Lucknow News: 35 साल की लीज पर निजी हाथों में गया जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र, ₹250 करोड़ से होगा कायाकल्

Lucknow News: लखनऊ के JPNIC को 35 साल की लीज पर निजी कंसोर्टियम को सौंपा गया है। ₹200-250 करोड़ से अधूरे काम पूरे होंगे। जानें लीज की शर्तें, राजस्व मॉडल और विवाद।

Newstrack Network
Published on: 26 Aug 2026 9:58 PM IST (Updated on: 26 Aug 2026 9:59 PM IST)
JPNIC Lucknow
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 JPNIC Lucknow (Image Credit-Social Media)

लखनऊ। राजधानी लखनऊ के गोमती नगर में स्थित समाजवादी पार्टी सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट 'जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र' (JPNIC) के संचालन और पुनर्उद्धार को लेकर वर्षों से बना गतिरोध आखिरकार समाप्त हो गया है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए इसे निजी कंपनी को 35 वर्षों की लीज पर सौंपने का फैसला किया है।

ओपन टेंडरिंग प्रक्रिया के बाद 'वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिसॉर्ट्स' (लधानी ग्रुप) के कंसोर्टियम का चयन किया गया है। यह कंसोर्टियम 'जैसा है, जहां है' (As is, where is) के आधार पर अगले 2 वर्षों में अपने खर्च से लगभग 200 से 250 करोड़ रुपये लगाकर अधूरे कार्यों को पूरा करेगा और केंद्र का संचालन शुरू करेगा।

निर्माण, विवाद और जांच की पूरी कहानी: ड्रीम प्रोजेक्ट से बदहाली तक

शुरुआत (2013): समाजवादी पार्टी के शासनकाल में 2013 में जेपीएनआईसी की आधारशिला रखी गई थी। इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों वाले कन्वेंशन सेंटर, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और म्यूजियम के रूप में डिजाइन किया गया था।

लागत में भारी उछाल: शुरुआत में यह परियोजना करीब ₹265 करोड़ की आंकी गई थी, लेकिन लगातार संशोधनों के बाद इसका बजट बढ़कर ₹821 करोड़ से अधिक पहुंच गया।

2017 में काम ठप और जांच: वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद परियोजना में वित्तीय अनियमितताओं, फिजूलखर्ची और निर्माण में गड़बड़ियों के आरोप लगे। योगी सरकार ने निर्माण पर रोक लगाते हुए इसकी जांच के आदेश दिए।

सीबीआई/विजिलेंस और तकनीकी जांच: सीएजी (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट, तकनीकी टीमों और जांच एजेंसियों ने परियोजना के बढ़े हुए बजट, बिना मंजूरी के किए गए अतिरिक्त कार्यों और खरीद प्रक्रिया में गंभीर आपत्तियां दर्ज कीं।

9 वर्षों की बदहाली: जांच और मुकदमों के चलते लगभग 9 वर्षों तक यह विशाल इमारत बंद पड़ी रही। रखरखाव के अभाव में करोड़ों के उपकरण, लिफ्ट, डिजिटल स्क्रीन, फर्नीचर और टाइल्स सड़ने-टूटने लगे, बाउंड्री वॉल अधूरी रह गई और परिसर खंडहर में तब्दील होने लगा।

लीज की प्रमुख शर्तें और वित्तीय मॉडल

सरकारी खजाने पर शून्य भार: अब इसके जीर्णोद्धार और फिनिशिंग पर सरकार कोई धन खर्च नहीं करेगी। पूरा खर्च कंसोर्टियम उठाएगा।

परफॉर्मेंस गारंटी व अपफ्रंट प्रीमियम: चयनित कंपनी एलडीए को ₹10.11 करोड़ का अपफ्रंट प्रीमियम और ₹25 करोड़ की परफॉर्मेंस गारंटी जमा करेगी।

वार्षिक राजस्व: संचालन शुरू होते ही कंपनी एलडीए को पहले साल ₹6 करोड़ का भुगतान करेगी। इसमें प्रतिवर्ष 5% की अनिवार्य वृद्धि होगी, जो 35 साल पूरे होने तक सालाना लगभग ₹35 करोड़ तक पहुंच जाएगी।

मूल लागत की वसूली: एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार के अनुसार, निर्माण में खर्च हुए सरकारी धन (लगभग ₹821.74 करोड़) की भरपाई कंपनी से मिलने वाले इस राजस्व के जरिए अगले 30 वर्षों में ब्याज सहित राजकोष (ट्रेजरी) में की जाएगी।

किसका क्या अधिकार रहेगा?

निजी कंपनी के पास: 107 कमरों वाला लग्जरी होटल, 1000 व 2000 क्षमता वाले दो ऑडिटोरियम, कन्वेंशन सेंटर, ऑल-वेदर लॉन टेनिस कोर्ट, स्विमिंग/डाइविंग पूल, 700 वाहनों की 3-मंजिला मल्टीलेवल पार्किंग, कैफेटेरिया और अन्य स्पोर्ट्स ब्लॉक का संचालन कंपनी करेगी।

एलडीए के पास सुरक्षित: लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम से बने म्यूजियम ब्लॉक का स्वामित्व, संचालन और रखरखाव पूरी तरह एलडीए के पास रहेगा। एलडीए को मिलने वाले कुल राजस्व का 15% हिस्सा म्यूजियम के विस्तार और संरक्षण पर खर्च होगा।

सरकारी उपयोग: भवन की 18वीं मंजिल पर बने अत्याधुनिक हेलिपैड का उपयोग राज्य सरकार अपनी जरूरत के हिसाब से करेगी। इसके अलावा, साल में 50 दिन सरकारी आयोजनों के लिए यह परिसर पूरी तरह निशुल्क रहेगा।

खिलाड़ियों को रियायती दरें: क्लब और स्पोर्ट्स मेंबरशिप की फीस निजी कंपनी मनमाने ढंग से तय नहीं कर सकेगी। इसके नियम और दरें शासन द्वारा गठित आधिकारिक समिति तय करेगी, जिसमें स्थानीय खिलाड़ियों के लिए रियायती दरों का प्रावधान होगा।

फैसले पर सियासी तकरार

कैबिनेट के इस फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए सोशल मीडिया पर लिखा:

"भाजपा सरकार है या दुकानदार? अब उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने लखनऊ के JPNIC को निजी हाथों में सौंपने का निर्णय कैबिनेट में ले लिया है। अब तो बस सरकार को ही ठेके पर देना या बेचना बचा है। 'कमीशन' भ्रष्ट भाजपा की गाड़ी का तेल-पानी है और 'निजीकरण' उसका जुगाड़।"

वहीं, सरकार और एलडीए का तर्क है कि 9 साल से बंद पड़े 800 करोड़ से अधिक की सार्वजनिक संपत्ति को बदहाली से बचाने, लखनऊ को विश्वस्तरीय कन्वेंशन हब देने और बिना सरकारी पैसा लगाए खजाने की भरपाई करने के लिए यह पीपीपी/लीज मॉडल सबसे व्यावहारिक और पारदर्शी कदम है।

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