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कानपुर की बंद मिलों की जमीन पर यूपी सरकार की नजर, BIC संपत्तियों को लेकर केंद्र को भेजा जाएगा प्रस्त
Kanpur News: कानपुर की बंद कपड़ा मिलों की जमीन पर नए उद्योग बसाने की तैयारी है। यूपी सरकार BIC संपत्तियों के हस्तांतरण को लेकर केंद्र से प्रस्ताव भेजने की कवायद कर रही है।
Kanpur Closed Mills (Image Credit-Social Media)
लखनऊ/कानपुर। कभी ‘पूरब का मैनचेस्टर’ कहे जाने वाले कानपुर के बीचोंबीच दशकों से बंद पड़ी कपड़ा मिलों और उनकी बेशकीमती जमीन को दोबारा औद्योगिक विकास से जोड़ने की बड़ी तैयारी शुरू हुई है। उत्तर प्रदेश सरकार ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन यानी BIC और बंद कपड़ा मिलों से जुड़ी संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेकर वहां नए उद्योग और औद्योगिक बुनियादी ढांचा विकसित करने की संभावनाओं पर काम कर रही है। शासन स्तर पर इस संबंध में दो उच्चस्तरीय बैठकें हो चुकी हैं और अब केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय को औपचारिक प्रस्ताव भेजने के निर्देश दिए गए हैं। प्रदेश के वस्त्रोद्योग मंत्री राकेश सचान के मुताबिक केंद्र के स्तर पर भी इस बारे में बातचीत हुई है और कानूनी अड़चनों का अध्ययन किया जा रहा है। हालांकि ‘राज्य सरकार BIC की संपत्तियों पर कब्जा लेगी’ कहना कानूनी रूप से अभी जल्दबाजी होगी। अधिक सटीक स्थिति यह है कि राज्य सरकार इन संपत्तियों के हस्तांतरण या अधिग्रहण का रास्ता तलाश रही है, क्योंकि BIC भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण वाली केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है और उसकी जमीन सीधे उत्तर प्रदेश सरकार की संपत्ति नहीं है। केंद्र सरकार की BIC में हिस्सेदारी 91.77 प्रतिशत दर्ज है।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कानपुर में बंद कपड़ा मिलों की जमीन शहर के ऐसे हिस्सों में है जहां अब जमीन अत्यंत मूल्यवान हो चुकी है। दशकों से बंद परिसरों में एक ओर विशाल औद्योगिक भूखंड उपलब्ध हैं तो दूसरी ओर कई संपत्तियां कानूनी विवाद, कर्ज, परिसमापन, लीज और अतिक्रमण जैसी समस्याओं में फंसी हैं। राज्य सरकार का आकलन है कि यदि इन जमीनों को कानूनी रूप से निर्विवाद बनाकर औद्योगिक इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया जा सके तो नए उद्योगों के लिए शहर के भीतर और आसपास बड़ी मात्रा में भूमि मिल सकती है। लेकिन इस प्रक्रिया में केंद्र सरकार, कपड़ा मंत्रालय, BIC, उसकी सहायक कंपनियों, परिसमापक, लेनदार बैंकों, कर्मचारियों और अदालतों से जुड़े अधिकारों का समाधान करना पड़ेगा।
लाल इमली की कहानी 150 साल पुरानी
कानपुर में BIC की पहचान सबसे अधिक लाल इमली से जुड़ी है। Cawnpore Woollen Mills की स्थापना 1876 में हुई थी और बाद में इसके उत्पाद ‘लाल इमली’ ब्रांड के नाम से देशभर में प्रसिद्ध हुए। BIC स्वयं 24 फरवरी 1920 को कंपनी के रूप में स्थापित हुई और 1981 में ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड (शेयर अधिग्रहण) कानून के जरिए भारत सरकार ने इसके निजी शेयर अपने नियंत्रण में ले लिए। कंपनी की दो प्रमुख ऊनी कपड़ा इकाइयां थीं—कानपुर की Cawnpore Woollen Mills यानी लाल इमली और पंजाब के धारीवाल की New Egerton Woollen Mills।
एक समय लाल इमली का कपड़ा, कंबल, लोई, ट्वीड और वर्दी के कपड़े सरकारी संस्थानों से लेकर आम बाजार तक प्रसिद्ध थे। लेकिन पुरानी मशीनें, लगातार घाटा, कार्यशील पूंजी की कमी और बदलते कपड़ा बाजार से मुकाबला न कर पाने के कारण कंपनी धीरे-धीरे गंभीर वित्तीय संकट में चली गई। 1992 में BIC को बीमार औद्योगिक कंपनी के रूप में BIFR के पास भेजा गया। इसके बाद इसे बचाने के लिए कई पुनरुद्धार योजनाएं बनीं, लेकिन कोई भी स्थायी रूप से सफल नहीं हो सकी।
2009 से बंद है उत्पादन
लाल इमली और धारीवाल की इकाइयों में 2009 से उत्पादन गतिविधियां बंद हैं। यह तथ्य केंद्र सरकार ने 2023 में कर्मचारियों के लंबित वेतन और सेवानिवृत्ति लाभ के भुगतान की घोषणा करते समय स्वयं दर्ज किया था। उस समय केंद्र ने BIC के 1,101 कर्मचारियों के बकाया वेतन और सेवानिवृत्ति लाभ के लिए ₹80.17 करोड़ जारी किए थे। इसमें ₹74.71 करोड़ कर्मचारियों के वेतन और सेवानिवृत्ति संबंधी बकाये तथा ₹5.46 करोड़ नियोक्ता की EPF और ESI देनदारियों के लिए थे।
इसलिए मौजूदा पहल केवल किसी हाल में बंद हुई फैक्ट्री की खाली जमीन के इस्तेमाल का सवाल नहीं है। कानपुर लगभग डेढ़ दशक से ऐसी विशाल औद्योगिक परिसंपत्तियों का बोझ ढो रहा है जिनमें उत्पादन बंद है लेकिन जमीन, कर्मचारी देनदारियां, ऋण और कानूनी विवाद जीवित हैं।
केंद्र पहले पुनरुद्धार चाहता था, अब बंद करने की सिफारिश
BIC के भविष्य की सरकारी नीति भी समय के साथ बदलती रही है। एक दौर में केंद्र सरकार लाल इमली और धारीवाल दोनों इकाइयों को पुनर्जीवित करना चाहती थी। 2011 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने BIC की पुनरुद्धार योजना को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी, लेकिन उसकी एक महत्वपूर्ण शर्त उत्तर प्रदेश में कंपनी की जमीन से जुड़ी अनुमति थी। BIC ने अपनी आठ लीज वाली संपत्तियों को फ्रीहोल्ड कराने के लिए कानपुर नगर के जिलाधिकारी के समक्ष आवेदन भी किया था।
इससे भी पहले 2002 की पुनर्वास योजना में सरकारी ऋण को इक्विटी में बदलने, ब्याज माफ करने, SBI और दूसरे संस्थानों के बकाये का एकमुश्त समाधान, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और अतिरिक्त जमीन बेचकर पुनरुद्धार के लिए धन जुटाने जैसी व्यवस्थाएं थीं। उस समय भी उत्तर प्रदेश सरकार से लीज वाली जमीन को न्यूनतम लागत पर फ्रीहोल्ड में बदलने की अपेक्षा की गई थी।
लेकिन पुनरुद्धार सफल नहीं हुआ। दिसंबर 2025 में लोकसभा में केंद्र सरकार ने बताया कि नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की अध्यक्षता वाले अधिकारियों के समूह ने 27 जनवरी 2022 को BIC को बंद करने की सिफारिश की थी। इसी समूह ने 4 अप्रैल 2022 को National Textile Corporation यानी NTC और उसकी 23 मिलों को बंद करने की भी सिफारिश की। इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश की पहल उस समय सामने आई है जब केंद्र के स्तर पर BIC को पुनर्जीवित करने के बजाय बंद करने की सिफारिश पहले से मौजूद है।
₹4,000 करोड़ की देनदारी के दावे की अलग पुष्टि जरूरी
राज्य सरकार की बैठकों से सामने आई जानकारी में बंद मिलों पर करीब ₹4,000 करोड़ की देनदारियां होने की बात कही गई है। बताया गया है कि इसमें बड़ा हिस्सा पुराने कर्मचारियों की देनदारियों का है, जबकि सरकारी विभागों और बैंकों के कंसोर्टियम की रकम भी बकाया है। यह आंकड़ा मौजूदा राज्यस्तरीय आकलन के रूप में महत्वपूर्ण है, लेकिन उपलब्ध केंद्रीय सार्वजनिक दस्तावेजों में BIC की वर्तमान देनदारियों का ठीक ₹4,000 करोड़ का समेकित आंकड़ा स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं मिला। इसलिए इसे फिलहाल शासन स्तर पर सामने आए अनुमान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
देनदारियों की वास्तविक स्थिति पता लगाना संपत्ति हस्तांतरण से पहले सबसे महत्वपूर्ण काम होगा। यदि किसी संपत्ति पर बैंक का वैध भार है, कर्मचारी का वैधानिक बकाया है, अदालत का आदेश है या वह परिसमापन प्रक्रिया का हिस्सा है तो राज्य सरकार केवल प्रशासनिक निर्णय लेकर उसे उद्योग लगाने के लिए किसी तीसरे पक्ष को नहीं दे सकती। पहले संबंधित अधिकारों और दावों का निस्तारण आवश्यक होगा।
BIC और उसकी सहायक मिलों को एक समझना भी गलत
कानपुर की बंद मिलों के मामले में एक और महत्वपूर्ण कानूनी अंतर है। लाल इमली सीधे BIC की इकाई है, जबकि Elgin Mills Company Limited और Cawnpore Textiles Limited अलग सहायक कंपनियां रही हैं। केंद्र सरकार के पुराने दस्तावेजों में BIC की तीन सहायक कंपनियां Elgin Mills Company Limited, Cawnpore Textiles Limited और Brushware Limited दर्ज हैं।
इस अंतर का सीधा असर जमीन पर पड़ेगा। किसी BIC संपत्ति के हस्तांतरण की कानूनी प्रक्रिया और परिसमापन में जा चुकी उसकी सहायक कंपनी की संपत्ति के हस्तांतरण की प्रक्रिया एक जैसी नहीं होगी। इसलिए कानपुर की ‘सभी बंद मिलों की जमीन’ को एक ही स्वामित्व वाली जमीन समझना कानूनी रूप से सही नहीं है।
एल्गिन मिल की जमीन पर अदालत का भी अधिकार
Elgin Mills Company Limited का मामला विशेष रूप से जटिल है। कंपनी की स्थापना 1864 में हुई थी और इसकी दो इकाइयां Elgin No. 1 तथा Elgin No. 2 थीं। लगातार घाटे के बाद BIFR ने 1994 में कंपनी को बंद करने की सिफारिश की, अपीलीय प्राधिकरण ने 1997 में इसे बरकरार रखा और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1999 में कंपनी को बंद करने का आदेश देकर आधिकारिक परिसमापक नियुक्त किया। कपड़ा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार Elgin Mills की चल संपत्तियां आधिकारिक परिसमापक द्वारा बेची जा चुकी हैं और मंत्रालय ने जमीन वापस लेने के लिए कंपनी अदालत में आवेदन किया था। मामला अदालत में लंबित बताया गया है।
यही कारण है कि एल्गिन मिल की जमीन को राज्य सरकार सीधे BIC से लेकर इस्तेमाल नहीं कर सकती। पहले यह तय होना होगा कि जमीन का कानूनी अधिकार किसके पास है, परिसमापन में लेनदारों का दावा कितना है और कंपनी अदालत क्या अनुमति देती है।
एक लेनदार की NOC ने भी रोका मामला
केंद्र की हाल की रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि BIC ने सुरक्षित लेनदारों की देनदारियां निपटाने की दिशा में कार्रवाई की, लेकिन एक सुरक्षित लेनदार Kotak Mahindra Bank ने अपने हिसाब से बकाया राशि को लेकर अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं दिया था। मंत्रालय ने इसे सुलझाने की प्रक्रिया जारी होने की जानकारी दी थी।
यह विवरण बताता है कि मिल की जमीन का सवाल केवल केंद्र और राज्य सरकार के बीच सहमति से नहीं सुलझेगा। किसी संपत्ति पर सुरक्षित लेनदार का कानूनी अधिकार होने पर उसके दावे का समाधान करना होगा। इसी तरह कर्मचारियों, भविष्य निधि, राज्य और स्थानीय निकायों के कर तथा दूसरे वैधानिक बकाये का क्रम भी कानून के अनुसार निर्धारित होगा।
NTC की मिलें अलग मामला
कानपुर में BIC के अलावा National Textile Corporation यानी NTC की भी बंद मिलें और जमीनें हैं। राज्य सरकार इन्हें भी शहर के औद्योगिक पुनर्विकास की संभावित भूमि के रूप में देख रही है, लेकिन NTC और BIC दो अलग केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम हैं। NTC की संपत्ति को BIC की संपत्ति मानकर एक साथ हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। प्रत्येक कंपनी की परिसंपत्ति, देनदारी और कानूनी स्थिति का अलग परीक्षण होगा।
केंद्र सरकार ने दिसंबर 2025 में संसद में बताया था कि कोविड लॉकडाउन के बाद NTC की कुछ मिलों में उत्पादन दोबारा शुरू करने की कोशिश हुई, लेकिन 2021 के बाद संचालन टिक नहीं सका। अधिकारियों के समूह ने 2022 में NTC और उसकी 23 मिलों को बंद करने की सिफारिश की। इस पृष्ठभूमि में उत्तर प्रदेश सरकार के लिए अवसर यह है कि यदि केंद्र इन बंद औद्योगिक संपत्तियों का निस्तारण करता है तो कानपुर की उपयोगी जमीन को अनियोजित रियल एस्टेट में जाने के बजाय औद्योगिक पुनर्विकास से जोड़ा जा सके।
कानपुर के बीचोंबीच जमीन, इसलिए कीमत से अधिक रणनीतिक महत्व
इन मिलों की जमीन की वास्तविक ताकत केवल उसका बाजार मूल्य नहीं है। इनमें से कई संपत्तियां ऐसे शहर में स्थित हैं जहां सड़क, रेलवे, बिजली, श्रमिक आबादी, बाजार और पुराना औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र पहले से मौजूद है। नई औद्योगिक परियोजना के लिए दूरस्थ क्षेत्र में भूमि लेकर सड़क, बिजली और दूसरी सुविधाएं शून्य से विकसित करने की तुलना में पुराने औद्योगिक क्षेत्रों का पुनर्विकास कई परिस्थितियों में अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
कानपुर के पास चमड़ा, वस्त्र, इंजीनियरिंग, प्लास्टिक, रसायन, रक्षा उत्पादन और छोटे-मझोले उद्योगों की पुरानी औद्योगिक क्षमता है। डिफेंस कॉरिडोर के कानपुर नोड और सड़क-एक्सप्रेसवे संपर्क के विस्तार ने भी शहर की औद्योगिक उपयोगिता बढ़ाई है। इसलिए राज्य सरकार बंद मिलों की भूमि को केवल आवासीय या व्यावसायिक भूखंडों में बदलने के बजाय नए उद्योगों के लिए इस्तेमाल करने पर जोर दे रही है।
अतिक्रमण रोकना भी बड़ी चुनौती
वर्षों से बंद पड़े विशाल औद्योगिक परिसरों की एक समस्या अतिक्रमण और संपत्ति सुरक्षा भी है। उत्पादन बंद होने के बाद नियमित औद्योगिक गतिविधि समाप्त हो जाती है, कर्मचारी कम होते जाते हैं और खाली जमीन पर अवैध कब्जे का खतरा बढ़ता है। जितना अधिक समय किसी संपत्ति का भविष्य अनिश्चित रहता है, उसके पुनर्विकास की लागत और कानूनी जटिलता उतनी ही बढ़ सकती है।
इसीलिए शासन की मौजूदा कवायद में जमीन के मालिकाना अधिकार के साथ वास्तविक कब्जे, भूमि अभिलेख, लीज की शर्तें, न्यायालयी मुकदमे और अतिक्रमण की स्थिति का भी परीक्षण जरूरी होगा। किसी जमीन का कागज पर BIC या उसकी सहायक कंपनी के नाम होना और जमीन का वास्तविक रूप से निर्विवाद कब्जे में होना अलग-अलग बातें हैं।
पहले भी जमीन बेचकर मिल बचाने की बनी थी योजना
दिलचस्प तथ्य यह है कि BIC की जमीन को लेकर यह पहली सरकारी कवायद नहीं है। दो दशक पहले केंद्र सरकार ने ठीक उलटी रणनीति अपनाई थी—तब अतिरिक्त जमीन बेचकर प्राप्त रकम से लाल इमली और धारीवाल को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई गई थी। 2002 की पुनर्वास योजना में अतिरिक्त भूमि बिक्री से ₹124.51 करोड़ जुटाने का अनुमान था। उत्तर प्रदेश सरकार ने बाद में छह लाख वर्गमीटर से अधिक जमीन को फ्रीहोल्ड करने और अतिरिक्त जमीन बेचने की अनुमति देने की दिशा में कदम भी उठाया था, लेकिन शर्त यह थी कि पैसा बंद मिलों के पुनरुद्धार में इस्तेमाल होगा।
अब परिस्थितियां उलट चुकी हैं। मिल को जमीन बेचकर बचाने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है और चर्चा यह है कि बंद मिलों की जमीन को ही नए औद्योगिक विकास का आधार बनाया जाए।
सरकार के सामने चार बड़ी कानूनी गांठें
मौजूदा प्रक्रिया में सबसे पहले प्रत्येक जमीन का वास्तविक स्वामित्व और लीज-फ्रीहोल्ड स्थिति स्पष्ट करनी होगी। दूसरे, कर्मचारियों, बैंकों, सरकारी विभागों और दूसरे लेनदारों की वास्तविक देनदारी तय करनी होगी। तीसरे, एल्गिन जैसी परिसमापनाधीन कंपनियों की संपत्तियों पर अदालत और आधिकारिक परिसमापक के अधिकारों का समाधान आवश्यक होगा। चौथे, केंद्र सरकार को यह तय करना होगा कि BIC अथवा NTC की संपत्ति उत्तर प्रदेश सरकार को किस कानूनी और वित्तीय व्यवस्था के तहत हस्तांतरित की जा सकती है—बिक्री, हस्तांतरण, दीर्घकालीन लीज या किसी संयुक्त पुनर्विकास मॉडल के जरिए।
इसी वजह से वस्त्रोद्योग मंत्री राकेश सचान ने भी स्वीकार किया है कि कानूनी अड़चनों का अध्ययन किया जा रहा है। केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय इस प्रक्रिया में निर्णायक होगा क्योंकि BIC उसी के प्रशासनिक नियंत्रण वाला केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम है। केवल उत्तर प्रदेश सरकार की इच्छा से मालिकाना अधिकार स्थानांतरित नहीं हो सकता।
‘टेकओवर’ से ज्यादा बड़ा सवाल—जमीन का होगा क्या?
यदि अंततः केंद्र और राज्य के बीच समझौता हो जाता है तो अगला प्रश्न इन संपत्तियों के इस्तेमाल का होगा। कानपुर में बंद मिलों की जमीन इतनी महत्वपूर्ण है कि उसका उपयोग केवल संपत्ति बेचकर राजस्व जुटाने के लिए करना और उसे औद्योगिक पुनरुद्धार के लिए नियोजित करना दो बिल्कुल अलग विकास मॉडल होंगे। राज्य सरकार का मौजूदा रुख दूसरे विकल्प की ओर दिखाई देता है—जमीन मिले तो वहां नए उद्योग स्थापित किए जाएं।
इसके लिए एक समग्र औद्योगिक पुनर्विकास योजना की आवश्यकता होगी। पुरानी मिलों की कुछ इमारतें ऐतिहासिक औद्योगिक विरासत का हिस्सा भी हैं। दुनिया के कई पुराने औद्योगिक शहरों में ऐसे परिसरों का पुनर्विकास करते समय विरासत भवनों को संरक्षित रखते हुए बाकी जमीन पर आधुनिक उद्योग, नवाचार केंद्र, व्यावसायिक क्षेत्र और सार्वजनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं। कानपुर में भी औद्योगिक विकास और शहर की ऐतिहासिक पहचान के बीच संतुलन का सवाल उठेगा।
कानपुर के लिए बंद मिलें बोझ से अवसर बन सकती हैं
कानपुर का औद्योगिक इतिहास इन्हीं मिलों के आसपास विकसित हुआ था। लाल इमली, एल्गिन और दूसरी कपड़ा मिलों ने कभी हजारों परिवारों को रोजगार दिया और शहर के मोहल्लों, बाजारों तथा श्रमिक संस्कृति तक को आकार दिया। इनके बंद होने से केवल फैक्ट्रियां नहीं रुकीं, शहर के पुराने औद्योगिक ढांचे का एक बड़ा हिस्सा निष्क्रिय हो गया। अब यदि इन्हीं जमीनों पर आधुनिक विनिर्माण और रोजगार पैदा करने वाले उद्योग आते हैं तो यह पुराने औद्योगिक शहर के पुनरुत्थान का अवसर बन सकता है।
लेकिन मौजूदा स्थिति को ‘राज्य सरकार ने BIC की जमीन ले ली’ समझना गलत होगा। अभी प्रक्रिया तैयारी और प्रस्ताव के स्तर पर है। BIC केंद्र सरकार के नियंत्रण वाली कंपनी है, उसकी कुछ संपत्तियां और सहायक कंपनियां अदालतों तथा परिसमापन प्रक्रिया से जुड़ी हैं, लेनदारों के दावे मौजूद हैं और कर्मचारियों सहित विभिन्न पक्षों की देनदारियां सुलझानी हैं। ₹4,000 करोड़ की कुल देनदारी का मौजूदा दावा भी अंतिम आधिकारिक समेकित लेखे से पुष्ट होना बाकी है।
उत्तर प्रदेश सरकार की पहल फिर भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार बंद मिलों की जमीन को केवल पुराने कर्ज और विवाद की समस्या के बजाय कानपुर के अगले औद्योगिक विकास के संभावित संसाधन के रूप में व्यवस्थित ढंग से देखने की कोशिश हो रही है। लाल इमली और दूसरी मिलों को पुराने स्वरूप में दोबारा चलाने की कई कोशिशें विफल हो चुकी हैं और केंद्र के अधिकारियों का समूह BIC तथा NTC को बंद करने की सिफारिश भी कर चुका है। ऐसे में अब निर्णायक सवाल यह नहीं रह गया है कि डेढ़ सदी पुराने कारखानों की मशीनें फिर कब चलेंगी, बल्कि यह है कि उनकी हजारों करोड़ रुपये मूल्य की जमीन और औद्योगिक विरासत कानपुर में अगली पीढ़ी के उद्योग और रोजगार पैदा करने में कैसे इस्तेमाल होगी।


