Chandauli Gas Cylinder Price: नौगढ़ में रसोई गैस की 'डबल मार', 45 दिन का इंतजार और जनता बेहाल

Chandauli LPG Gas Price Hike: दोहरी मार ने नौगढ़ के आम आदमी और आदिवासियों के जीवन को नारकीय बना दिया है। कमरतोड़ महंगाई के इस दौर में अब गरीब की रसोई से धुएं के साथ-साथ लाचारी की चीखें निकल रही हैं।

Sunil Kumar
Published on: 7 Jun 2026 5:21 PM IST
Chandauli Naugarh
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Chandauli Naugarh LPG Price Hike (Social Media).jpg

Chandauli Gas Cylinder Price: अति पिछड़ा इलाका नौगढ़ एक बार फिर सरकारी सिस्टम और बेकाबू महंगाई की बलि चढ़ गया है। यहाँ की गरीब जनता के लिए 'उज्ज्वला' का सपना अब एक दुःस्वप्न बनता जा रहा है। एक तरफ तो ग्रामीण उपभोक्ताओं को गैस रीफिलिंग के लिए पूरे 45 दिनों का लंबा इंतजार करने का फरमान सुना दिया गया है, तो दूसरी तरफ घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दामों में सीधे 29 रुपये की एक और बेरहम बढ़ोतरी कर दी गई है। इस दोहरी मार ने नौगढ़ के आम आदमी और आदिवासियों के जीवन को नारकीय बना दिया है। कमरतोड़ महंगाई के इस दौर में अब गरीब की रसोई से धुएं के साथ-साथ लाचारी की चीखें निकल रही हैं।

आधी आबादी पर महंगाई का सीधा प्रहार: गृहिणियों का बजट ध्वस्त

गैस सिलेंडर के दाम क्या बढ़े, नौगढ़ की गृहणियों के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खिंच गईं। गाँव की रहने वाली डंगरी और सुनीता ने अपना दर्द और आक्रोश बयां करते हुए कहा, "बाजार में दाल, तेल और हरी सब्जियां पहले ही हमारी पहुंच से बाहर हो चुकी थीं। अब रही-सही कसर इस ₹29 की बढ़ोतरी ने पूरी कर दी है। सरकार क्या चाहती है कि हम फिर से चूल्हा और लकड़ी के युग में लौट जाएं?"

हैरान करने वाली बात यह है कि जहाँ ग्रामीण महिलाएं अपनी बदहाली पर रो रही हैं, वहीं नौकरीपेशा या कर्मचारी महिलाएं इस संवेदनशील मुद्दे पर कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से कतरा रही हैं, जो उनकी चुप्पी और मजबूरी को साफ बयां करता है।

ग्रामीण क्षेत्र के साथ भेदभाव: 45 दिन का 'गैस उपवास' क्यों?

इस पूरे मामले में सबसे तीखा और परेशान करने वाला पहलू सरकार का यह अजीबोगरीब नियम है। जहाँ शहरी उपभोक्ताओं को 25 दिन के बाद बुकिंग का अधिकार है, वहीं नौगढ़ जैसे सुदूर और पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों के सामान्य उपभोक्ताओं को 35 दिन व सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उज्ज्वला योजना के अत्यंत गरीब लाभर्थियों को अगले 45 दिन बाद ही बुकिंग करने पर दूसरा सिलेंडर नसीब होगा। सवाल यह उठता है कि क्या गाँव के लोगों को कम भूख लगती है? या फिर सरकार मान चुकी है कि ग्रामीण जनता डेढ़ महीने तक भूखी रह सकती है? इस भेदभावपूर्ण नियम ने गरीब परिवारों को ब्लैक में गैस खरीदने या फिर जंगलों से सूखी लकड़ियां बीनने पर मजबूर कर दिया है।


बाजार भी पस्त: व्यापारियों ने जताई गहरी चिंता

महंगाई की यह तपिश सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा और घातक असर स्थानीय बाजार पर भी पड़ रहा है। नौगढ़ के छोटे और बड़े व्यापारियों का स्पष्ट मानना है कि जब एक आम आदमी की जेब का बड़ा हिस्सा सिर्फ गैस और राशन जैसी बुनियादी चीजों में ही खत्म हो जाएगा, तो उसकी क्रय शक्ति (खरीदारी क्षमता) पूरी तरह खत्म हो जाएगी। बाजार में सन्नाटा पसरा है क्योंकि ग्राहकों के पास जरूरी चीजों के अलावा कुछ और खरीदने के पैसे ही नहीं बचे हैं।



जिम्मेदार मौन: मझगावां इंडेन गैस एजेंसी के मालिक ने साधी चुप्पी

जब इस गंभीर संकट और मनमाने दामों को लेकर 'न्यूजट्रैक' के पत्रकार सुनील कुमार ने जमीनी हकीकत जाननी चाही और 'मझगावां इंडेन गैस' के मालिक से संपर्क किया, तो उन्होंने इस मुद्दे पर बात करने से साफ इनकार कर दिया। बढ़ती कीमतों और घटती मांग के सवाल पर एजेंसी मालिक का यह मौन साफ दर्शाता है कि आम जनता की तकलीफों से सिस्टम और उसके सिंडिकेट को कोई सरोकार नहीं है। फिलहाल, जनता इस बेबसी से राहत के लिए सरकार की तरफ देख रही है, लेकिन राहत की उम्मीद धुंधली नजर आ रही है।

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