ में यह बसपा का शिखर था।

2014: 4.14 प्रतिशत वोट, लेकिन एक भी सांसद नहीं

2014 में बसपा को पूरे भारत में 4.14 प्रतिशत वोट मिले और वह वोट-प्रतिशत के आधार पर देश की प्रमुख पार्टियों में रही। लेकिन एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई। उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की लहर और विपक्षी वोटों के विभाजन ने बसपा को लगभग प्रत्येक क्षेत्र में नुकसान पहुँचाया।

यह बसपा के इतिहास का सबसे बड़ा चुनावी विरोधाभास था—करोड़ों वोट। लेकिन शून्य सांसद।

2019: सपा गठबंधन से दस सांसद

2019 में बसपा ने समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन किया। उत्तर प्रदेश में बसपा दस, सपा पाँच और रालोद शून्य सीटें जीत सकी। बसपा को गठबंधन का सबसे अधिक सीटगत लाभ मिला और पाँच वर्ष बाद लोकसभा में वापसी हुई। लेकिन चुनाव के तुरंत बाद मायावती ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी के मत पूरी तरह बसपा प्रत्याशियों को हस्तांतरित नहीं हुए। गठबंधन टूट गया और 1995 के बाद बनी सपा–बसपा निकटता फिर समाप्त हो गई।

2024: शून्य सांसद और राष्ट्रीय वोट में गिरावट

2024 में बसपा ने लगभग अकेले चुनाव लड़ते हुए 488 उम्मीदवार उतारे। पार्टी को पूरे भारत में 2.06 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन एक भी सीट नहीं मिली। उत्तर प्रदेश में उसका वोट लगभग 9.39 प्रतिशत रह गया।

2019 की तुलना में उत्तर प्रदेश के दलित मतों का एक हिस्सा समाजवादी पार्टी–कांग्रेस गठबंधन और भाजपा की ओर गया। मुस्लिम मतदाताओं ने भी भाजपा को हराने की क्षमता रखने वाले गठबंधन की ओर अधिक रणनीतिक मतदान किया। परिणामतः बसपा कई सीटों पर तीसरे स्थान तक सीमित रह गई।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा का प्रदर्शन

उत्तर प्रदेश बसपा की जन्मभूमि, मुख्य संगठनात्मक आधार और सत्ता का केंद्र रहा है।


विधानसभा चुनाव लड़ी सीटें जीती सीटें वोट प्रतिशत

1985 लगभग 237 0 लगभग 9.3%

1989 372 13 9.41%

1991 386 12 9.44%

1993 164 67 11.12%

1996 296 67 19.64%

2002 401 98 23.06%

2007 403 206 30.43%

2012 403 80 25.91%

2017 403 19 22.23%

2022 403 1 12.91%

2022 के परिणाम में बसपा ने सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ा, 12.91 प्रतिशत मत प्राप्त किए और केवल रसड़ा से उमाशंकर सिंह जीते।

1985: वोट मिला, सीट नहीं

पार्टी गठन के एक वर्ष के भीतर हुए विधानसभा चुनाव में बसपा कोई सीट नहीं जीत सकी।लेकिन लगभग नौ प्रतिशत वोट प्राप्त करना एक नई पार्टी के लिए असाधारण था। यह समर्थन सीटों में नहीं बदला, क्योंकि वोट विभिन्न क्षेत्रों में फैला हुआ था।

1989: 13 विधायक

1989 में बसपा के 13 विधायक निर्वाचित हुए। पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में एक स्वतंत्र और संगठित दलित राजनीतिक दल का प्रभावी समूह बना।

1991: राम मंदिर लहर के बीच 12 सीटें

1991 में भाजपा के प्रचंड उभार के बावजूद बसपा ने 12 सीटें और लगभग साढ़े नौ प्रतिशत मत बनाए रखे। इससे उसका स्थायी दलित आधार प्रमाणित हुआ।

1993: सपा–बसपा गठबंधन और 67 विधायक

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1993 का चुनाव भाजपा को रोकने की राजनीति के केंद्र में था। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने सपा–बसपा गठबंधन बनाया। नारा चला—

“मिले मुलायम–कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।”

सीटों का बँटवारा होने के कारण बसपा ने केवल 164 सीटों पर चुनाव लड़ा और 67 जीतीं। समाजवादी पार्टी ने 109 सीटें जीतीं। दोनों दलों तथा सहयोगियों ने मिलकर सरकार बनाई और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

यह दलित–पिछड़ा राजनीतिक एकता का ऐतिहासिक प्रयोग था। लेकिन दोनों दलों के सामाजिक आधार, स्थानीय नेतृत्व और सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर तनाव बढ़ता गया...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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