Chandauli News: त्यौहार बीत गए: आशा बहुओं को 3 माह से नहीं मिला वेतन, जेबें खाली

Chandauli News: चंदौली जिले की आशा बहुएं 3 माह से बकाया भुगतान न मिलने से आक्रोशित, त्योहार भी गुज़रे बेरंग, सरकार से नियमित मानदेय की मांग तेज।

Sunil Kumar
Published on: 2 Oct 2025 4:52 PM IST
Asha Workers not got salary for 3 months
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त्यौहार बीत गए: आशा बहुओं को 3 माह से नहीं मिला वेतन, जेबें खाली (Photo- Newstrack)

Chandauli News: उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में आशा बहुओं को पिछले तीन महीनों से उनका बकाया पारिश्रमिक नहीं मिला है, जिसके कारण उनमें गहरा रोष है। ये आशा बहुएं, जो ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं और चौबीसों घंटे काम करती हैं, उन्हें दुर्गा पूजा और दशहरा जैसे बड़े त्योहारों पर भी खाली हाथ रहना पड़ा। सरकार उन्हें न तो नियमित वेतन देती है और न ही मानदेय। उन्हें सिर्फ उनके द्वारा किए गए हर काम (जैसे टीकाकरण, संस्थागत प्रसव आदि) का पारिश्रमिक मिलता है, लेकिन वह भी समय पर न मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई है।

स्वास्थ्य सेवा की रीढ़, फिर भी खाली हाथ

आशा बहुएं ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों तक पहुँचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की देखभाल से लेकर बच्चों के टीकाकरण तक, वे हर छोटे-बड़े स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल होती हैं। वे गांवों में जागरूकता फैलाती हैं और लोगों को सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से जोड़ती हैं। यह ऐसा काम है जिसके लिए उन्हें चौबीसों घंटे तैयार रहना पड़ता है। इसके बावजूद, सरकार उन्हें एक निश्चित मासिक वेतन या मानदेय नहीं देती है। उनका गुजारा पूरी तरह से उनके किए गए कार्यों पर आधारित पारिश्रमिक पर निर्भर करता है।

तीन महीने का बकाया, कैसे मनेगा त्योहार?

जिले की आशा बहुओं का कहना है कि उन्हें पिछले तीन महीने से उनके काम का पैसा नहीं मिला है। यह देरी ऐसे समय में हुई जब देश भर में दुर्गा पूजा और दशहरा जैसे बड़े पर्व मनाए गए। त्योहारों के दौरान अपनी और अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसों की सख्त जरूरत होती है, लेकिन पारिश्रमिक न मिलने से उनकी जेबें खाली रहीं। इस स्थिति ने न केवल उनकी आर्थिक तंगी बढ़ा दी है, बल्कि उनके मनोबल को भी तोड़ा है।

पारिश्रमिक ही एकमात्र सहारा, वो भी नहीं

आशा बहुओं की शिकायत है कि जब उनका काम पूरी तरह से पारिश्रमिक पर निर्भर करता है, तब भी यह पैसा उन्हें समय पर नहीं दिया जाता है। समय पर भुगतान न होने का सीधा असर उनके घर-परिवार के खर्चों पर पड़ता है, जिसमें बच्चों की फीस और रोज़मर्रा की जरूरतें शामिल हैं। वे लगातार अपनी सेवाओं के लिए एक निश्चित मासिक मानदेय देने की मांग कर रही हैं, ताकि उनकी आर्थिक असुरक्षा खत्म हो सके।

रोष और मांग

पारिश्रमिक में लगातार हो रही इस देरी के कारण आशा बहुओं में गहरा रोष है। वे अब जल्द से जल्द अपने बकाये भुगतान की मांग कर रही हैं। साथ ही, वे यह भी चाहती हैं कि सरकार उनके काम की अहमियत को समझे और उन्हें नियमित तौर पर मासिक वेतन या मानदेय देना सुनिश्चित करे, ताकि वे बिना किसी चिंता के अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं जारी रख सकें। स्वास्थ्य विभाग को जल्द ही इस मामले पर ध्यान देना चाहिए ताकि ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा का यह महत्वपूर्ण पहिया बिना किसी रुकावट के चलता रहे।

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