क्लबफुट के लंबे इलाज से माता-पिता पर बढ़ रहा मानसिक दबाव, KGMU के शोध में चौंकाने वाला खुलासा

Lucknow: KGMU के शोध में क्लबफुट से प्रभावित बच्चों के 190 अभिभावकों में 16.8% में अवसाद के लक्षण मिले। माताओं में मानसिक दबाव के संकेत अधिक पाए गए।

Newstrack Network
Published on: 19 Oct 2026 6:09 PM IST
क्लबफुट के लंबे इलाज से माता-पिता पर बढ़ रहा मानसिक दबाव, KGMU के शोध में चौंकाने वाला खुलासा
X

Lucknow: बच्चे के जन्म के साथ परिवार में खुशियाँ आती हैं, लेकिन जब नवजात के पैरों में जन्मजात विकृति हो और उसके इलाज के लिए महीनों तक अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ें, तो यह स्थिति माता-पिता के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है। लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के बाल अस्थि रोग विभाग के एक शोध में इसी समस्या का महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। जन्मजात टेढ़े पैर यानी क्लबफुट से प्रभावित बच्चों का उपचार करा रहे 190 अभिभावकों पर किए गए अध्ययन में 16.8 प्रतिशत में अवसाद के लक्षण पाए गए। यानी लगभग हर छह में से एक अभिभावक में मानसिक तनाव से जुड़े ऐसे संकेत मिले, जिनके लिए आगे चिकित्सकीय मूल्यांकन की आवश्यकता हो सकती है। अध्ययन में महिलाओं पर इसका प्रभाव पुरुषों की तुलना में लगभग तीन गुना पाया गया। शोध के निष्कर्ष चिकित्सा पत्रिका 'Cureus' में प्रकाशित हुए हैं।

केजीएमयू के बाल अस्थि रोग विभाग ने जून 2021 से दिसंबर 2023 के बीच क्लबफुट से प्रभावित बच्चों के 190 अभिभावकों को अध्ययन में शामिल किया। इनमें 145 महिलाएँ और 45 पुरुष थे। प्रतिभागियों की औसत उम्र 28 वर्ष थी। शोधकर्ताओं ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रारंभिक आकलन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपयोग की जाने वाली DASS-21 प्रश्नावली का इस्तेमाल किया। यह प्रश्नावली अवसाद, चिंता और तनाव से संबंधित लक्षणों के आकलन में उपयोगी होती है। अध्ययन में 32 अभिभावकों के उत्तर अवसाद के लक्षणों की ओर संकेत करते मिले। हालाँकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रश्नावली में लक्षण पाए जाने का अर्थ चिकित्सकीय रूप से अवसाद का निश्चित निदान नहीं है। इसके लिए विशेषज्ञ द्वारा विस्तृत मूल्यांकन जरूरी होता है।

शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष महिलाओं और पुरुषों के बीच सामने आया अंतर है। अध्ययन में शामिल 145 महिलाओं में से 29 में अवसाद के लक्षण पाए गए। यह संख्या लगभग 20 प्रतिशत है। दूसरी ओर 45 पुरुषों में से केवल तीन में ऐसे लक्षण मिले, जो 6.7 प्रतिशत के बराबर है। इस प्रकार अध्ययन में महिलाओं में अवसाद के संकेत मिलने का अनुपात पुरुषों की तुलना में लगभग तीन गुना रहा। हालाँकि, अध्ययन में महिलाओं और पुरुषों की संख्या समान नहीं थी और पुरुष प्रतिभागियों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी। इसलिए इस अंतर को सभी क्लबफुट प्रभावित परिवारों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी यह निष्कर्ष बताता है कि बच्चे के लंबे उपचार के दौरान माताओं की मानसिक सेहत पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

क्लबफुट एक जन्मजात स्थिति है, जिसमें बच्चे का एक पैर या दोनों पैर अंदर और नीचे की ओर मुड़े हुए हो सकते हैं। इसका चिकित्सकीय नाम कंजेनिटल टैलिपीज इक्विनोवेरस है। समय पर उपचार शुरू होने पर अधिकांश बच्चों के पैरों की स्थिति में अच्छा सुधार संभव है। सामान्यतः इसके उपचार में पोंसेटी पद्धति का उपयोग किया जाता है, जिसके अंतर्गत पैर की स्थिति को धीरे-धीरे सुधारने के लिए क्रमिक प्लास्टर लगाए जाते हैं। कुछ बच्चों में एड़ी की कसी हुई कंडरा को ठीक करने के लिए एक छोटी प्रक्रिया की भी आवश्यकता पड़ सकती है। प्रारंभिक सुधार के बाद विशेष ब्रेस का उपयोग लंबे समय तक करना पड़ता है, ताकि पैर दोबारा मुड़ने की आशंका कम की जा सके।

यही लंबी उपचार प्रक्रिया अभिभावकों के लिए शारीरिक, आर्थिक और मानसिक चुनौतियाँ पैदा कर सकती है। बच्चे को नियमित रूप से अस्पताल ले जाना, प्लास्टर बदलवाना, ब्रेस सही तरीके से पहनाना और चिकित्सक की सलाह का पालन करना परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। छोटे बच्चे को असुविधा होने या उसके रोने पर माता-पिता की चिंता बढ़ सकती है। कई परिवारों को उपचार के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। बार-बार अस्पताल जाने से कामकाज प्रभावित हो सकता है और यात्रा पर अतिरिक्त खर्च भी आता है। ऐसे में यदि परिवार के दूसरे सदस्यों का पर्याप्त सहयोग नहीं मिले, तो बच्चे की देखभाल की मुख्य जिम्मेदारी सँभालने वाले व्यक्ति पर दबाव और बढ़ सकता है।

केजीएमयू के बाल अस्थि रोग विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक वर्मा के अनुसार, क्लबफुट के उपचार में बार-बार प्लास्टर बदलना, लंबे समय तक ब्रेस पहनाना और समस्या दोबारा उभरने की आशंका माता-पिता के मानसिक दबाव को बढ़ा सकती है। इसलिए बच्चे के उपचार के साथ अभिभावकों की मानसिक स्थिति का भी नियमित आकलन किया जाना चाहिए। उन्होंने अभिभावकों के लिए मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परामर्श और आवश्यक जाँच की जरूरत पर जोर दिया है। इसका उद्देश्य केवल अवसाद के लक्षण पहचानना नहीं, बल्कि परिवार को उपचार की लंबी प्रक्रिया के दौरान भावनात्मक सहयोग उपलब्ध कराना भी है।

शोध में एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि बारहवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने वाले अभिभावकों और पर्याप्त पारिवारिक या सामाजिक सहयोग से वंचित लोगों में अवसाद के संकेत अधिक देखे गए। शिक्षा और सामाजिक सहयोग से जुड़े ये निष्कर्ष बताते हैं कि बच्चे की बीमारी का प्रभाव केवल चिकित्सकीय स्थिति पर निर्भर नहीं करता। परिवार के पास उपचार संबंधी जानकारी कितनी है, चिकित्सक की सलाह समझने में कितनी सुविधा है और घर के दूसरे सदस्य देखभाल की जिम्मेदारी किस हद तक साझा करते हैं, जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालाँकि, उपलब्ध विवरण से यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि कम शिक्षा या सामाजिक सहयोग की कमी ही अवसाद के प्रत्यक्ष कारण हैं। इनके बीच संबंध को समझने के लिए विस्तृत विश्लेषण आवश्यक होगा।

क्लबफुट से प्रभावित बच्चे की देखभाल में ब्रेस का नियमित उपयोग विशेष महत्व रखता है। प्रारंभिक उपचार से पैर की स्थिति में सुधार आने के बाद भी चिकित्सक द्वारा निर्धारित अवधि तक ब्रेस पहनाना जरूरी हो सकता है। यदि इसका उपयोग निर्धारित तरीके से नहीं किया जाए, तो कुछ बच्चों में विकृति दोबारा उभरने का खतरा बढ़ सकता है। माता-पिता के लिए यह जिम्मेदारी कई वर्षों तक बनी रह सकती है। इसलिए उन्हें उपचार की प्रक्रिया, उसकी अवधि और संभावित कठिनाइयों के बारे में स्पष्ट जानकारी देना आवश्यक है। जब अभिभावकों को यह समझ में आता है कि उपचार का प्रत्येक चरण क्यों जरूरी है, तो अनिश्चितता और अनावश्यक आशंका कम करने में सहायता मिल सकती है।

बच्चों के उपचार में मानसिक स्वास्थ्य को शामिल करने की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि माता-पिता की भावनात्मक स्थिति बच्चे की देखभाल की नियमितता को प्रभावित कर सकती है। लगातार तनाव या अवसाद के लक्षणों से जूझ रहे अभिभावक को अस्पताल की नियुक्तियों, ब्रेस के उपयोग और दैनिक देखभाल का पालन करने में अतिरिक्त कठिनाई हो सकती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उपचार में किसी समस्या के लिए माता-पिता को जिम्मेदार ठहराया जाए। बल्कि चिकित्सा व्यवस्था को यह समझना चाहिए कि परिवार को केवल निर्देश देने के बजाय उन निर्देशों का पालन करने के लिए व्यावहारिक और भावनात्मक सहायता भी उपलब्ध कराना आवश्यक है।

इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि जन्मजात शारीरिक विकृतियों के उपचार में परिवार को उपचार की इकाई के रूप में देखना उपयोगी हो सकता है। चिकित्सक बच्चे के पैर की स्थिति, प्लास्टर और ब्रेस की प्रगति का नियमित मूल्यांकन करते हैं। इसी के साथ अभिभावकों से उनकी नींद, चिंता, थकान, पारिवारिक सहयोग और भावनात्मक कठिनाइयों के बारे में भी बातचीत की जा सकती है। यदि किसी अभिभावक में लंबे समय तक उदासी, निराशा, दैनिक कामकाज में रुचि की कमी या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श की व्यवस्था की जा सकती है।

केजीएमयू का यह शोध इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि किसी बच्चे की बीमारी या जन्मजात विकृति का असर केवल उसी बच्चे तक सीमित नहीं रहता। उपचार की लंबी प्रक्रिया पूरे परिवार को प्रभावित कर सकती है। 190 अभिभावकों के अध्ययन में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति में अवसाद के लक्षण मिलना इस आवश्यकता को रेखांकित करता है कि बच्चों के उपचार के साथ माता-पिता की मानसिक सेहत की भी देखभाल की जाए। विशेष रूप से माताओं और कमजोर सामाजिक सहयोग वाले परिवारों को समय पर परामर्श और सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण हो सकता है।

Newstrack Network
ABOUT THE AUTHOR

Newstrack Network

Newstrack Desknewstracknetwork@gmail.com

Newstrack is one of the most Trusted and Popular news portal of India. Remain updated and aware, only on Newstrack

Next Story