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UP News: मायावती की बसपा के लिए अहम अक्टूबर, यूपी की 10 राज्यसभा सीटों पर होगा चुनाव
UP News: बसपा के रामजी गौतम का राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को खत्म होगा। यूपी की 10 राज्यसभा सीटों पर 16 अक्टूबर को मतदान होगा। जानिए लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद में बसपा के मौजूदा प्रतिनिधित्व की स्थिति।
BSP Rajya Sabha Election 2026 (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी का सफर एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां कभी प्रदेश की सत्ता चलाने वाली पार्टी आज अपने निर्वाचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बचाए रखने के संकट से गुजर रही है। 2007 में 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा के पास आज विधानसभा में एक भी विधायक नहीं है। लोकसभा में भी पार्टी का कोई सांसद नहीं है और विधान परिषद में भी उसका कोई सदस्य नहीं बचा है। अब राज्यसभा में मौजूद पार्टी की आखिरी कड़ी भी नवंबर में समाप्त होने जा रही है।
बसपा के राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। इससे पहले उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया है। 16 अक्टूबर 2026 को मतदान होगा, मतदान का समय सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक रहेगा और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना शुरू होगी। चुनाव प्रक्रिया 19 अक्टूबर तक पूरी हो जाएगी।
यानी अक्टूबर का राज्यसभा चुनाव बसपा के लिए महज 10 सीटों का चुनाव नहीं है। यह उस पार्टी के लिए संसद में अपनी आखिरी मौजूदगी बचाए रखने का सवाल है, जिसने कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ी शक्ति के रूप में अपनी पहचान बनाई थी।
कभी 206 विधायक, आज विधानसभा में शून्य
बसपा के मौजूदा राजनीतिक संकट को समझने के लिए उसके विधानसभा के सफर को देखना जरूरी है।
2007 में मायावती के नेतृत्व में बसपा ने उत्तर प्रदेश में 206 विधानसभा सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। यह बसपा के राजनीतिक इतिहास का सबसे मजबूत विधानसभा प्रदर्शन था। लेकिन पांच साल बाद तस्वीर बदल गई।
2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा की सीटें 206 से घटकर 80 रह गईं और पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। 2017 में भाजपा की बड़ी जीत के बीच बसपा की संख्या और घटकर 19 रह गई।
फिर आया 2022 का विधानसभा चुनाव।
403 सदस्यीय विधानसभा में बसपा केवल एक सीट जीत सकी—बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट, जहां से उमाशंकर सिंह लगातार तीसरी बार विधायक बने।
यानी 2007 में जिस पार्टी के पास 206 विधायक थे, 15 साल के भीतर उसकी विधानसभा में संख्या 206 से 1 तक पहुंच गई।
और अगस्त 2026 में वह एक विधायक भी नहीं रहा।
उमाशंकर सिंह के निधन के बाद विधानसभा में बसपा शून्य
रसड़ा के तीन बार के विधायक उमाशंकर सिंह का अगस्त 2026 में निधन हो गया। उनके निधन के बाद उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा में बसपा का कोई विधायक नहीं बचा।
यह घटना बसपा के लिए केवल एक सीट खाली होने की घटना नहीं थी।
यह उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी की दशकों पुरानी निर्वाचित मौजूदगी के समाप्त होने का प्रतीक बन गई।
अब विधानसभा में बसपा की ओर से न कोई विधायक है, न कोई पार्टी की ओर से सदन में सवाल उठाने वाला प्रतिनिधि।
इस लिहाज से उमाशंकर सिंह का निधन बसपा के विधानसभा अध्याय के लिए एक निर्णायक राजनीतिक मोड़ साबित हुआ।
विधान परिषद में भी बसपा की आवाज पहले ही खत्म हो चुकी
विधानसभा के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधान परिषद में भी बसपा का कोई मौजूदा प्रतिनिधित्व नहीं है। यानी राज्य की दोनों विधानमंडलीय संस्थाओं—विधानसभा और विधान परिषद—में बसपा का निर्वाचित प्रतिनिधित्व शून्य है। हालिया रिपोर्टों में भी इस स्थिति की पुष्टि की गई है।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कभी उत्तर प्रदेश के विधानमंडल में बसपा की मौजूदगी केवल औपचारिक नहीं थी। वह सरकार बनाने और सरकार गिराने की क्षमता रखने वाली प्रमुख राजनीतिक ताकत थी।
आज उसी पार्टी के पास विधानमंडल के किसी भी सदन में कोई सदस्य नहीं है।
लोकसभा में 2024 में फिर शून्य
बसपा के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का दूसरा बड़ा मोर्चा लोकसभा है।
बसपा ने 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 21 सीटें जीती थीं। 2014 में पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी।
2019 में सपा के साथ गठबंधन के बाद बसपा ने वापसी करते हुए 10 लोकसभा सीटें जीतीं।
लेकिन 2024 में तस्वीर फिर पलट गई और बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी।
इस तरह लोकसभा में भी आज बसपा का प्रतिनिधित्व शून्य है। 2024 के चुनाव में पार्टी को उत्तर प्रदेश में वोट तो मिले, लेकिन वे वोट सीटों में परिवर्तित नहीं हो सके। यही बसपा के मौजूदा संकट की सबसे अहम राजनीतिक पहेली है—वोट का आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, लेकिन निर्वाचित प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त हो गया।
राज्यसभा में बची आखिरी आवाज—रामजी गौतम
लोकसभा में शून्य और विधानसभा में शून्य होने के बाद बसपा की संसद में आखिरी मौजूदगी राज्यसभा के जरिए है।
बसपा के राष्ट्रीय समन्वयक रामजी गौतम 26 नवंबर 2020 को राज्यसभा सदस्य बने थे। यह उनका पहला कार्यकाल है।
लेकिन अब उनका कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त होने जा रहा है।
इसका सीधा मतलब है कि अगर अक्टूबर के राज्यसभा चुनाव में बसपा का कोई उम्मीदवार निर्वाचित नहीं होता, तो नवंबर के बाद संसद के दोनों सदनों में बसपा का कोई सांसद नहीं रहेगा।
और यही वह स्थिति है जो बसपा के राजनीतिक इतिहास में पहली बार बनने जा रही है।
रामजी गौतम 2020 में कैसे पहुंचे थे राज्यसभा ?
यहां 2020 और 2026 के राजनीतिक गणित में जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है।
2020 में जब रामजी गौतम राज्यसभा पहुंचे थे, तब बसपा के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक मौजूद थे। हालांकि पार्टी के पास अपने दम पर राज्यसभा सीट निकालने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं थी।
2020 के राज्यसभा चुनाव के दौरान बसपा के पास प्रभावी तौर पर 15 विधायक रह गए थे। इसके बावजूद रामजी गौतम निर्विरोध राज्यसभा पहुंच गए। रिपोर्टों के मुताबिक इस निर्वाचन में भाजपा के समर्थन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साथ ही एक एसपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार का नामांकन खारिज हो गया था।
यानी 2020 का गणित था—
बसपा के विधायक + उस समय बने राजनीतिक समीकरण + भाजपा का समर्थन = रामजी गौतम निर्विरोध राज्यसभा।
आज छह साल बाद वही गणित पूरी तरह बदल चुका है।
अब बसपा के पास एक भी विधायक नहीं है।
राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित विधानसभा सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। इसलिए जिस पार्टी की विधानसभा में संख्या शून्य है, उसके लिए अपने दम पर राज्यसभा सीट हासिल करना संभव नहीं है।
16 अक्टूबर का चुनाव बसपा के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों?
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटें खाली हो रही हैं।
इन सीटों पर चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने कार्यक्रम घोषित कर दिया है—
29 सितंबर 2026 — चुनाव की अधिसूचना
6 अक्टूबर — नामांकन की अंतिम तारीख
7 अक्टूबर — नामांकन पत्रों की जांच
9 अक्टूबर — नाम वापस लेने की अंतिम तारीख
16 अक्टूबर — मतदान
16 अक्टूबर शाम 5 बजे — मतगणना
19 अक्टूबर — चुनाव प्रक्रिया पूरी
25 नवंबर — मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त
इन 10 सीटों में भाजपा के आठ, सपा के एक और बसपा के रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।
यही वजह है कि अक्टूबर का चुनाव 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीतिक ताकत का एक बड़ा प्रदर्शन भी होगा।
बसपा के सामने सबसे बड़ी समस्या—गणित
राज्यसभा चुनाव में पार्टी का उम्मीदवार केवल लोकप्रियता या वोट प्रतिशत के आधार पर नहीं जीतता। यहां विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या निर्णायक होती है।
मौजूदा विधानसभा में भाजपा और उसके सहयोगियों के पास बड़ी संख्या है, जबकि सपा के पास भी महत्वपूर्ण संख्या है। रिपोर्ट के अनुसार 403 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा और उसके सहयोगियों के पास 289 विधायक, सपा के पास 101, कांग्रेस के दो, जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो और तीन विधायक असंबद्ध हैं।
ऐसे में बसपा के सामने चुनौती यह है कि उसके पास अपना एक भी विधायक नहीं है।
इसलिए रामजी गौतम की जगह कोई बसपा उम्मीदवार तभी राज्यसभा पहुंच सकता है, जब उसे दूसरे दलों के विधायकों का पर्याप्त समर्थन मिले।
बसपा का संकट सिर्फ सांसद या विधायक का नहीं
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बसपा की मौजूदा स्थिति को केवल “एक सीट हार गई” जैसे नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा।
आज तस्वीर यह है—सदन बसपा की मौजूदा स्थिति
लोकसभा 0 सांसद
राज्यसभा 1 सांसद — रामजी गौतम, कार्यकाल 25 नवंबर 2026 तक
उत्तर प्रदेश विधानसभा 0 विधायक
उत्तर प्रदेश विधान परिषद 0 सदस्य
अर्थात अक्टूबर के राज्यसभा चुनाव के बाद यदि बसपा को कोई सीट नहीं मिलती है, तो संसद के दोनों सदनों और यूपी विधानमंडल के दोनों सदनों में उसका निर्वाचित प्रतिनिधित्व शून्य हो जाएगा।
डेढ़ दशक में 206 से शून्य तक
बसपा की राजनीतिक यात्रा को अगर केवल आंकड़ों में देखा जाए तो कहानी और स्पष्ट हो जाती है—
2007 — 206 विधायक, पूर्ण बहुमत की सरकार
2012 — 80 विधायक, सत्ता से बाहर
2017 — 19 विधायक
2022 — सिर्फ 1 विधायक
अगस्त 2026 — उमाशंकर सिंह के निधन के बाद 0 विधायक
और लोकसभा में—
2009 — 21 सांसद
2014 — 0
2019 — 10 सांसद
2024 — 0
और अब राज्यसभा—
2020 — रामजी गौतम राज्यसभा पहुंचे
2026 — उनका कार्यकाल समाप्त
16 अक्टूबर 2026 — 10 राज्यसभा सीटों का चुनाव
यह क्रम बताता है कि बसपा का मौजूदा संकट अचानक पैदा नहीं हुआ है। यह लंबे समय में उसके चुनावी प्रतिनिधित्व के लगातार सिकुड़ने का परिणाम है।
राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा: संकट की चर्चा, लेकिन फैसला नियमों से
बसपा के इस राजनीतिक संकट के साथ एक और सवाल लगातार उठ रहा है—क्या पार्टी का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी खतरे में है?
यहां तथ्य और राजनीतिक अनुमान अलग रखना जरूरी है।
राज्यसभा की एक सीट खत्म होने से अपने आप किसी पार्टी का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा समाप्त नहीं होता। राष्ट्रीय पार्टी के लिए निर्वाचन आयोग के निर्धारित मानदंड लागू होते हैं।
लेकिन बसपा की चुनावी स्थिति निश्चित तौर पर कमजोर हुई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और राष्ट्रीय स्तर पर उसका वोट शेयर करीब 2.04 प्रतिशत रहा।
इसलिए यह कहना ज्यादा सटीक है कि बसपा के राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे को लेकर राजनीतिक और संगठनात्मक चिंता बढ़ी है, लेकिन अंतिम स्थिति निर्वाचन आयोग के निर्धारित नियमों और संबंधित चुनावी आंकड़ों के आधार पर ही तय होगी।
लेकिन क्या बसपा का वोट खत्म हो गया है?
यहीं बसपा की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है।
सीटें खत्म हुई हैं, लेकिन वोट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा को उत्तर प्रदेश में वोट मिले। लेकिन वह वोट सीटों में तब्दील नहीं हो सका।
यही कारण है कि बसपा के भविष्य को केवल उसके सांसदों और विधायकों की मौजूदा संख्या देखकर तय करना आसान नहीं है।
राजनीति में प्रतिनिधित्व के दो अलग-अलग स्तर होते हैं—
वोट बैंक और सीट।
बसपा की मौजूदा चुनौती यह है कि उसका सामाजिक और चुनावी आधार जितना भी बचा हो, वह उसे विधानसभा और लोकसभा में प्रभावी प्रतिनिधित्व में बदल नहीं पा रही है।
2027 से पहले मायावती के सामने असली चुनौती
2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं है।
लेकिन उससे पहले अक्टूबर 2026 का राज्यसभा चुनाव सामने है।
अगर बसपा राज्यसभा में भी अपनी मौजूदगी नहीं बचा पाती है, तो नवंबर 2026 के बाद स्थिति बेहद असामान्य होगी—
न लोकसभा में सांसद,
न राज्यसभा में सांसद,
न विधानसभा में विधायक,
न विधान परिषद में सदस्य।
यानी जिस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई, वह पहली बार राज्य और केंद्र के प्रमुख निर्वाचित सदनों में बिना किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के खड़ी होगी। हालिया विश्लेषण भी इसे बसपा के संसदीय प्रतिनिधित्व के लिए ऐतिहासिक स्थिति के रूप में देख रहे हैं।
सवाल “बसपा खत्म” होने का नहीं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व वापस पाने का है
बसपा की मौजूदा स्थिति को देखकर उसके राजनीतिक अंत की घोषणा करना जल्दबाजी होगी।
क्योंकि किसी पार्टी का भविष्य केवल सांसदों और विधायकों की मौजूदा संख्या से तय नहीं होता। चुनावी राजनीति में सामाजिक आधार, वोट प्रतिशत, संगठन, नेतृत्व और उस वोट को सीटों में बदलने की क्षमता—सभी महत्वपूर्ण होते हैं।
लेकिन दूसरी तरफ यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि बसपा आज अपने सबसे कमजोर निर्वाचित प्रतिनिधित्व वाले दौर में पहुंच चुकी है।
2007 में 206 विधायक रखने वाली पार्टी आज विधानसभा में शून्य पर है।
2009 में 21 लोकसभा सांसदों वाली पार्टी 2024 में शून्य पर पहुंच गई।
2019 में 10 लोकसभा सीटों की वापसी के बाद भी 2024 में पार्टी संसद के निचले सदन में खाता नहीं खोल सकी।
विधान परिषद में पहले ही कोई प्रतिनिधित्व नहीं बचा।
और अब राज्यसभा में रामजी गौतम की सीट पर अक्टूबर का चुनाव अंतिम कड़ी बन गया है।
इसलिए 16 अक्टूबर 2026 का राज्यसभा चुनाव बसपा के लिए केवल 10 सीटों का चुनाव नहीं है। यह इस बात की भी परीक्षा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती की पार्टी अपनी राजनीतिक मौजूदगी को किस तरह फिर से निर्वाचित प्रतिनिधित्व में बदलने की कोशिश करती है।
कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता के केंद्र में रही बसपा आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि “बसपा खत्म हो गई या नहीं?”
सबसे बड़ा सवाल है—
क्या बसपा अपने बचे हुए राजनीतिक आधार को फिर से सीटों और प्रतिनिधित्व में बदल पाएगी?
अक्टूबर का राज्यसभा चुनाव इस सवाल का पहला बड़ा राजनीतिक पड़ाव होगा।


