Hapur News: आलू की मंदी से किसानों पर दोहरी मार, शीतगृहों में डंप एक लाख टन से ज्यादा आलू

Hapur News: हापुड़ में आलू के दामों में गिरावट से किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। शीतगृहों में एक लाख टन से ज्यादा आलू डंप होने से किसानों को नुकसान और बिक्री की चिंता सता रही है।

Avnish Pal
Published on: 19 Oct 2026 5:32 PM IST
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Hapur News(Photo-Social Media)

Hapur News: गन्ना और धान की फसल का उत्पादन आधा रहने से पहले ही आर्थिक संकट का सामना कर रहे किसानों की मुश्किलें अब आलू की मंदी ने और बढ़ा दी हैं। बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद में शीतगृहों में रखा आलू किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। बाजार में आलू के भाव इतने नीचे हैं कि किसानों को उपज बेचने पर लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। दूसरी ओर, शीतगृह में आलू रखने के लिए लगातार बढ़ता खर्च उनकी चिंता बढ़ा रहा है।

हालात यह हैं कि जिले के 20 शीतगृहों में अब भी करीब एक लाख चार हजार मीट्रिक टन आलू भंडारित है। ऐसे में किसानों के सामने आलू बेचने या भाव बढ़ने की उम्मीद में शीतगृह में रखे रहने देने की दुविधा बनी हुई है।किसानों की परेशानी इसलिए भी बढ़ रही है, क्योंकि नवंबर के प्रथम सप्ताह में पंजाब और हिमाचल प्रदेश से नए आलू की आवक शुरू होने की संभावना है। नई फसल बाजार में पहुंचने के बाद कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है। यदि अगले दो सप्ताह में भाव में सुधार नहीं हुआ तो किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर आलू बेचना पड़ सकता है। वहीं, जो किसान उपज नहीं निकाल पाएंगे, उनके सामने भंडारण का अतिरिक्त खर्च उठाने के साथ आलू खराब होने का खतरा भी बना रहेगा।

तीन साल से मंदी झेल रहे किसानों की मुश्किलें बढ़ीं

जिले के आलू उत्पादक किसान पिछले तीन वर्षों से बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव और मंदी की समस्या से जूझ रहे हैं। इस वर्ष भी उन्हें राहत मिलने की उम्मीद पूरी होती नजर नहीं आ रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जिले के 20 शीतगृहों में इस वर्ष करीब दो लाख चार हजार मीट्रिक टन आलू का भंडारण किया गया था। वर्तमान में इनमें लगभग एक लाख चार हजार मीट्रिक टन आलू रखा हुआ है।त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने के बावजूद आलू के भाव किसानों को राहत देने की स्थिति में नहीं पहुंच पाए हैं। चिप्स बनाने में इस्तेमाल होने वाली चिप्सोना किस्म का भाव करीब 900 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचा है।सामान्य आलू की कीमत लगभग 600 से 700 रुपये प्रति क्विंटल बनी हुई है। इन दरों पर किसानों को फसल की लागत, खुदाई, छंटाई, ढुलाई और भंडारण जैसे खर्चों का हिसाब लगाने के बाद पर्याप्त लाभ नहीं मिल पा रहा है। किसानों को उम्मीद थी कि त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने से आलू की कीमतों में तेजी आएगी और वे बेहतर भाव मिलने पर अपनी उपज बेच सकेंगे। लेकिन बाजार में अपेक्षित सुधार नहीं होने से उनकी उम्मीदों पर पानी फिरता दिखाई दे रहा है।

भंडारण का खर्च भी बन रहा बड़ी परेशानी

आलू की कीमत कम होने के बावजूद शीतगृहों में भंडारण का खर्च किसानों को उठाना पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार, साधारण आलू का भंडारण किराया करीब 260 रुपये प्रति क्विंटल और मोटे आलू का किराया लगभग 285 रुपये प्रति क्विंटल है। इसके अलावा किसानों को फसल की खुदाई, शीतगृह तक ढुलाई और अन्य खर्च भी वहन करने पड़ते हैं।

ऐसे में कम भाव पर आलू बेचने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है, जबकि अधिक कीमत मिलने की उम्मीद में आलू रोके रखने पर भंडारण खर्च बढ़ता जा रहा है। यदि बाजार में समय रहते तेजी नहीं आई तो किसानों के लिए नुकसान से बच पाना मुश्किल हो सकता है।आलू की नई फसल आने में अब करीब दो सप्ताह का समय शेष है। नवंबर के प्रथम सप्ताह में पंजाब और हिमाचल प्रदेश से आलू की आवक शुरू होने की संभावना है। बाहरी राज्यों से नया आलू बाजार में पहुंचने पर उपलब्धता बढ़ेगी। इससे पुराने आलू की मांग और कीमत प्रभावित हो सकती है। इसी कारण शीतगृहों में रखे आलू को लेकर किसानों की चिंता बढ़ गई है।

किसान को कम भाव, उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते बढ़ जाती है कीमत

आलू की कीमतों को लेकर किसानों और उपभोक्ताओं के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। किसानों के अनुसार, चिप्सोना आलू का भाव करीब 900 रुपये प्रति क्विंटल यानी लगभग नौ रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर है, जबकि सामान्य आलू के लिए उन्हें करीब छह से सात रुपये प्रति किलोग्राम मिल रहे हैं। दूसरी ओर, खुदरा बाजार में चिप्सोना आलू करीब 16 रुपये प्रति किलोग्राम और सामान्य आलू लगभग 14 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रहा है।इस अंतर के कारण किसानों में नाराजगी है। उनका कहना है कि खेतों में फसल तैयार करने से लेकर उसकी खुदाई और शीतगृह तक पहुंचाने में काफी मेहनत और पूंजी लगती है, लेकिन बिक्री के समय उन्हें उचित कीमत नहीं मिलती। वहीं, उपभोक्ताओं को बाजार में आलू खरीदने के लिए अपेक्षाकृत अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।हालांकि, किसान को मिलने वाले भाव और खुदरा कीमत के बीच का पूरा अंतर केवल बिचौलियों का मुनाफा नहीं होता। इसमें ढुलाई, छंटाई, भंडारण, खराब होने का जोखिम और व्यापार से जुड़े अन्य खर्च भी शामिल होते हैं। इसके बावजूद किसानों को अपनी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिलने का मुद्दा लगातार गंभीर बना हुआ है।

बच्चों की पढ़ाई से लेकर कर्ज चुकाने तक की चिंता

आलू की खेती से उचित आमदनी नहीं होने का असर किसानों के घरेलू बजट पर भी पड़ रहा है। किसानों के सामने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने, बेटियों की शादी की व्यवस्था करने और बैंकों से लिए गए कर्ज की किस्तें चुकाने जैसी जिम्मेदारियां हैं। फसल पर खर्च की गई रकम वापस नहीं मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है।किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि आलू को कम कीमत पर बेचा जाता है तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा और यदि भाव बढ़ने की उम्मीद में उसे शीतगृह में रखा जाता है तो भंडारण का खर्च बढ़ता रहेगा। ऐसे में उन्हें बाजार की स्थिति और अपनी आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर फैसला करना पड़ रहा है।

सरकार ने भंडारण किराये में दी है छूट

जिला उद्यान अधिकारी डॉ. हरित कुमार के अनुसार, आलू की मंदी को देखते हुए किसानों को राहत देने के लिए सरकार की ओर से शीतगृहों में भंडारण किराये में छूट दी गई है। नवंबर के प्रथम सप्ताह में पंजाब और हिमाचल प्रदेश से आलू की आवक शुरू होने की संभावना है। ऐसे में किसानों को बाजार की स्थिति को देखते हुए सही समय पर आलू निकालने पर विचार करना चाहिए।उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे नई फसल की आवक और बाजार में मांग की स्थिति को ध्यान में रखकर निर्णय लें, ताकि भंडारण का खर्च बढ़ने और संभावित नुकसान से बचा जा सके।

अब बाजार में सुधार की उम्मीद पर टिकी निगाहें

आलू की मंदी ने जिले के किसानों के सामने एक बार फिर खेती की लागत और उपज के उचित मूल्य का सवाल खड़ा कर दिया है। गन्ना और धान की फसल से अपेक्षित उत्पादन नहीं मिलने के बीच आलू से अच्छी आमदनी की उम्मीद भी कमजोर पड़ रही है। शीतगृहों में बड़ी मात्रा में आलू जमा होने और नई फसल की आवक नजदीक आने से आने वाले दिनों में बाजार की स्थिति किसानों के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।किसानों की निगाहें अब आलू के भाव में संभावित सुधार पर टिकी हैं। यदि समय रहते कीमतों में बढ़ोतरी नहीं हुई तो बड़ी मात्रा में आलू कम दाम पर बेचना पड़ सकता है, जिससे किसानों का आर्थिक संकट और गहरा सकता है।

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