Etawah Mazar Demolition: कभी सजती थीं महफिलें, पूरी होती थीं मन्नतें...अब लगे हैं पौधे, इटावा की एक चर्चित मजार का अंत

Etawah Mazar Demolition 2026: इटावा के फिशर वन क्षेत्र में वर्षों से चर्चा में रही मजार हटने के बाद अब वहां 1000 पौधे लगाए गए हैं। वन विभाग इस भूमि को हरित क्षेत्र के रूप में विकसित करेगा।

Jyotsana Singh
Published on: 13 Jun 2026 3:15 PM IST (Updated on: 13 Jun 2026 3:17 PM IST)
Etawah Mazar Demolition site transformed into a green zone with 1000 saplings planted Uttar Pradesh 2026
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Etawah Mazar Demolition News 2026

Etawah Mazar Demolition 2026: कई दशकों से इटावा के फिशर वन क्षेत्र में हर साल उर्स के दौरान सजने वाली रंग-बिरंगी महफिलें, देर रात तक गूंजती कव्वालियां और दूर-दूर से आने वाले जायरीनों की चहल-पहल अब बीते दिनों की बात हो गई है। जिस स्थान पर कभी चादरपोशी और दुआओं का सिलसिला चलता था, वहां अब आम, नीम और जामुन के पौधे अपनी जड़ें जमा रहे हैं। मजार के हटने के साथ ही उर्स की रौनक, कव्वालियों की महफिलें और उससे जुड़ी अनेक यादें भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई हैं।

इटावा सफारी पार्क के निकट फिशर वन क्षेत्र में वर्षों से चर्चा और विवाद का केंद्र रही कथित तौर पर मोहम्मद गौरी के सेनापति शमशुद्दीन से जुड़ी मजार अब इतिहास बन चुकी है। वन विभाग की संरक्षित भूमि से अवैध निर्माण हटाए जाने के कुछ ही घंटों बाद वहां का दृश्य पूरी तरह बदल गया। जहां कभी मजार और उससे जुड़े निर्माण दिखाई देते थे, वहां अब आम, नीम, जामुन और सहजन के पौधे लहलहाने की तैयारी में हैं।

वन विभाग ने खाली कराई गई 0.0281 हेक्टेयर भूमि पर करीब एक हजार पौधे रोपकर इस स्थान को हरित क्षेत्र में बदलने की शुरुआत कर दी है। विभाग का कहना है कि आने वाले समय में यहां विकसित वन क्षेत्र तैयार किया जाएगा, जिससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और अतिक्रमण की आशंकाएं भी समाप्त होंगी।

रात में हटी मजार, सुबह मिला पौधारोपण

स्थानीय लोगों के लिए यह बदलाव किसी आश्चर्य से कम नहीं था। बुधवार देर रात तक जिस स्थान पर मजार का ढांचा मौजूद था, गुरुवार सुबह वहां पौधारोपण का काम शुरू हो चुका था। वन विभाग के कर्मचारियों ने पूरे क्षेत्र को समतल कर पौधे लगाए और उनकी देखभाल के लिए आधा दर्जन कर्मचारियों की ड्यूटी भी लगा दी। वन विभाग के अनुसार यह भूमि संरक्षित वन क्षेत्र का हिस्सा है और इसे प्राकृतिक स्वरूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है। अधिकारियों का कहना है कि आवश्यकता के अनुसार आगे भी यहां पौधारोपण जारी रहेगा।

क्या था पूरा विवाद?

फिशर वन क्षेत्र में स्थित यह मजार स्थानीय स्तर पर सैयद बाबा की मजार के नाम से जानी जाती थी। यहां हर वर्ष उर्स और अन्य धार्मिक आयोजन होते थे। कुछ लोगों का दावा था कि यह मजार मोहम्मद गौरी के सेनापति शमशुद्दीन की है और कई सौ वर्षों से यहां आस्था का केंद्र रही है। हालांकि इसके ऐतिहासिक दस्तावेजों और वास्तविक पहचान को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं। करीब एक वर्ष पहले इस भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायत शासन तक पहुंची थी। इसके बाद राजस्व और वन विभाग की संयुक्त जांच कराई गई। जांच में भूमि वन विभाग की संरक्षित संपत्ति पाई गई। मामला वन प्राधिकारी न्यायालय पहुंचा, जहां मजार प्रबंधन से भूमि के स्वामित्व संबंधी दस्तावेज मांगे गए। 64 दिनों तक चली सुनवाई के दौरान कोई वैध साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जा सका। इसके बाद न्यायालय ने बेदखली और ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया।

अपील भी हुई खारिज

न्यायालय के आदेश के खिलाफ प्रथम अपीलीय अधिकारी, मुख्य वन संरक्षक के समक्ष अपील दायर की गई थी। लेकिन वहां भी भूमि पर स्वामित्व के पक्ष में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जा सके। अपील खारिज होने के बाद प्रशासन और मजार प्रबंधन के बीच बातचीत हुई।

मजार के सदर फजले इलाही ने बाद में न्यायालय जाने से इनकार कर दिया और कहा कि जो हो गया, उसे स्वीकार किया जाएगा। प्रशासन के अनुसार प्रबंधन ने स्वयं भी कुछ हिस्से हटाए, जबकि शेष निर्माण प्रशासनिक कार्रवाई में ध्वस्त कर दिया गया।

शमशुद्दीन कौन थे? इतिहास और लोककथाओं में दर्ज है कहानी

शमशुद्दीन को लेकर स्थानीय स्तर पर कई कथाएं प्रचलित हैं। माना जाता रहा है कि वे 12वीं शताब्दी में भारत आए मोहम्मद गौरी की सेना से जुड़े एक सेनापति थे। हालांकि इतिहासकारों के बीच इस दावे की स्पष्ट और प्रमाणिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। अधिकांश जानकारी लोकमान्यताओं, मौखिक परंपराओं और क्षेत्रीय मान्यताओं पर आधारित है।

इटावा और आसपास के क्षेत्रों में मोहम्मद गौरी तथा कन्नौज के राजा जयचंद से जुड़े युद्धों की कई लोककथाएं सुनाई जाती हैं। इन्हीं कथाओं के आधार पर शमशुद्दीन की मजार को ऐतिहासिक महत्व दिया जाता रहा। समय के साथ यह स्थान धार्मिक आस्था का केंद्र बन गया और दूर-दूर से लोग यहां पहुंचने लगे।

क्या कहती है स्थानीय लोककथा?

लोककथाओं के अनुसार 12वीं शताब्दी के अंत में जब मोहम्मद गौरी ने उत्तर भारत पर आक्रमण किया, तब उसका संघर्ष पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज के राजा जयचंद से हुआ। कहा जाता है कि तराइन के युद्ध के बाद गौरी की सेना गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र में आगे बढ़ी थी।

स्थानीय मान्यता के मुताबिक गौरी के कुछ सेनापति और सैनिक इटावा, कन्नौज, मैनपुरी और औरैया क्षेत्र तक पहुंचे। इन्हीं में एक सेनापति शमशुद्दीन भी बताए जाते हैं। कहा जाता है कि किसी संघर्ष या अभियान के दौरान उनकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके सम्मान में एक मजार बनाई गई। बाद में यह स्थान स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र बन गया।

इसके अलावा इटावा और आसपास के इलाकों में कई पुरानी मजारें, टीले और ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं। समय के साथ स्थानीय लोगों ने इन्हें मध्यकालीन युद्धों और गौरी की सेना से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। इसी वजह से कई स्थानों के बारे में यह मान्यता बनी कि वहां गौरी के सैनिकों या सेनापतियों की कब्रें हैं।

क्या कहते हैं इतिहासकार?

इतिहासकारों के अनुसार मोहम्मद गौरी और जयचंद के बीच हुए संघर्षों तथा 1194 ईस्वी के चंदावर के युद्ध (जो वर्तमान इटावा के निकट माना जाता है) का उल्लेख ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है। इसी युद्ध में जयचंद की हार और मृत्यु का वर्णन मिलता है। लेकिन शमशुद्दीन नामक किसी विशेष सेनापति की कब्र या मजार को लेकर ठोस ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।

यही कारण है कि शमशुद्दीन की मजार से जुड़ी कहानी को स्थानीय लोकविश्वास और क्षेत्रीय परंपराओं का हिस्सा माना जाता है, जबकि उसके सभी दावों की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं हो पाई है।

उर्स में जुटती थी भीड़

मजार पर हर वर्ष उर्स का आयोजन किया जाता था। स्थानीय मुस्लिम समुदाय के अलावा अन्य समुदायों के लोग भी यहां पहुंचते थे। चादरपोशी, फातिहा और सामूहिक दुआएं उर्स का प्रमुख हिस्सा होती थीं। कई श्रद्धालु यहां मनोकामना पूरी होने की मान्यता के साथ आते थे। हालांकि इस वर्ष भूमि विवाद और प्रशासनिक प्रतिबंधों के कारण उर्स को लेकर भी विवाद की स्थिति बनी रही। वन विभाग ने भूमि स्वामित्व विवाद का हवाला देते हुए आयोजन की अनुमति नहीं दी थी, जिसके बाद मामला और चर्चा में आ गया था।

अब हरियाली बनेगी नई पहचान

इटावा सफारी पार्क के निकट स्थित फिशर वन क्षेत्र पहले से ही पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। वन विभाग का कहना है कि खाली कराई गई भूमि को वन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाएगा ताकि जैव विविधता को बढ़ावा मिल सके और क्षेत्र का प्राकृतिक स्वरूप मजबूत हो।

वन रेंजर अशोक शर्मा के अनुसार पौधारोपण विभाग के नियमित कार्यों का हिस्सा है और भविष्य में आवश्यकता के अनुसार और पौधे लगाए जाएंगे। अभी तक एक हजार पौधों के रोपण के साथ उस भूमि पर हरियाली का नया अध्याय शुरू हो चुका है, जहां कुछ दिन पहले तक एक लंबे समय से ऐतिहासिक मजार मौजूद रही थी।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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