Kanpur News: हार्ट अटैक से पहले मिलेगी चेतावनी? IIT कानपुर बना रहा खास बायोसेंसर

Kanpur News: IIT कानपुर के शोधकर्ता ग्राफीन आधारित बायोसेंसर पर काम कर रहे हैं, जो कम मात्रा के रक्त नमूने से हृदय रोग से जुड़े शुरुआती biomarkers पहचानने की दिशा में विकसित किया जा रहा है।

Newstrack Network
Published on: 10 Aug 2026 8:12 PM IST
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Kanpur News (Image Credit-Social Media)

कानपुर। हार्ट अटैक अक्सर अचानक होता दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे चल रही बीमारी कई वर्ष पहले शुरू हो चुकी होती है। धमनियों की भीतरी दीवारों में वसा, कोलेस्ट्रॉल, सूजन पैदा करने वाली कोशिकाएं और अन्य पदार्थ धीरे-धीरे जमा होकर एथेरोस्क्लेरोटिक प्लाक बनाते रहते हैं। लंबे समय तक मरीज को कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होता और जब रक्त प्रवाह बहुत कम हो जाए या कोई प्लाक फटकर खून का थक्का बना दे, तब एंजाइना, हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थिति सामने आ सकती है। इसी ‘साइलेंट’ प्रक्रिया को शुरुआती स्तर पर पकड़ने के उद्देश्य से IIT कानपुर में एक नए जैव-संवेदी प्लेटफॉर्म पर काम किया गया है।

IIT कानपुर के मेहता फैमिली सेंटर फॉर इंजीनियरिंग इन मेडिसिन और बायोसाइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग से जुड़े शोधार्थी तमोजित सांतरा, प्रोफेसर संतोष के. मिश्रा के मार्गदर्शन में हृदय रोगों के लिए ऐसे सेंसर विकसित करने पर काम कर रहे हैं जिन्हें भविष्य में कम मात्रा के रक्त नमूने से शुरुआती जोखिम पहचानने में उपयोग किया जा सके। IIT कानपुर की आधिकारिक शोध प्रोफाइल में तमोजित के कार्यक्षेत्र में हृदय रोग, 3D प्रिंटिंग, कार्बन नैनोमैटेरियल, ग्राफीन आधारित बायोसेंसर और फोम-सेल आधारित चिकित्सकीय प्रणाली शामिल हैं।

धमनियों में सिर्फ कोलेस्ट्रॉल नहीं जमता, पूरी जैविक प्रक्रिया चलती है

आम बोलचाल में एथेरोस्क्लेरोसिस को ‘धमनियों में कोलेस्ट्रॉल जमना’ कहा जाता है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से प्रक्रिया इससे कहीं अधिक जटिल है। इसकी शुरुआत अक्सर तब होती है जब धमनी की अंदरूनी परत यानी एंडोथीलियम को उच्च रक्तचाप, धूम्रपान, मधुमेह, ऑक्सीडेटिव तनाव या बढ़े LDL कोलेस्ट्रॉल जैसे कारकों से नुकसान पहुंचता है।इसके बाद LDL कण धमनी की भीतरी परत में प्रवेश कर सकते हैं। इनमें रासायनिक बदलाव होने पर प्रतिरक्षा प्रणाली सक्रिय होती है। मोनोसाइट नाम की प्रतिरक्षा कोशिकाएं वहां पहुंचती हैं और मैक्रोफेज में बदलकर परिवर्तित LDL को निगलने लगती हैं। बहुत अधिक लिपिड भर जाने पर ये कोशिकाएं फोम सेल कहलाती हैं।

धीरे-धीरे फोम सेल, वसा, संयोजी ऊतक, कैल्शियम और सूजन संबंधी पदार्थ मिलकर प्लाक बनाते हैं। इसलिए एथेरोस्क्लेरोसिस को केवल वसा जमा होने की बीमारी नहीं बल्कि लंबे समय तक चलने वाली सूजन और रक्तवाहिका संबंधी बीमारी माना जाता है।

बायोसेंसर धमनी के अंदर जाकर प्लाक नहीं नापता

इस तकनीक को समझने में सबसे महत्वपूर्ण फर्क यही है। कोई रक्त आधारित बायोसेंसर सामान्यतः यह नहीं बता सकता कि ‘धमनी 37 प्रतिशत बंद है’ या प्लाक की मोटाई ठीक कितनी है। ऐसी संरचनात्मक जानकारी के लिए आज भी CT coronary angiography, coronary angiography, intravascular ultrasound जैसी इमेजिंग तकनीकों की भूमिका रहती है।बायोसेंसर का काम अलग है। वह रक्त में मौजूद किसी विशिष्ट जैव-चिह्न यानी biomarker को पहचानता है। यदि वह जैव-चिह्न एथेरोस्क्लेरोसिस, सूजन, प्लाक अस्थिरता या रक्त का थक्का बनने की प्रक्रिया से जुड़ा हो तो उसकी मात्रा बीमारी के जोखिम के बारे में अतिरिक्त जानकारी दे सकती है।

इसलिए इस तकनीक को फिलहाल ‘धमनियों में कोलेस्ट्रॉल कितना जमा है’ बताने वाले उपकरण के बजाय शुरुआती जैविक संकेत पहचानने की दिशा में विकसित सेंसर कहना अधिक वैज्ञानिक रूप से सही होगा।

ग्राफीन और इलेक्ट्रोकेमिकल सेंसर क्यों महत्वपूर्ण हैं?

IIT कानपुर की आधिकारिक पेटेंट सूची में तमोजित सांतरा, राहुल गुप्ता, प्रो. संतोष के. मिश्रा और प्रो. निशिथ वर्मा के नाम से Copper-laser Induced Graphene Based Electrochemical Biosensor का पेटेंट आवेदन दर्ज है। आवेदन 4 जुलाई 2025 को दाखिल किया गया था। ग्राफीन बेहद पतली कार्बन सामग्री है जिसकी विद्युत चालकता और सतह क्षेत्र बहुत अधिक होता है। यही गुण इसे बायोसेंसर के लिए उपयोगी बनाते हैं। यदि सेंसर की सतह पर किसी विशेष प्रोटीन या जैव-अणु को पकड़ने वाला घटक लगाया जाए तो लक्ष्य अणु उससे जुड़ने पर विद्युत संकेत में बदलाव पैदा कर सकता है।

उस बदलाव को इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली मापकर यह बता सकती है कि लक्ष्य biomarker मौजूद है या उसकी सांद्रता कितनी है।IIT कानपुर की शोध सामग्री में इसी समूह द्वारा थ्रोम्बिन की पहचान के लिए copper nanoparticle-dispersed laser-induced graphene electrochemical sensor पर प्रकाशित वैज्ञानिक काम का भी उल्लेख है। थ्रोम्बिन रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण एंजाइम है।

हार्ट अटैक में थ्रोम्बिन क्यों महत्वपूर्ण?

हार्ट अटैक का एक सामान्य कारण यह होता है कि वर्षों से मौजूद एथेरोस्क्लेरोटिक प्लाक अचानक अस्थिर होकर फट जाता है। शरीर इसे चोट समझता है और उस स्थान पर प्लेटलेट तथा clotting proteins सक्रिय हो जाते हैं।इसी clotting cascade में थ्रोम्बिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह fibrinogen को fibrin में बदलने और स्थिर रक्त का थक्का बनाने की प्रक्रिया में मदद करता है।यदि ऐसा थक्का coronary artery को अचानक बंद कर दे तो हृदय की मांसपेशी तक रक्त और ऑक्सीजन पहुंचना रुक सकता है और हार्ट अटैक हो सकता है।यही कारण है कि रक्त के थक्के बनने से जुड़े biomarkers की संवेदनशील पहचान cardiovascular diagnostics में महत्वपूर्ण शोध क्षेत्र है।

कुछ बूंद रक्त से जांच हुई तो क्यों बड़ा बदलाव होगा?

आज हृदय रोग का जोखिम जानने के लिए lipid profile, blood sugar, blood pressure, ECG और जरूरत पड़ने पर echocardiography, CT angiography या invasive coronary angiography जैसी जांचें की जाती हैं।

यदि भविष्य में कोई validated point-of-care biosensor बहुत कम रक्त नमूने से cardiovascular biomarkers को सटीकता से पहचानने लगे तो इसका उपयोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, छोटे अस्पताल और यहां तक कि portable diagnostic device के रूप में किया जा सकता है।इसका सबसे बड़ा लाभ ऐसे लोगों में हो सकता है जिन्हें अभी छाती में दर्द नहीं है, लेकिन मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, धूम्रपान, पारिवारिक इतिहास या बढ़े LDL के कारण हृदय रोग का खतरा अधिक है।

हालांकि किसी नए सेंसर को अस्पताल में नियमित जांच बनने से पहले बड़ी संख्या में मरीजों पर clinical validation, sensitivity, specificity और false-positive तथा false-negative परिणामों की जांच करनी होती है।

सेंसर की असली परीक्षा—स्वस्थ और बीमार में कितना सही फर्क करता है

किसी भी diagnostic biosensor की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह प्रयोगशाला में लक्ष्य अणु पहचान लेता है।वैज्ञानिकों को यह साबित करना पड़ता है कि वह हजारों अन्य proteins और molecules वाले वास्तविक रक्त नमूने में भी सही biomarker पहचान सके। इसके लिए उसकी संवेदनशीलता, विशिष्टता, सीमा-ए-पहचान, परिणामों की पुनरावृत्ति और लंबे समय तक स्थिरता जांची जाती है।

फिर स्वस्थ लोगों, शुरुआती बीमारी वाले मरीजों और गंभीर बीमारी वाले रोगियों के नमूनों पर परिणामों की तुलना करनी होती है।यही चरण तय करता है कि कोई शोध उपकरण वास्तव में अस्पताल तक पहुंचेगा या प्रयोगशाला तक सीमित रह जाएगा।

दूसरा बड़ा शोध—शरीर में घुल जाने वाला 3D-प्रिंटेड स्टेंट

तमोजित का दूसरा शोध हृदय रोग के इलाज से जुड़ी एक अलग समस्या पर केंद्रित है। वह बायोडिग्रेडेबल 3D-प्रिंटेड स्टेंट विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।स्टेंट एक छोटी जालीदार नली होती है जिसे संकरी coronary artery में लगाया जाता है ताकि रक्तवाहिका खुली रहे और हृदय तक रक्त प्रवाह बना रहे।

आज बड़ी संख्या में प्रयुक्त coronary stents धातु आधारित होते हैं। आधुनिक drug-eluting stents पर ऐसी दवा की coating भी होती है जो दोबारा narrowing होने का खतरा घटाती है।लेकिन धातु का scaffold शरीर में स्थायी रूप से रह जाता है। इसी कारण दुनिया भर में ऐसे bioresorbable scaffolds पर शोध चल रहा है जो शुरुआती महीनों में धमनी को सहारा दें और बाद में धीरे-धीरे शरीर में विघटित हो जाएं।

घुल जाने वाला स्टेंट सुनने में सरल, बनाना बहुत कठिन

बायोडिग्रेडेबल स्टेंट का विचार आकर्षक है, लेकिन इंजीनियरिंग की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण भी है।स्टेंट को इतना मजबूत होना चाहिए कि धमनी की दीवार को कई महीनों तक खुला रख सके, लेकिन इतना स्थायी भी नहीं कि वर्षों तक शरीर में मौजूद रहे। यदि वह बहुत जल्दी टूट गया तो धमनी फिर सिकुड़ सकती है। यदि बहुत धीरे घुला तो biodegradable बनाने का उद्देश्य कमजोर हो जाएगा।

इसके अलावा सामग्री जैव-संगत होनी चाहिए, उस पर खून का खतरनाक थक्का नहीं बनना चाहिए और degradation के दौरान बनने वाले पदार्थ शरीर के लिए हानिकारक नहीं होने चाहिए।यानी सही संतुलन चाहिए—मजबूती भी, लचक भी और नियंत्रित degradation भी।

3D प्रिंटिंग से हर मरीज के लिए अलग डिजाइन की संभावना

3D प्रिंटिंग की खासियत यह है कि डिजिटल डिजाइन के आधार पर किसी संरचना का आकार, मोटाई, जाली का pattern और mechanical properties नियंत्रित की जा सकती हैं।भविष्य में यदि यह तकनीक clinical स्तर तक पहुंचती है तो अलग-अलग धमनी के आकार के लिए customized scaffold बनाना संभव हो सकता है।

हालांकि coronary stent जैसी life-critical device में patient-specific 3D printing को clinical routine बनाने से पहले अत्यंत कठोर mechanical, biological और regulatory परीक्षण आवश्यक होंगे।

पशु मॉडल परीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण

मानव शरीर में लगाने से पहले ऐसे स्टेंट को प्रयोगशाला और पशु मॉडल में कई स्तरों पर परखा जाता है। शोधकर्ताओं को देखना पड़ता है कि implant के बाद धमनी में सूजन कितनी होती है, blood clot बनता है या नहीं, vessel दोबारा संकरी होती है या नहीं और सामग्री किस गति से विघटित होती है।यदि पशु मॉडल में सुरक्षा और प्रभावकारिता साबित होती है तभी आगे मानव clinical trials की दिशा खुल सकती है।इसलिए IIT कानपुर में चल रहे इस काम को फिलहाल research and development stage की तकनीक के रूप में देखना चाहिए, बाजार में उपलब्ध उपचार के रूप में नहीं।

PMRF के तहत कर रहे हृदय रोग पर शोध

IIT कानपुर की आधिकारिक प्रधानमंत्री रिसर्च फेलोशिप सूची में तमोजित सांतरा को PMRF Cycle-7 के शोधार्थी के रूप में दर्ज किया गया है। संस्थान की प्रोफाइल के अनुसार उनका शोध हृदय रोग, बायोसेंसर, ग्राफीन और 3D प्रिंटिंग जैसे क्षेत्रों को जोड़ता है। यह वही दिशा है जिसे आधुनिक चिकित्सा में Engineering in Medicine कहा जाता है—जहां डॉक्टरों की clinical समस्या का समाधान इंजीनियरिंग, जैव-प्रौद्योगिकी और material science मिलकर तलाशते हैं।

एक तरफ बीमारी पहले पकड़ना, दूसरी तरफ उपचार को बेहतर बनाना

तमोजित के दोनों शोधों की विशेषता यह है कि वे cardiovascular disease के दो अलग चरणों को संबोधित करते हैं।पहला प्रयास बीमारी के diagnosis और early-risk detection पर है—यानी क्या रक्त में मौजूद molecular signals के जरिए हृदय रोग की प्रक्रिया जल्दी पहचानी जा सकती है।

दूसरा उपचार पर है—यदि coronary artery पहले ही संकरी हो चुकी है और stent लगाना जरूरी हो, तो क्या ऐसा scaffold बनाया जा सकता है जो अपना काम पूरा करने के बाद शरीर में स्थायी विदेशी वस्तु बनकर न रहे।यानी एक तकनीक बीमारी को पहले पकड़ने और दूसरी बीमारी के इलाज को अधिक जैव-संगत बनाने की कोशिश है।

अभी ‘हार्ट अटैक रोकने वाली मशीन’ कहना जल्दबाजी होगी

ऐसे शोधों के बारे में सबसे बड़ी सावधानी यह है कि शुरुआती प्रयोगशाला परिणाम को तत्काल clinical breakthrough न माना जाए।बायोसेंसर को मरीजों पर व्यापक परीक्षण से गुजरना होगा। यह साबित करना होगा कि वह वर्तमान lipid profile, inflammatory markers और cardiac diagnostic techniques की तुलना में अतिरिक्त और clinically useful जानकारी देता है।

इसी तरह biodegradable stent को mechanical strength, clotting, inflammation, degradation और long-term vessel response की कड़ी परीक्षाओं से गुजरना होगा।सफलता मिलने के बाद ही regulatory approval और बड़े पैमाने पर उत्पादन की दिशा खुलेगी।

दिल की बीमारी की अगली लड़ाई ‘पहले पहचान’ की

हृदय रोग चिकित्सा की सबसे बड़ी समस्या यही है कि एथेरोस्क्लेरोसिस वर्षों तक चुपचाप बढ़ सकता है। व्यक्ति सामान्य महसूस करता रहता है, जबकि उसकी धमनियों के भीतर सूजन और plaque formation जारी हो सकती है।ऐसे में भविष्य का बड़ा लक्ष्य केवल हार्ट अटैक होने के बाद artery खोलना नहीं, बल्कि उस जैविक प्रक्रिया को बहुत पहले पहचानना है जो हार्ट अटैक तक पहुंच सकती है।

IIT कानपुर का यह शोध इसी दिशा में महत्वपूर्ण प्रयोग है। यदि कम लागत वाला रक्त आधारित सेंसर विश्वसनीय रूप से शुरुआती cardiovascular risk पहचानने में सफल होता है और biodegradable 3D-printed stent सुरक्षित सिद्ध होता है तो दोनों तकनीकें हृदय रोग की जांच और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

लेकिन फिलहाल इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि अंतिम इलाज मिल जाना नहीं, बल्कि यह है कि इंजीनियरिंग, जैव-विज्ञान और चिकित्सा को जोड़कर दिल की बीमारी को पहले पहचानने और बेहतर तरीके से उपचार करने की नई दिशा पर काम आगे बढ़ रहा है।

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