Lucknow News: लखनऊ में ग्रीन गैस के नाम पर बड़ा साइबर फ्रॉड, APK इंस्टॉल कराकर लाखों की ठगी

Lucknow News: लखनऊ में ग्रीन गैस के नाम पर साइबर ठगी के मामले बढ़े। 45 उपभोक्ताओं ने शिकायत की। जालसाज Meter Update APK भेजकर बैंक खातों से लाखों रुपये निकाल रहे हैं।

Newstrack Network
Published on: 21 Sept 2026 6:51 PM IST
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Lucknow News (Image Credit-Social Media)

लखनऊ। राजधानी में घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) उपभोक्ताओं को निशाना बनाकर साइबर ठगी का नया तरीका तेजी से फैल रहा है। जालसाज खुद को ग्रीन गैस लिमिटेड का कर्मचारी बताकर उपभोक्ताओं को फोन, व्हाट्सएप या संदेश के जरिए बताते हैं कि उनका गैस बिल बकाया है, मीटर अपडेट नहीं हुआ है, केवाईसी अधूरी है या कनेक्शन का नवीनीकरण नहीं होने के कारण गैस आपूर्ति बंद कर दी जाएगी। इसके बाद ‘Meter Update.apk’ जैसे नाम वाली फाइल भेजकर उसे मोबाइल में इंस्टॉल कराया जाता है। लखनऊ पुलिस के अनुसार ऐसे मामलों में अब तक कम से कम 45 ग्रीन गैस उपभोक्ता साइबर सेल से शिकायत कर चुके हैं। हाल के अलग-अलग मामलों में लोगों के खातों से लाखों रुपये निकल चुके हैं। खतरे की गंभीरता को देखते हुए लखनऊ पुलिस की क्राइम ब्रांच ने ‘ऑपरेशन डिजिटल कवच’ के तहत विशेष चेतावनी जारी की है, वहीं ग्रीन गैस लिमिटेड ने भी अपने उपभोक्ताओं को साफ कहा है कि कंपनी फोन या संदेश के जरिए किसी ऐप या APK फाइल को डाउनलोड करने, ओटीपी-पिन बताने अथवा किसी अनधिकृत लिंक या क्यूआर कोड से भुगतान करने के लिए नहीं कहती।

इस ठगी की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि अपराधी बिजली या गैस कनेक्शन कटने जैसी रोजमर्रा की चिंता को हथियार बना रहे हैं। उपभोक्ता के पास पहले फोन या व्हाट्सएप संदेश आता है। कॉल करने वाला स्वयं को ग्रीन गैस का कर्मचारी बताता है और बातचीत इस तरह करता है कि सामने वाले को तत्काल कार्रवाई जरूरी लगने लगे। किसी को कहा जाता है कि बिल अपडेट नहीं हुआ है, किसी का मीटर सत्यापित नहीं है और किसी को कुछ ही देर में गैस कनेक्शन काटने की चेतावनी दी जाती है। इसके बाद समस्या ‘ठीक’ करने के लिए मोबाइल पर एक APK फाइल भेजी जाती है। APK एंड्रॉयड फोन में ऐप स्थापित करने की फाइल होती है। आधिकारिक ऐप स्टोर के बाहर से आई ऐसी अज्ञात फाइल को इंस्टॉल करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि दुर्भावनापूर्ण ऐप उपयोगकर्ता से संदेश, संपर्क, स्क्रीन, नोटिफिकेशन या दूसरी संवेदनशील सुविधाओं की अनुमति मांग सकता है। इन्हीं अनुमतियों का दुरुपयोग कर अपराधी बैंकिंग संबंधी जानकारी और ओटीपी तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं। पुलिस ने इसी कारण अनजान नंबर से व्हाट्सएप या एसएमएस पर आने वाली APK फाइल को किसी भी परिस्थिति में इंस्टॉल न करने की सलाह दी है।

किसी के 31.84 लाख तो किसी के 5.85 लाख रुपये निकले

यह चेतावनी केवल संभावित खतरे पर आधारित नहीं है। सितंबर में लखनऊ में ऐसे कई मामले दर्ज हो चुके हैं। पुलिस के पहले संकलित चार मामलों में पीड़ितों से कुल 46.48 लाख रुपये की ठगी सामने आई थी। इनमें एक 67 वर्षीय व्यक्ति के तीन बैंक खातों से 25 लेनदेन में 31.84 लाख रुपये निकलने की जानकारी सामने आई। अपराधियों ने ग्रीन गैस कर्मचारी बनकर बिल और मीटर अपडेट करने का डर दिखाया था। इसके बाद अलग-अलग थाना क्षेत्रों से इसी तरीके के और मामले सामने आने लगे।

गोसाईंगंज के हबीरपुर निवासी बसंत कुमार सिंह के पास 10 सितंबर को ग्रीन गैस मीटर अपडेट करने के नाम पर व्हाट्सएप कॉल आई। उन्हें APK फाइल इंस्टॉल कराई गई और बाद में उनके एचडीएफसी बैंक खाते से पांच बार में 5,85,597 रुपये निकल गए। मानकनगर के समर विहार निवासी 88 वर्षीय शिबादास बनर्जी को भी मीटर अपडेट कराने के नाम पर APK फाइल भेजी गई। उनसे दस रुपये की मामूली फीस देने के लिए कहा गया और भुगतान की प्रक्रिया शुरू करते ही मोबाइल से समझौता होने के बाद तीन बैंक खातों से करीब 1.41 लाख रुपये निकल गए। इंदिरानगर निवासी नीलम साह से बिल अपडेट करने के नाम पर बैंक संबंधी जानकारी ली गई और बाद में उनके खाते से करीब 1.30 लाख रुपये निकाल लिए गए। इन मामलों में अलग-अलग थानों और साइबर क्राइम पुलिस ने मुकदमे दर्ज कर जांच शुरू की है।

इसी तरह इंदिरानगर क्षेत्र के अशोक कुमार चटर्जी को 29 अगस्त को व्हाट्सएप पर ग्रीन गैस मीटर अपडेट करने के नाम पर लगातार APK फाइलें भेजी गईं। उनके मुताबिक कुछ ही समय बाद खाते से अनधिकृत लेनदेन शुरू हो गया और करीब 5.05 लाख रुपये का नुकसान हुआ। इस मामले में भी साइबर क्राइम थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। लगातार सामने आ रहे इन मामलों से स्पष्ट है कि अपराधी किसी एक इलाके या आयु वर्ग को नहीं, बल्कि ग्रीन गैस उपभोक्ताओं को व्यापक रूप से निशाना बना रहे हैं।

उपभोक्ता की जानकारी पहले से होने का संदेह, लेकिन डेटा लीक अभी प्रमाणित नहीं

इस साइबर ठगी का एक गंभीर पहलू यह भी है कि कुछ मामलों में जालसाज उपभोक्ता के बारे में ऐसी जानकारी के साथ संपर्क करते हैं जिससे कॉल विश्वसनीय लगती है। पुलिस की शुरुआती जांच और मीडिया रिपोर्टों में आशंका जताई गई है कि अपराधियों के पास उपभोक्ताओं से संबंधित कुछ जानकारी पहले से उपलब्ध हो सकती है। लेकिन अभी यह प्रमाणित नहीं हुआ है कि यह डेटा ग्रीन गैस लिमिटेड के किसी तंत्र से लीक हुआ है। डेटा सार्वजनिक स्रोतों, पहले हुए किसी अन्य डेटा उल्लंघन, व्यावसायिक डेटाबेस अथवा अलग माध्यम से भी अपराधियों तक पहुंच सकता है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले इसे ‘ग्रीन गैस का डेटा लीक’ कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। पुलिस के लिए यह पता लगाना महत्वपूर्ण है कि जालसाज वास्तविक उपभोक्ताओं की पहचान कैसे कर रहे हैं और उनके मोबाइल नंबर तथा कनेक्शन संबंधी जानकारी उन्हें कहां से मिल रही है।

ग्रीन गैस लिमिटेड ने भी धोखाधड़ी को देखते हुए अपने ग्राहकों के लिए सार्वजनिक चेतावनी जारी की है। कंपनी के अनुसार अपराधी PNG पंजीकरण, कनेक्शन सक्रिय करने, बिल भुगतान, केवाईसी अपडेट, कनेक्शन काटने की चेतावनी, सब्सिडी या सेवा सक्रिय करने के बहाने फोन, एसएमएस और व्हाट्सएप के जरिए संपर्क कर सकते हैं। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि वह उपभोक्ताओं से ओटीपी, पिन, पासवर्ड या गोपनीय बैंकिंग जानकारी साझा करने को नहीं कहती और न ही भुगतान के लिए संदिग्ध लिंक, व्यक्तिगत यूपीआई, क्यूआर कोड या अज्ञात ऐप डाउनलोड करने को कहती है। किसी कॉल की सत्यता पर संदेह होने पर उपभोक्ता ग्रीन गैस के आधिकारिक ग्राहक सेवा माध्यम से स्वतंत्र रूप से पुष्टि कर सकते हैं।

APK इंस्टॉल होते ही अपराधी को पूरा फोन मिल जाना जरूरी नहीं

इस तरह की खबरों में अक्सर लिखा जाता है कि ‘APK डाउनलोड होते ही मोबाइल हैक हो जाता है’, लेकिन तकनीकी रूप से यह कथन अधूरा है। केवल फाइल मोबाइल में आ जाने से सामान्यतः अपराधी को फोन का पूरा नियंत्रण नहीं मिल जाता। खतरा तब बहुत बढ़ता है जब उपयोगकर्ता उस संदिग्ध APK को इंस्टॉल करता है और उसे एसएमएस, नोटिफिकेशन, स्क्रीन देखने, एक्सेसिबिलिटी सेवा या दूसरी संवेदनशील अनुमतियां दे देता है। अलग-अलग दुर्भावनापूर्ण ऐप की क्षमता भी अलग होती है। कोई ऐप एसएमएस पढ़ सकता है, कोई स्क्रीन की गतिविधि देख सकता है और अधिक उन्नत मैलवेयर दूरस्थ नियंत्रण की क्षमता भी हासिल कर सकता है। इसलिए पुलिस की चेतावनी का मूल संदेश यह है कि व्हाट्सएप, एसएमएस या अनजान वेबसाइट से आई किसी APK फाइल को इंस्टॉल ही न किया जाए।

अपराधी इसके बाद बैंकिंग प्रक्रिया की कमजोर कड़ियों को निशाना बनाते हैं। यदि दुर्भावनापूर्ण ऐप को एसएमएस और नोटिफिकेशन तक पहुंच मिल जाए तो वह बैंक से आने वाले संदेश और कुछ परिस्थितियों में ओटीपी देख सकता है। यदि पीड़ित से पहले ही बैंक या कार्ड की जानकारी हासिल कर ली गई हो तो अपराधी इसका इस्तेमाल अनधिकृत लेनदेन की कोशिश में कर सकते हैं। कुछ मामलों में पीड़ित से दस रुपये या बहुत छोटी रकम का भुगतान कराने का बहाना भी बनाया जाता है। छोटी रकम इसलिए मांगी जाती है ताकि व्यक्ति को संदेह न हो और वह भुगतान प्रक्रिया में अपनी बैंकिंग जानकारी दर्ज कर दे। इसके बाद बड़ी रकम निकालने का प्रयास किया जाता है। लखनऊ में सामने आए मामलों में कई खातों से लगातार कई लेनदेन किए जाने की जानकारी इसी खतरे को गंभीर बनाती है।

APK गलती से इंस्टॉल हो जाए तो तुरंत इंटरनेट बंद करें

लखनऊ पुलिस ने ऐसे मामलों के लिए तत्काल कदम भी बताए हैं। यदि संदिग्ध APK फाइल गलती से इंस्टॉल हो गई हो तो सबसे पहले मोबाइल डेटा और वाई-फाई बंद करके फोन को इंटरनेट से अलग करना चाहिए। संदिग्ध ऐप को कोई नई अनुमति नहीं देनी चाहिए और बैंक खाते, यूपीआई तथा दूसरे वित्तीय खातों की गतिविधि तत्काल जांचनी चाहिए। महत्वपूर्ण पासवर्ड उसी संदिग्ध फोन से बदलने के बजाय किसी दूसरे सुरक्षित उपकरण से बदलना अधिक सुरक्षित है। यदि बैंक खाते से रकम निकल चुकी है तो समय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे मामले में राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर तुरंत सूचना देनी चाहिए और बैंक को भी तत्काल सूचित कर खाते या संबंधित डिजिटल माध्यम पर आवश्यक रोक लगवानी चाहिए। पुलिस ने संदिग्ध व्हाट्सएप संदेश, फोन नंबर, स्क्रीनशॉट और लेनदेन संबंधी रिकॉर्ड मिटाने के बजाय सुरक्षित रखने को कहा है, क्योंकि यही डिजिटल साक्ष्य अपराधियों तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं।

लखनऊ पुलिस की क्राइम ब्रांच के डीसीपी अनिल कुमार यादव ने भी डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने पर जोर दिया है। ‘ऑपरेशन डिजिटल कवच’ के तहत पुलिस संदिग्ध नंबरों, व्हाट्सएप संदेशों और साइबर ठगी के नए तरीकों से जुड़ी जानकारी एकत्र कर रही है। ग्रीन गैस के नाम पर होने वाली ठगी के मामले में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि अलग-अलग पीड़ितों के पास आए नंबर, APK फाइल, बैंक खाते और संदेशों में समानता मिलती है तो पुलिस उनके पीछे सक्रिय संगठित नेटवर्क तक पहुंच सकती है।

ग्रीन गैस के नाम पर चल रही यह ठगी साइबर अपराध के बदलते स्वरूप का उदाहरण है। अपराधी अब केवल पुरस्कार, लॉटरी या बैंक खाता बंद होने जैसे पुराने बहानों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि बिजली, गैस, मोबाइल और दूसरी रोजमर्रा की सेवाओं से जुड़ी ऐसी जरूरत चुन रहे हैं जिन पर उपभोक्ता तत्काल प्रतिक्रिया देता है। लखनऊ में 45 उपभोक्ताओं का पुलिस तक पहुंचना और कुछ ही मामलों में लाखों रुपये निकल जाना बताता है कि एक छोटी APK फाइल कितने बड़े आर्थिक नुकसान का रास्ता खोल सकती है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे सुरक्षित नियम बेहद सरल है—गैस बिल, मीटर, केवाईसी या कनेक्शन काटने के नाम पर आए किसी अनजान संदेश की फाइल या लिंक को न खोलें, कंपनी से उसके आधिकारिक माध्यम पर स्वयं संपर्क कर सत्यापन करें और रकम निकलने की स्थिति में बिना समय गंवाए 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं।

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