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पायरेसी से सीधे छिन रहा लेखकों की रॉयल्टी का हक, ओरिजिनल किताबों से ही बचेगा साहित्य का भविष्य
Lucknow News: पायरेटेड किताबों से लेखकों की रॉयल्टी प्रभावित हो रही है। लखनऊ पुस्तक मेले में ओरिजिनल किताबों को बढ़ावा देने और पायरेसी रोकने पर जोर दिया गया।
Lucknow News (Image Credit- Newstrack)
लखनऊ। डिजिटल दौर में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिकने वाली सस्ती और पायरेटेड किताबें सीधे तौर पर लेखकों की मेहनत और उनकी आजीविका (रॉयल्टी) पर डाका डाल रही हैं। किसी भी किताब की अनधिकृत या फोटोकॉपी प्रति बाजार में आने से लेखक को मिलने वाली कानूनी रॉयल्टी खत्म हो जाती है, जो रचनात्मक जगत के लिए सबसे घातक प्रहार है। यह गंभीर चिंता लखनऊ के मोती महल लॉन में चल रहे 23वें राष्ट्रीय पुस्तक मेले में दिनकर पुस्तकालय की ओर से साझा की गई, जहां पुस्तक प्रेमियों की भारी भीड़ के बीच ओरिजिनल किताबों को बचाने और बढ़ावा देने की मुहिम जोर पकड़ रही है।
फिल्म पायरेसी की तरह लेखकों पर भी दोहरा वार
दिनकर पुस्तकालय से जुड़े मयंक ने पायरेसी के खतरे को रेखांकित करते हुए कहा कि जिस तरह किसी फिल्म की अनधिकृत रिकॉर्डिंग साझा करने से फिल्म निर्माताओं और कलाकारों को भारी आर्थिक क्षति होती है, ठीक वही स्थिति किताबों के साथ हो रही है।
सामान्य व्यवस्था में हर मूल प्रति की बिक्री से लेखक को उसका हक और रॉयल्टी मिलती है, जिससे नए लेखन को संबल मिलता है। पायरेटेड प्रतियां इस पूरी व्यवस्था को ध्वस्त कर देती हैं, जिससे लेखक और प्रकाशक दोनों का अस्तित्व संकट में पड़ता है।
एक छत के नीचे दिग्गज प्रकाशक, 100% मूल किताबों की गारंटी
मोती महल लॉन में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले में दिनकर पुस्तकालय का स्टॉल पाठकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र बना हुआ है। अमूमन पाठकों को अलग-अलग किताबों के लिए दर्जनों प्रकाशकों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन यहां एक अनूठी पहल के तहत राजकमल, वाणी, पेंगुइन, हार्पर कॉलिंस और वेस्टलैंड जैसे दिग्गज प्रकाशकों की पुस्तकें एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराई गई हैं।
संस्थान का दावा है कि उनके पास केवल 100 प्रतिशत प्रमाणित और मूल प्रतियां ही उपलब्ध हैं, ताकि पायरेसी को पूरी तरह नकारा जा सके।
ई-बुक्स के दौर में ऑफलाइन बाजार गुलजार, 1.05 करोड़ की बिक्री
डिजिटल माध्यमों और ई-बुक्स के बढ़ते चलन के बावजूद पाठकों में किताबों को हाथों में लेकर पन्ने पलटने का आकर्षण कम नहीं हुआ है। देश के लगभग 30 शहरों में पुस्तक स्टॉल लगाने के बाद मिले अनुभवों को साझा करते हुए मयंक ने बताया कि उन्होंने शुरुआत में सालाना 50 लाख रुपये की किताबें पाठकों तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था।
पाठकों के जबरदस्त समर्थन से पुस्तक मेलों के जरिए यह ऑफलाइन बिक्री 1.05 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गई। यह उछाल साबित करता है कि हिंदी किताबों का पाठक वर्ग तेजी से बढ़ रहा है।
अपनी पसंद से तय करें ‘रीडिंग जर्नी’
मेले में पहुंच रहे युवाओं और नए पाठकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा कि पढ़ने की आदत किसी की देखा-देखी नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रुचि से विकसित होनी चाहिए।
जिस तरह हर व्यक्ति के खान-पान का स्वाद अलग होता है, उसी तरह हर पाठक की ‘रीडिंग जर्नी’ भी अनूठी होती है। पाठक अपनी पसंद के विषय से शुरुआत करें, धीरे-धीरे पढ़ने की यह आदत उन्हें अच्छे विचारों, नए अनुभवों और बेहतर साहित्य से जोड़ देगी।


