जिस ‘फॉर्मूले’ ने UP में BJP को बनाया ताकतवर, 10 साल बाद वहीं क्यों बढ़ी चुनौती? 2027 में क्या होगा?

UP News: 2014 से 2024 तक यूपी की राजनीति में बीजेपी के सामाजिक समीकरण में बदलाव की कहानी। गैर-यादव OBC, गैर-जाटव दलित, सवर्ण और PDA की रणनीति से 2027 का राजनीतिक गणित कैसे बदल रहा है।

Snigdha Singh
Published on: 27 Sept 2026 8:21 PM IST (Updated on: 27 Sept 2026 10:14 PM IST)
Uttar Pradesh election 2027
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 Uttar Pradesh election 2027 (Image Credit-Social Media)

UP News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर जाता है। लेकिन यूपी की सत्ता का रास्ता कहां से होकर जाता है? इसका जवाब पिछले एक दशक के चुनावी नतीजों में छिपा है जातियों के उस बड़े गठजोड़ से, जिसे बीजेपी ने 2014 में नए तरीके से तैयार किया था।

एक समय उत्तर प्रदेश में मोटे तौर पर समाजवादी पार्टी को यादव-मुस्लिम, बहुजन समाज पार्टी को दलित और बीजेपी को सवर्ण मतदाताओं से जोड़कर देखा जाता था। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इसी स्थापित राजनीतिक गणित को बदल दिया।

पार्टी ने अपने परंपरागत सवर्ण समर्थन के साथ गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित समुदायों के बीच तेजी से विस्तार किया। कुर्मी, मौर्य, शाक्य, सैनी, कुशवाहा, निषाद और राजभर जैसे अलग-अलग पिछड़े समुदायों को प्रतिनिधित्व और गठबंधन की राजनीति के जरिए जोड़ने की कोशिश हुई।

यह प्रयोग इतना प्रभावी रहा कि बीजेपी ने 2014 में उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 लोकसभा सीटें जीत लीं और सहयोगी अपना दल ने दो सीटें जीतीं। बीजेपी को 42.63 प्रतिशत वोट मिले। 2009 में पार्टी का वोट शेयर सिर्फ 17.5 प्रतिशत था।

लेकिन अब 2027 से पहले सवाल यही है जिस सामाजिक समीकरण ने बीजेपी को यूपी की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत बनाया, क्या उसी समीकरण की गांठें अब ढीली पड़ रही हैं?

2014 में BJP ने ऐसा क्या बदल दिया था?

2014 की कहानी सिर्फ मोदी लहर की नहीं थी। बीजेपी ने उम्मीदवारों के चयन में भी बड़ा बदलाव किया। 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने यूपी में केवल 15 OBC उम्मीदवार उतारे थे। 2014 में यह संख्या बढ़ाकर 26 कर दी गई। इनमें केवल दो यादव थे।

यानी रणनीति साफ थी समाजवादी पार्टी के यादव-केंद्रित पिछड़ा वोट बैंक के मुकाबले बाकी पिछड़ी जातियों में जगह बनाना।

इसके साथ बीजेपी ने अपने पुराने सवर्ण आधार को भी बनाए रखा। 2014 में उसने 18 ब्राह्मण और 13 ठाकुर उम्मीदवार मैदान में उतारे। अपना दल के साथ गठबंधन ने कुर्मी मतदाताओं तक पहुंच बनाने में भी मदद की।

यही बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग का नया मॉडल बना। सवर्ण, गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित।

2017 में यही फॉर्मूला बना सत्ता की सीढ़ी

2014 की जीत के बाद बीजेपी ने यही प्रयोग 2017 के विधानसभा चुनाव में और बड़े पैमाने पर किया।

403 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव में बीजेपी ने अपने 384 उम्मीदवारों में 127 OBC चेहरे उतारे। उसके उम्मीदवारों में OBC और अनुसूचित जाति की संयुक्त हिस्सेदारी 52.8 प्रतिशत थी। साथ ही पार्टी ने 75 ब्राह्मण और 70 ठाकुर उम्मीदवार भी उतारे।

कुर्मी आधार वाले अपना दल (सोनेलाल) और राजभर आधार वाली सुभासपा जैसे सहयोगियों ने सामाजिक गठबंधन को और विस्तार दिया। नतीजा सामने था बीजेपी अकेले 312 विधानसभा सीटें जीत गई।

इस जीत ने यूपी की पुरानी राजनीतिक धारणा बदल दी। पिछड़ा वोट अब केवल समाजवादी पार्टी और दलित वोट केवल BSP की राजनीतिक जागीर नहीं माना जा सकता था।

2019 में सबसे मजबूत हुआ BJP का किला

2019 में अखिलेश यादव और मायावती साथ आए। SP-BSP-RLD गठबंधन के पीछे भी बड़ा जातीय गणित था। यादव, दलित, मुस्लिम और जाट जैसे समूहों को एक साथ लाने की कोशिश। कागज पर यह गठबंधन बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती दिखाई देता था।

लेकिन बीजेपी ने उस चुनाव में करीब 50 प्रतिशत वोट हासिल किए और 62 सीटें जीतीं। उसके उम्मीदवारों में OBC और SC की हिस्सेदारी 57.5 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। अपना दल और निषाद पार्टी जैसे सहयोगियों ने भी उसके सामाजिक विस्तार में भूमिका निभाई।यानी 2019 तक बीजेपी का जातीय गठबंधन अपने सबसे मजबूत दौर में दिखाई दे रहा था।

2022 में पहली बार दिखीं छोटी-छोटी दरारें

2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी दोबारा सरकार बनाने में सफल रही, लेकिन तस्वीर 2017 जैसी एकतरफा नहीं थी। बीजेपी 255 सीटों पर आ गई जबकि समाजवादी पार्टी 111 सीटों तक पहुंची। बीजेपी को 42.2 प्रतिशत और SP को 32.76 प्रतिशत वोट मिले। इस चुनाव में अखिलेश यादव ने भी बीजेपी की रणनीति से सबक लिया।

SP ने यादव-मुस्लिम समीकरण से बाहर निकलकर गैर-यादव OBC नेताओं को अधिक जगह दी। ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा सहित कई OBC आधारित दलों को साथ लिया और बीजेपी से आए स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी जैसे नेताओं को भी अपने खेमे में जोड़ा।

बीजेपी सरकार बचाने में सफल रही, लेकिन विपक्ष को वह रास्ता मिल गया था जिस पर आगे चलकर PDA तैयार हुआ।

फिर आया 2024 और बदल गया खेल

2024 के लोकसभा चुनाव ने बीजेपी को यूपी में बड़ा झटका दिया। 2019 में 62 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2024 में 33 सीटों पर आ गई। समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। बीजेपी का वोट शेयर भी 2019 के लगभग 50 प्रतिशत से गिरकर करीब 41.7 प्रतिशत रह गया।

राजनीतिक विश्लेषण में इसके कई कारण बताए गए स्थानीय एंटी-इनकंबेंसी, उम्मीदवार चयन, बेरोजगारी जैसे मुद्दे और संविधान तथा आरक्षण को लेकर विपक्ष का अभियान।

लेकिन बीजेपी के सामाजिक समीकरण के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण संकेत OBC और दलित मतदाताओं के कुछ हिस्सों में आया बदलाव था। चुनाव के बाद पार्टी के कई नेताओं ने भी OBC और दलित समर्थन में आई कमी को नतीजों से जोड़कर देखा। यानी बीजेपी का सामाजिक गठबंधन पूरी तरह टूटा नहीं, लेकिन उसमें सेंध जरूर दिखाई दी।

अखिलेश ने BJP का ही हथियार BJP के खिलाफ कैसे इस्तेमाल किया?

यहां 2024 की सबसे दिलचस्प कहानी शुरू होती है। अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी की पुरानी MY यानी मुस्लिम-यादव छवि से बाहर निकलने के लिए PDA पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक का फॉर्मूला आगे बढ़ाया। लेकिन इसका असली असर टिकट वितरण में दिखाई दिया।

2024 में समाजवादी पार्टी ने केवल पांच यादव उम्मीदवार उतारे और वे सभी अखिलेश परिवार से थे। इसके उलट पार्टी ने 27 गैर-यादव OBC उम्मीदवार मैदान में उतारे। इनमें नौ कुर्मी थे। दलित आउटरीच के लिए SP ने आरक्षित सीटों की संख्या से भी दो अधिक दलित उम्मीदवार उतारे। सामान्य सीट फैजाबाद से दलित उम्मीदवार अवधेश प्रसाद की जीत PDA रणनीति का सबसे चर्चित प्रतीक बनी। इतना ही नहीं, अखिलेश ने 11 सवर्ण उम्मीदवार भी उतारे, जिनमें चार ब्राह्मण थे।

यानी 2014 में बीजेपी ने जो काम SP के यादव वोट बैंक के साथ किया था उसके बाहर मौजूद OBC समूहों को अपनी तरफ खींचना 2024 में अखिलेश ने लगभग उसी सोशल इंजीनियरिंग को बीजेपी के सामाजिक गठबंधन के खिलाफ आजमाया।

अब 2027 में सबसे बड़ी लड़ाई किस वोट की?

2027 में लड़ाई केवल यादव बनाम गैर-यादव या दलित बनाम सवर्ण की नहीं रहने वाली। सबसे बड़ी लड़ाई उस फ्लोटिंग सोशल स्पेस की है जो किसी एक पार्टी के साथ स्थायी रूप से बंधा हुआ नहीं माना जा सकता।

इसमें कुर्मी, मौर्य, शाक्य, सैनी, कुशवाहा, निषाद, राजभर जैसे OBC समूह और पासी, खटीक, धोबी, वाल्मीकि जैसे गैर-जाटव दलित समुदाय खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं।

यही वजह है कि बीजेपी अभी से अपने दलित संपर्क अभियान को तेज कर रही है। हाल की रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी गैर-जाटव दलित समूहों पासी, खटीक, धोबी और वाल्मीकि आदि के बीच पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।

दूसरी तरफ SP भी 2027 में दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाने की रणनीति बना रही है। पार्टी की कोशिश अपनी पुरानी मुस्लिम-यादव छवि से आगे व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की है। यानी दोनों बड़ी पार्टियां अब लगभग एक ही चुनावी मैदान में लड़ रही हैं।

मायावती इस पूरे गणित में कहां हैं?

2027 का जातीय गणित BSP को अलग रखकर पूरा नहीं हो सकता।खासकर जाटव मतदाताओं के बीच BSP और मायावती की ऐतिहासिक राजनीतिक पकड़ रही है। बीजेपी ने पिछले एक दशक में गैर-जाटव दलित समुदायों में विस्तार करने की कोशिश की, जबकि SP अब दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाकर इसी मैदान में जगह बनाने की कोशिश कर रही है।

इसलिए 2027 का एक बड़ा सवाल यह भी होगा कि क्या मायावती अपने पुराने दलित आधार को फिर से एकजुट कर पाएंगी या दलित वोट अलग-अलग दलों में बंटेगा? दलित वोट का वितरण कई सीटों पर BJP-SP की सीधी लड़ाई का परिणाम प्रभावित कर सकता है।

जातीय जनगणना से और मुश्किल होगा गणित

इस पूरी राजनीति के बीच जातीय गणना का मुद्दा भी मौजूद है। पुराने सर्वे और अनुमानों में यूपी की OBC आबादी 50 प्रतिशत से अधिक बताई जाती रही है, हालांकि मौजूदा सटीक आधिकारिक जातिवार संख्या उपलब्ध नहीं है। जातीय गणना के बाद अगर विस्तृत आंकड़े सामने आते हैं तो राजनीतिक दलों पर टिकट और संगठन में हिस्सेदारी को लेकर नए दबाव बन सकते हैं। तब सवाल केवल यह नहीं होगा कि किस जाति के कितने वोट हैं।

सवाल यह भी उठेगा जिसकी जितनी आबादी, टिकट और सत्ता में उसकी कितनी हिस्सेदारी? यही मुद्दा 2027 के टिकट वितरण को और पेचीदा बना सकता है।

BJP की दूसरी चिंता, सवर्ण वोट को भी हल्के में नहीं ले सकती

बीजेपी के सामने एक दिलचस्प चुनौती है। अगर पार्टी OBC और दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाती है तो उसे अपने पारंपरिक सवर्ण समर्थन का संतुलन भी बनाए रखना होगा। 2024 के चुनाव के बाद पश्चिमी यूपी में ठाकुरों और पूर्वी यूपी में ब्राह्मणों के कुछ वर्गों की नाराजगी की चर्चा हुई थी। हाल के महीनों में विपक्षी दल भी सवर्ण मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यानी बीजेपी के लिए चुनौती दोतरफा है नए सामाजिक समूहों को जोड़ना भी है और पुराने आधार को खिसकने भी नहीं देना है।

2027 में ‘हिंदुत्व बनाम PDA’ कहना भी अधूरी कहानी

पहली नजर में 2027 की लड़ाई को BJP के हिंदुत्व और SP के PDA के मुकाबले के रूप में देखना आसान है।लेकिन जमीन पर कहानी इससे कहीं ज्यादा जटिल होगी।

बीजेपी की राजनीति में हिंदुत्व के साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व, कल्याणकारी योजनाएं और OBC-दलित आउटरीच भी शामिल रहे हैं। दूसरी तरफ अखिलेश का PDA भी केवल जातियों का नारा नहीं रहना चाहता; SP उसमें सवर्ण उम्मीदवारों और व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिए भी जगह बनाने की कोशिश कर रही है। इसीलिए 2027 का असली मुकाबला शायद नारों से ज्यादा किस पार्टी का सामाजिक गठबंधन ज्यादा चौड़ा और जमीन पर ज्यादा टिकाऊ रहता है, इस पर निर्भर करेगा।

2014 का फॉर्मूला अब 2027 की सबसे बड़ी परीक्षा

2014 में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का जातीय व्याकरण बदल दिया था। उसने अपने सवर्ण आधार को छोड़े बिना गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित समूहों को जोड़कर ऐसा गठबंधन बनाया जिसने 2014, 2017, 2019 और फिर 2022 में उसकी चुनावी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन 2024 ने पहली बार बड़े पैमाने पर दिखाया कि यह गठबंधन अभेद्य नहीं है।

अब अखिलेश उसी जगह सेंध लगाने के लिए PDA को और विस्तार दे रहे हैं। BJP गैर-जाटव दलितों और OBC समूहों से संपर्क मजबूत कर रही है। BSP अपने दलित आधार को बचाने और विस्तार देने की चुनौती से जूझ रही है। इसलिए 2027 में सवाल केवल योगी बनाम अखिलेश का नहीं होगा।

असली लड़ाई इसके नीचे चलेगी कुर्मी किधर, मौर्य-शाक्य किसके साथ, निषाद-राजभर का रुख क्या और दलित वोट कितना बंटेगा? उत्तर प्रदेश में 2027 की सत्ता की चाबी इन्हीं सामाजिक समीकरणों के बीच कहीं छिपी हो सकती है।

Snigdha Singh
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Snigdha Singh

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