UP News: लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर सबसे बड़ा सवाल- क्या सड़क के नीचे की मिट्टी भार सहने लायक नहीं ?

UP News: IIT खड़गपुर की चार दिन की जांच पूरी, NHAI मुख्यालय पहुंची रिपोर्ट, लैब परीक्षण से तय होगा सड़क की मरम्मत कितनी बड़ी होगी।

Newstrack Network
Published on: 11 Aug 2026 8:21 PM IST
Lucknow-Kanpur Expressway- Is the soil under the road not worth bearing the load?
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लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर सबसे बड़ा सवाल- क्या सड़क के नीचे की मिट्टी भार सहने लायक नहीं? (Photo- Social Media)

UP News: लखनऊ/कानपुर। करीब 63 किलोमीटर लंबे लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर बारिश के बाद जगह-जगह सड़क बैठने और सतह टूटने की घटनाओं ने अब निर्माण की ऊपरी परत से कहीं बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सिविल इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश में बिटुमिन की सतह खराब होना एक तरह की समस्या है, लेकिन किसी नई सड़क का जगह-जगह धंसना उसके नीचे बने पूरे सड़क ढांचे—सबग्रेड, मिट्टी की भार वहन क्षमता, कम्पैक्शन और ड्रेनेज—की जांच की मांग करता है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि यदि बेस में इस्तेमाल मिट्टी पर्याप्त भार वहन करने योग्य नहीं है या उसका कम्पैक्शन मानकों के अनुरूप नहीं हुआ तो केवल ऊपर से पैचवर्क करने से समस्या स्थायी रूप से खत्म नहीं होगी। जरूरत पड़ने पर एक्सप्रेसवे के प्रभावित हिस्सों की ऊपरी परत हटाकर बेस को नए सिरे से तैयार करना पड़ सकता है।

इसी बीच एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता जांचने आई IIT खड़गपुर की टीम ने चार दिन की जांच पूरी कर अपनी प्रारंभिक फाइंडिंग और रिपोर्ट NHAI मुख्यालय को सौंप दी है। सड़क से लिए गए मिट्टी, बिटुमिन और अन्य सामग्री के नमूनों की प्रयोगशाला जांच अभी महत्वपूर्ण होगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि खराबी कुछ हिस्सों तक सीमित है या सड़क निर्माण की बुनियादी परतों में व्यापक सुधार की जरूरत है।

बिटुमिन उखड़ना अलग, सड़क धंसना कहीं ज्यादा गंभीर

सड़क इंजीनियरिंग में बारिश के बाद ऊपरी बिटुमिन परत में दरार, गड्ढे या सतह उखड़ने की समस्या कई कारणों से हो सकती है। पानी दरारों से अंदर प्रवेश करे तो बिटुमिन और नीचे की परतों के बीच जुड़ाव कमजोर हो सकता है। लेकिन यहां चिंता सड़क के कई हिस्सों में नीचे बैठने को लेकर है।

विशेषज्ञों के मुताबिक सड़क को केवल उसकी काली ऊपरी सतह मजबूत नहीं बनाती। उसके नीचे अलग-अलग इंजीनियरिंग परतें तैयार की जाती हैं। सबसे नीचे प्राकृतिक जमीन या तैयार सबग्रेड, उसके ऊपर चयनित सामग्री, ग्रेन्युलर परतें और फिर बिटुमिन की अलग-अलग परतें होती हैं। इनमें किसी स्तर पर कमजोरी आने का प्रभाव ऊपर दिखाई दे सकता है।

इसीलिए किसी नई सड़क का धंसना केवल तारकोल की समस्या मान लेना तकनीकी रूप से अधूरा होगा।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल—मिट्टी कितना भार सह सकती थी?

विशेषज्ञों के अनुसार सड़क निर्माण से पहले मिट्टी के इंजीनियरिंग गुणों का परीक्षण बेहद महत्वपूर्ण होता है। केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि मिट्टी भराव के लिए उपलब्ध है। यह भी निर्धारित करना होता है कि निर्धारित नमी और कम्पैक्शन पर वह कितना भार सह सकती है और यातायात के बार-बार पड़ने वाले दबाव में उसका व्यवहार कैसा रहेगा।

सड़क निर्माण में कैलिफोर्निया बेयरिंग रेशियो (CBR) जैसे परीक्षण सबग्रेड की भार वहन क्षमता समझने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इसके अलावा मिट्टी की नमी, घनत्व, कण संरचना और कम्पैक्शन जैसे पहलुओं की जांच होती है। यदि कमजोर मिट्टी पर अपेक्षित इंजीनियरिंग उपचार किए बिना ऊपर सड़क बना दी जाए तो भारी और लगातार यातायात के कारण नीचे की परतों में विकृति आ सकती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ अब सवाल उठा रहे हैं कि एक्सप्रेसवे के प्रभावित हिस्सों में इस्तेमाल मिट्टी का चयन, परीक्षण और कम्पैक्शन किस स्तर तक हुआ था।

पानी पहुंचा तो कमजोर बेस और तेजी से बैठ सकता है

इस मामले में दूसरा महत्वपूर्ण पहलू पानी है। पूर्व की जांच में कुछ स्थानों पर सड़क के नीचे कई फुट तक नमी मिलने की बात सामने आई थी। ड्रेनेज की कार्यक्षमता पर भी सवाल उठे थे। सड़क के नीचे पानी पहुंचने पर कुछ प्रकार की मिट्टी की भार वहन क्षमता तेजी से कम हो सकती है। यदि मिट्टी पहले से अपेक्षाकृत कमजोर हो और उसमें पानी प्रवेश कर जाए तो यातायात का दबाव समस्या को और गंभीर बना सकता है।

इसीलिए सड़क इंजीनियरिंग में ड्रेनेज को केवल किनारे बनी नाली नहीं माना जाता। सड़क की डिजाइन ऐसी होनी चाहिए कि बारिश का पानी सतह से तेजी से बाहर निकले और किनारों अथवा दरारों से नीचे की संरचनात्मक परतों में जमा न हो।

हजारों वाहनों का बार-बार भार असली परीक्षा

एक्सप्रेसवे शुरू होने के बाद सड़क पर हजारों वाहनों की आवाजाही शुरू हुई। इनमें भारी व्यावसायिक वाहन भी शामिल होते हैं। सड़क के लिए चुनौती केवल एक वाहन का वजन नहीं, बल्कि बार-बार पड़ने वाला दोहराव वाला एक्सल लोड होता है। यदि सबग्रेड और बेस डिजाइन के अनुसार मजबूत हैं तो सड़क वर्षों तक इस भार को सह सकती है। लेकिन नीचे की परत कमजोर हो, कम्पैक्शन अपर्याप्त हो या पानी पहुंच रहा हो तो हर गुजरते भारी वाहन के साथ सूक्ष्म विकृति बढ़ सकती है और अंततः सतह बैठने लगती है।

इसलिए विशेषज्ञ धंसाव को केवल बारिश से जोड़कर देखने के बजाय मिट्टी+नमी+कम्पैक्शन+ड्रेनेज+ट्रैफिक लोड के संयुक्त प्रभाव की जांच जरूरी बता रहे हैं।

क्या भराव को पर्याप्त तरीके से कम्पैक्ट किया गया था?

विशेषज्ञों ने निर्माण प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। सड़क के एम्बैंकमेंट और सबग्रेड में मिट्टी को नियंत्रित मोटाई की परतों में फैलाकर निर्धारित नमी पर रोलर से कम्पैक्ट किया जाता है। प्रत्येक परत को आवश्यक घनत्व मिलने के बाद ही अगली परत बिछाई जानी चाहिए। यदि मोटी परत में मिट्टी डालकर केवल ऊपर से रोलिंग कर दी जाए तो ऊपर का हिस्सा मजबूत दिखाई दे सकता है, जबकि अंदर रिक्त स्थान और ढीली मिट्टी बच सकती है। बाद में पानी और भारी यातायात मिलने पर यही हिस्सा बैठ सकता है। कुछ विशेषज्ञ प्राकृतिक गीले-सूखे चक्रों और भराव के स्थिरीकरण की अवधि पर भी सवाल उठा रहे हैं। हालांकि एक्सप्रेसवे में वास्तव में कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई और उसमें कोई कमी हुई या नहीं, इसका निर्णायक उत्तर तकनीकी जांच से ही मिलेगा।

सिर्फ पैचवर्क पर्याप्त होगा या पूरी परत खोलनी पड़ेगी?

यही अब इस एक्सप्रेसवे से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी प्रश्न है। यदि समस्या केवल बिटुमिन की ऊपरी परत में है तो मिलिंग और री-सर्फेसिंग जैसे उपाय पर्याप्त हो सकते हैं। लेकिन यदि खराबी सबग्रेड अथवा एम्बैंकमेंट तक पहुंच चुकी है तो उपचार कहीं व्यापक होगा।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि जिन हिस्सों में गंभीर धंसाव मिला है वहां सड़क को खोलकर नीचे की प्रत्येक परत की जांच करनी चाहिए। कमजोर मिट्टी निकालकर उपयुक्त सामग्री डाली जा सकती है, दोबारा निर्धारित स्तर तक कम्पैक्शन किया जा सकता है और उसके बाद ऊपर की सड़क संरचना तैयार की जा सकती है।

जरूरत पड़ने पर जियोसिंथेटिक सामग्री का इस्तेमाल कर कमजोर जमीन को मजबूत करने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है। जियोग्रिड और जियोटेक्सटाइल जैसी सामग्रियां कुछ परिस्थितियों में परतों को अलग रखने, भार वितरण बेहतर करने और संरचना को स्थिरता देने में मदद करती हैं। लेकिन कौन-सी तकनीक उपयुक्त होगी, यह मिट्टी और लैब परीक्षणों के परिणाम पर निर्भर करेगा।

तीन महीने ट्रैफिक रोकने तक का सुझाव

कुछ सिविल इंजीनियरिंग विशेषज्ञ स्थिति को इतना गंभीर मान रहे हैं कि उनका सुझाव है कि व्यापक मरम्मत की जरूरत सामने आए तो प्रभावित हिस्सों पर कुछ महीनों के लिए यातायात रोका जाए या एक तरफ से नियंत्रित यातायात चलाया जाए। इसके पीछे तर्क है कि लगातार यातायात के बीच केवल ऊपरी मरम्मत करते रहने से कमजोर बेस का स्थायी उपचार मुश्किल हो सकता है। हालांकि पूरे एक्सप्रेसवे को बंद करने या यातायात सीमित करने का निर्णय विशेषज्ञों की राय मात्र से नहीं होगा। यह NHAI की अंतिम तकनीकी रिपोर्ट, सुरक्षा आकलन और मरम्मत योजना के आधार पर ही तय किया जा सकता है।

हाईटेक 3D-AMG तकनीक फिर सवालों के घेरे में, लेकिन तकनीक अकेली दोषी नहीं

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को हाईटेक निर्माण परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इसमें बड़े स्तर पर 3D Automated Machine Guidance यानी 3D-AMG तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इस प्रणाली में डिजिटल इंजीनियरिंग मॉडल के आधार पर निर्माण मशीनों को ऊंचाई, ढलान और सतह तैयार करने में अधिक सटीकता मिलती है।

लेकिन यही मामला आधुनिक सड़क निर्माण की एक सीमा भी सामने लाता है। मशीन किसी सतह को निर्धारित ऊंचाई और ढलान पर तैयार कर सकती है, लेकिन मिट्टी की वास्तविक गुणवत्ता, नमी, भार वहन क्षमता और पर्याप्त कम्पैक्शन सुनिश्चित करने के लिए सामग्री परीक्षण और इंजीनियरिंग निगरानी फिर भी आवश्यक है।

इसलिए यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि हाईटेक तकनीक के कारण सड़क खराब हुई। असली सवाल यह है कि तकनीक के साथ फील्ड इंजीनियरिंग और गुणवत्ता नियंत्रण कितने मजबूत रहे।

ठेके से सब-कॉन्ट्रैक्ट तक गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी?

कुछ विशेषज्ञों ने निर्माण कार्य के अलग-अलग हिस्से छोटी एजेंसियों अथवा सब-कॉन्ट्रैक्टरों से कराए जाने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि मुख्य ठेकेदार काम आगे दूसरी एजेंसियों को देता है तो प्रत्येक स्तर पर गुणवत्ता नियंत्रण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

लेकिन यहां भी अंतिम जिम्मेदारी और किसी एजेंसी की कथित लापरवाही का निर्धारण जांच के आधार पर ही होना चाहिए। किसी सब-कॉन्ट्रैक्टर का इस्तेमाल अपने आप में गुणवत्ता खराब होने का प्रमाण नहीं है। प्रश्न यह है कि काम चाहे जिसने किया हो, निर्धारित तकनीकी मानकों की जांच किसने की और उसे प्रमाणित किस आधार पर किया गया।

IIT खड़गपुर की चार दिन की जांच पूरी

इन सवालों के बीच IIT खड़गपुर की टीम ने एक्सप्रेसवे की चार दिन की जांच पूरी कर ली है। टीम ने अलग-अलग हिस्सों में मिट्टी, बिटुमिन, सड़क के स्लोप, ड्रेनेज और नालियों की स्थिति का निरीक्षण किया। कई स्थानों से नमूने लिए गए और सड़क की फोटोग्राफी तथा वीडियोग्राफी भी कराई गई।

इससे पहले जांच के दौरान सड़क खोदकर नीचे की नमी और पानी के बहाव को भी देखा गया था। विभिन्न स्थानों से मिट्टी, गिट्टी, कंक्रीट और बिटुमिन के नमूने लिए गए हैं। इन नमूनों की प्रयोगशाला जांच महत्वपूर्ण होगी क्योंकि आंखों से दिखाई देने वाली खराबी केवल लक्षण बताती है; लैब परीक्षण बताएंगे कि सड़क की सामग्री और बेस निर्धारित तकनीकी मानकों पर कितने खरे उतरे।

अब लैब रिपोर्ट तय करेगी—‘सर्जरी’ छोटी होगी या बड़ी

एक्सप्रेसवे के लिए अगला चरण निर्णायक है। यदि प्रयोगशाला रिपोर्ट में सामग्री और सबग्रेड अधिकांश हिस्सों में मानकों के अनुरूप पाए जाते हैं और समस्या केवल चुनिंदा स्थानों के ड्रेनेज या बिटुमिन तक सीमित निकलती है तो स्थानीय स्तर पर मरम्मत से समाधान संभव हो सकता है।

लेकिन यदि बड़े हिस्से में मिट्टी की भार वहन क्षमता, कम्पैक्शन या संरचनात्मक परतों में कमी सामने आती है तो मामला पैचवर्क से बहुत आगे जाएगा। तब सड़क के प्रभावित हिस्सों की ऊपरी परत हटाने, कमजोर बेस निकालने और सड़क को नए सिरे से बनाने जैसे महंगे और समय लेने वाले विकल्प सामने आ सकते हैं। यही कारण है कि अब नजर केवल इस बात पर नहीं है कि सड़क कहां-कहां धंसी, बल्कि इस सवाल पर है कि सड़क के नीचे आखिर हुआ क्या था।

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की जांच का अंतिम परिणाम देश की दूसरी सड़क परियोजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण सबक बन सकता है। आधुनिक मशीनें सड़क निर्माण को अधिक सटीक बना सकती हैं, लेकिन मिट्टी की जांच, सही सामग्री, कम्पैक्शन, जल निकासी और मौके पर इंजीनियर की निगरानी का कोई तकनीकी शॉर्टकट नहीं है। एक्सप्रेसवे की असली मजबूती ऊपर दिखाई देने वाले चमकदार बिटुमिन में नहीं, बल्कि उसके नीचे छिपी उन परतों में होती है जिन्हें वाहन चालक कभी देख नहीं पाता।

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