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Chandauli Panchayat Chunav: प्रधान प्रशासक, सरकार के फैसले पर स्वागत भी, सवाल भी
Chandauli Panchayat Chunav: चंदौली में प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने पर सियासत गरमाई, सरकार विकास की बात कर रही तो विपक्ष लोकतंत्र पर सवाल उठा रहा।
Chandauli Panchayat Chunav (Social Media)
Chandauli Panchayat Chunav: चंदौली में ग्राम पंचायतों के निर्वाचित प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें ही प्रशासक नियुक्त किए जाने के फैसले ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। एक तरफ जहां अधिकांश ग्राम प्रधान इस निर्णय का स्वागत कर रहे हैं, वहीं विपक्षी दल इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान की भावना के खिलाफ बताते हुए सरकार पर निशाना साध रहे हैं। जनपद चंदौली में इस मुद्दे को लेकर पंचायतों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का माहौल बना हुआ है।
चंदौली जनपद में कुल 734 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें अधिकांश ग्राम पंचायतों में पूर्व निर्वाचित प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया है, जबकि सात ग्राम पंचायतों में प्रधानों की अनुपस्थिति या अन्य कारणों से सहायक विकास अधिकारियों (एडीओ) को प्रशासक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। धानापुर ब्लॉक के शांतिपुर तोरवा, जीयनपुर और मिश्रपुरा ग्राम पंचायतों में एडीओ प्रशासक नियुक्त किए गए हैं। इसके अलावा सदर विकास खंड के पूर्वतालुके चकिया और नेगुरा, सकलडीहा ब्लॉक के कोडरिया तथा चकिया ब्लॉक के तियरी ग्राम पंचायत में भी सहायक विकास अधिकारियों को प्रशासक बनाया गया है।
सरकार का तर्क है कि पंचायत चुनाव संपन्न होने तक गांवों में विकास कार्यों की निरंतरता बनाए रखने और प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए यह व्यवस्था की गई है। भाजपा नेताओं का कहना है कि यदि पंचायतों में कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं होती तो विकास योजनाएं प्रभावित होतीं और ग्रामीण जनता को नुकसान उठाना पड़ता।
हालांकि विपक्ष इस फैसले को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर है। विपक्षी दलों का आरोप है कि पंचायत चुनाव टालने और राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से यह व्यवस्था बनाई गई है। उनका कहना है कि पांच वर्षों के लिए चुने गए जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें दोबारा प्रशासक बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
उधर ग्राम प्रधानों के बीच भी इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई प्रधानों का मानना है कि यदि पंचायत चुनाव अगले एक वर्ष तक नहीं होते हैं तो उन्हें विकास कार्यों को जारी रखने का अवसर मिलेगा। पंचायत चुनाव में आरक्षण व्यवस्था के कारण सीटों के बदलने की संभावना रहती है। ऐसे में कई प्रधानों को यह आशंका है कि अगली बार उनकी सीट आरक्षित या किसी अन्य श्रेणी में चली सकती है, जिससे दोबारा चुनाव लड़ना या जीत हासिल करना कठिन हो सकता है। ऐसे प्रधानों के लिए प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखना एक तरह से राजनीतिक और प्रशासनिक अवसर माना जा रहा है।
हालांकि इस संबंध में प्रधान संघ के जिला अध्यक्ष पवन सिंह ने कहा की सरकार जो निर्णय लिया है वह जो सरकार का निर्णय है उसका हम लोग स्वागत करते हैं।
इसके साथ ही कुछ प्रधानों के मन में चिंता भी है। उनका कहना है कि अब विकास कार्यों की स्वीकृति और भुगतान की प्रक्रिया पहले की अपेक्षा अधिक जटिल हो सकती है। प्रधानों का मानना है कि जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) के माध्यम से जिलाधिकारी की स्वीकृति लेने की व्यवस्था में फाइलें कई स्तरों से गुजरेंगी। इससे कार्यों में विलंब होने के साथ-साथ कथित तौर पर कमीशनखोरी बढ़ने की आशंका भी है। कई प्रधानों का कहना है कि "जितनी ज्यादा टेबलों पर फाइल जाएगी, उतना ही कमीशन का खेल बढ़ेगा।"
सपा जिलाध्यक्ष ने दी तीखी प्रतिक्रिया
इस पूरे मामले पर समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष सतनारायण राजभर ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार में संवैधानिक संस्थाएं और संवैधानिक पद अंतिम सांसें गिन रहे हैं। उनके अनुसार वर्तमान सरकार में संविधान की भावना का सम्मान नहीं किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक लाभ और सत्ता की लालसा में प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है और न्यायालय जो भी निर्णय देगा, समाजवादी पार्टी उसका सम्मान करेगी।
बसपा जिलाध्यक्ष ने कहा पार्टी के बढ़ते जनाधार से पंचायत चुनाव टाला
बहुजन समाज पार्टी के जिलाध्यक्ष घनश्याम प्रधान ने भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में बसपा का जनाधार लगातार बढ़ रहा है और इसी कारण भाजपा पंचायत चुनाव कराने से बच रही है। उनके अनुसार पंचायत चुनाव टालने के लिए ही प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2007 की तरह वर्ष 2027 में भी बसपा प्रदेश की राजनीति में बड़ा प्रदर्शन करेगी। घनश्याम प्रधान ने भाजपा पर संविधान विरोधी कार्य करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जनता में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि बहुजन समाज पार्टी सर्व समाज के हितों के लिए कार्य करती रही है और भविष्य में भी करती रहेगी।
विधान सभा के हार के डर से, डर गई भाजपा,कांग्रेस जिलाध्यक्ष का बड़ा बयान
कांग्रेस जिलाध्यक्ष अरुण द्विवेदी ने भी भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में संभावित हार के डर से पंचायत चुनाव नहीं करा रही है। उनके अनुसार यदि पंचायत चुनाव होते तो जनता का मूड स्पष्ट रूप से सामने आता और उसका प्रभाव विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता था। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने संविधान और नियमों को दरकिनार करते हुए कार्यकाल पूरा कर चुके जनप्रतिनिधियों को प्रशासक नियुक्त कर दिया है। अरुण द्विवेदी ने कहा कि भाजपा किसी भी तरह सत्ता पर बने रहने की कोशिश कर रही है, लेकिन जनता आगामी चुनावों में इसका जवाब देगी।
भाजपा पूर्व जिलाध्यक्ष राणा सिंह ने कहा अगर हम दो दूना चार कहे तो विपक्ष कहेगा गलत
विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष एवं पूर्व जिलाध्यक्ष राणा प्रताप सिंह ने कहा कि भाजपा चाहे कोई भी निर्णय ले, विपक्ष उसका विरोध करने के लिए तैयार रहता है। उन्होंने कहा कि विपक्ष के पास भाजपा की आलोचना के अलावा कोई सकारात्मक एजेंडा नहीं बचा है। राणा प्रताप सिंह के अनुसार सरकार गांवों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है और इसी उद्देश्य से प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया है। उन्होंने कहा कि कुछ प्रशासनिक और कानूनी अड़चनों के कारण पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाए, लेकिन सरकार विकास कार्यों को रुकने नहीं देना चाहती।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासक बनाए गए सभी प्रधान भाजपा से जुड़े हों, यह जरूरी नहीं है। विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े प्रधान भी इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। उनके अनुसार सरकार ने यह निर्णय पूरी तरह संवैधानिक प्रक्रिया और जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए लिया है। उन्होंने विपक्ष पर केवल राजनीतिक बयानबाजी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जनता सरकार के विकास कार्यों को देख रही है और आने वाले समय में इसका परिणाम भी दिखाई देगा।
फिलहाल चंदौली में प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। जहां सरकार इसे विकास कार्यों की निरंतरता से जोड़कर देख रही है, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने वाला कदम बता रहा है। पंचायत चुनाव कब होंगे और इस व्यवस्था पर न्यायालय का क्या रुख रहेगा, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा जिले ही नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बना रह सकता है।


