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कमर दर्द को न करें नजरअंदाज, विटामिन-D की कमी से कमजोर हो सकती हैं हड्डियां
Lucknow: कमर दर्द को नजरअंदाज न करें। एसजीपीजीआई के विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय से दर्द झेल रहे 69.3% मरीजों में विटामिन-D की गंभीर कमी पाई गई।
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Lucknow: लगातार कमर दर्द, उठने-बैठने में परेशानी, थोड़ी देर चलने पर थकान और पीठ की मांसपेशियों में कमजोरी को अक्सर गलत तरीके से बैठने, लंबे समय तक कंप्यूटर पर काम करने या उम्र बढ़ने का सामान्य असर मान लिया जाता है। लेकिन कमर दर्द के पीछे शरीर में विटामिन-डी और कैल्शियम की कमी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के विशेषज्ञों ने इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है। संस्थान के एपेक्स ट्रामा सेंटर की ओपीडी में लंबे समय से कमर दर्द की शिकायत लेकर पहुँचे मरीजों में बड़ी संख्या में विटामिन-डी की कमी पाई गई है। चिकित्सकों के अनुसार, विटामिन-डी और कैल्शियम का अपर्याप्त स्तर हड्डियों तथा मांसपेशियों की सेहत को प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से उम्र बढ़ने के साथ हड्डियों की मजबूती कम होने पर रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर का खतरा भी बढ़ सकता है।
एसजीपीजीआई के एपेक्स ट्रामा सेंटर के आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अमित कुमार के अनुसार, उनकी ओपीडी में क्रॉनिक लो बैक पेन यानी लंबे समय से कमर के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत लेकर आने वाले मरीजों में 69.3 प्रतिशत में विटामिन-डी की गंभीर कमी पाई गई। शेष मरीजों में भी विटामिन-डी का स्तर अपर्याप्त होने की जानकारी दी गई है। यह स्थिति चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि विटामिन-डी शरीर में कैल्शियम के अवशोषण और हड्डियों के सामान्य खनिजीकरण के लिए आवश्यक है। इसकी कमी लंबे समय तक बनी रहने पर हड्डियों की मजबूती प्रभावित हो सकती है। साथ ही कुछ व्यक्तियों में मांसपेशियों की कमजोरी और हड्डियों में दर्द जैसी समस्याएँ भी सामने आ सकती हैं।
हालाँकि, इन आँकड़ों को समझते समय एक महत्वपूर्ण अंतर ध्यान में रखना आवश्यक है। किसी ओपीडी में कमर दर्द के मरीजों के बीच विटामिन-डी की कमी अधिक मिलना यह साबित नहीं करता कि उन सभी मरीजों का दर्द केवल इसी कमी के कारण हो रहा था। कमर दर्द के पीछे मांसपेशियों में खिंचाव, रीढ़ की डिस्क से संबंधित समस्याएँ, उम्र के साथ होने वाले परिवर्तन, हड्डियों की कमजोरी और अन्य चिकित्सकीय कारण भी हो सकते हैं। उपलब्ध जानकारी में ओपीडी के कुल मरीजों की संख्या और अध्ययन की विस्तृत पद्धति नहीं दी गई है। इसलिए 69.3 प्रतिशत के आँकड़े को पूरे लखनऊ या सामान्य आबादी में कमर दर्द के कारणों का निश्चित अनुपात नहीं माना जाना चाहिए।
डॉ. अमित कुमार के अनुसार, विटामिन-डी की कमी से रीढ़ की हड्डियों की सेहत प्रभावित हो सकती है और पीठ के आसपास की मांसपेशियों में कमजोरी आ सकती है। रीढ़ अनेक छोटी हड्डियों, जिन्हें वर्टिब्रा कहा जाता है, से मिलकर बनी होती है। ये हड्डियाँ शरीर का भार सँभालने और झुकने, उठने तथा चलने जैसी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब हड्डियों का घनत्व कम हो जाता है और वे कमजोर होने लगती हैं, तो मामूली चोट या सामान्य गतिविधि के दौरान भी फ्रैक्चर होने की आशंका बढ़ सकती है। विशेष रूप से ऑस्टियोपोरोसिस से प्रभावित लोगों में रीढ़ की हड्डी के दबने से होने वाला फ्रैक्चर, जिसे वर्टिब्रल कंप्रेशन फ्रैक्चर कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण समस्या है।
एसजीपीजीआई के आर्थोपेडिक सर्जन प्रो. पुलक शर्मा ने भी विटामिन-डी और कैल्शियम की कमी को लेकर चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, सामान्य आबादी में इन पोषक तत्वों की कमी व्यापक रूप से देखी जा रही है। उन्होंने उत्तर भारत में बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने की बात कही है। हालाँकि, विटामिन-डी और कैल्शियम की कमी की वास्तविक व्यापकता उम्र, खानपान, जाँच की पद्धति, निर्धारित मानकों और अध्ययन की गई आबादी के अनुसार बदल सकती है। इसलिए 80 से 90 प्रतिशत जैसी अनुमानित संख्या को किसी विशिष्ट जनसंख्या अध्ययन के बिना सभी लोगों पर लागू नहीं किया जा सकता।
विशेषज्ञों ने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया है कि धूप में कम निकलना और भोजन में कैल्शियम की अपर्याप्त मात्रा हड्डियों की सेहत को प्रभावित कर सकती है। आधुनिक जीवनशैली में बड़ी संख्या में लोग दिन का अधिकांश समय घर, कार्यालय या बंद कमरों में बिताते हैं। कंप्यूटर और मोबाइल पर काम करने की अवधि बढ़ने के कारण शारीरिक गतिविधियाँ भी सीमित हो सकती हैं। दूसरी ओर, भोजन में कैल्शियम और विटामिन-डी के पर्याप्त स्रोत शामिल न होने पर पोषण संबंधी कमी की आशंका बढ़ सकती है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि ऑस्टियोपोरोसिस केवल विटामिन-डी की कमी से नहीं होता। उम्र, रजोनिवृत्ति के बाद होने वाले हार्मोन संबंधी परिवर्तन, शारीरिक निष्क्रियता, कुछ दवाएँ और अन्य चिकित्सकीय स्थितियाँ भी हड्डियों के कमजोर होने में योगदान कर सकती हैं।
महिलाओं में उम्र बढ़ने के साथ हड्डियों की कमजोरी का प्रश्न विशेष महत्व रखता है। रजोनिवृत्ति के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर में कमी के कारण हड्डियों का घनत्व तेजी से घट सकता है। इससे ऑस्टियोपोरोसिस और रीढ़ की हड्डी के फ्रैक्चर का खतरा बढ़ता है। प्रो. पुलक शर्मा के हवाले से उपलब्ध जानकारी में 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में लगभग 60 प्रतिशत वर्टिब्रल कंप्रेशन फ्रैक्चर को विटामिन-डी और कैल्शियम की कमी से जोड़कर बताया गया है। हालाँकि, इस प्रतिशत के समर्थन में किसी विशिष्ट अध्ययन का विवरण उपलब्ध नहीं है। चिकित्सकीय रूप से ऐसे फ्रैक्चर के पीछे ऑस्टियोपोरोसिस सहित कई कारण हो सकते हैं। इसलिए किसी फ्रैक्चर की वजह तय करने के लिए संबंधित व्यक्ति की हड्डियों की स्थिति, पोषण, चिकित्सकीय इतिहास और आवश्यक जाँच का मूल्यांकन जरूरी है।
कमर दर्द से परेशान लोगों के लिए राहत की बात यह है कि अधिकांश मामलों में ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ती। एसजीपीजीआई के न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रो. आशुतोष कुमार के अनुसार, 95 प्रतिशत से अधिक कमर दर्द के मरीजों को शल्य चिकित्सा की जरूरत नहीं होती। उचित दवाओं, व्यायाम, फिजियोथेरेपी और जीवनशैली में बदलाव से बड़ी संख्या में मरीजों को राहत मिल सकती है। हालाँकि, उपचार का तरीका दर्द के वास्तविक कारण और उसकी गंभीरता के अनुसार निर्धारित किया जाता है। सामान्य मांसपेशीय दर्द, नस पर दबाव, रीढ़ की हड्डी के फ्रैक्चर और अन्य समस्याओं के उपचार में अंतर हो सकता है।
प्रो. आशुतोष कुमार ने चेताया है कि यदि कमर दर्द के साथ पैरों में कमजोरी, सुन्नपन या चलने में कठिनाई होने लगे तो विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। कुछ लक्षण ऐसे भी हैं जिनमें तत्काल चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक होता है। इनमें पेशाब या मल पर नियंत्रण अचानक कम होना, जाँघों के भीतरी हिस्से या जननांगों के आसपास सुन्नपन और पैरों में तेजी से बढ़ती कमजोरी शामिल हैं। ऐसे लक्षण रीढ़ की नसों पर गंभीर दबाव का संकेत हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त गंभीर चोट के बाद शुरू हुआ दर्द, बुखार के साथ कमर दर्द या कैंसर के इतिहास वाले व्यक्ति में नया लगातार दर्द भी चिकित्सकीय जाँच की माँग करता है।
जिन चुनिंदा मरीजों में ऑपरेशन आवश्यक होता है, उनके लिए आधुनिक शल्य चिकित्सा तकनीकें उपलब्ध हैं। एसजीपीजीआई में मिनिमली इनवेसिव और एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इन प्रक्रियाओं में उपयुक्त मरीजों के लिए अपेक्षाकृत छोटा चीरा, कम रक्तस्राव और जल्दी स्वस्थ होने जैसे संभावित लाभ हो सकते हैं। लेकिन हर मरीज के लिए ये तकनीकें उपयुक्त नहीं होतीं। ऑपरेशन का निर्णय नसों पर दबाव की गंभीरता, रीढ़ की संरचनात्मक समस्या, अन्य उपचारों से मिली राहत और मरीज की समग्र स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर लिया जाता है। अधिक उम्र के मरीजों में भी इन पहलुओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक होता है।
कमर दर्द से बचाव के लिए विशेषज्ञ नियमित शारीरिक गतिविधि और बैठने की सही आदतों पर जोर देते हैं। लंबे समय तक लगातार एक ही स्थिति में बैठे रहने के बजाय बीच-बीच में उठकर चलना और हल्का स्ट्रेच करना उपयोगी हो सकता है। कार्यालय में काम करने वालों को लगभग हर 45 मिनट पर थोड़ी देर का विराम लेने की सलाह दी गई है। कंप्यूटर की स्क्रीन आँखों के अनुकूल ऊँचाई पर रखना, बैठते समय कमर को उचित सहारा देना और लंबे समय तक असुविधाजनक स्थिति में काम करने से बचना भी मददगार हो सकता है। हालांकि, किसी एक निश्चित बैठने की मुद्रा को सभी प्रकार के कमर दर्द का समाधान नहीं माना जा सकता। नियमित गतिविधि, मांसपेशियों की मजबूती और काम के दौरान स्थिति बदलते रहना अधिक महत्वपूर्ण है।
भारी सामान उठाने के दौरान भी सावधानी आवश्यक है। शरीर से दूर रखकर वजन उठाने या अचानक झटके के साथ मुड़ने से पीठ पर दबाव बढ़ सकता है। सामान उठाते समय उसे शरीर के पास रखना, घुटनों और कूल्हों को आवश्यकतानुसार मोड़ना तथा अचानक घूमने से बचना उपयोगी है। जिन व्यक्तियों को पहले से कमर दर्द, रीढ़ की समस्या या ऑस्टियोपोरोसिस है, उन्हें व्यायाम और वजन उठाने की सीमा के बारे में चिकित्सक या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह लेनी चाहिए।
विटामिन-डी की पर्याप्त मात्रा बनाए रखने के लिए धूप का संपर्क और उचित पोषण महत्वपूर्ण हैं। लेकिन हर व्यक्ति के लिए सुबह आठ से दस बजे के बीच बीस मिनट धूप में रहना पर्याप्त होगा, ऐसा निश्चित नहीं है। त्वचा का रंग, मौसम, प्रदूषण, कपड़े, भौगोलिक स्थिति और सूर्य की किरणों की तीव्रता के अनुसार शरीर में विटामिन-डी बनने की मात्रा बदलती है। भोजन में दूध, दही और अन्य कैल्शियम युक्त पदार्थ शामिल करना उपयोगी हो सकता है। अंडे की जर्दी, कुछ प्रकार की मछलियाँ, विटामिन-डी से समृद्ध खाद्य पदार्थ और पराबैंगनी प्रकाश के संपर्क में आए कुछ मशरूम भी विटामिन-डी के स्रोत हो सकते हैं। संतुलित आहार के बावजूद कमी बनी रहने पर चिकित्सक जाँच और उपचार की सलाह दे सकते हैं।
कैल्शियम और विटामिन-डी की मात्रा को लेकर भी सावधानी आवश्यक है। वयस्कों की कैल्शियम आवश्यकता उम्र और अन्य परिस्थितियों के अनुसार बदलती है; कई वयस्कों के लिए लगभग 1000 मिलीग्राम प्रतिदिन और कुछ आयु वर्गों के लिए 1200 मिलीग्राम प्रतिदिन की कुल आहार आवश्यकता का संदर्भ दिया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को इतनी मात्रा में कैल्शियम की गोली लेनी चाहिए। इसी प्रकार रक्त में विटामिन-डी का स्तर जाँचते समय 25-हाइड्रॉक्सी विटामिन-डी की मात्रा सामान्यतः नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर में मापी जाती है। सभी व्यक्तियों के लिए 30 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर का स्तर अनिवार्य लक्ष्य हो, इस पर चिकित्सा दिशानिर्देशों में एकरूपता नहीं है। इसलिए विटामिन-डी की गोलियाँ या अधिक मात्रा वाले सप्लीमेंट बिना चिकित्सकीय सलाह के लेना उचित नहीं है। अत्यधिक सेवन से नुकसान भी हो सकता है।
लगातार कमर दर्द की शिकायत होने पर सबसे महत्वपूर्ण कदम उसका वास्तविक कारण पता करना है। केवल दर्द की दवा लेते रहना या बिना जाँच के विटामिन-डी और कैल्शियम के सप्लीमेंट शुरू कर देना हर स्थिति में उचित नहीं होगा। चिकित्सक लक्षणों, शारीरिक परीक्षण और जोखिम कारकों के आधार पर आवश्यक जाँच का निर्णय ले सकते हैं। जिन लोगों में हड्डियों की कमजोरी या फ्रैक्चर का संदेह हो, उनके लिए बोन मिनरल डेंसिटी की जाँच सहित अन्य परीक्षण उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन प्रत्येक सामान्य कमर दर्द के मरीज को सभी प्रकार की जाँच कराना भी जरूरी नहीं होता।
एसजीपीजीआई के विशेषज्ञों की जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि कमर दर्द को केवल गलत तरीके से बैठने या उम्र का सामान्य प्रभाव मानकर लगातार नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विटामिन-डी और कैल्शियम की कमी कुछ मरीजों में हड्डियों तथा मांसपेशियों की समस्याओं से जुड़ी हो सकती है, लेकिन हर कमर दर्द की वजह यही नहीं होती। नियमित गतिविधि, संतुलित आहार, उचित व्यायाम और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की जाँच से अधिकांश मरीजों को राहत मिल सकती है। वहीं पैरों में बढ़ती कमजोरी, सुन्नपन या अन्य गंभीर लक्षण सामने आने पर समय पर चिकित्सकीय सहायता लेना आवश्यक है।


