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अब उंगलियों के इशारे पर बजेगा पूरा ऑर्केस्ट्रा, IIT कानपुर ने बनाया ‘स्मार्ट वर्चुअल ऑर्केस्ट्रा’
IIT Kanpur: IIT कानपुर के शोधकर्ताओं ने सेंसर आधारित स्मार्ट वर्चुअल ऑर्केस्ट्रा विकसित किया है, जो उंगलियों की टैपिंग से संगीत की गति पहचानकर तालवाद्य संगत को रियल टाइम में बदल सकता है।
IIT Kanpur
IIT Kanpur: मंच पर गायक या वादक अकेला हो और साथ देने के लिए तबला, ढोलक या पूरा तालवाद्य समूह उपलब्ध न हो, तब भी उसकी उंगलियों का इशारा संगत शुरू करा सकेगा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर (IIT Kanpur) के शोधकर्ताओं ने सेंसर आधारित ‘स्मार्ट वर्चुअल ऑर्केस्ट्रा’ विकसित किया है, जो संगीतकार की उंगलियों से दी गई ताल और गति को पहचानकर उसी के अनुरूप तत्काल तालवाद्य संगत तैयार कर सकता है। संगीतकार निर्धारित लय में उंगलियां टैप करता है, सेंसर उस संकेत को पकड़ते हैं और प्रणाली उसी समय संगत की गति तथा संरचना को बदल देती है। इस तकनीक को IIT कानपुर के विद्युत अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. विपुल अरोड़ा और शोधकर्ता हिमांशु जिंदल ने विकसित किया है और इसके लिए पेटेंट भी प्राप्त किया गया है।
इस प्रणाली की खासियत केवल पहले से रिकॉर्ड संगीत बजाना नहीं है। सामान्य ‘बैकिंग ट्रैक’ एक निश्चित गति और क्रम में चलता है। गायक या वादक यदि अपनी गति बदल दे तो पहले से रिकॉर्ड संगत अपने आप उसके अनुसार नहीं बदलती। IIT कानपुर की प्रणाली इस समस्या को हल करने का प्रयास करती है। संगीतकार अपनी उंगलियों के टैप से जिस गति या लय का संकेत देता है, सेंसर उसे डिजिटल इनपुट में बदलते हैं और प्रणाली उसी के आधार पर तालवाद्य संगत को समायोजित करती है। इस तरह कलाकार को मशीन की तय गति का पीछा करने के बजाय संगत को अपनी गति के अनुरूप नियंत्रित करने की सुविधा मिल सकती है।
उंगली का टैप बनेगा संगीत का निर्देश
तकनीक के मूल में ‘टेम्पो’ यानी संगीत की गति है। कोई संगीतकार यदि धीमी गति में प्रस्तुति शुरू करता है और कुछ समय बाद उसे तेज करना चाहता है तो सामान्य रिकॉर्डेड संगत में बदलाव करने के लिए अलग नियंत्रण की जरूरत पड़ती है। स्मार्ट वर्चुअल ऑर्केस्ट्रा में उंगलियों की टैपिंग ही नियंत्रण संकेत का काम करती है। सेंसर लगातार इन टैप के बीच का समय पढ़कर यह अनुमान लगा सकते हैं कि कलाकार किस गति में संगीत चाहता है। इसके बाद संगत उसी अनुपात में तेज या धीमी की जा सकती है।
यह विचार देखने में सरल लगता है, लेकिन वास्तविक समय में संगीतकार के संकेत और मशीन से निकलने वाले संगीत के बीच तालमेल बनाना तकनीकी रूप से कठिन है। यदि प्रणाली प्रतिक्रिया देने में अधिक समय लेती है तो संगीत की लय टूट सकती है। इसी कारण ऐसी तकनीक में संकेत पहचानने और उसके आधार पर संगीत उत्पन्न अथवा समायोजित करने की प्रक्रिया बहुत कम समय में पूरी होनी चाहिए। IIT कानपुर की विकसित प्रणाली का उद्देश्य इसी वास्तविक समय की प्रतिक्रिया को संभव बनाना है।
रिकॉर्डेड ट्रैक से अलग क्यों है यह तकनीक
आज संगीतकारों के पास इलेक्ट्रॉनिक मेट्रोनोम, ड्रम मशीन, लूपर और डिजिटल ऑडियो सॉफ्टवेयर जैसे कई साधन पहले से मौजूद हैं। इसलिए ‘वर्चुअल ऑर्केस्ट्रा’ का अर्थ यह नहीं है कि IIT कानपुर ने पहली बार इलेक्ट्रॉनिक संगत का आविष्कार किया है। इसकी नवीनता उस सेंसर आधारित संवाद में है जिसमें कलाकार अपने शारीरिक संकेत के जरिए संगत की लय को वास्तविक समय में नियंत्रित कर सकता है।
सामान्य ड्रम मशीन में उपयोगकर्ता पहले गति निर्धारित करता है। मेट्रोनोम भी चुनी हुई गति पर बीट देता रहता है। यहां कोशिश यह है कि कलाकार को बार-बार स्क्रीन, बटन या दूसरे नियंत्रण को छूने की आवश्यकता न पड़े। उंगलियों का स्वाभाविक ताल संकेत ही मशीन को बताए कि संगत किस गति में चलनी चाहिए। इससे विशेष रूप से उस स्थिति में उपयोग आसान हो सकता है जब संगीतकार के दोनों हाथ किसी वाद्य के संचालन में व्यस्त न हों अथवा वह अभ्यास के दौरान बिना किसी दूसरे व्यक्ति की सहायता के संगत चाहता हो।
अकेले अभ्यास करने वाले संगीतकारों को मिल सकता है ‘डिजिटल साथी’
इस तकनीक का व्यावहारिक उपयोग संगीत प्रशिक्षण और व्यक्तिगत अभ्यास में हो सकता है। तबला, ढोलक, मृदंग, ड्रम या दूसरे तालवाद्य बजाने वाला कलाकार उपलब्ध न होने पर गायक और वादक अक्सर इलेक्ट्रॉनिक ताल मशीन या रिकॉर्डेड ट्रैक का सहारा लेते हैं। यदि वर्चुअल संगत कलाकार की बदलती गति को समझने लगे तो अभ्यास अधिक स्वाभाविक हो सकता है। शुरुआती विद्यार्थी भी अलग-अलग गति में रियाज करते हुए अपनी जरूरत के अनुसार संगत नियंत्रित कर सकते हैं।
हालांकि ‘स्मार्ट वर्चुअल ऑर्केस्ट्रा’ नाम से यह धारणा नहीं बननी चाहिए कि मौजूदा प्रणाली अभी मानव ऑर्केस्ट्रा के प्रत्येक वाद्य, कलाकार की भावनात्मक अभिव्यक्ति और संगीत निर्देशक के सभी संकेतों को पूरी तरह बदल सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका प्रमुख काम संगीतकार के संकेतों के आधार पर तालवाद्य संगत को नियंत्रित और उत्पन्न करना है। वास्तविक ऑर्केस्ट्रा में दर्जनों वाद्य, स्वर-सामंजस्य, डायनेमिक्स, तात्कालिक रचनात्मक बदलाव और कलाकारों के बीच मानवीय संवाद होता है। इसलिए फिलहाल इसे मानव ऑर्केस्ट्रा का पूर्ण विकल्प कहने के बजाय बुद्धिमान डिजिटल संगत प्रणाली कहना अधिक सटीक होगा।
भारतीय संगीत के लिए उपयोग की बड़ी संभावना
ऐसी तकनीक भारतीय संगीत में विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है क्योंकि हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत में प्रस्तुति के दौरान लय तथा गति में परिवर्तन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शास्त्रीय संगीत में कलाकार अक्सर प्रस्तुति को धीरे-धीरे विस्तार देता है और अलग-अलग चरणों में गति बदलती है। यदि डिजिटल संगत केवल एक निश्चित बीट पर चले तो कलाकार की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। संकेत पहचानने वाली प्रणाली भविष्य में कलाकार के अनुसार अपने को ढाल सके तो इलेक्ट्रॉनिक संगत अधिक स्वाभाविक बन सकती है।
लोक संगीत, भजन, गजल और स्वतंत्र गायन में भी छोटे कलाकारों के लिए इसका उपयोग संभव है। हर अभ्यास या छोटी प्रस्तुति में पूरा संगीत दल उपलब्ध कराना आसान नहीं होता। सेंसर आधारित संगत तकनीक परिपक्व होकर व्यावसायिक उत्पाद बनती है तो कलाकार को कम उपकरणों के साथ अभ्यास और प्रस्तुति की सुविधा मिल सकती है। हालांकि वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रणाली अलग-अलग ताल, अनियमित गति परिवर्तन और संगीतकार के गलत अथवा अनजाने टैप को कितनी सटीकता से पहचानती है।
पेटेंट मिलना महत्वपूर्ण, लेकिन व्यावसायिक उत्पाद बनना अगला चरण
IIT कानपुर के प्रो. विपुल अरोड़ा और हिमांशु जिंदल द्वारा विकसित प्रणाली को पेटेंट मिलना इस शोध की तकनीकी नवीनता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन पेटेंट प्राप्त होना और तकनीक का बड़े पैमाने पर बाजार में उपलब्ध उत्पाद बन जाना अलग-अलग चरण हैं। किसी प्रयोगशाला प्रणाली को व्यावसायिक उपकरण बनाने के लिए उसकी लागत, सेंसर की विश्वसनीयता, अलग-अलग संगीत शैलियों में परीक्षण, प्रतिक्रिया समय, उपयोग में आसानी और लंबे समय तक स्थिर प्रदर्शन जैसे पहलुओं पर काम करना पड़ता है।
इस तकनीक का आगे का विकास और भी दिलचस्प हो सकता है। सेंसर से केवल उंगलियों की गति ही नहीं बल्कि हाथ के दूसरे इशारे, दबाव और अलग-अलग संकेत पहचाने जाएं तो कलाकार संगत के विभिन्न पहलुओं को बिना स्क्रीन छुए नियंत्रित कर सकता है। मशीन लर्निंग को जोड़ा जाए तो प्रणाली किसी संगीतकार की व्यक्तिगत शैली से सीखकर उसके सामान्य गति परिवर्तन को समझ सकती है। हालांकि उपलब्ध जानकारी में ऐसी सभी क्षमताओं की पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन्हें मौजूदा पेटेंट प्रणाली की विशेषता के बजाय भविष्य की तकनीकी संभावनाओं के रूप में ही देखना चाहिए।
IIT कानपुर का ‘स्मार्ट वर्चुअल ऑर्केस्ट्रा’ संगीत और इलेक्ट्रॉनिक अभियांत्रिकी के मिलन का एक दिलचस्प उदाहरण है। डिजिटल संगीत तकनीक अब तक मुख्य रूप से स्क्रीन, बटन और सॉफ्टवेयर के माध्यम से नियंत्रित होती रही है, जबकि यह प्रयोग मानव के स्वाभाविक इशारे को ही नियंत्रण माध्यम बनाने की दिशा में है। इसका सबसे महत्वपूर्ण विचार यह नहीं कि मशीन इंसानी संगीतकारों की जगह ले लेगी, बल्कि यह है कि अकेला संगीतकार भी अपनी उंगलियों से ताल का संकेत देकर ऐसी डिजिटल संगत तैयार कर सके जो उसकी गति के पीछे चले-उसे मशीन की गति के पीछे न चलना पड़े।


