TRENDING TAGS :
Kanpur News: पराली, पिज्जा और समोसे के कचरे से बनेगी हाइड्रोजन, कानपुर में शुरू हुआ बड़ा शोध
Kanpur News: कानपुर के AITD में पराली और खाद्य अपशिष्ट से बायो-हाइड्रोजन बनाने पर तीन साल का शोध शुरू हुआ है। डार्क फर्मेंटेशन से पायलट बायो-रिएक्टर विकसित किया जाएगा।
Kanpur News (Image Credit-Social Media)
कानपुर। खेतों में बची पराली, मेस और होटलों का बचा हुआ भोजन, खराब पिज्जा-समोसा, दाल-चावल, रोटी-सब्जी तथा कटे हुए फल और सब्जियों के अवशेष अब केवल कचरा नहीं रहेंगे। इन्हीं जैविक अपशिष्टों से भविष्य का स्वच्छ ईंधन मानी जाने वाली ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करने की दिशा में कानपुर के डॉ. आंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी फॉर दिव्यांगजन (AITD) ने एक महत्वपूर्ण शोध परियोजना शुरू की है। संस्थान के विशेषज्ञ ‘डार्क फर्मेंटेशन’ तकनीक की मदद से कृषि और खाद्य अपशिष्ट से जैव-हाइड्रोजन उत्पादन की प्रक्रिया विकसित करेंगे।
इस शोध के लिए उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद से लगभग 13.36 लाख रुपये का अनुदान मिला है। परियोजना तीन वर्षों तक चलेगी और इसमें प्रयोगशाला स्तर से आगे बढ़ते हुए एक पायलट बायो-रिएक्टर मॉडल विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। यदि परिणाम सफल रहे तो तकनीक का इस्तेमाल भविष्य में कृषि मंडियों, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों, बड़े संस्थानों की मेस, होटल उद्योग और ग्रामीण क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
क्या है डार्क फर्मेंटेशन?
डार्क फर्मेंटेशन एक जैविक प्रक्रिया है, जिसमें कुछ विशेष प्रकार के सूक्ष्मजीव जैविक पदार्थों में मौजूद कार्बोहाइड्रेट को बिना प्रकाश और बिना ऑक्सीजन वाली परिस्थितियों में तोड़ते हैं। इस प्रक्रिया से हाइड्रोजन के साथ कार्बन डाइऑक्साइड और कुछ कार्बनिक अम्ल भी बनते हैं।साधारण शब्दों में कहें तो जिस तरह सूक्ष्मजीव खाद्य पदार्थों को किण्वित करते हैं, उसी सिद्धांत को नियंत्रित वैज्ञानिक वातावरण में ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अंतर यह है कि यहां लक्ष्य शराब या लैक्टिक अम्ल बनाना नहीं, बल्कि अधिकतम संभव बायो-हाइड्रोजन प्राप्त करना होता है।
तकनीक की खासियत यह है कि इसमें सूरज की रोशनी की जरूरत नहीं होती और जैविक कचरे को सीधे ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इससे दो समस्याओं पर एक साथ काम किया जा सकता है—एक ओर कृषि और खाद्य कचरे का निपटान, दूसरी ओर स्वच्छ ईंधन का उत्पादन।
पराली इस शोध के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर भारत में हर साल धान और गेहूं की कटाई के बाद बड़ी मात्रा में कृषि अवशेष बचता है। किसानों के पास इसे हटाने के लिए समय और संसाधन सीमित होने पर कई क्षेत्रों में पराली जलाने की समस्या सामने आती है। इससे हवा में महीन कण, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और अन्य प्रदूषक निकलते हैं, जो वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।यदि पराली को ईंधन या औद्योगिक कच्चे माल में बदला जाए तो किसान के लिए यह बोझ के बजाय आर्थिक संसाधन बन सकती है। डार्क फर्मेंटेशन इसी दिशा का एक विकल्प है। हालांकि पराली को सीधे रिएक्टर में डाल देने से हाइड्रोजन नहीं बनती। इसमें मौजूद लिग्नोसेलुलोज संरचना काफी कठोर होती है, इसलिए उसे पहले छोटे-छोटे अणुओं और किण्वन योग्य शर्करा में बदलने के लिए विशेष पूर्व-उपचार की जरूरत पड़ती है।यही इस शोध की वैज्ञानिक चुनौतियों में से एक होगी—पराली को ऐसी अवस्था में कैसे तैयार किया जाए कि सूक्ष्मजीव उसका अधिकतम उपयोग कर सकें।
पिज्जा और समोसा भी कैसे बन सकते हैं ईंधन?
बचा हुआ भोजन वैज्ञानिक दृष्टि से कार्बन का अच्छा स्रोत हो सकता है। पिज्जा, समोसा, दाल, चावल, रोटी, फल और सब्जियों में अलग-अलग मात्रा में स्टार्च, शर्करा, प्रोटीन और वसा होती है। इनमें से विशेष रूप से कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खाद्य कचरा डार्क फर्मेंटेशन के लिए उपयोगी हो सकता है।लेकिन हर खाद्य अपशिष्ट समान नहीं होता। ज्यादा तेल, नमक, मसाले या अम्लीय पदार्थ कभी-कभी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए शोधकर्ताओं को यह तय करना होगा कि किस तरह के खाद्य अपशिष्ट का कौन-सा मिश्रण सबसे अधिक हाइड्रोजन पैदा करता है।संस्थान के लिए यही शोध का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा—कचरे की संरचना और गैस उत्पादन के बीच वैज्ञानिक संबंध तय करना।
सही बैक्टीरिया चुनना होगा सबसे अहम काम
बायोटेक्नोलॉजी विभागाध्यक्ष एवं डीन अनुसंधान एवं विकास डॉ. मनीष सिंह राजपूत के अनुसार परियोजना में ऐसे सूक्ष्मजीवों की पहचान और चयन किया जाएगा जो कृषि और खाद्य अपशिष्ट को कुशलतापूर्वक हाइड्रोजन में बदल सकें। परियोजना में डॉ. ओमहरी सह-अन्वेषक के रूप में जुड़े हैं।डार्क फर्मेंटेशन में आमतौर पर हाइड्रोजन बनाने वाले बैक्टीरिया की सक्रियता तापमान, पीएच, पोषक तत्व, फीड की मात्रा और रिएक्टर में सामग्री के ठहराव के समय पर निर्भर करती है। इन सभी मापदंडों में थोड़ा सा बदलाव भी गैस उत्पादन की मात्रा को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए शोधकर्ताओं को केवल “हाइड्रोजन बनी या नहीं” नहीं देखना होगा, बल्कि यह भी मापना होगा कि प्रति किलोग्राम कचरे से कितनी हाइड्रोजन मिली, किस तापमान पर सर्वाधिक उत्पादन हुआ और प्रक्रिया को लगातार कितने समय तक स्थिर रखा जा सकता है।
तीन साल में पायलट बायो-रिएक्टर बनाने का लक्ष्य
परियोजना का अंतिम उद्देश्य प्रयोगशाला की छोटी बोतलों तक सीमित नहीं है। तीन वर्षों के दौरान शोध टीम हाइड्रोजन उत्पादन की दक्षता बढ़ाने और प्रक्रिया को पायलट स्तर के बायो-रिएक्टर में स्थानांतरित करने पर काम करेगी।पायलट मॉडल इस बात की असली परीक्षा होगा कि प्रयोगशाला में सफल तकनीक अधिक मात्रा में कचरा डालने पर भी उतनी ही प्रभावी रहती है या नहीं। अक्सर जैव-प्रौद्योगिकी की कई प्रक्रियाएं छोटे स्तर पर अच्छी तरह काम करती हैं, लेकिन बड़े रिएक्टर में तापमान, मिश्रण, गैस निकासी और सूक्ष्मजीवों की स्थिरता बनाए रखना कठिन हो जाता है।
यदि AITD की टीम इस चरण को सफलतापूर्वक पार कर लेती है तो तकनीक के औद्योगिक विस्तार की संभावनाएं ज्यादा स्पष्ट होंगी।
क्या यह इलेक्ट्रोलाइजर से बनने वाली ग्रीन हाइड्रोजन का विकल्प बन सकती है?
आज दुनिया में जिस “ग्रीन हाइड्रोजन” की सबसे अधिक चर्चा होती है, वह मुख्यतः नवीकरणीय बिजली से पानी का विद्युत अपघटन करके बनाई जाती है। इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रोलाइजर और बड़ी मात्रा में स्वच्छ बिजली की आवश्यकता होती है। डार्क फर्मेंटेशन इससे अलग जैविक मार्ग है। इसमें पानी को बिजली से तोड़ने के बजाय जैविक कचरे में मौजूद रासायनिक ऊर्जा को सूक्ष्मजीवों की मदद से हाइड्रोजन में बदला जाता है।इसलिए इसे बायो-हाइड्रोजन कहना वैज्ञानिक रूप से अधिक सटीक है। यदि प्रक्रिया का कुल ऊर्जा स्रोत कम-कार्बन हो और अपशिष्ट का प्रभावी उपयोग किया जाए तो यह हरित ऊर्जा व्यवस्था का हिस्सा बन सकती है।
हालांकि इसे पारंपरिक इलेक्ट्रोलाइजर आधारित ग्रीन हाइड्रोजन का सीधा विकल्प मानना अभी जल्दबाजी होगी। डार्क फर्मेंटेशन में हाइड्रोजन की उपज, गैस शुद्धिकरण और बड़े पैमाने पर आर्थिक व्यवहार्यता अभी भी शोध के महत्वपूर्ण विषय हैं।
गैस बनने के बाद शुद्धिकरण भी जरूरी
डार्क फर्मेंटेशन से निकलने वाली गैस शुद्ध हाइड्रोजन नहीं होती। इसमें कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसें भी हो सकती हैं। यदि हाइड्रोजन को फ्यूल सेल या किसी उच्च शुद्धता वाले औद्योगिक उपयोग में लेना हो तो गैस को अलग और शुद्ध करना पड़ेगा।यानी परियोजना की सफलता केवल गैस पैदा कर लेने से तय नहीं होगी। अंतिम उपयोग के लिए यह भी देखना होगा कि हाइड्रोजन शुद्धिकरण की लागत कितनी आती है और कुल प्रक्रिया ऊर्जा तथा अर्थव्यवस्था की दृष्टि से लाभकारी है या नहीं।
बचा हुआ द्रव भी बन सकता है संसाधन
डार्क फर्मेंटेशन के बाद रिएक्टर में केवल गैस ही नहीं बनती, बल्कि कुछ कार्बनिक अम्ल और तरल अवशेष भी बचते हैं। इन्हें आगे दूसरी जैविक प्रक्रिया में इस्तेमाल कर बायोगैस, मीथेन या अन्य उपयोगी जैव-उत्पाद बनाया जा सकता है।यदि ऐसा एकीकृत मॉडल विकसित किया जाता है तो कचरे से केवल हाइड्रोजन नहीं, बल्कि कई प्रकार की ऊर्जा और मूल्यवान उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता और बढ़ सकती है।इसे आधुनिक बायोरिफाइनरी मॉडल की दिशा में एक कदम माना जा सकता है, जिसमें कचरे का अधिकतम हिस्सा उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करने का लक्ष्य रहता है।
किसानों से आएगी पराली, मेस से मिलेगा खाद्य कचरा
परियोजना के लिए कृषि अवशेष आसपास के किसानों और चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों से जुटाने की योजना है। वहीं खाद्य अपशिष्ट के लिए AITD की अपनी मेस तथा अन्य शिक्षण संस्थानों की मेस से संपर्क किया जाएगा।यदि प्रयोग सफल होता है तो भविष्य में इसी मॉडल को मंडियों, छात्रावासों, होटल, विवाह समारोह स्थलों और बड़ी रसोइयों तक बढ़ाया जा सकता है, जहां रोजाना बड़ी मात्रा में भोजन का अपशिष्ट निकलता है।
किसानों के लिए भी बन सकता है नया बाजार
पराली से ऊर्जा उत्पादन व्यावसायिक स्तर पर सफल हुआ तो इसका लाभ केवल प्रदूषण कम करने तक सीमित नहीं रहेगा। कृषि अवशेष की खरीद शुरू होने पर किसान को उस सामग्री का भी मूल्य मिल सकता है जिसे वह आज अनुपयोगी मानता है।इसके साथ पराली संग्रह, बेलिंग, परिवहन और भंडारण से ग्रामीण क्षेत्रों में नए रोजगार भी पैदा हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए पूरी आपूर्ति शृंखला विकसित करनी होगी, क्योंकि खेत से रिएक्टर तक पराली पहुंचाने की लागत स्वयं परियोजना की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।
भारत की हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था में जैविक मार्ग की भूमिका
भारत भविष्य के स्वच्छ ऊर्जा तंत्र में हाइड्रोजन को महत्वपूर्ण ईंधन मान रहा है। इस्पात, उर्वरक, रिफाइनरी और भारी परिवहन जैसे ऐसे क्षेत्रों में हाइड्रोजन उपयोगी हो सकती है जहां सीधे बिजलीकरण में कठिनाई आती है।ऐसे में पानी के इलेक्ट्रोलिसिस के साथ-साथ जैविक कचरे से हाइड्रोजन बनाने जैसे वैकल्पिक रास्तों पर शोध महत्वपूर्ण है। भारत के पास विशाल कृषि अवशेष और तेजी से बढ़ता शहरी खाद्य अपशिष्ट दोनों मौजूद हैं। इसलिए यदि वैज्ञानिक और आर्थिक स्तर पर उपयुक्त तकनीक विकसित होती है तो देश के लिए इसका दोहरा लाभ हो सकता है।
अभी प्रयोग है, औद्योगिक समाधान बनने में कई परीक्षाएं बाकी
AITD की परियोजना महत्वाकांक्षी है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से इसे अभी शुरुआती शोध के रूप में ही देखना उचित होगा। आने वाले तीन वर्षों में टीम को यह साबित करना होगा कि अलग-अलग प्रकार के कचरे से लगातार और पर्याप्त मात्रा में हाइड्रोजन बनाई जा सकती है, प्रक्रिया स्थिर रह सकती है और उत्पादन लागत व्यावहारिक हो सकती है।साथ ही यह भी देखना होगा कि पराली के पूर्व-उपचार, गैस शुद्धिकरण, रिएक्टर संचालन और कचरे के परिवहन पर जितनी ऊर्जा और पैसा खर्च होता है, उसके मुकाबले मिलने वाली हाइड्रोजन का मूल्य कितना है।
यदि ये सवाल सकारात्मक रूप से हल होते हैं तो कानपुर का यह प्रयोग भविष्य में “वेस्ट टू हाइड्रोजन” तकनीक का उपयोगी भारतीय मॉडल बन सकता है।फिलहाल इसकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह दो बड़ी समस्याओं—पराली और खाद्य अपशिष्ट के निपटान तथा स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन—को एक ही वैज्ञानिक समाधान से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। अगर प्रयोग सफल होता है तो भविष्य में खेत की पराली और थाली में बचा भोजन दोनों कचरा नहीं, ऊर्जा का कच्चा माल बन सकते हैं।


