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Rana Beni Madhav: राणा बेनी माधव कौन थे? 1857 में अंग्रेजों से 1859 तक लड़ने वाले योद्धा की कहानी
Rana Beni Madhav History in Hindi: राणा बेनी माधव बख्श सिंह कौन थे? जानिए 1857 के महासंग्राम में बैसवारा, रायबरेली और अवध के इस वीर योद्धा की भूमिका, अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष, शंकरपुर का घेरा, नेपाल तक जारी लड़ाई और 1859 में उनकी मृत्यु की पूरी ऐतिहासिक कहानी।
Rana Beni Madhav Military Strategy Uttar Pradesh History in Hindi
Rana Beni Madhav History in Hindi: भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास यदि केवल दिल्ली, कानपुर, झांसी और लखनऊ की बड़ी घटनाओं के आधार पर लिखा जाए तो 1857 के महासंग्राम का एक बहुत महत्वपूर्ण अध्याय अधूरा रह जाता है। यह अध्याय है अवध के ग्रामीण प्रतिरोध का और उस प्रतिरोध के सबसे दृढ़ सेनानायकों में एक नाम था—राणा बेनी माधव बख्श सिंह, जिन्हें विभिन्न अभिलेखों में बेनी माधो, बेनी माधव, राणा बेनी माधव बख्श और राजा बेनी माधो सिंह जैसे नामों से लिखा गया है। आज उनकी स्मृति विशेष रूप से रायबरेली और बैसवारा में जीवित है। लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि उनका महत्व किसी एक जिले अथवा किसी एक सामाजिक समूह तक सीमित नहीं था। वे अवध में 1857–59 तक चले अंग्रेज-विरोधी संघर्ष के उन नेताओं में थे, जिन्होंने लखनऊ पर अंग्रेजों का दोबारा अधिकार हो जाने, अपनी रियासत छिन जाने, अपने किले खाली करने और विशाल ब्रिटिश सैन्य अभियान का सामना करने के बावजूद आत्मसमर्पण नहीं किया।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रकाशित Dictionary of Martyrs: India’s Freedom Struggle (1857–1947) में उन्हें शंकरपुर, अवध का राजा बताया गया है और स्पष्ट रूप से दर्ज है कि उन्होंने 1857 में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह में भाग लिया, अवध में विद्रोही सेनाओं के संगठन में प्रमुख भूमिका निभाई और बिरजिस कद्र द्वारा जौनपुर तथा आजमगढ़ का प्रशासक नियुक्त किए गए। सरकारी विवरण के अनुसार वे अनेक लड़ाइयों का नेतृत्व करते हुए अंततः नेपाल की पहाड़ियों में चले गए और वहां भी संघर्ष जारी रखा।
शंकरपुर का राणा और बैसवारा का भूगोल
राणा बेनी माधव को समझने के लिए सबसे पहले बैसवारा को समझना आवश्यक है। वर्तमान रायबरेली और उन्नाव के बड़े हिस्से में फैला यह क्षेत्र बैस राजपूत ताल्लुकेदारों के प्रभाव वाला भूभाग था। राणा का प्रमुख केंद्र रायबरेली की शंकरपुर रियासत थी। विभिन्न विवरणों में शंकरपुर के अतिरिक्त उनके प्रभाव वाले अन्य गढ़ों का भी उल्लेख आता है। शंकरपुर केवल उनका निवास नहीं था बल्कि अंग्रेजों के विरुद्ध प्रतिरोध का महत्वपूर्ण सैन्य केंद्र बन गया था।
उनके प्रारंभिक जीवन के संबंध में लोकप्रिय विवरणों की तुलना में ठोस समकालीन प्रमाण कम हैं। प्रचलित परंपरा में उनका जन्म 24 अगस्त, 1804 माना जाता है। इसी कारण रायबरेली में अगस्त में उनकी जयंती के समारोह आयोजित होते हैं।
लोकपरंपरा और बाद के विवरण उन्हें देवी दुर्गा का भक्त बतलाते हैं। अवध के नवाब वाजिद अली शाह से उनके संबंध बताए जाते हैं। उनके नाम के साथ ‘सिरमौर राणा बहादुर दिलेर जंग’ जैसी उपाधि भी मिलती है। इन आरंभिक विवरणों के प्रत्येक अंश की प्रमाणिकता समान स्तर की नहीं है, किंतु इतना स्पष्ट है कि 1857 से पहले ही वे बैसवारा के प्रभावशाली ताल्लुकेदार और क्षेत्रीय शक्ति थे।
1856 : वह वर्ष जिसने अवध को बदल दिया
राणा के विद्रोह को केवल मई,1857 से समझना अधूरा होगा। इसकी वास्तविक राजनीतिक पृष्ठभूमि 1856 में अवध के अंग्रेजी अधिग्रहण से तैयार हुई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने नवाब वाजिद अली शाह को सत्ता से हटाकर अवध को अपने शासन में मिला लिया। इसके साथ अवध की पुरानी प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था में भारी परिवर्तन आया। ताल्लुकेदारों के अधिकारों पर प्रभाव पड़ा, पुराने दरबार और सेना से जुड़े लोगों की स्थिति बदली और ग्रामीण समाज पर नई राजस्व व्यवस्था का दबाव बढ़ा।
इसलिए अवध में 1857 केवल छावनियों के भारतीय सैनिकों का विद्रोह नहीं रह गया। सैनिक असंतोष के साथ किसानों, ताल्लुकेदारों, पुराने प्रशासन से जुड़े वर्गों और स्थानीय शक्ति-समूहों की शिकायतें जुड़ गईं। यही कारण था कि दिल्ली या अन्य क्षेत्रों की तुलना में अवध में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध बहुत गहरे ग्रामीण आधार तक फैल गया।राणा बेनी माधव इसी परिस्थिति से उभरे।
1857 : स्थानीय राजा से बड़े विद्रोही सेनानायक तक
मेरठ में 10 मई, 1857 को विद्रोह आरंभ होने के बाद उसकी लपटें तेजी से उत्तर भारत में फैलने लगीं। अवध पहले से विस्फोटक स्थिति में था। रायबरेली क्षेत्र में भी अंग्रेजी प्रशासन का नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा। राणा ने केवल अपने सैनिकों के सहारे संघर्ष नहीं किया। रायबरेली जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण में उनके द्वारा हजारों किसानों और मजदूरों को संगठित करने का उल्लेख है। यही तथ्य राणा की लड़ाई को महज एक ताल्लुकेदार की अपनी संपत्ति बचाने की लड़ाई मानने से रोकता है। अवध में विद्रोह की वास्तविक शक्ति गांवों में थी। राणा उन नेताओं में थे जो इस ग्रामीण शक्ति को सैन्य प्रतिरोध में बदल सके।
उनकी सेना की संख्या के बारे में स्रोतों में बहुत बड़ा अंतर मिलता है। कुछ विवरण 15,000 के आसपास, कुछ 20–25 हजार और कुछ उससे भी कहीं अधिक समर्थकों का उल्लेख करते हैं। यहां सावधानी आवश्यक है। उदाहरण के लिए 11 दिसंबर 1858 के एक ब्रिटिश समाचार विवरण में उनके पास करीब 14,000 सैनिक और दस तोपें होने की सूचना दी गई थी। दूसरी ओर एक बाद का भारतीय सैन्य-ऐतिहासिक विवरण उनके व्यापक समर्थक समूह को लगभग 80,000 तक बताता है। इतनी बड़ी संख्या संभवतः नियमित सेना के बजाय विस्तृत क्षेत्र में फैले सशस्त्र समर्थकों को भी सम्मिलित करती थी। इस अंतर से एक महत्वपूर्ण बात फिर भी स्पष्ट होती है—राणा के पास इतना व्यापक जन और सैन्य आधार था कि अंग्रेजी प्रशासन उन्हें साधारण स्थानीय विद्रोही मानकर नजरअंदाज नहीं कर सकता था।
बिरजिस कद्र और बेगम हजरत महल के साथ
लखनऊ में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का राजनीतिक केंद्र बेगम हजरत महल बनीं और उनके पुत्र बिरजिस कद्र को अवध का शासक घोषित किया गया। राणा बेनी माधव इस वैकल्पिक अवध सत्ता के प्रमुख समर्थकों में सम्मिलित हुए। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के आधिकारिक अभिलेख में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज है—बिरजिस कद्र ने राणा बेनी माधव को जौनपुर और आजमगढ़ का प्रशासक नियुक्त किया था।
इस नियुक्ति का अर्थ बहुत व्यापक है। राणा अब केवल शंकरपुर की जागीर अथवा बैसवारा के हितों की रक्षा करने वाले ताल्लुकेदार नहीं रह गए थे। विद्रोही अवध सरकार उन्हें प्रशासनिक और सैनिक जिम्मेदारी सौंप रही थी। अर्थात 1857 के दौरान वे अंग्रेजी सत्ता के समानांतर खड़ी राजनीतिक व्यवस्था का अंग बन चुके थे। बेगम हजरत महल के प्रमुख सहयोगियों में भी उनका नाम मिलता है। अवध के प्रतिरोध में मौलवी अहमदुल्लाह शाह, राजा जयलाल सिंह और दूसरे क्षेत्रीय नेताओं के साथ राणा बेनी माधव का उल्लेख किया जाता है।
चिनहट और लखनऊ के संघर्ष की व्यापक पृष्ठभूमि
30 जून, 1857 की प्रसिद्ध चिनहट की लड़ाई अंग्रेजों के लिए एक गंभीर पराजय सिद्ध हुई। समकालीन घटनाओं के आधुनिक सैन्य विश्लेषणों में राणा बेनी माधव को भी अवध के उन नेताओं में गिना गया है जिन्होंने इस व्यापक विद्रोही लामबंदी में भूमिका निभाई। चिनहट की पराजय के बाद अंग्रेजों को लखनऊ रेजीडेंसी के भीतर सिमटना पड़ा।
लेकिन राणा का सबसे महत्वपूर्ण दौर इसके बाद आया। 1858 में अंग्रेजों ने भारी सैन्य शक्ति के साथ लखनऊ और अवध को दोबारा अपने नियंत्रण में लेना शुरू किया। मार्च 1858 में लखनऊ पर अंग्रेजी अधिकार पुनः स्थापित होने के बाद भी ग्रामीण अवध पूरी तरह शांत नहीं हुआ।यहीं राणा बेनी माधव का संघर्ष असाधारण हो जाता है।
लखनऊ हार गया, लेकिन बैसवारा नहीं झुका
अंग्रेजों के लखनऊ पर अधिकार के बाद सामान्यतः यह अपेक्षा थी कि आसपास के ताल्लुकेदार अंग्रेजी सरकार से समझौता कर लेंगे। कुछ ने ऐसा किया भी। लेकिन राणा बेनी माधव का प्रतिरोध और अधिक दृढ़ हो गया। ब्रिटिशकालीन Imperial Gazetteer of India का विवरण इस संबंध में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसमें लिखा गया कि लखनऊ के पतन के बाद ताल्लुकेदारों का विरोध अधिक मुखर हुआ और शंकरपुर के राणा बेनी माधव बख्श का विरोध विशेष रूप से दृढ़ था। अंततः लॉर्ड क्लाइड को बैसवारा के विरुद्ध एक बड़ा संयुक्त सैन्य अभियान चलाना पड़ा।
यह औपनिवेशिक शासन के अपने गजेटियर की स्वीकारोक्ति है। इसी से राणा की सैन्य और राजनीतिक चुनौती का वास्तविक आकार समझ में आता है।
अंग्रेजों ने समझौते का रास्ता क्यों चुना?
1858 के उत्तरार्ध तक अंग्रेजी नेतृत्व की समस्या यह थी कि राणा का प्रभाव दूसरे ताल्लुकेदारों को भी अंग्रेजों से समझौता करने से रोक रहा था। नवंबर-दिसंबर 1858 की ब्रिटिश रिपोर्टों में स्पष्ट संकेत मिलता है कि अंग्रेजों की दृष्टि में राणा का भय और प्रभाव इतना था कि दूसरे जमींदार शांति स्थापित करने में हिचक रहे थे। एक समकालीन ब्रिटिश समाचार विवरण ने उनकी शक्ति लगभग 14,000 सैनिकों और दस तोपें बताई और लिखा कि उनके प्रभाव के कारण बड़ी संख्या में जमींदार अंग्रेजों से समझौता नहीं कर रहे थे।अर्थात राणा केवल सैन्य समस्या नहीं थे। वे राजनीतिक समस्या भी थे। जब तक वे लड़ रहे थे, अंग्रेजों की यह घोषणा विश्वसनीय नहीं बन सकती थी कि अवध पूरी तरह उनके नियंत्रण में आ चुका है।
राणा को आत्मसमर्पण का प्रस्ताव
इसके बाद अंग्रेजों ने वह तरीका अपनाया जो 1857–58 के दौरान कई विद्रोही नेताओं के साथ आजमाया गया—समर्पण की शर्तें। राणा के सामने संकेत दिया गया कि यदि वे संघर्ष छोड़ दें तो उनकी संपत्ति संबंधी दावों पर विचार हो सकता है। लेकिन राणा ने अपने व्यक्तिगत समर्पण से इनकार कर दिया।उनके उत्तर के अलग-अलग रूप विभिन्न स्रोतों में मिलते हैं, इसलिए किसी एक लोकप्रिय वाक्य को अक्षरशः प्रमाणित कथन मानना सावधानी के विरुद्ध होगा। लेकिन स्रोतों का मूल आशय एक जैसा है—राणा किला छोड़ सकते थे, किंतु स्वयं अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। वे अपने स्वामी बिरजिस कद्र के प्रति निष्ठाबद्ध थे।
भारतीय सैन्य इतिहास संबंधी एक प्रकाशित स्रोत भी उनके इस रुख को दर्ज करता है कि वे शंकरपुर खाली कर देंगे। लेकिन स्वयं समर्पण नहीं करेंगे क्योंकि वे अवध के नवाब की प्रजा हैं, अंग्रेजी सरकार की नहीं। यह राणा के जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण है। यदि उनका उद्देश्य केवल अपनी जमींदारी और संपत्ति बचाना होता, तो उनके पास समझौते का रास्ता उपलब्ध था। लेकिन उन्होंने संपत्ति की अपेक्षा राजनीतिक निष्ठा और प्रतिरोध को चुना।
शंकरपुर : अंग्रेजी सेना का बड़ा घेरा
1858 के उत्तरार्ध में अंग्रेजों ने बैसवारा के प्रतिरोध को समाप्त करने के लिए बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया। Imperial Gazetteer के अनुसार अक्टूबर के अंत में लॉर्ड क्लाइड ने बैसवारा के विरुद्ध अपना बड़ा संयुक्त अभियान प्रारंभ किया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग एक महीने बाद राणा को क्षेत्र छोड़ना पड़ा। शंकरपुर राणा का प्रमुख गढ़ था। अंग्रेजी सैन्य स्रोत इसे अत्यंत मजबूत किलेबंदी बताते हैं। राणा को चारों ओर से घेरने की योजना बनाई गई।
लेकिन राणा ने वही किया जो उनके सैन्य व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता बन गया—उन्होंने किसी किले को अपने जीवन और आंदोलन से अधिक महत्वपूर्ण नहीं माना। वे जानते थे कि अंग्रेजों के पास श्रेष्ठ तोपखाना और बड़ी नियमित सेना है। यदि वे शंकरपुर में बंद होकर निर्णायक युद्ध लड़ते, तो संभवतः वहीं समाप्त हो जाते। उन्होंने किला छोड़ा लेकिन सेना और अपना नेतृत्व बचा लिया। यही उनकी युद्ध-रणनीति थी—स्थान छोड़ा जा सकता है, संघर्ष नहीं।
छापामार युद्ध की रणनीति
राणा की तुलना कुछ ऐतिहासिक सैन्य विवरणों में तात्या टोपे से की गई है। इसका कारण था उनकी गतिशील युद्ध-पद्धति। एक सरकारी ऐतिहासिक प्रकाशन में वर्णित है कि वे बड़ी अंग्रेजी सेना के सामने अनिवार्य निर्णायक युद्ध में फंसने के बजाय छोटे ब्रिटिश दस्तों को परेशान करते, अवसर देखकर हमला करते और बड़ी सेना पहुंचने से पहले हट जाते थे। स्रोत ने स्पष्ट रूप से इसे छापामार युद्ध जैसी रणनीति बताया है।
राणा अपने भूगोल को जानते थे। बैसवारा के गांव, जंगल, रास्ते, नदियां और स्थानीय सामाजिक नेटवर्क उनके लिए युद्ध की संपत्ति थे। अंग्रेजों को सैनिक भेजने पड़ते थे। राणा के लिए स्थानीय समाज ही सूचना और आश्रय का तंत्र बन सकता था। इस अर्थ में उनका युद्ध आधुनिक शब्दावली के बहुत पहले जनाधारित गतिशील प्रतिरोध का रूप ले चुका था।
डौंडिया खेड़ा : बड़ी लड़ाई, लेकिन राणा फिर बच निकले
शंकरपुर छोड़ने के बाद राणा की शक्ति समाप्त नहीं हुई। वे डौंडिया खेड़ा की दिशा में बढ़े और अंग्रेजी सेना उनके पीछे लगी रही। नवंबर 1858 के अंतिम सप्ताह में डौंडिया खेड़ा क्षेत्र में महत्वपूर्ण संघर्ष हुआ। यहां अंग्रेजी सेना राणा की सेना को पीछे हटाने और उसकी तोपें प्राप्त करने में सफल हुई। लेकिन फिर वही हुआ जो अंग्रेजी कमांडरों के लिए लगातार समस्या बन रहा था—राणा स्वयं हाथ नहीं आए।
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। राणा लड़ाइयां हार सकते थे, स्थान छोड़ सकते थे, तोपें खो सकते थे, लेकिन जब तक उनका नेतृत्व सुरक्षित था तब तक विद्रोह की संभावना जीवित रहती थी। इसीलिए ब्रिटिश सेना का लक्ष्य केवल उनका किला अथवा सेना नहीं, राणा स्वयं थे।
बैसवारा का प्रतिरोध क्यों इतना कठिन था?
बैसवारा में अंग्रेजी सेना को केवल किसी राजा की निजी सेना का सामना नहीं करना पड़ रहा था। यहां ताल्लुकेदारों, ग्रामीण योद्धाओं और किसानों की सामाजिक संरचना विद्रोह के पीछे खड़ी थी। यही 1857 के अवध विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में एक है।
राणा बेनी माधव इसी सामाजिक संरचना के सफल सैन्य नेता बने। रायबरेली के आधिकारिक इतिहास में किसानों और मजदूरों की बड़ी संख्या उनके साथ होने का उल्लेख इसी कारण महत्वपूर्ण है। राणा का प्रभाव जातीय रूप से बैस राजपूत आधार से अवश्य निकला था। लेकिन संघर्ष उससे आगे बढ़ चुका था।
इसी संदर्भ में वीरा पासी की स्मृति सामने आती है। रायबरेली की लोकपरंपरा में वीरा पासी को राणा के अत्यंत साहसी सहयोगी के रूप में याद किया जाता है। राणा को अंग्रेजी गिरफ्त से छुड़ाने जैसी प्रसिद्ध कथा भी उनसे जुड़ी है। लेकिन इस संबंध में समकालीन अभिलेख सीमित हैं। इसलिए इतिहास और लोकस्मृति को मिलाए बिना कहना अधिक उचित होगा कि वीरा पासी की भूमिका बैसवारा की सामाजिक स्मृति में बहुत महत्वपूर्ण है।
पिता विद्रोही, पुत्र समझौते की ओर—एक असाधारण प्रसंग
राणा के जीवन से जुड़ा एक कम चर्चित लेकिन अत्यंत दिलचस्प प्रसंग उनके पुत्र रघुराज सिंह से संबंधित है। बाद के ऐतिहासिक संकलनों में 15 नवंबर, 1858 से जुड़ा एक पत्र उद्धृत किया गया है जिसमें रघुराज सिंह की ओर से अंग्रेजी सरकार के प्रति समझौते की इच्छा व्यक्त होने और पिता बेनी माधव के बिरजिस कद्र के पक्ष में बने रहने की बात कही गई है। इस दस्तावेज की मूल अभिलेखीय प्रति के आधार पर स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक है, इसलिए इसे अंतिम सत्य की तरह नहीं बल्कि महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संकेत की तरह देखना चाहिए।
यदि यह पत्र अपनी प्रचलित व्याख्या में सही है तो इससे राणा के संघर्ष का एक अत्यंत मार्मिक पक्ष सामने आता है—परिवार के भीतर भी अंग्रेजों से समझौते और संघर्ष जारी रखने के बीच विभाजन पैदा हो चुका था। लेकिन राणा ने अपना पक्ष नहीं बदला।
1858 के अंत तक अंग्रेजों का लक्ष्य : अवध को पूरी तरह कुचलना
1858 की गर्मियों और बरसात में अंग्रेजी सैन्य अभियान कुछ धीमा रहा था। सर्दियां आने के बाद सर कॉलिन कैंपबेल—जो बाद में लॉर्ड क्लाइड कहलाए—ने अवध को पूरी तरह अधीन करने का अभियान तेज किया। बैसवारा इसी अभियान का प्रमुख लक्ष्य था।
एक ओर अंग्रेज ताल्लुकेदारों को क्षमा और संपत्ति संबंधी आश्वासन देकर अलग कर रहे थे, दूसरी ओर जो नेता प्रतिरोध जारी रखे हुए थे उनके विरुद्ध सैन्य घेरा कस रहे थे।राणा अंग्रेजों की इस दोहरी नीति के सामने भी नहीं टूटे।नवंबर, 1858 के अंत तक वे बैसवारा छोड़ने को मजबूर हुए। लेकिन इसका अर्थ आत्मसमर्पण नहीं था। वे उत्तर की ओर बढ़ते गए और अंततः विद्रोह की अंतिम शरणस्थली बनते जा रहे नेपाल के तराई क्षेत्र की ओर चले गए।
नेपाल : 1857 की क्रांति का भूला हुआ अंतिम अध्याय
1857 का लोकप्रिय इतिहास अक्सर 1858 में समाप्त कर दिया जाता है। वास्तव में अनेक विद्रोही नेता 1859 तक संघर्ष अथवा पलायन की अवस्था में थे। नेपाल की तराई और पहाड़ी सीमा इसका अंतिम महत्वपूर्ण क्षेत्र बनी। बेगम हजरत महल, बिरजिस कद्र और अनेक दूसरे विद्रोही नेता नेपाल की ओर चले गए। राणा बेनी माधव भी वहां पहुंचे। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अनुसार राणा ने नेपाल सीमा क्षेत्र में बरौदिया, चितवन, बुटवल और नयाकोट जैसे स्थानों पर संघर्ष किया और अंततः एक लड़ाई में मारे गए। सरकारी Dictionary of Martyrs भी कहता है कि वे बेगम हजरत महल के साथ नेपाल की पहाड़ियों में गए, सीमा क्षेत्र में अंग्रेज-विरोधी संघर्ष जारी रखा और वहीं युद्ध में उनकी मृत्यु हुई।
राणा को किसने मारा—अंग्रेजों ने या नेपाल की सेना ने?
इस प्रश्न पर स्रोतों में अंतर मिलता है। भारत सरकार का संक्षिप्त विवरण उन्हें नेपाल सीमा पर अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए मारा गया बताता है। दूसरी ओर नेपाल-ब्रिटिश संबंधों पर अभिलेखाधारित शोध और ऑक्सफोर्ड में उपलब्ध अवध विद्रोह के अध्ययन में अधिक विशिष्ट जानकारी मिलती है। नेपाल के शासक जंग बहादुर राणा ने अंग्रेजों का साथ दिया था। नेपाल की सेना ने विद्रोहियों को पकड़ने और अंग्रेजों को सौंपने में भी भूमिका निभाई। Anglo-Nepalese Relations in the Nineteenth Century में अभिलेखीय संदर्भों के आधार पर स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बेनी माधो नेपाली सैनिकों द्वारा मारे गए।
अवध विद्रोह पर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में उपलब्ध शोध इससे भी अधिक स्पष्ट है। उसमें लिखा है कि नवंबर 1859 में बेनी माधव जंग बहादुर के नेतृत्व से जुड़ी गोरखा शक्ति से लड़ते हुए मारे गए। और लेखक ने इसे एक अर्थ में नेपाल की पहाड़ियों में 1857 के विद्रोह का अंतिम गीत कहा है।
इसलिए उपलब्ध स्रोतों को मिलाकर अधिक सावधान निष्कर्ष यह होगा कि राणा की मृत्यु 1859 में नेपाल क्षेत्र में अंग्रेजों के सहयोगी नेपाली-गोरखा सैन्य अभियान से जुड़े संघर्ष में हुई।लेकिन इससे उनकी कहानी और भी असाधारण बन जाती है।1857 में शुरू हुई उनकी लड़ाई 1859 तक चली।
1857 की क्रांति खत्म हो रही थी, राणा अब भी लड़ रहे थे
इस कालक्रम को एक साथ रखिए। मई, 1857 में विद्रोह आरंभ हुआ। सितंबर, 1857 में दिल्ली अंग्रेजों के हाथ चली गई। मार्च, 1858 में लखनऊ पर अंग्रेजों ने दोबारा अधिकार कर लिया। जून, 1858 में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। अप्रैल, 1859 में तात्या टोपे को फांसी दी गई।
लेकिन उपलब्ध शोध के अनुसार राणा बेनी माधव नवंबर 1859 तक जीवित और संघर्षरत थे। यही तथ्य उन्हें 1857 के सबसे लंबे समय तक प्रतिरोध करने वाले प्रमुख नेताओं की श्रेणी में खड़ा करता है।
क्या वे केवल अपनी जमींदारी बचाने के लिए लड़ रहे थे?
1857 के इतिहास पर यह एक पुरानी बहस है। अवध के ताल्लुकेदारों के विद्रोह में निजी हित भी थे।पर हकीकत है कि यदि केवल संपत्ति उनका लक्ष्य होती तो 1858 में अंग्रेजों से समझौते का अवसर मिलने के बाद संघर्ष जारी रखने का अर्थ नहीं था। शंकरपुर चला गया, सैन्य शक्ति टूटती गई, तोपें छूटीं, बैसवारा छोड़ना पड़ा—फिर भी उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। बिरजिस कद्र के प्रति राजनीतिक निष्ठा, अंग्रेजी सत्ता को वैध न मानना, अवध छोड़कर नेपाल तक जाना और वहां भी लड़ते रहना उनके संघर्ष को निजी संपत्ति की लड़ाई से बहुत आगे ले जाता है।
राणा की युद्धकला : उनका वास्तविक सैन्य महत्व
राणा बेनी माधव के सैन्य व्यक्तित्व की चार प्रमुख विशेषताएं दिखाई देती हैं।
पहली—सामाजिक लामबंदी। वे स्थानीय ग्रामीण समाज को बड़ी संख्या में युद्ध के लिए संगठित कर सकते थे।
दूसरी—भूगोल का उपयोग। बैसवारा के स्थानीय रास्तों और सामाजिक नेटवर्क का उपयोग करके वे अंग्रेजी सेना की गति को चुनौती देते थे...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें


