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Hamirpur News: 5 किमी पैदल चलकर कलक्ट्रेट पहुंचे बच्चे, बोले- सड़क बनवा दो, हम भी अफसर बनेंगे
Hamirpur News: हमीरपुर में चंदूपुर के स्कूली बच्चे खराब सड़क के विरोध में 5 किमी पैदल चलकर कलक्ट्रेट पहुंचे। बच्चों ने पक्की सड़क बनवाने की मांग की।
Hamirpur News (Image Credit-Social Media)
हमीरपुर। “सड़क बनवा दो, हम भी पढ़ाई करेंगे और अफसर बनेंगे…” हमीरपुर कलक्ट्रेट परिसर में मंगलवार को घंटों तक गूंजते ये नारे किसी राजनीतिक दल या कर्मचारी संगठन के नहीं थे। ये उन स्कूली बच्चों की आवाज थी, जो चंदूपुर और आसपास के गांवों से करीब पांच किलोमीटर पैदल चलकर जिला मुख्यालय पहुंचे थे। उनकी मांग बेहद बुनियादी थी—स्कूल आने-जाने वाला चंदूपुर-हमीरपुर मार्ग पक्का कराया जाए। बच्चे तिरंगा लेकर कलक्ट्रेट पहुंचे, करीब पांच घंटे तक प्रदर्शन किया और जिलाधिकारी अभिषेक गोयल से सीधे अपनी बात कहने की मांग करते रहे। लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी और अंततः बच्चे मायूस होकर लौट गए। समकालीन मीडिया रिपोर्टों में भी इस प्रदर्शन को लगभग पांच किलोमीटर की पदयात्रा और लंबे धरने के रूप में दर्ज किया गया है।
यह प्रदर्शन इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि कुछ दिन पहले फतेहपुर में स्कूली छात्रों ने पंखे, साफ पानी, सफाई, खेल मैदान और विज्ञान प्रयोगशाला जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था। वहां जिलाधिकारी और शिक्षा विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे और कई मांगों पर तत्काल कार्रवाई का भरोसा दिया गया था। अब हमीरपुर में बच्चों के सड़क के लिए कलक्ट्रेट पहुंचने से ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर नई पीढ़ी की बढ़ती मुखरता फिर सामने आई है। (
कीचड़ और खराब सड़क से होकर रोज स्कूल जाते हैं बच्चे
चंदूपुर और आसपास के कई गांवों के विद्यार्थियों का कहना है कि जिस मार्ग से वे रोज स्कूल आते-जाते हैं, वह लंबे समय से खराब है। बरसात में स्थिति और बदतर हो जाती है। सड़क पर कीचड़, पानी और गड्ढों के कारण पैदल चलना तक मुश्किल हो जाता है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार सड़क को अस्थायी रूप से चलने योग्य बनाने के लिए मिट्टी डलवाने का प्रयास भी हुआ, लेकिन बारिश के बाद समस्या फिर खड़ी हो गई। ग्रामीण सड़क की खराब हालत केवल आने-जाने की असुविधा नहीं है। इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है। मानसून में यदि रास्ता मुश्किल हो जाए तो स्कूल पहुंचने का समय बढ़ता है, दुर्घटना का जोखिम बढ़ता है और छोटे बच्चों के लिए नियमित उपस्थिति भी चुनौती बन सकती है।यही वजह है कि प्रदर्शन के दौरान बच्चों का सबसे प्रभावशाली नारा था—“सड़क बनवा दो, हम भी पढ़ाई करेंगे और अफसर बनेंगे।”
कलक्ट्रेट पहुंचे तो गोल चबूतरे पर बैठाया गया
बच्चों का समूह कलक्ट्रेट पहुंचा तो प्रशासन ने उन्हें परिसर के गोल चबूतरे के पास प्रदर्शन करने को कहा। छात्र-छात्राएं वहां बैठ गए, लेकिन उनकी मुख्य मांग थी कि जिलाधिकारी खुद आकर उनकी बात सुनें।इसके बाद प्रशासन ने पांच बच्चों को अधिकारियों से बातचीत के लिए बुलाया। लेकिन जिलाधिकारी से मुलाकात नहीं होने पर कुछ बच्चे नाराज हो गए और डीएम कार्यालय की ओर बढ़ने लगे। स्थिति को देखते हुए पुलिस और पीएसी के जवानों को आगे किया गया और बच्चों को कार्यालय की तरफ जाने से रोक दिया गया। कुछ बच्चे कार्यालय तक पहुंच भी गए, लेकिन उन्हें वापस बाहर भेज दिया गया।मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रदर्शन शांतिपूर्ण मांग से शुरू हुआ था, लेकिन जिलाधिकारी से मुलाकात न हो पाने के कारण बच्चों में नाराजगी बढ़ी।
अफसरों की गाड़ियों को घेरा, नारे लगाते रहे बच्चे
प्रदर्शन के दौरान कलक्ट्रेट परिसर से गुजरने वाली अधिकारियों की गाड़ियों के सामने भी बच्चे पहुंच गए और सड़क निर्माण की मांग को लेकर नारे लगाए। एडीएम राकेश कुमार ने बच्चों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे जिलाधिकारी से मिलकर ही लौटने पर अड़े रहे।कुछ अभिभावक भी इस दौरान कलक्ट्रेट पहुंच गए। मूल समाचार के अनुसार प्रशासनिक अधिकारियों और अभिभावकों के बीच भी तीखी बातचीत हुई।
करीब पांच घंटे तक चला प्रदर्शन आखिरकार उस समय समाप्त हुआ जब बच्चों को बताया गया कि जिलाधिकारी वहां से जा चुके हैं। इसके बाद छात्र-छात्राएं वापस गांव लौट गए।
‘डीएम पीछे के गेट से निकले’—प्रदर्शनकारियों का दावा
प्रदर्शन से जुड़ी सबसे विवादित बात यह रही कि बच्चों और उनके साथ मौजूद लोगों ने दावा किया कि जिलाधिकारी उनसे मिले बिना कलक्ट्रेट के पीछे के रास्ते से निकल गए। समाचार स्रोत में भी यही विवरण दिया गया है।हालांकि इस हिस्से को प्रशासन के पक्ष के साथ पढ़ना जरूरी है। जिलाधिकारी अभिषेक गोयल ने कहा कि इसे केवल बच्चों का प्रदर्शन कहना सही नहीं होगा। उनके अनुसार करीब सौ लोग आए थे और उनमें अधिकांश वयस्क थे, जबकि कुछ लोग अपने बच्चों को साथ लाए थे।जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी अभिषेक गोयल वर्तमान जिलाधिकारी के रूप में दर्ज हैं।
डीएम बोले—‘यह बच्चों का प्रदर्शन नहीं था’
जिलाधिकारी अभिषेक गोयल ने कहा, “यह बच्चों का प्रदर्शन नहीं था। तकरीबन सौ लोग आए थे, उनमें ज्यादातर वयस्क थे। कुछ लोग अपने बच्चों के साथ आए थे। ये लोग पहले भी आ चुके हैं।” उनके अनुसार सड़क निर्माण की मांग से शासन को अवगत कराया जा चुका है और धन आवंटित होते ही सड़क बनवा दी जाएगी। तब तक अस्थायी तौर पर मिट्टी डालकर मार्ग को चलने योग्य बनाया जाएगा। इस तरह इस घटना के दो अलग पक्ष सामने आते हैं। प्रदर्शनकारी इसे बच्चों की स्वाभाविक सड़क मांग बता रहे हैं, जबकि प्रशासन का कहना है कि इसमें बड़ी संख्या में वयस्क शामिल थे और बच्चों की मौजूदगी के कारण इसे पूरी तरह छात्र आंदोलन कहना सही नहीं होगा।
सवाल फिर भी वही—सड़क कब बनेगी?
प्रदर्शन में बच्चे कितने थे और वयस्क कितने, यह बहस अपनी जगह है, लेकिन इससे मूल समस्या नहीं बदलती। चंदूपुर-हमीरपुर मार्ग के निर्माण की मांग लंबे समय से चली आ रही है और प्रशासन भी यह मान रहा है कि सड़क को बनाने के लिए धन की आवश्यकता है। यदि रास्ता इतना खराब है कि बरसात में बच्चों को स्कूल पहुंचने में कठिनाई होती है, तो मुद्दे का समाधान प्रदर्शन की प्रकृति तय करने से नहीं बल्कि सड़क निर्माण की समयबद्ध योजना से होगा। यहीं प्रशासन के बयान से एक और प्रश्न निकलता है। यदि धन आवंटन अभी बाकी है तो सड़क की स्वीकृति किस चरण में है, कितनी लागत प्रस्तावित है, कितनी लंबाई का निर्माण होना है और बजट कब तक मिलने की संभावना है—इन सवालों का स्पष्ट जवाब ग्रामीणों और विद्यार्थियों के लिए अधिक उपयोगी होगा।
फतेहपुर में बच्चों की मांग पर डीएम पहुंचे थे मौके पर
इस घटना की तुलना स्वाभाविक रूप से फतेहपुर से हो रही है। 28 जुलाई 2026 को फतेहपुर जिले के किशनपुर स्थित सर्वोदय इंटर कॉलेज के विद्यार्थियों ने विद्यालय में पंखे, साफ पानी, सफाई, खेल मैदान और विज्ञान की पढ़ाई जैसी सुविधाओं के लिए प्रदर्शन किया था। वहां जिलाधिकारी निधि गुप्ता वत्स और जिला विद्यालय निरीक्षक सहित अधिकारी मौके पर पहुंचे थे। कई सुविधाएं तत्काल उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए और विज्ञान प्रयोगशाला के लिए शासन को प्रस्ताव भेजने की बात कही गई।
हमीरपुर में तस्वीर अलग रही। यहां बच्चों की मुख्य मांग स्कूल परिसर के भीतर की सुविधा नहीं बल्कि स्कूल तक पहुंचने वाली सड़क है और पांच घंटे तक कलक्ट्रेट में रहने के बावजूद वे जिलाधिकारी से प्रत्यक्ष बातचीत नहीं कर सके।
क्या सचमुच यह ‘जेन अल्फा आंदोलन’ है?
इन घटनाओं को सोशल मीडिया और समाचारों में तेजी से ‘जेन अल्फा का आंदोलन’ कहा जा रहा है। आम तौर पर 2010 के आसपास या उसके बाद जन्मे बच्चों को जनरेशन अल्फा कहा जाता है। यानी मौजूदा स्कूली बच्चों का बड़ा हिस्सा इसी आयु समूह में आता है।लेकिन इसे अभी किसी संगठित ‘जेन अल्फा आंदोलन’ का रूप देना जल्दबाजी होगी। फतेहपुर और हमीरपुर की घटनाएं मुख्यतः स्थानीय समस्याओं से पैदा हुए छात्र प्रदर्शन हैं। हां, दोनों घटनाओं में एक समानता जरूर दिखाई देती है—कम उम्र के विद्यार्थी अब बुनियादी सुविधाओं के लिए स्वयं सार्वजनिक रूप से अपनी मांग रख रहे हैं।हमीरपुर के प्रदर्शन को सोशल मीडिया पर भी व्यापक प्रतिक्रिया मिली और इसे बच्चों द्वारा सुरक्षित स्कूल पहुंच की मांग के रूप में समर्थन मिला।
बच्चों के प्रदर्शन से बड़ा सवाल—क्या स्कूल का रास्ता भी शिक्षा का हिस्सा है?
शिक्षा केवल स्कूल की इमारत, शिक्षक और किताबों तक सीमित नहीं है। यदि छात्र स्कूल तक सुरक्षित तरीके से पहुंच ही न सके तो बाकी सुविधाओं का महत्व कम हो जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, परिवहन, पुल और बरसाती रास्ते शिक्षा तक पहुंच तय करने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं।एक अच्छी सड़क बच्चे को केवल स्कूल तक नहीं पहुंचाती। उसी मार्ग से एंबुलेंस आती है, शिक्षक पहुंचते हैं, किसान बाजार जाता है और गांव की आर्थिक गतिविधियां जिला मुख्यालय से जुड़ती हैं।इसलिए चंदूपुर के बच्चों की मांग को सिर्फ सड़क निर्माण के एक स्थानीय विवाद के रूप में देखना अधूरा होगा। यह ग्रामीण बुनियादी ढांचे और शिक्षा तक समान पहुंच का सवाल भी है।
तिरंगा हाथ में, मांग केवल एक—स्कूल जाने लायक रास्ता
हमीरपुर के इस प्रदर्शन की सबसे मजबूत तस्वीर शायद यही है—स्कूली बच्चे हाथों में तिरंगा लेकर पांच किलोमीटर चलकर जिला मुख्यालय पहुंचे और सरकार से किसी बड़ी सुविधा की नहीं, केवल स्कूल आने-जाने के लिए ठीक सड़क की मांग करते रहे।
प्रशासन ने अस्थायी तौर पर मिट्टी डालकर रास्ता चलने योग्य बनाने और शासन से धन मिलते ही सड़क निर्माण कराने का भरोसा दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह आश्वासन कितनी जल्दी जमीन पर उतरता है।
बच्चों की उम्र चाहे उन्हें ‘जेन अल्फा’ की श्रेणी में रखती हो या नहीं, उनका सवाल बिल्कुल पुराना और बुनियादी है—अगर गांव से स्कूल तक सड़क ही नहीं होगी तो पढ़ाई तक बराबर पहुंच कैसे बनेगी?


