TRENDING TAGS :
Hardoi: क्रांतिकारियों की वीरगाथा से जुड़ी ट्रेन को ही भुला बैठी रेल! काकोरी कांड की गवाह सेवा बंद
Hardoi News: काकोरी कांड से ऐतिहासिक रूप से जुड़ी लखनऊ-सहारनपुर पैसेंजर ट्रेन कोविड काल में बंद होने के बाद अब तक पुराने स्वरूप में वापस नहीं लौटी है। 9 अगस्त 1925 को इसी रूट की 8-डाउन ट्रेन को रोककर क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटा था।
Hardoi News
Hardoi News: 9 अगस्त का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वर्ष 1925 में इसी दिन देश के वीर क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत को ऐसी चुनौती दी थी, जिसकी गूंज आज भी इतिहास के पन्नों में सुनाई देती है। काकोरी की धरती पर हुआ यह ट्रेन एक्शन केवल सरकारी खजाना लूटने की घटना नहीं था, बल्कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ भारतीय युवाओं के साहस, संगठन और अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक बन गया था।9 अगस्त 1925 को काकोरी के निकट जिस ट्रेन को रोककर अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटा गया था, वह उस समय 8-डाउन ट्रेन के नाम से संचालित होती थी। समय के साथ इसी रेल सेवा का संबंध लखनऊ-सहारनपुर पैसेंजर से जोड़ा जाता रहा।
ट्रेन का ऐतिहासिक महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि इसे भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की उस घटना से जोड़कर देखा जाता है जिसने पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत की नींव को चुनौती देने वाले युवाओं का मनोबल बढ़ाया।काकोरी ट्रेन एक्शन में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र लाहिड़ी, मन्मथनाथ गुप्त और ठाकुर रोशन सिंह समेत कई क्रांतिकारी शामिल थे। क्रांतिकारियों ने ट्रेन को रोककर गार्ड के डिब्बे में रखे सरकारी खजाने को अपने कब्जे में लिया था। उनका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए संसाधन जुटाना था।आज काकोरी स्टेशन और उसके आसपास इस ऐतिहासिक घटना की यादें और स्मारक मौजूद हैं। देश आज भी इन वीरों को श्रद्धा से याद करता है। सरकारें स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों की स्मृतियों को संरक्षित करने की बात करती हैं, स्मारकों को विकसित करने की योजनाएं बनती हैं और राष्ट्रीय पर्वों पर उनके बलिदान को नमन किया जाता है।
इसी इतिहास से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कड़ी आज रेल पटरियों से गायब है
लखनऊ-सहारनपुर पैसेंजर ट्रेन, जिसे कभी 54251 के रूप में भी जाना जाता था, कोविड काल के दौरान बंद हुई और इसके बाद दोबारा अपने पुराने स्वरूप में वापस नहीं लौट सकी। इस ट्रेन के बंद होने से केवल एक रेल सेवा समाप्त नहीं हुई, बल्कि लखनऊ से सहारनपुर के बीच छोटे-बड़े अनेक स्टेशनों के उन यात्रियों की सुविधा भी छिन गई, जो कम किराये में इस ट्रेन से सफर करते थे।ग्रामीण और छोटे कस्बों के यात्रियों के लिए पैसेंजर ट्रेन महज परिवहन का साधन नहीं होती। यह नौकरीपेशा लोगों, विद्यार्थियों, छोटे व्यापारियों, मरीजों और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए यात्रा करने वाले हजारों लोगों की जीवनरेखा होती है।
लखनऊ-सहारनपुर पैसेंजर का बंद होना इसी वर्ग के लिए बड़ी परेशानी का कारण बना।सबसे बड़ा सवाल इसके ऐतिहासिक महत्व को लेकर है। जिस रेल सेवा की पहचान देश के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक से जुड़ी रही हो, क्या उसे केवल एक सामान्य पैसेंजर ट्रेन मानकर भुला दिया जाना उचित है?आज जब देश आजादी के अमृतकाल की बात करता है, क्रांतिकारियों की स्मृतियों को संजोने के लिए कार्यक्रम आयोजित होते हैं और नई पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास बताया जाता है, तब काकोरी कांड से जुड़ी इस रेल सेवा को पुनर्जीवित करने की मांग भी गंभीरता से सुनी जानी चाहिए।जरूरत केवल ट्रेन चलाने की नहीं, बल्कि इतिहास और वर्तमान के बीच उस रेल कड़ी को फिर जोड़ने की है, जिसने कभी देश के स्वतंत्रता संग्राम को एक नया अध्याय दिया था।काकोरी की धरती आज भी क्रांतिकारियों की वीरगाथा सुनाती है। अब सवाल यह है कि क्या भारतीय रेल उस इतिहास की गवाह रही ट्रेन को फिर पटरी पर उतारकर उन वीर सपूतों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि देगी?


