IIT कानपुर की तकनीक से कपड़ा उद्योग का गंदा पानी दोबारा होगा इस्तेमाल, 10 हजार लीटर क्षमता का संयंत्र सफल

IIT Kanpur: IIT कानपुर के वैज्ञानिकों ने कपड़ा उद्योग के दूषित पानी को साफ कर दोबारा उपयोग योग्य बनाने वाली तकनीक विकसित की है। 10 KLD पायलट संयंत्र में इसका औद्योगिक परीक्षण हो चुका है।

Newstrack Network
Published on: 13 Aug 2026 8:15 PM IST (Updated on: 13 Aug 2026 8:18 PM IST)
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IIT Kanpur: कपड़ा उद्योग से निकलने वाला गहरा रंगीन और रसायनों से भरा अपशिष्ट जल देश की सबसे कठिन औद्योगिक प्रदूषण समस्याओं में से एक है। इसे साफ करना महंगा होता है, कई पारंपरिक शोधन संयंत्र बदलते हुए रंग, पीएच और रासायनिक भार को लगातार संभाल नहीं पाते और बड़ी मात्रा में पानी एक बार इस्तेमाल होने के बाद बेकार हो जाता है। इसी समस्या के समाधान के लिए IIT कानपुर के वैज्ञानिकों ने ऐसी संयुक्त जल-शोधन प्रणाली विकसित की है जो कपड़ा उद्योग के दूषित पानी से रंग और कार्बनिक प्रदूषकों को कई चरणों में हटाकर उसे दोबारा उपयोग योग्य बनाने की दिशा में काम करती है। इसका 10 किलोलीटर प्रतिदिन यानी 10,000 लीटर प्रतिदिन क्षमता वाला पायलट संयंत्र राजस्थान में वास्तविक औद्योगिक परिस्थितियों में लगाया और परखा जा चुका है। इस तकनीक पर शोध npj Clean Water में मार्च 2024 में प्रकाशित हुआ था।

इस तकनीक की विशेषता यह है कि इसमें किसी एक शोधन विधि पर भरोसा नहीं किया गया। पहले रासायनिक जमाव और छनाई से पानी में मौजूद निलंबित पदार्थ तथा रंग का बड़ा हिस्सा हटाया जाता है। इसके बाद विशेष रूप से तैयार जिंक ऑक्साइड और जिंक ऑक्साइड-ग्राफीन ऑक्साइड नैनो-सामग्री से लेपित प्लेटों वाले प्रकाश-उत्प्रेरक रिएक्टर में पानी भेजा जाता है। सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में यह पदार्थ अत्यधिक सक्रिय हाइड्रॉक्सिल रेडिकल बनाता है, जो जटिल रंग और कार्बनिक यौगिकों को छोटे तथा अपेक्षाकृत कम हानिकारक अणुओं में तोड़ता है। अंत में पॉलीएक्रिलोनाइट्राइल फाइबर और सक्रिय कार्बन फिल्टर शेष कार्बनिक पदार्थों को हटाते हैं।

क्यों मुश्किल है कपड़ा उद्योग का पानी साफ करना

कपड़ा रंगाई और प्रसंस्करण उद्योग में पानी के साथ रंग, लवण, क्षार, सर्फैक्टेंट और कई तरह के कार्बनिक रसायन मिल जाते हैं। इसलिए इसका प्रदूषण सामान्य घरेलू सीवेज की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो सकता है। अलग-अलग बैच में कपड़े और रंग बदलने से अपशिष्ट जल का पीएच, रंग और रासायनिक ऑक्सीजन मांग भी तेजी से बदल सकती है। शोधकर्ताओं ने इसी कारण लिखा कि एकल उपचार पद्धति कई बार पर्याप्त नहीं होती और प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक उपचार को एक नियंत्रित श्रृंखला में जोड़ना अधिक प्रभावी हो सकता है।

यही इस IIT कानपुर तकनीक का मूल विचार है-पहले बड़े और निलंबित प्रदूषक हटाइए, फिर रंग तथा कठिन कार्बनिक रसायनों को ऑक्सीकरण से तोड़िए और अंत में महीन फिल्टर से शेष अशुद्धियां पकड़िए।

सूर्य की रोशनी ही बनती है रासायनिक सफाई की ताकत

प्रणाली का सबसे रोचक हिस्सा प्रकाश-उत्प्रेरक रिएक्टर है। इसमें जिंक ऑक्साइड आधारित नैनो-सामग्री स्टेनलेस स्टील की छिद्रित प्लेटों पर लगाई जाती है। पानी को इन प्लेटों के बीच घुमावदार रास्ते से प्रवाहित किया जाता है ताकि उसका उत्प्रेरक के साथ अधिक से अधिक संपर्क हो। रिएक्टर को ऐसी जगह और ऊंचाई पर रखा गया है जहां पर्याप्त सूर्यप्रकाश मिल सके।

सूर्यप्रकाश मिलने पर उत्प्रेरक ऐसी प्रतिक्रियाएं शुरू करता है जो अत्यधिक प्रतिक्रियाशील हाइड्रॉक्सिल रेडिकल पैदा करती हैं। ये रेडिकल रंग के जटिल अणुओं को तोड़ते हैं और COD यानी रासायनिक ऑक्सीजन मांग घटाने में सहायता करते हैं। शोध-पत्र के अनुसार यही उन्नत ऑक्सीकरण प्रक्रिया प्रणाली के मुख्य प्रदूषण-नियंत्रण चरणों में से एक है।

दो रिएक्टर, प्रत्येक पांच हजार लीटर

पायलट प्रणाली में दो प्रकाश-उत्प्रेरक टैंक श्रृंखला में लगाए गए हैं और प्रत्येक की प्रभावी क्षमता लगभग 5 किलोलीटर है। इस तरह एक चक्र में करीब 10 किलोलीटर पानी को उपचार श्रृंखला से गुजारा जा सकता है। प्रत्येक रिएक्टर में प्रकाश-उत्प्रेरक से लेपित अनेक छिद्रित स्टेनलेस स्टील प्लेटें लगाई गई हैं ताकि पानी और उत्प्रेरक का संपर्क बढ़े। शोध-पत्र में इस पूरे पायलट संयंत्र की क्षमता 10 KLD, यानी प्रतिदिन लगभग 10,000 लीटर, दर्ज की गई है।

जयपुर की वास्तविक फैक्ट्री में हुआ परीक्षण

तकनीक केवल प्रयोगशाला में रंग मिला पानी साफ करने तक सीमित नहीं रही। पायलट संयंत्र को पहले जोधपुर के संयुक्त अपशिष्ट शोधन संयंत्र में इस्पात और कपड़ा उद्योग के मिश्रित अपशिष्ट पर जांचा गया और बाद में जयपुर की लक्ष्मी टेक्सटाइल्स में सीधे कपड़ा उद्योग के अपशिष्ट जल पर लगाया गया। शोध-पत्र में दोनों स्थानों के परीक्षण दर्ज हैं। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रयोगशाला के नियंत्रित पानी और वास्तविक औद्योगिक अपशिष्ट में बड़ा अंतर होता है। फैक्ट्री में रंग, रसायन और पीएच लगातार बदलते हैं। ऐसी परिस्थिति में संयंत्र का काम करना ही तकनीक की व्यावहारिकता की बड़ी परीक्षा है।

BOD, COD और TOC आखिर बताते क्या हैं

औद्योगिक पानी की गुणवत्ता समझने के लिए तीन आंकड़े बार-बार सामने आते हैं—BOD, COD और TOC। BOD यानी जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग बताती है कि पानी में मौजूद जैविक पदार्थों को सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित करने में कितनी ऑक्सीजन खर्च होगी। BOD जितनी अधिक, जैविक प्रदूषण सामान्यतः उतना अधिक। COD यानी रासायनिक ऑक्सीजन मांग बताती है कि पानी में मौजूद ऑक्सीकरण योग्य पदार्थों को रासायनिक रूप से तोड़ने में कितनी ऑक्सीजन के बराबर ऑक्सीकरण क्षमता चाहिए। कपड़ा उद्योग में COD बहुत अधिक हो सकती है क्योंकि कई रंग और रसायन जैविक रूप से आसानी से नहीं टूटते।

TOC यानी कुल कार्बनिक कार्बन पानी में कुल कार्बनिक पदार्थ की मात्रा का एक अलग संकेतक है। शोधकर्ताओं ने इन तीनों के साथ पीएच, घुलित ठोस पदार्थ और धुंधलेपन जैसे मानकों का भी आकलन किया।

केवल रंग गायब होना पानी साफ होने का प्रमाण नहीं

कपड़ा उद्योग के अपशिष्ट में एक भ्रम अक्सर होता है—यदि पानी पारदर्शी हो गया तो उसे साफ मान लिया जाता है। ऐसा जरूरी नहीं।रंग हट जाने के बाद भी पानी में घुले रसायन, कार्बनिक पदार्थ और लवण बने रह सकते हैं। इसीलिए IIT कानपुर की प्रणाली केवल ‘डिकोलराइजेशन’ नहीं करती, बल्कि COD, TOC, BOD और अन्य मापदंडों को भी घटाने का प्रयास करती है। शोध-पत्र में उपचार के अलग-अलग चरणों के बाद इन मानकों में लगातार कमी दर्ज की गई और अंतिम पानी को निर्धारित डिस्चार्ज मानकों के भीतर लाने की बात कही गई।

नैनो-फिल्टर का अंतिम चरण क्यों जरूरी

प्रकाश-उत्प्रेरक प्रक्रिया बड़े और जटिल रंग अणुओं को तोड़ देती है, लेकिन टूटे हुए छोटे कार्बनिक यौगिक पानी में रह सकते हैं। इसलिए इसके बाद पॉलीएक्रिलोनाइट्राइल फाइबर और सक्रिय कार्बन फिल्टर लगाए गए हैं।शोध में नैनो-फिल्ट्रेशन चरण से कुल कार्बनिक कार्बन में करीब 42 प्रतिशत अतिरिक्त कमी दर्ज की गई। यानी प्रणाली में कोई एक ‘जादुई फिल्टर’ नहीं है। हर चरण पिछले चरण से बचे प्रदूषकों को लक्ष्य करता है।

क्या यह सचमुच ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ है?

शोध-पत्र इस पायलट प्रणाली को Zero Liquid Discharge यानी ZLD अवधारणा के अनुरूप बताता है और उपचारित पानी के औद्योगिक पुनः उपयोग की संभावना दिखाता है। लेकिन यहां तकनीकी सावधानी जरूरी है। पारंपरिक पूर्ण ZLD प्रणाली में सामान्यतः इतना पानी पुनर्प्राप्त किया जाता है कि बाहर तरल अपशिष्ट लगभग न निकले और शेष घुले लवण या ठोस पदार्थ अलग रूप में निकाले जाएं। कई औद्योगिक ZLD संयंत्र इसके लिए रिवर्स ऑस्मोसिस, बहु-प्रभाव वाष्पीकरण और क्रिस्टलीकरण जैसी महंगी प्रक्रियाएं भी इस्तेमाल करते हैं।

IIT कानपुर की प्रकाशित प्रणाली मुख्यतः उन्नत ऑक्सीकरण, अवशोषण और निस्यंदन से पानी को पुनः उपयोग योग्य बनाने पर आधारित है। इसलिए व्यावसायिक स्तर पर इसे पूर्ण ZLD व्यवस्था के रूप में लागू करते समय लवण, केंद्रित अवशेष और ठोस अपशिष्ट का अंतिम प्रबंधन भी स्पष्ट करना आवश्यक होगा।

मौजूदा CETP में जोड़ी जा सकती है तकनीक

इस तकनीक की व्यावहारिक उपयोगिता का बड़ा पहलू यह है कि इसे औद्योगिक इकाई के मौजूदा अपशिष्ट शोधन संयंत्र के साथ एक अतिरिक्त उन्नत उपचार चरण के रूप में जोड़ा जा सकता है। शोध-पत्र में इसे संयुक्त उपचार प्रणाली के रूप में डिजाइन किया गया है जिसमें प्राथमिक छनाई के बाद प्रकाश-उत्प्रेरक और उन्नत निस्यंदन जोड़ा जाता है। यदि किसी उद्योग को पूरी पुरानी व्यवस्था हटाकर नई फैक्ट्री जैसी प्रणाली न बनानी पड़े तो पूंजीगत लागत और स्थापना समय दोनों कम हो सकते हैं।

‘आधी लागत’ का दावा अभी किस आधार पर

मूल जानकारी में कहा गया है कि तकनीक पारंपरिक जल शोधन व्यवस्था की तुलना में करीब 50 प्रतिशत कम लागत पर काम कर सकती है। लेकिन प्रकाशित npj Clean Water शोध-पत्र में इस 50 प्रतिशत लागत-कटौती का विस्तृत आर्थिक विश्लेषण उपलब्ध नहीं है। शोध में जिंक ऑक्साइड को अपेक्षाकृत कम लागत वाला उत्प्रेरक बताया गया है और सूर्यप्रकाश आधारित प्रक्रिया से ऊर्जा आवश्यकता कम होने की संभावना जरूर बनती है।

इसलिए प्रकाशन में बेहतर होगा कि लिखा जाए-“शोध टीम के अनुसार संचालन लागत पारंपरिक उन्नत शोधन प्रणालियों की तुलना में लगभग आधी हो सकती है; बड़े व्यावसायिक संयंत्र पर इसका स्वतंत्र लागत सत्यापन अभी महत्वपूर्ण होगा।”

जब तक पूंजी लागत, बिजली, रसायन, फिल्टर बदलने, स्लज निस्तारण और रखरखाव का पूरा तुलनात्मक हिसाब सार्वजनिक न हो, ‘आधी लागत’ को अंतिम सिद्ध आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।

चार साल से चलने के दावे को भी सही संदर्भ चाहिए

ताजा जानकारी में कहा गया है कि तकनीक जयपुर की एक कपड़ा इकाई में करीब चार वर्ष से उपयोग में है। प्रकाशित शोध-पत्र में लक्ष्मी टेक्सटाइल्स, जयपुर में औद्योगिक परीक्षण की पुष्टि होती है, लेकिन शोध-पत्र 2024 में प्रकाशित हुआ था और उसमें चार वर्ष के सतत वाणिज्यिक संचालन का अलग दीर्घकालिक प्रदर्शन आंकड़ा नहीं दिया गया है।

इसलिए यदि संस्थान ने अब 2026 में बताया है कि पायलट लगातार चार वर्ष से चल रहा है तो यह नई संचालन संबंधी जानकारी होगी। इसे शोध-पत्र के निष्कर्ष के बजाय शोध टीम के वर्तमान दावे के रूप में लिखना ज्यादा सटीक होगा।

टीम के नाम में भी फर्क समझना जरूरी

2024 में प्रकाशित मूल शोध-पत्र के प्रमुख लेखकों में पंकज सिंह चौहान, कीर्तिमान सिंह, आदित्य चौधरी, उर्मिला बृघु, एस.के. सिंह और शांतनु भट्टाचार्य शामिल हैं। शोध में IIT कानपुर के अलावा MNIT जयपुर और संबंधित औद्योगिक संस्थानों की भागीदारी रही। मूल समाचार में डॉ. कपिल मनोहरन और सूरज कुमार को भी मौजूदा तकनीकी टीम का हिस्सा बताया गया है। IIT कानपुर के आधिकारिक बौद्धिक संपदा रिकॉर्ड से दोनों का प्रो. शांतनु भट्टाचार्य के साथ शोध कार्य में जुड़ा होना पुष्ट होता है, लेकिन वे 2024 वाले npj Clean Water शोध-पत्र के लेखक नहीं हैं।इसलिए खबर में दोनों स्तर अलग रखना उचित है-प्रकाशित शोध-पत्र की मूल टीम और वर्तमान तकनीक-विस्तार/अभियांत्रिकी टीम।

डेटा अपने आप दर्ज करना इस तकनीक की दूसरी ताकत

औद्योगिक जल शोधन में केवल पानी साफ करना पर्याप्त नहीं है। यह भी लगातार जानना पड़ता है कि इनलेट में प्रदूषण कितना था और आउटलेट पर कितना बचा।

शोधकर्ताओं ने इसी दिशा में डेटा-आधारित मॉडल विकसित किए। मशीन लर्निंग और कृत्रिम न्यूरल नेटवर्क मॉडल के जरिए COD, TOC और धुंधलेपन जैसे आउटपुट का अनुमान लगाया गया। प्रकाशित अध्ययन में इन मॉडलों की सहसंबंध क्षमता बहुत ऊंची पाई गई और कई मामलों में R² लगभग 0.99 तक रहा। इसका भविष्य का उपयोग यह हो सकता है कि संयंत्र केवल पानी साफ न करे बल्कि खुद पहचान सके कि प्रदूषण बढ़ा है और किस उपचार चरण को अधिक समय या रसायन चाहिए।

10 KLD से 100 KLD जाना सबसे कठिन अगला कदम

प्रयोगशाला से 10 हजार लीटर प्रतिदिन के पायलट तक पहुंचना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन औद्योगिक पैमाने पर असली चुनौती अब शुरू होगी।100 KLD यानी एक लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता पर प्रकाश-उत्प्रेरक प्लेटों का क्षेत्रफल, सूर्यप्रकाश उपलब्धता, प्रवाह नियंत्रण, फिल्टर का जीवन, बैकवॉश, उत्पन्न स्लज और संचालन लागत सभी बदलेंगे।छोटी प्रणाली में जो प्रक्रिया आसानी से नियंत्रित होती है वह दस गुना क्षमता पर ठीक उसी तरह काम करे, यह स्वतः सुनिश्चित नहीं होता।इसीलिए 100 KLD विस्तार इस तकनीक की वास्तविक वाणिज्यिक परीक्षा होगी।

कानपुर के लिए तकनीक का महत्व और बड़ा

यह शोध कानपुर के लिए केवल संस्थान की उपलब्धि नहीं है। कानपुर और आसपास का औद्योगिक क्षेत्र लंबे समय से चमड़ा, कपड़ा, रंगाई और दूसरे प्रदूषणकारी उद्योगों के जल-प्रबंधन की चुनौती से जूझता रहा है।यदि कम ऊर्जा और कम पूंजी खर्च वाली पुनः उपयोग प्रणाली बड़े पैमाने पर सफल होती है तो पानी की दो समस्याएं एक साथ कम हो सकती हैं-एक तरफ नदी और भूजल में औद्योगिक प्रदूषण घटेगा, दूसरी तरफ फैक्ट्रियों की ताजे पानी पर निर्भरता कम होगी।भारत के जल-संकटग्रस्त औद्योगिक क्षेत्रों के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।एक लाख लीटर साफ पानी का अर्थ एक लाख लीटर बचाया गया भूजल भी हो सकता है

मान लीजिए कोई 100 KLD संयंत्र उपचारित पानी का अधिकांश हिस्सा फिर उसी उद्योग में इस्तेमाल कर सके। इसका अर्थ प्रतिदिन लगभग एक लाख लीटर तक ताजे पानी की मांग कम करने की संभावना हो सकती है।वर्ष भर में यह करोड़ों लीटर पानी की बचत में बदल सकती है।हालांकि वास्तविक बचत इस बात पर निर्भर करेगी कि उपचारित पानी किस प्रक्रिया में दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है और कितनी मात्रा वास्तव में पुनर्चक्रित होती है।

इसलिए औद्योगिक जल-शोधन की अगली पीढ़ी का लक्ष्य केवल ‘प्रदूषण मानक पूरा करना’ नहीं होना चाहिए, बल्कि ‘पानी को वापस उत्पादन चक्र में भेजना’ होना चाहिए।

फैक्ट्री के गंदे पानी को ‘कचरा’ नहीं, संसाधन मानने की तकनीक

IIT कानपुर के इस शोध की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी एक BOD या COD आंकड़े में नहीं है। असली विचार यह है कि उद्योग से निकलने वाला पानी एक बार इस्तेमाल करके फेंक देने वाली वस्तु नहीं होना चाहिए।उसे कई चरणों में साफ करके दोबारा फैक्ट्री में भेजा जा सकता है। इससे उद्योग को कम ताजा पानी चाहिए, प्रदूषित डिस्चार्ज कम होता है और जल-शोधन पर लंबे समय का खर्च भी घट सकता है।

यदि 10 KLD का यह पायलट 100 KLD और फिर उससे बड़े औद्योगिक पैमाने पर समान गुणवत्ता और स्वीकार्य लागत के साथ सफल रहता है, तो यह कपड़ा उद्योग के लिए केवल नई सफाई तकनीक नहीं होगी। यह ‘पानी लो, इस्तेमाल करो और फेंक दो’ वाले पुराने औद्योगिक मॉडल को ‘पानी लो, साफ करो और फिर इस्तेमाल करो’ वाले चक्रीय मॉडल में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

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