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Lucknow News: ब्रेन हैमरेज के मरीज का बिना ओपन सर्जरी इलाज, केजीएमयू ने अपनाई फ्लो डाइवर्टर तकनीक
Lucknow News: केजीएमयू लखनऊ में बहराइच के 28 वर्षीय युवक के फटे ब्रेन एन्यूरिज्म का बिना सिर की हड्डी खोले एंडोवास्कुलर तकनीक से उपचार किया गया। जानिए फ्लो डाइवर्टर, डीएसए जांच और आयुष्मान योजना की भूमिका।
KGMU Brain Hemorrhage Treatment (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। ब्रेन हैमरेज के एक जटिल मामले में किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के चिकित्सकों ने बहराइच निवासी 28 वर्षीय युवक का बिना सिर की हड्डी खोले एंडोवास्कुलर तकनीक से उपचार किया है। युवक के मस्तिष्क की एक धमनी की दीवार कमजोर होकर गुब्बारे की तरह फूल गई थी। इस असामान्य उभार, जिसे ब्रेन एन्यूरिज्म कहा जाता है, के फटने से मस्तिष्क के आसपास रक्तस्राव शुरू हो गया था। मरीज को अचानक तेज सिरदर्द, उल्टी और चक्कर आने की शिकायत हुई। जाँच में बाईं पोस्टीरियर कम्युनिकेटिंग आर्टरी (पीकॉम) से संबंधित एन्यूरिज्म में ब्लेब फटने की जानकारी सामने आई। चिकित्सकों ने विशेष इमेजिंग तकनीक से प्रभावित रक्तवाहिनी की पहचान की और फिर एक अत्यंत पतली नली के माध्यम से उसके भीतर विशेष उपकरण स्थापित कर रक्त प्रवाह को नियंत्रित करने की प्रक्रिया पूरी की।
केजीएमयू के इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विशेषज्ञों ने नौ अक्टूबर को यह प्रक्रिया की। उपचार के बाद मरीज को बेहोशी की दवाओं के प्रभाव से बाहर लाया गया और उसकी श्वासनली में लगी ट्यूब हटा दी गई। संस्थान से प्राप्त विवरण के अनुसार, उसकी स्थिति फिलहाल स्थिर है और वह न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. राजेश वर्मा की देखरेख में है। मरीज की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उपचार में इस्तेमाल किए गए विशेष उपकरण आयुष्मान भारत योजना की सहायता से उपलब्ध कराए गए। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फटे हुए ब्रेन एन्यूरिज्म में समय पर उपचार नहीं मिलने से दोबारा रक्तस्राव, मस्तिष्क को गंभीर क्षति और मृत्यु तक का खतरा हो सकता है।
क्या होता है ब्रेन एन्यूरिज्म और इसके फटने से कैसे होता है रक्तस्राव?
मानव मस्तिष्क को रक्त पहुँचाने वाली धमनियों की दीवार सामान्यतः इतनी मजबूत होती है कि वह रक्त के निरंतर दबाव को सहन कर सके। लेकिन कुछ व्यक्तियों में धमनी की दीवार का कोई हिस्सा कमजोर हो जाता है। रक्त के दबाव के कारण यह हिस्सा बाहर की ओर उभरने लगता है और धीरे-धीरे थैली या गुब्बारे जैसा आकार ले सकता है। इसे मस्तिष्कीय एन्यूरिज्म कहा जाता है। हर एन्यूरिज्म फटता नहीं है और कई लोगों में यह किसी अन्य कारण से कराई गई जाँच के दौरान संयोग से पता चलता है। लेकिन यदि इसकी दीवार फट जाए, तो रक्त मस्तिष्क के आसपास मौजूद स्थान में फैल सकता है।
ऐसी स्थिति को सबएरैक्नॉइड हैमरेज कहा जाता है। यह ब्रेन हैमरेज का एक गंभीर प्रकार है। इसमें अचानक असहनीय सिरदर्द, उल्टी, गर्दन में अकड़न, प्रकाश से परेशानी, चेतना में बदलाव या बेहोशी जैसे लक्षण हो सकते हैं। कुछ मरीजों को यह सिरदर्द जीवन का सबसे तेज सिरदर्द महसूस होता है। रक्तस्राव के बाद मस्तिष्क के भीतर दबाव बढ़ने, दोबारा रक्तस्राव होने और मस्तिष्क तक रक्त की आपूर्ति प्रभावित होने जैसी जटिलताएँ विकसित हो सकती हैं। इसलिए अचानक शुरू हुआ असामान्य रूप से तीव्र सिरदर्द, विशेषकर उल्टी या बेहोशी के साथ, तत्काल आपातकालीन चिकित्सा जाँच की आवश्यकता का संकेत है।
पीकॉम धमनी में बना था कमजोर उभार, जाँच से पता चली रक्तस्राव की वजह
बहराइच के युवक के मस्तिष्क की बाईं पोस्टीरियर कम्युनिकेटिंग आर्टरी से संबंधित हिस्से में एन्यूरिज्म की पहचान हुई। इस धमनी को संक्षेप में पीकॉम कहा जाता है। यह मस्तिष्क की रक्त आपूर्ति करने वाली महत्वपूर्ण धमनियों के बीच संपर्क स्थापित करने वाली संरचना का हिस्सा है। उपलब्ध चिकित्सकीय विवरण के अनुसार, मरीज के एन्यूरिज्म में ब्लेब नामक छोटा कमजोर उभार फट गया था। ब्लेब एन्यूरिज्म की दीवार पर बनने वाला ऐसा छोटा उभार हो सकता है जिसकी संरचना आसपास के हिस्से की तुलना में अधिक कमजोर हो। इसकी मौजूदगी उपचार की योजना बनाते समय महत्वपूर्ण हो सकती है।
केजीएमयू में मरीज को इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी लैब ले जाया गया, जहाँ डिजिटल सबट्रैक्शन एंजियोग्राफी (डीएसए) की गई। यह मस्तिष्क की रक्तवाहिनियों को विस्तार से देखने की विशेष तकनीक है। इसमें रक्तवाहिनियों के भीतर कंट्रास्ट पदार्थ पहुँचाकर एक्स-रे की सहायता से उनकी संरचना और रक्त प्रवाह का अध्ययन किया जाता है। कंप्यूटर तकनीक से आसपास की हड्डियों और अन्य संरचनाओं की छवि का प्रभाव कम करके रक्तवाहिनियों को अधिक स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है।
डीएसए से चिकित्सकों को यह समझने में मदद मिलती है कि एन्यूरिज्म कहाँ बना है, उसका आकार कैसा है, वह किस धमनी से जुड़ा है और आसपास की रक्तवाहिनियों की स्थिति क्या है। इसी जानकारी के आधार पर यह निर्णय लिया जाता है कि मरीज के लिए कौन-सी उपचार पद्धति अधिक उपयुक्त होगी। केजीएमयू में युवक की जाँच के बाद चिकित्सकों ने एंडोवास्कुलर फ्लो डाइवर्टर तकनीक का चयन किया।
बिना सिर खोले दिमाग की धमनी तक कैसे पहुँचे चिकित्सक?
एंडोवास्कुलर उपचार का अर्थ है रक्तवाहिनी के भीतर से बीमारी वाले स्थान तक पहुँचकर उपचार करना। इसमें सामान्यतः जाँघ या कलाई की रक्तवाहिनी से विशेष कैथेटर प्रवेश कराया जाता है। चिकित्सक एक्स-रे आधारित मार्गदर्शन की सहायता से इसे मस्तिष्क की प्रभावित धमनी तक पहुँचाते हैं। इसके भीतर से अत्यंत पतले माइक्रो कैथेटर और दूसरे विशेष उपकरणों को आगे बढ़ाया जा सकता है।
इस प्रक्रिया में सिर की हड्डी को खोलने की आवश्यकता नहीं होती। हालाँकि, इसे पूरी तरह बिना किसी प्रवेश या हस्तक्षेप वाला उपचार कहना भी तकनीकी रूप से सही नहीं है, क्योंकि रक्तवाहिनी में कैथेटर प्रवेश कराने के लिए शरीर में छोटा छिद्र बनाया जाता है। इसका मुख्य लाभ यह है कि चुनिंदा मरीजों में खुली मस्तिष्क शल्य चिकित्सा के बिना रक्तवाहिनी की समस्या का उपचार किया जा सकता है।
केजीएमयू में नौ अक्टूबर को इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी के डॉ. मनोज कुमार, डॉ. सौरभ कुमार और उनकी टीम ने संबंधित विभागाध्यक्षों की देखरेख में प्रक्रिया पूरी की। माइक्रो कैथेटर के माध्यम से प्रभावित रक्तवाहिनी तक पहुँचकर विशेष फ्लो डाइवर्टर उपकरण लगाया गया। चिकित्सकों के अनुसार, प्रक्रिया के बाद मरीज को बेहोशी से बाहर लाकर उसकी श्वासनली की ट्यूब हटा दी गई। वह फिलहाल न्यूरोलॉजी विभाग की निगरानी में है।
फ्लो डाइवर्टर क्या है और यह कैसे काम करता है?
फ्लो डाइवर्टर एक विशेष प्रकार का महीन धातु-जालीदार उपकरण होता है जिसे रक्तवाहिनी के भीतर एन्यूरिज्म के प्रवेश वाले हिस्से पर स्थापित किया जाता है। इसका उद्देश्य रक्त के मुख्य प्रवाह को धमनी के सामान्य रास्ते में बनाए रखते हुए एन्यूरिज्म की थैली के भीतर जाने वाले रक्त प्रवाह को कम करना होता है। इससे समय के साथ एन्यूरिज्म के भीतर रक्त का थक्का बनने और उसके अलग होने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सकता है। धीरे-धीरे रक्तवाहिनी की भीतरी परत उपकरण के ऊपर विकसित हो सकती है, जिससे प्रभावित हिस्से का पुनर्निर्माण होता है।
इस तकनीक को समझने के लिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि फ्लो डाइवर्टर लगाने से एन्यूरिज्म हमेशा तत्काल पूरी तरह बंद नहीं होता। कई मामलों में इसका प्रभाव समय के साथ विकसित होता है और पूर्ण बंद होने की पुष्टि बाद की इमेजिंग जाँचों से की जाती है। पीकॉम धमनी से संबंधित एन्यूरिज्म पर प्रकाशित अध्ययनों में भी उपचार के बाद नियमित एंजियोग्राफी तथा अन्य जाँचों से परिणाम का मूल्यांकन किया गया है।
फ्लो डाइवर्टर सभी प्रकार के एन्यूरिज्म के लिए पहली पसंद नहीं होता। विशेष रूप से पहले से फटे एन्यूरिज्म में इसके उपयोग का निर्णय सावधानी से किया जाता है, क्योंकि उपकरण में रक्त का थक्का बनने से रोकने के लिए प्लेटलेट की गतिविधि कम करने वाली दवाओं की आवश्यकता पड़ सकती है। दूसरी ओर, रक्तस्राव वाले मरीज में ऐसी दवाओं के उपयोग से संबंधित जोखिमों का भी मूल्यांकन करना पड़ता है। इसलिए मरीज की धमनी की बनावट, एन्यूरिज्म की स्थिति, रक्तस्राव की गंभीरता और अन्य उपचार विकल्पों के आधार पर विशेषज्ञ निर्णय लेते हैं।
ब्रेन एन्यूरिज्म का इलाज केवल फ्लो डाइवर्टर से ही नहीं होता
ब्रेन एन्यूरिज्म के उपचार के लिए अलग-अलग तकनीकें उपलब्ध हैं। इनमें माइक्रोसर्जिकल क्लिपिंग, एंडोवास्कुलर कॉइलिंग और चुनिंदा परिस्थितियों में फ्लो डाइवर्टर का इस्तेमाल शामिल है। क्लिपिंग में शल्य चिकित्सक एन्यूरिज्म के आधार पर विशेष क्लिप लगाकर उसमें रक्त के प्रवेश को रोकते हैं। कॉइलिंग में कैथेटर के माध्यम से एन्यूरिज्म की थैली के भीतर महीन धातु की कॉइल रखी जाती हैं, ताकि उसमें रक्त का प्रवाह कम हो और थक्का बन सके।
कुछ जटिल एन्यूरिज्म में सामान्य कॉइलिंग या क्लिपिंग उपयुक्त नहीं होती। ऐसे मामलों में फ्लो डाइवर्टर या अन्य संयुक्त तकनीकों पर विचार किया जा सकता है। कौन-सी पद्धति अधिक उपयुक्त होगी, यह केवल एन्यूरिज्म के आकार पर निर्भर नहीं करता। उसकी गर्दन की चौड़ाई, स्थान, आसपास की शाखाएँ, मरीज की आयु, रक्तस्राव की स्थिति और विशेषज्ञ केंद्र की उपलब्ध सुविधाएँ भी महत्वपूर्ण होती हैं।
बहराइच के युवक के मामले में चिकित्सकों ने फ्लो डाइवर्टर का इस्तेमाल किया। लेकिन उपलब्ध विवरण में एन्यूरिज्म का सटीक आकार, उपकरण का नाम और आगे की निर्धारित इमेजिंग जाँचों का विवरण नहीं दिया गया है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि उपकरण लगते ही एन्यूरिज्म पूरी तरह समाप्त हो गया। तत्काल प्रक्रिया सफल होने और लंबे समय तक एन्यूरिज्म सुरक्षित रूप से बंद रहने की पुष्टि अलग-अलग चिकित्सकीय चरण हैं।
ब्रेन हैमरेज के बाद भी क्यों जरूरी है निगरानी?
फटे हुए ब्रेन एन्यूरिज्म का उपचार कर देने के बाद भी मरीज को कुछ समय तक चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता होती है। इसका कारण यह है कि शुरुआती रक्तस्राव के प्रभाव तुरंत समाप्त नहीं होते। कुछ मरीजों में मस्तिष्क की रक्तवाहिनियों में संकुचन, मस्तिष्क तक रक्त की आपूर्ति में कमी, मस्तिष्क के भीतर तरल पदार्थ जमा होने या अन्य न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं का जोखिम बना रह सकता है।
रक्तवाहिनियों में संकुचन को वासोस्पाज्म कहा जाता है। यह एन्यूरिज्म फटने के बाद विकसित होने वाली संभावित जटिलताओं में शामिल है। कुछ मरीजों में रक्तस्राव के बाद मस्तिष्क के भीतर तरल पदार्थ के सामान्य प्रवाह में बाधा आ सकती है, जिससे हाइड्रोसेफेलस जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए मरीज की चेतना, हाथ-पैरों की ताकत, बोलने की क्षमता, रक्तचाप और अन्य न्यूरोलॉजिकल संकेतों पर ध्यान दिया जाता है।
फ्लो डाइवर्टर लगाए जाने के बाद भी चिकित्सक यह देखते हैं कि उपकरण अपनी सही स्थिति में है या नहीं, मुख्य रक्तवाहिनी में रक्त प्रवाह पर्याप्त बना हुआ है या नहीं और एन्यूरिज्म के भीतर रक्त प्रवाह में अपेक्षित परिवर्तन हो रहा है या नहीं। मरीज को कौन-सी दवाएँ और कितने समय तक दी जाएँगी, इसका निर्णय उपचार करने वाली टीम करती है। इन दवाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के बंद करना खतरनाक हो सकता है।
आयुष्मान भारत योजना से उपलब्ध हुए महँगे उपकरण
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पक्ष मरीज की आर्थिक स्थिति भी है। केजीएमयू से प्राप्त जानकारी के अनुसार, युवक के परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। ऐसे में उपचार में इस्तेमाल किए जाने वाले आवश्यक उपकरण आयुष्मान भारत योजना के सहयोग से उपलब्ध कराए गए। इससे चिकित्सकों को उपचार की योजना आगे बढ़ाने में सहायता मिली।
ब्रेन एन्यूरिज्म के एंडोवास्कुलर उपचार में विशेष कैथेटर, तार, इमेजिंग व्यवस्था और रोग के अनुसार अन्य उपकरणों की आवश्यकता हो सकती है। कुछ उपकरणों की लागत काफी अधिक होती है। इसलिए आर्थिक सहायता की उपलब्धता जटिल उपचार तक मरीज की पहुँच के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालाँकि, उपलब्ध विवरण में मरीज के उपचार की कुल लागत, आयुष्मान योजना से स्वीकृत राशि और अस्पताल की ओर से वहन किए गए खर्च का अलग-अलग विवरण नहीं है। इसलिए इस विशेष मामले में कितने रुपये की आर्थिक सहायता मिली, इसकी निश्चित राशि बताना संभव नहीं है। मरीज और उसके परिजनों ने उपचार के बाद केजीएमयू प्रशासन, चिकित्सकों तथा आयुष्मान योजना के प्रति आभार व्यक्त किया है।
अचानक असहनीय सिरदर्द हो तो उसे सामान्य दर्द न समझें
ब्रेन एन्यूरिज्म फटने का सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत अचानक शुरू होने वाला अत्यंत तेज सिरदर्द है। सामान्य सिरदर्द धीरे-धीरे बढ़ सकता है, लेकिन एन्यूरिज्म फटने पर होने वाला सिरदर्द कई बार कुछ ही क्षणों में अत्यधिक तीव्र हो जाता है। इसे चिकित्सकीय भाषा में थंडरक्लैप हेडेक कहा जाता है। इसके साथ उल्टी, गर्दन में अकड़न, दृष्टि में बदलाव, बेहोशी या शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी भी हो सकती है।
ऐसे लक्षण दिखाई देने पर मरीज को तत्काल ऐसे अस्पताल ले जाना चाहिए जहाँ आपातकालीन न्यूरोलॉजिकल जाँच और मस्तिष्क की इमेजिंग उपलब्ध हो। केवल दर्द निवारक दवा लेकर प्रतीक्षा करना खतरनाक हो सकता है। हर अचानक तेज सिरदर्द का कारण एन्यूरिज्म नहीं होता, लेकिन इसके पीछे गंभीर बीमारी की संभावना होने के कारण तत्काल जाँच आवश्यक है।
ब्रेन एन्यूरिज्म के जोखिम से जुड़े कारकों में उच्च रक्तचाप, धूम्रपान, कुछ आनुवंशिक स्थितियाँ और पारिवारिक इतिहास शामिल हो सकते हैं। फिर भी एन्यूरिज्म ऐसे व्यक्तियों में भी मिल सकता है जिनमें कोई स्पष्ट जोखिम कारक सामने न आया हो। बहराइच के युवक की उम्र केवल 28 वर्ष थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि गंभीर मस्तिष्कीय रक्तवाहिनी संबंधी समस्याएँ केवल अधिक उम्र के लोगों तक सीमित नहीं हैं। हालाँकि, इस मरीज में एन्यूरिज्म बनने का विशिष्ट कारण उपलब्ध विवरण से स्पष्ट नहीं होता।
केजीएमयू में जटिल न्यूरोवैस्कुलर उपचार की सुविधा का उदाहरण
केजीएमयू में बहराइच के युवक का उपचार इस बात का उदाहरण है कि आधुनिक इमेजिंग और रक्तवाहिनी के भीतर से की जाने वाली प्रक्रियाओं का उपयोग जटिल मस्तिष्कीय बीमारियों में किस प्रकार किया जा सकता है। इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी, एनेस्थीसिया और न्यूरोलॉजी विभागों के बीच समन्वय इस उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। विशेष रूप से गंभीर रक्तस्राव वाले मरीज में सही समय पर बीमारी की पहचान, उपयुक्त उपचार तकनीक का चयन और प्रक्रिया के बाद निगरानी आवश्यक होती है।
मरीज की तत्काल स्थिति संतोषजनक बताई गई है। फिर भी दीर्घकालीन उपचार परिणाम का मूल्यांकन आगामी चिकित्सकीय जाँचों और नियमित निगरानी के आधार पर होगा। इस घटना का व्यापक संदेश यह है कि ब्रेन हैमरेज के सभी मामलों में सिर खोलकर ऑपरेशन करना आवश्यक नहीं होता। कुछ विशेष प्रकार के एन्यूरिज्म का उपचार रक्तवाहिनियों के भीतर से भी किया जा सकता है। लेकिन उपचार का तरीका प्रत्येक मरीज की बीमारी और उसकी गंभीरता के अनुसार तय किया जाना चाहिए।
बहराइच के 28 वर्षीय युवक को समय पर केजीएमयू पहुँचाने, डीएसए से प्रभावित धमनी की पहचान करने और नौ अक्टूबर को फ्लो डाइवर्टर स्थापित करने के बाद उसकी स्थिति स्थिर बताई गई है। आर्थिक सहायता के कारण आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो सकी। यह उपचार आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञ चिकित्सकीय निर्णय और समय पर उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं के महत्व को रेखांकित करता है।


