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Lakhimpur News: कस्ता के पास प्राचीन बाबा तुरंतनाथ धाम बदहाल, अभाव में घट रही श्रद्धालुओं की संख्या
Lakhimpur News: लखीमपुर में कस्ता के पास प्राचीन बाबा तुरंतनाथ धाम बदहाली का शिकार है। रास्ते और सुविधाओं के अभाव में यहां श्रद्धालुओं की संख्या लगातार घट रही है।
Lakhimpur News(Photo-Social Media)
Lakhimpur News: किसी गांव की पहचान सिर्फ उसकी गलियों, खेतों और आबादी से नहीं होती। उसकी पहचान वहां की परंपराओं, लोककथाओं और उन धार्मिक स्थलों से भी होती है, जिन्हें पीढ़ियां अपनी आस्था के साथ संजोकर रखती हैं। कस्ता के निकट ग्राम गाजीपुर में स्थित बाबा तुरंतनाथ मंदिर भी ऐसी ही एक धार्मिक विरासत है, जो कभी आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हुआ करता था। लेकिन आज यह प्राचीन धाम अपनी पुरानी पहचान और रौनक खोता नजर आ रहा है।
मितौली तहसील क्षेत्र की ग्राम पंचायत अछरोला के मजरा गाजीपुर में स्थित इस मंदिर को लेकर ग्रामीणों के बीच कई पुरानी मान्यताएं प्रचलित हैं। मंदिर में स्थापित शिवलिंग को लेकर सबसे चर्चित मान्यता यह है कि वह धरती के भीतर काफी गहराई तक धंसा हुआ है। ग्रामीण बताते हैं कि अतीत में इसे बाहर निकालने का प्रयास किया गया तो शिवलिंग से दूध और रक्त निकलने की बात सामने आई। इसी लोकविश्वास के चलते श्रद्धालु बाबा तुरंतनाथ को चमत्कारी और सिद्ध स्थल मानते हैं।
कुएं की खुदाई से जुड़ी है मंदिर की कहानी
बाबा तुरंतनाथ धाम की कहानी भी अपने आप में रोचक है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार जिस स्थान पर आज मंदिर है, वहां कभी कुएं की खुदाई की जा रही थी। इसी दौरान शिवलिंग मिलने की बात कही जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि उस समय शिवलिंग से दूध और रक्त जैसी धार निकलने की मान्यता के बाद लोगों ने इसे दैवीय संकेत माना और उसी स्थान पर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। धीरे-धीरे यहां मंदिर का निर्माण हुआ और यह स्थान बाबा तुरंतनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
मन्नत पूरी हुई तो कराया मंदिर का जीर्णोद्धार
मंदिर से जुड़ी एक अन्य स्थानीय कथा प्रीतम सिंह नामक व्यक्ति से जुड़ी है। बताया जाता है कि ग्राम बेहखा निवासी प्रीतम सिंह कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। उन्होंने बाबा तुरंतनाथ के सामने मनोकामना रखी कि यदि उनका रोग ठीक हो गया तो वह मंदिर का जीर्णोद्धार कराएंगे। स्थानीय लोगों के अनुसार उनकी मनोकामना पूरी हुई और उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार में योगदान दिया। इसके बाद धाम की धार्मिक गतिविधियों और मेले की परंपरा को और विस्तार मिलने की बात कही जाती है। हालांकि इन घटनाओं की ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध अभिलेखों से नहीं होती और इन्हें स्थानीय लोकविश्वास के रूप में ही देखा जाता है।
एक ही परिसर में शिव, ब्रह्मा और नवदुर्गा की आस्था
बाबा तुरंतनाथ मंदिर की खासियत यह भी बताई जाती है कि यहां भगवान शिव के साथ ब्रह्मा जी और नवदुर्गा की पूजा की परंपरा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार हरिचरण गिरी हिंगलाज से नवदुर्गा और ब्रह्मा जी की प्रतिमाएं पैदल लेकर आए थे। मंदिर में इनकी पूजा आज भी किए जाने की बात ग्रामीण बताते हैं।
साधुओं की तपस्या की गवाही देती हैं समाधियां
मंदिर परिसर के आसपास बनी समाधियां यहां की संत परंपरा की कहानी कहती हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां मंशा गिरी, हरिचरण गिरी, निमधारी बाबा और साधु गिरी की समाधियां मौजूद हैं। ग्रामीणों के बीच प्रचलित कथाओं के अनुसार इन संतों ने अपना जीवन कठोर साधना में बिताया। मंशा गिरी के बारे में भस्म सेवन, हरिचरण गिरी के बारे में फलाहार और निमधारी बाबा के बारे में नीम की पत्तियों व रस के सेवन की मान्यताएं प्रचलित हैं। साधु गिरी को लेकर भी ग्रामीणों में कई चमत्कारिक कथाएं सुनने को मिलती हैं। मंदिर के सामने उनकी समाधि आज भी मौजूद बताई जाती है।
कभी मेले में गूंजता था मिट्टी के भोंपू का शोर
बाबा तुरंतनाथ धाम का मेला कभी ग्रामीण संस्कृति का बड़ा हिस्सा हुआ करता था। कार्तिक पूर्णिमा और दशहरा के अवसर पर यहां मेले लगने की परंपरा रही है। महाशिवरात्रि पर भी श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती थी। बुजुर्ग बताते हैं कि पुराने समय में मेले की एक अलग ही पहचान थी। मिट्टी के भोंपू और पारंपरिक वाद्य यंत्र बच्चों और युवाओं के आकर्षण का केंद्र होते थे। आसपास के गांवों से लोग बैलगाड़ियों और अन्य साधनों से परिवार सहित मेले में पहुंचते थे। आज वही मेला पहले जैसी भीड़ और रौनक के लिए तरस रहा है।
पुल के अभाव ने कम कर दी श्रद्धालुओं की आवाजाही
धाम की वर्तमान स्थिति की सबसे बड़ी समस्या आवागमन को लेकर बताई जाती है। ग्रामीणों के अनुसार सरायन नदी पर स्थायी पुल नहीं होने से गाजीपुर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। बरसात और नदी में पानी बढ़ने के दौरान समस्या और गंभीर हो जाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आवागमन की सुविधा बेहतर होने पर न केवल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ सकती है, बल्कि इस क्षेत्र के पारंपरिक मेले को भी फिर से पुरानी पहचान मिल सकती है।
सवाल सिर्फ मंदिर का नहीं, विरासत बचाने का है
बाबा तुरंतनाथ मंदिर से जुड़ी कहानियां भले ही लोकमान्यताओं पर आधारित हों, लेकिन इस स्थल से जुड़ी ग्रामीण संस्कृति और धार्मिक परंपराएं अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। आज जरूरत इस बात की है कि इस प्राचीन धार्मिक स्थल की वास्तविक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का दस्तावेजीकरण कराया जाए। मंदिर परिसर का संरक्षण हो, श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत सुविधाएं विकसित हों और आवागमन की समस्या का स्थायी समाधान निकले। क्योंकि अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, लोककथाओं और ग्रामीण विरासत का एक हिस्सा भी धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में खो सकता है।


