Bundelkhand Water Crisis: गर्म होती धरती, प्यासा होता बुंदेलखंड, जल, जंगल और जीवन के संकट की कहानी

Bundelkhand Water Crisis: बुन्देलखंड… यह नाम सुनते ही मन में सूखी धरती, फटी मिट्टी, खाली तालाब और पानी के लिए संघर्ष करती ज़िंदगियों की तस्वीर उभर आती है।

Sanjay Singh
Published on: 23 May 2026 1:52 PM IST
Bundelkhand Water Crisis Emergency and Climate Change
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Bundelkhand Water Crisis Emergency and Climate Change

Bundelkhand Water Crisis: बुन्देलखंड… यह नाम सुनते ही मन में सूखी धरती, फटी मिट्टी, खाली तालाब और पानी के लिए संघर्ष करती ज़िंदगियों की तस्वीर उभर आती है। लेकिन आज बुन्देलखंड केवल जल संकट से नहीं जूझ रहा, बल्कि वह भीषण गर्मी और तेजी से बदलती जलवायु की दोहरी मार झेल रहा है। बढ़ती गर्मी और जल संकट ने बुन्देलखंड की परिस्थितियों को पहले से कहीं अधिक गंभीर बना दिया है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिलों में फैला बुन्देलखंड क्षेत्र वर्षों से सूखा, पलायन और पानी की कमी जैसी समस्याओं से जूझता रहा है, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ते तापमान ने यहां के संकट को और गहरा कर दिया है। इस वर्ष मई के महीने में बुन्देलखंड के कई जिले देश के सबसे अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में शामिल रहे। बांदा में तापमान कई दिनों तक 46 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया, जबकि झांसी, महोबा, हमीरपुर और चित्रकूट में भी तापमान 45 डिग्री के पार पहुंचा। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में बुन्देलखंड में हीटवेव के दिनों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

लगभग 70 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले बुन्देलखंड की आबादी करीब दो करोड़ मानी जाती है, जिनमें से अधिकांश लोग कृषि और पशुपालन पर निर्भर हैं। लेकिन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा से पानी रही है। नीति आयोग की रिपोर्टों और विभिन्न जल अध्ययनों के अनुसार बुन्देलखंड के कई जिलों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि कई स्थानों पर भूजल स्तर 10 से 20 मीटर से अधिक नीचे पहुंच चुका है। गर्मियों में हजारों हैंडपंप और कुएं सूख जाते हैं, जिससे गांवों में पेयजल संकट गहरा जाता है।

हालांकि बुन्देलखंड का इतिहास बताता है कि यह क्षेत्र कभी जल संरचनाओं और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हुआ करता था। चंदेल शासकों ने 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच यहां हजारों तालाबों और जलाशयों का निर्माण कराया था। महोबा का मदन सागर, कीरत सागर और विजय सागर जैसे तालाब आज भी उस जल संस्कृति की पहचान हैं। इतिहासकारों के अनुसार बुन्देलखंड में कभी दस हजार से अधिक छोटे-बड़े पारंपरिक तालाब सक्रिय थे, जो वर्षा जल को रोकने, भूजल रिचार्ज करने और तापमान संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

लेकिन पिछले कुछ दशकों में तेजी से बदलती जीवनशैली और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ने स्थिति को बदल दिया। बुन्देलखंड में वन क्षेत्र लगातार घटा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कई जिलों में वन क्षेत्र राष्ट्रीय मानकों से काफी कम है। जंगलों की कटाई, पहाड़ों का अत्यधिक खनन और नदियों में अवैज्ञानिक रेत खनन ने पर्यावरण संतुलन को कमजोर कर दिया है। केन, बेतवा, धसान, पहूज और धसान जैसी नदियों का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ है। गर्मियों में कई नदियों का जलस्तर बेहद कम हो जाता है।

बुन्देलखंड में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 800 से 900 मिलीमीटर के बीच होती है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या बारिश के असमान वितरण की है। पहले जहां मानसून लंबे समय तक संतुलित वर्षा देता था, अब कुछ दिनों की अत्यधिक बारिश में ही अधिकांश पानी बह जाता है। जल विशेषज्ञों के अनुसार बुन्देलखंड में गिरने वाले कुल वर्षा जल का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा बिना संग्रहण के बहकर निकल जाता है। यही कारण है कि बारिश के बावजूद जल संकट बना रहता है।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब यहां स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। पहले बुन्देलखंड केवल सूखे के लिए जाना जाता था, लेकिन अब कई क्षेत्रों में अचानक बाढ़ जैसी स्थितियां भी बनने लगी हैं। वर्ष 2021 और 2022 में केन और बेतवा नदी के आसपास कई इलाकों में भारी बारिश के कारण बाढ़ की स्थिति बनी थी। यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि क्षेत्र की पारिस्थितिकी तेजी से असंतुलित हो रही है।

इस संकट का सबसे बड़ा असर किसानों और मजदूरों पर पड़ रहा है। बुन्देलखंड में लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन सिंचाई के सीमित साधनों के कारण खेती लगातार जोखिमपूर्ण होती जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार क्षेत्र की बड़ी कृषि भूमि आज भी वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। गर्मी बढ़ने से फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है और पशुपालन भी संकट में है। पानी और रोजगार की कमी के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की ओर पलायन करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बुन्देलखंड को भविष्य के गंभीर संकट से बचाना है तो पारंपरिक जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करना सबसे जरूरी होगा। गांवों के पुराने तालाबों की सफाई, चेकडैम, खेत तालाब, कंटूर बंडिंग और भूजल पुनर्भरण जैसे कार्य बड़े स्तर पर करने होंगे। साथ ही बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और जंगलों के संरक्षण की आवश्यकता है। कृषि क्षेत्र में कम पानी वाली फसलों, ड्रिप सिंचाई और जल संरक्षण आधारित खेती को बढ़ावा देना समय की मांग है।

बुन्देलखंड में कई सामाजिक संस्थाएं और समुदाय आधारित समूह वर्षों से इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। “जल सहेली” जैसी महिलाओं की पहल ने कई गांवों में जल संरक्षण के माध्यम से बदलाव की मिसाल पेश की है। जिन गांवों में तालाबों का पुनर्जीवन और जल संरक्षण कार्य हुए हैं, वहां भूजल स्तर में सुधार और खेती की स्थिति बेहतर होने के उदाहरण सामने आए हैं।

आज बुन्देलखंड एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां प्रकृति लगातार चेतावनी दे रही है। बढ़ती गर्मी, सूखते जल स्रोत और असंतुलित मौसम यह संकेत हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भयावह हो सकता है। लेकिन यदि इस क्षेत्र की पारंपरिक जल संस्कृति, सामुदायिक ज्ञान और प्रकृति के साथ संतुलन बनाने की पुरानी समझ को फिर से अपनाया जाए, तो बुन्देलखंड न केवल अपने संकट से उबर सकता है बल्कि पूरे देश के लिए जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का उदाहरण भी बन सकता है।

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