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Lakhimpur Kheri News: तिकुनिया हिंसा केस में ट्रायल जज पर गंभीर आरोप, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC से मांगी रिपोर्ट
Lakhimpur Kheri News: लखीमपुर खीरी तिकुनिया हिंसा केस में ट्रायल जज पर लगाए गए आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट मांगी। यूपी से वरिष्ठ अभियोजक पर भी जवाब तलब।
Lakhimpur Kheri Violence Case (Image Credit-Social Media)
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में अक्टूबर 2021 में हुई तिकुनिया हिंसा के बहुचर्चित मुकदमे की सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गंभीर सवाल उठे हैं। पीड़ित पक्ष की ओर से मौजूदा पीठासीन न्यायिक अधिकारी के आचरण, एक महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करने, दूसरे विशेष कानूनों से जुड़े मुकदमों को कथित रूप से अपने पास मंगाने और मुख्य मुकदमे के बीच सरकारी अभियोजक बदलकर बेहद कम अनुभव वाले वकील को जिम्मेदारी दिए जाने जैसे आरोप लगाए गए। इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने आवेदन इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से आरोपों को देखने, आवश्यक होने पर सुधारात्मक कार्रवाई करने और कार्रवाई की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को भेजने को कहा गया है। मामले पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी ट्रायल जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही नहीं माना है और न ही न्यायिक अधिकारी को मुकदमे से हटाने का आदेश दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीड़ितों और प्रत्यक्षदर्शी की ओर से ये आरोप अदालत के सामने रखे हैं। शीर्ष अदालत ने उनकी सत्यता की जांच का प्रश्न इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर छोड़ा है, क्योंकि अधीनस्थ न्यायपालिका पर प्रशासनिक नियंत्रण संबंधित हाईकोर्ट का होता है। जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान इसी संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिति की ओर ध्यान दिलाया। इसलिए फिलहाल यह न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आरोपों और उनकी जांच का मामला है, किसी आरोप के सिद्ध हो जाने का नहीं।
बीमार प्रत्यक्षदर्शी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट से शुरू हुआ विवाद
सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण ने बताया कि मुकदमे के एक प्रत्यक्षदर्शी शेर सिंह को ट्रायल कोर्ट में गवाही के लिए उपस्थित होना था, लेकिन बीमारी के कारण वह तय तारीख पर नहीं पहुंच सका। उनके मुताबिक गवाह ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज कराया था और उसकी बीमारी से संबंधित चिकित्सकीय पर्चा भी अदालत के सामने दिया गया था। इसके बावजूद पीठासीन अधिकारी ने उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। भूषण ने इसे लेकर कड़ी आपत्ति जताई और न्यायिक अधिकारी के आचरण पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इसके बाद पुलिस गवाह के माता-पिता के पास पहुंची और उन पर दबाव पड़ा, जिसके बाद गवाह ने अदालत में आने से हिचक दिखाई। ये सभी बातें पीड़ित पक्ष की ओर से लगाए गए आरोप हैं और अभी इनकी स्वतंत्र जांच होनी बाकी है।
इस मुद्दे पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शुरुआत में न्यायिक अधिकारी के सामने मौजूद दूसरी परिस्थिति की ओर भी ध्यान दिलाया। सुप्रीम कोर्ट स्वयं तिकुनिया मामले के ट्रायल को तेजी से पूरा करने के निर्देश देता रहा है। ऐसे में यदि बुलाया गया गवाह अदालत में उपस्थित नहीं होता तो ट्रायल जज से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह मुकदमे को अनावश्यक रूप से लटकने न दे। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक तरफ शीर्ष अदालत मुकदमा शीघ्र पूरा करने के लिए कहती है और दूसरी तरफ अभियोजन का गवाह उपस्थित नहीं होता तो न्यायिक अधिकारी पर भी दबाव रहता है। इसलिए केवल गैर-जमानती वारंट जारी होने को अपने आप न्यायिक दुराचार का प्रमाण नहीं माना गया।
भूषण का जवाब था कि यहां सामान्य रूप से अनुपस्थित रहने वाला गवाह नहीं था बल्कि बीमारी के कारण उपस्थित न हो पाने की सूचना और चिकित्सकीय प्रमाण दिया गया था। यही कारण है कि उन्होंने वारंट जारी किए जाने के तरीके पर सवाल उठाया। इस तरह सुप्रीम कोर्ट के सामने एक तरफ पीड़ित पक्ष की गंभीर शिकायत और दूसरी तरफ तेजी से ट्रायल कराने के लिए न्यायिक अधिकारी की जिम्मेदारी—दोनों पहलू सामने आए।
‘दूसरे मुकदमे अपने पास मंगाए और फिर जमानत या राहत दी’
पीड़ित पक्ष ने न्यायिक अधिकारी के खिलाफ केवल तिकुनिया मामले तक सीमित शिकायत नहीं की। भूषण ने आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारी ने NDPS Act और SC/ST (Prevention of Atrocities) Act से जुड़े कई मुकदमे दूसरी अदालतों से अपने पास मंगाए और उनमें आरोपियों को जमानत अथवा दूसरी राहत दी, जबकि कुछ मामलों में आरोपी बरी भी हुए। उनका तर्क था कि विशेष कानूनों से जुड़े मामलों के लिए निर्धारित न्यायिक व्यवस्था होती है और अधिकारी के पास इस तरह मुकदमे अपने पास स्थानांतरित करने का अधिकार था या नहीं, इसकी जांच आवश्यक है।
यहां भी सावधानी जरूरी है। किसी आरोपी को जमानत देना या बरी करना अपने आप न्यायिक अनियमितता का प्रमाण नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि संबंधित मुकदमे न्यायिक अधिकारी के पास किस प्रशासनिक या कानूनी आदेश से आए, क्या उन्हें अपने न्यायालय में लेने का अधिकार था और उन मामलों में अपनाई गई प्रक्रिया कानून के अनुरूप थी या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों पर स्वयं तथ्यात्मक निष्कर्ष देने के बजाय इन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के परीक्षण के लिए भेजना उचित समझा है।
अप्रैल में बदले थे ट्रायल जज
सुनवाई में यह तथ्य भी सामने आया कि पहले तिकुनिया मामले की सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी 15 अप्रैल को सेवानिवृत्त हो गए थे और मौजूदा न्यायिक अधिकारी ने अगले दिन मुकदमे की जिम्मेदारी संभाली। पीड़ित पक्ष के मुताबिक इसके तुरंत बाद 17 अप्रैल को प्रत्यक्षदर्शी शेर सिंह की गवाही निर्धारित थी और बीमारी के कारण उसकी अनुपस्थिति पर गैर-जमानती वारंट जारी हुआ। इसलिए शिकायत का बड़ा हिस्सा नए पीठासीन अधिकारी के कार्यभार संभालने के बाद ट्रायल में हुई घटनाओं से जुड़ा है।
भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से संबंधित न्यायिक अधिकारी को इस मुकदमे से हटाने की मांग भी की। उनका आरोप था कि यदि वर्तमान व्यवस्था जारी रही तो निष्पक्ष ट्रायल प्रभावित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यह मांग स्वीकार करके जज बदलने का आदेश नहीं दिया। जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि अधीनस्थ न्यायिक अधिकारी पर प्रशासनिक नियंत्रण इलाहाबाद हाईकोर्ट का है, इसलिए शिकायत का परीक्षण पहले वहीं होना चाहिए। यही कारण है कि आवेदन हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया है।
अभियोजक बदलने पर सुप्रीम कोर्ट की ज्यादा स्पष्ट चिंता
सुनवाई का दूसरा गंभीर पहलू सरकारी अभियोजन से जुड़ा था। भूषण ने अदालत को बताया कि मुकदमे के बीच पहले सरकारी अभियोजक को बदल दिया गया और उनकी जगह ऐसे नए अभियोजक को लगाया गया जिसके पास कथित तौर पर केवल चार महीने का अनुभव था। इतने संवेदनशील और जटिल सत्र मुकदमे में अत्यंत कम अनुभव वाले अभियोजक की नियुक्ति पर पीठ ने सवाल उठाए। 
जस्टिस बागची ने अभियोजन की कार्यप्रणाली को लेकर भी चिंता जताई। अदालत के सामने यह बात आई कि कुछ महत्वपूर्ण गवाहों को अभियोजन ने छोड़ दिया और उनसे गवाही नहीं कराई गई। पीठ ने सवाल किया कि जिन गवाहों को बुलाया गया था, उनमें से तीन को आखिर क्यों नहीं जांचा गया। जस्टिस बागची ने संकेत दिया कि महत्वपूर्ण गवाहों को बिना पर्याप्त कारण छोड़ देना निष्पक्ष अभियोजन की दृष्टि से चिंताजनक हो सकता है। 
इसी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि लखीमपुर खीरी जिले में उपलब्ध सबसे वरिष्ठ और अनुभवी सरकारी अभियोजक, जिसे सत्र न्यायालय के गंभीर मुकदमे चलाने का पर्याप्त अनुभव हो, उसकी पहचान की जाए। राज्य सरकार को दो सप्ताह में हलफनामा देकर अदालत को बताना है कि किस अनुभवी अभियोजक को तिकुनिया मुकदमे की जिम्मेदारी दी जा सकती है। यानी न्यायिक अधिकारी से जुड़े आरोपों को हाईकोर्ट के पास भेजने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन की गुणवत्ता सुधारने के लिए राज्य सरकार से सीधे कदम उठाने को कहा है।
साइट प्लान गायब होने का भी आरोप
सुप्रीम कोर्ट में पीड़ित पक्ष ने एक और गंभीर दावा किया कि तिकुनिया हिंसा से संबंधित महत्वपूर्ण साइट प्लान अदालत के रिकॉर्ड से गायब है। भूषण ने कहा कि ऐसे दस्तावेज के उपलब्ध न होने की स्थिति में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का ठीक से पालन नहीं किया गया। साइट प्लान किसी आपराधिक मुकदमे में घटनास्थल, वाहनों की स्थिति, व्यक्तियों की मौजूदगी और घटनाक्रम को समझने में महत्वपूर्ण दस्तावेज हो सकता है।
लेकिन इस दावे को भी स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। अभी यह पीड़ित पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा गया आरोप है। यह स्पष्ट होना बाकी है कि मूल साइट प्लान वास्तव में रिकॉर्ड से गायब है, उसकी प्रमाणित प्रति उपलब्ध है या नहीं और यदि कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है तो वह कब और किन परिस्थितियों में अनुपलब्ध हुआ। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सामने भेजे गए आवेदन की जांच में यह मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोप लगाने के तरीके पर भी जताई असहमति
पूरी सुनवाई केवल न्यायिक अधिकारी की आलोचना तक सीमित नहीं रही। शीर्ष अदालत ने पीड़ित पक्ष की ओर से न्यायिक अधिकारी पर सीधे गंभीर आरोप लगाए जाने के तरीके को भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट स्वयं मुकदमे को शीघ्र पूरा कराने की निगरानी कर रहा है और ऐसे में ट्रायल कोर्ट को गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने पड़ सकते हैं। अदालत ने इस संभावना को खुला रखा कि समस्या का एक हिस्सा अभियोजन की कार्यप्रणाली से जुड़ा हो सकता है, विशेष रूप से तब जब अभियोजक बुलाए गए गवाहों की गवाही कराने से पीछे हटता है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट का मंगलवार का आदेश किसी एक पक्ष के आरोपों पर मुहर नहीं है। अदालत ने दो अलग रास्ते अपनाए हैं—न्यायिक अधिकारी से संबंधित आरोपों की जांच इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश करेंगे, जबकि सरकारी अभियोजन की कमजोरी को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को वरिष्ठ और अनुभवी अभियोजक की व्यवस्था करनी होगी। इससे ट्रायल की निष्पक्षता के साथ उसे अनावश्यक रूप से लंबा न खिंचने देने की दोनों चिंताओं को संतुलित करने की कोशिश दिखाई देती है।
3 अक्टूबर 2021 को तिकुनिया में क्या हुआ था
लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में 3 अक्टूबर 2021 को किसान आंदोलन के दौरान हुई हिंसा में कुल आठ लोगों की मौत हुई थी। किसान उस समय उत्तर प्रदेश के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के क्षेत्र में प्रस्तावित कार्यक्रम का विरोध कर रहे थे। आरोप है कि प्रदर्शन कर रहे किसानों के बीच से गुजरते वाहनों के काफिले ने चार किसानों को कुचल दिया। इसके बाद हुई हिंसा में दो भाजपा कार्यकर्ता, एक चालक और एक स्थानीय पत्रकार की भी मौत हो गई थी।
इस मामले में पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा उर्फ मोनू प्रमुख आरोपियों में हैं। उनके और अन्य आरोपियों के खिलाफ हत्या, आपराधिक साजिश और संबंधित अपराधों के आरोपों पर मुकदमा चल रहा है। आरोपियों ने आरोपों से इनकार किया है और उनका दोष या निर्दोषता अंततः ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर तय होनी है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले भी मुकदमे की प्रगति और गवाहों की सुरक्षा तथा सुनवाई की गति पर नजर रखता रहा है।
अब हाईकोर्ट की रिपोर्ट होगी महत्वपूर्ण
मंगलवार के आदेश के बाद अब दो स्तरों पर कार्रवाई होगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीड़ित पक्ष के आवेदन में लगाए गए आरोपों को देखेंगे और आवश्यक समझे जाने पर प्रशासनिक जांच अथवा अन्य सुधारात्मक कदम उठा सकते हैं। उसके बाद कार्रवाई की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी जाएगी। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सरकार को वरिष्ठ और अनुभवी सरकारी अभियोजक की पहचान कर दो सप्ताह में शीर्ष अदालत को इसकी जानकारी देनी है। 
इस पूरे घटनाक्रम में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति यही है कि तिकुनिया हिंसा केस के ट्रायल जज के खिलाफ गंभीर आरोप जरूर लगे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सिद्ध नहीं माना है। उसने आरोपों की प्रशासनिक जांच का जिम्मा उस इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सौंपा है जिसके अधीन संबंधित न्यायिक अधिकारी आते हैं। वहीं सरकारी अभियोजन के अनुभव और कुछ गवाहों को छोड़ने को लेकर शीर्ष अदालत की चिंता अधिक प्रत्यक्ष है और इसीलिए उसने राज्य सरकार से वरिष्ठ अभियोजक लगाने को कहा है। अब हाईकोर्ट की सीलबंद रिपोर्ट और नए अभियोजक के बारे में उत्तर प्रदेश सरकार का जवाब तय करेगा कि पांच साल पुराने तिकुनिया हिंसा मुकदमे की आगे की सुनवाई किस व्यवस्था में चलेगी।


