हनुमानगढ़ी में नमाज पढ़े जाने का दावा कितना सच? जानिए 22 साल पुराने विवाद की पूरी कहानी

Hanumangarhi Namaz Controversy: जानिए हनुमानगढ़ी नमाज विवाद की पूरी कहानी। 2003 के रोजा इफ्तार कार्यक्रम, कोर्ट की कार्रवाई, महंत ज्ञान दास की भूमिका और विवाद की पूरी टाइमलाइन।

Harsh Sharma
Published on: 10 July 2026 4:07 PM IST
हनुमानगढ़ी में नमाज पढ़े जाने का दावा कितना सच? जानिए 22 साल पुराने विवाद की पूरी कहानी
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Hanumangarhi Namaz Controversy: अयोध्या की हनुमानगढ़ी का नाम जब भी चर्चा में आता है, तो साल 2003 का एक पुराना विवाद फिर सामने आ जाता है। अक्सर यह कहा जाता है कि मंदिर परिसर में नमाज पढ़ी गई थी, लेकिन इस पूरे मामले को समझने के लिए इसकी शुरुआत जानना जरूरी है। साल 2003 में अयोध्या विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाने और हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच विश्वास बढ़ाने की कोशिशें चल रही थीं। इसी दौरान हनुमानगढ़ी से जुड़े महंत ज्ञान दास के आश्रम में रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुस्लिम समाज के कई प्रमुख लोग शामिल हुए। इनमें बाबरी मस्जिद मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी और मुस्लिम नेता सादिक अली उर्फ बाबू टेलर भी मौजूद थे। उस समय इस आयोजन को दोनों समुदायों के बीच संवाद और भाईचारे की पहल माना गया।

नमाज को लेकर कैसे बढ़ा विवाद?

इफ्तार कार्यक्रम के बाद यह आरोप सामने आया कि कार्यक्रम के दौरान हनुमानगढ़ी परिसर में नमाज भी अदा की गई। इसी दावे के बाद विवाद शुरू हो गया। कुछ लोगों ने इसे धार्मिक परंपराओं के खिलाफ बताया, जबकि कुछ लोगों का कहना था कि कार्यक्रम का उद्देश्य केवल आपसी सौहार्द बढ़ाना था। यह मामला धीरे-धीरे धार्मिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया। हनुमानगढ़ी के एक अन्य महंत धर्मदास ने इस आयोजन का विरोध किया और इसे अदालत में चुनौती दी। उनका कहना था कि मंदिर परिसर में इस तरह के धार्मिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाने चाहिए।

कोर्ट में पहुंचा मामला

विवाद बढ़ने के बाद मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच तक पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार जैसे आयोजनों पर रोक लगा दी। अदालत के इस आदेश के बाद यह कार्यक्रम बंद हो गया। बताया जाता है कि साल 2005 तक इस मुद्दे को लेकर काफी तनाव बना रहा। बढ़ते विवाद को देखते हुए महंत ज्ञान दास ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार का आयोजन नहीं कराया जाएगा।

महंत ज्ञान दास की सोच क्या थी?

महंत ज्ञान दास को उन संतों में गिना जाता था जो अयोध्या विवाद का समाधान बातचीत और आपसी समझ से निकालने के पक्षधर थे। वे अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष भी रह चुके थे। उनका मानना था कि हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच संवाद बना रहना चाहिए ताकि तनाव कम हो और विश्वास मजबूत हो। इसी सोच के तहत उन्होंने कई बार मुस्लिम समाज के लोगों से बातचीत की और दोनों समुदायों के बीच रिश्ते बेहतर बनाने की कोशिश की। उनके समर्थकों का कहना था कि इफ्तार कार्यक्रम भी इसी प्रयास का हिस्सा था।

आज फिर क्यों हो रही है चर्चा?

हनुमानगढ़ी में नमाज का मुद्दा समय-समय पर सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में फिर सामने आ जाता है। कई बार इस घटना का केवल एक हिस्सा ही बताया जाता है, जिससे पूरा संदर्भ लोगों तक नहीं पहुंच पाता। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विवाद की शुरुआत साल 2003 में आयोजित रोजा इफ्तार कार्यक्रम के बाद लगे नमाज संबंधी आरोपों से हुई थी। इसके बाद मामला अदालत पहुंचा और कोर्ट के आदेश के बाद हनुमानगढ़ी परिसर में ऐसे आयोजनों पर रोक लग गई। इस वजह से जब भी यह विषय उठता है, तो पूरी घटनाक्रम, अदालत की कार्रवाई और उस समय की परिस्थितियों को साथ में समझना जरूरी माना जाता है। तभी इस विवाद की सही पृष्ठभूमि और वास्तविक संदर्भ को समझा जा सकता है।

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Harsh Sharma is a Content Writer at Newstrack.com.

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