Allahabad Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला, दिव्यांग सैनिकों की पेंशन पर ‘NANA’ टिप्पणी पर्याप्त नहीं

Allahabad Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिव्यांग सैनिकों की पेंशन मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल ‘NANA’ लिख देने से पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पूर्व सैनिक के पक्ष में फैसला बरकरार रखा।

Anjali Soni
Published on: 27 May 2026 6:07 PM IST
Allahabad Court
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Allahabad Court(Photo-Social Media)

Allahabad Court: उत्तराखंड निवासी पूर्व सैनिक ऑनरेरी लेफ्टिनेंट एवं एक्स-सूबेदार पुष्कर सिंह कश्याल को लगभग 29 वर्षों की सैन्य सेवा के बाद लंबी कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। वर्ष 1991 में भारतीय सेना में भर्ती हुए पुष्कर सिंह कश्याल को सेवा के दौरान “प्राइमरी हाइपरटेंशन” बीमारी हो गई, जिसके बाद उन्हें 31 मार्च 2021 को लो मेडिकल कैटेगरी में सेना से मुक्त कर दिया गया।

सेना की रिलीज मेडिकल बोर्ड ने बीमारी को “न सैन्य सेवा से संबंधित और न ही सैन्य सेवा से बढ़ी हुई (NANA)” घोषित करते हुए दिव्यांगता पेंशन देने से इनकार कर दिया। इसके खिलाफ पूर्व सैनिक ने अपने अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय के माध्यम से वर्ष 2023 में सशस्त्र बल अधिकरण, लखनऊ में वाद दायर किया। सुनवाई के बाद 5 जुलाई 2023 को सशस्त्र बल अधिकरण ने पूर्व सैनिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश जारी किया।

सरकार ने हाईकोर्ट में दी चुनौती

अधिकरण के आदेश के बावजूद भारत सरकार और रक्षा मंत्रालय की ओर से आदेश का अनुपालन नहीं किया गया, जिसके कारण पूर्व सैनिक को निष्पादन वाद दाखिल करना पड़ा। बाद में केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में रिट याचिका दाखिल कर अधिकरण के आदेश को चुनौती दी। सरकार की ओर से कहा गया कि बीमारी सेना सेवा से संबंधित नहीं थी और मेडिकल बोर्ड की राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वहीं पूर्व सैनिक की ओर से अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने दलील दी कि भर्ती के समय सैनिक पूरी तरह स्वस्थ था और बीमारी लगभग 24 से 29 वर्षों की सैन्य सेवा के बाद उत्पन्न हुई। उन्होंने यह भी कहा कि मेडिकल बोर्ड ने बीमारी को सेवा से असंबद्ध बताने के पीछे कोई वैज्ञानिक या ठोस कारण प्रस्तुत नहीं किया।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने कहा कि केवल इस आधार पर कि बीमारी “पीस स्टेशन” पर पाई गई, किसी सैनिक को दिव्यांगता पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि शांति क्षेत्रों में भी सैनिक कठोर प्रशिक्षण, मानसिक दबाव और अनुशासनात्मक जिम्मेदारियों के बीच कार्य करते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट कारणों से रहित थी और किसी सैनिक को पेंशन से वंचित करने के लिए स्पष्ट, ठोस और कारणयुक्त राय आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णयों—धरमवीर सिंह बनाम भारत संघ और राजुमोन टी.एम. बनाम भारत संघ—का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि भर्ती के समय कोई बीमारी दर्ज नहीं थी, तो सामान्यतः उसे सेवा के दौरान उत्पन्न माना जाएगा। अदालत ने कहा कि विपरीत साबित करने का भार सरकार पर होगा और सैनिकों से जुड़े पेंशन नियम कल्याणकारी प्रकृति के हैं, इसलिए उनकी उदारतापूर्वक व्याख्या की जानी चाहिए।

अंततः हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका को “गुण-दोष रहित” बताते हुए खारिज कर दिया और पूर्व सैनिक को समस्त देय लाभों सहित दिव्यांगता पेंशन देने के आदेश को बरकरार रखा। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला दिव्यांग सैनिकों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।

Anjali Soni

Anjali Soni

News Publisher Mail ID - theanjalisonisoni111@gmail.com

उप संपादक | डिजिटल मीडिया पत्रकार

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