Lucknow: हादसे ने छीने दोनों हाथ, KGMU ने लौटाई आत्मनिर्भर जिंदगी की उम्मीद

KGMU News: बिजली हादसे में दोनों हाथ गंवाने वाले 22 वर्षीय नीरज यादव को KGMU ने निःशुल्क कृत्रिम हाथ उपलब्ध कराए। अब PMR विभाग में उन्हें दैनिक कामों के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

Newstrack Network
Published on: 26 Sept 2026 12:47 AM IST
KGMU Lucknow
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KGMU News: नौ महीने पहले बिजली के एक हादसे ने भदोही के 22 वर्षीय नीरज यादव की जिंदगी एक झटके में बदल दी थी। गंभीर करंट लगने के बाद उन्हें अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े। हादसे में जान तो बच गई, लेकिन इसके बाद नहाने, कपड़े पहनने, खाना खाने, वस्तु पकड़ने और रोजमर्रा के दूसरे सामान्य कामों के लिए भी दूसरों पर निर्भरता बढ़ गई। कृत्रिम हाथ इस निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकते थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि निजी संस्थान में इसका खर्च उठा सके। करीब नौ महीने बाद नीरज की जिंदगी अब एक बार फिर नई दिशा में बढ़ रही है। King George’s Medical University यानी KGMU के Physical Medicine and Rehabilitation (PMR) विभाग ने उन्हें दोनों कृत्रिम हाथ निःशुल्क उपलब्ध कराए हैं और अब उन्हें इन हाथों के सहारे दैनिक काम करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

नीरज की कहानी में महत्वपूर्ण बात केवल कृत्रिम हाथ मिल जाना नहीं है। किसी व्यक्ति के हाथ या पैर काटने के बाद पुनर्वास में कृत्रिम अंग लगाना प्रक्रिया का एक हिस्सा भर है। कृत्रिम अंग को शरीर के अनुरूप तैयार करना, उसे पहनना-उतारना सीखना, उसकी सहायता से वस्तुओं को पकड़ने और दैनिक गतिविधियां करने का अभ्यास तथा धीरे-धीरे कार्यात्मक स्वतंत्रता हासिल करना लंबी प्रक्रिया हो सकती है। नीरज के मामले में भी KGMU की टीम अब इसी दूसरे चरण पर काम कर रही है। संस्थान के अनुसार कृत्रिम हाथ लगाने के बाद उन्हें इनके संचालन और रोजमर्रा की गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वह धीरे-धीरे अपनी निर्भरता कम कर सकें।

जुलाई में KGMU पहुंचे थे नीरज, पैसे बने थे सबसे बड़ी बाधा

हादसे के कई महीने बाद नीरज जुलाई 2026 में KGMU के PMR विभाग के संपर्क में आए। परिवार के सामने सबसे बड़ी समस्या कृत्रिम हाथों की कीमत थी। KGMU की ओर से जारी जानकारी के अनुसार निजी संस्थानों में इस तरह के प्रोस्थेटिक हाथ लगवाने पर करीब ₹50,000 तक का खर्च आ सकता था। नीरज यह रकम जुटाने की स्थिति में नहीं थे। इसके बाद PMR विभाग ने स्वयंसेवी सहयोग का रास्ता निकाला और Inner Wheel Club तथा एक स्वयंसेवी संस्था के सहयोग से ₹9,500 की राशि जुटाई गई। अस्पताल ने चिकित्सा, फिटिंग और संबंधित पुनर्वास सुविधाएं निःशुल्क उपलब्ध कराईं।

यहां ₹9,500 और ₹50,000 के आंकड़ों को लेकर भी स्पष्टता जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि बाजार में मिलने वाले हर कृत्रिम हाथ की कीमत ₹50,000 है और KGMU ने वही उपकरण केवल ₹9,500 में बना दिया। कृत्रिम हाथों की कीमत उनकी तकनीक, सामग्री, कटे हुए हाथ के स्तर, कार्यक्षमता और नियंत्रण प्रणाली के आधार पर बहुत अलग हो सकती है। KGMU के मामले में ₹50,000 निजी संस्थानों में संभावित खर्च का संस्थान द्वारा बताया गया अनुमान है, जबकि ₹9,500 स्वयंसेवी सहयोग से जुटाई गई राशि थी जिससे नीरज को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने की आवश्यक प्रक्रिया में सहायता मिली।

‘सेवा संकल्प अभियान-2026’ के तहत मिली मदद

KGMU की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद के अनुसार यह पहल विश्वविद्यालय के ‘सेवा संकल्प अभियान-2026’ के तहत PMR विभाग की Prosthetic and Orthotic Unit ने की। पूरे पुनर्वास प्रयास का नेतृत्व PMR विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार गुप्ता ने किया। टीम में सहायक प्रोफेसर डॉ. आराधना शुक्ला, प्रोस्थेटिक एवं ऑर्थोटिक यूनिट की प्रभारी शगुन सिंह, तकनीशियन विमलेश और मनोज तथा शोभाराम यादव भी शामिल रहे।

KGMU के अपने रिकॉर्ड भी बताते हैं कि PMR विभाग में कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण उपलब्ध कराने का काम बड़े स्तर पर होता है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार विभाग में 2025 में 267 प्रोस्थेसिस उपलब्ध कराए गए थे, जबकि 2026 में उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों तक 253 प्रोस्थेसिस दिए जा चुके थे। इसी अवधि में 2026 में 4,013 ऑर्थोसिस, 5,187 फिजियोथेरेपी और 5,440 ऑक्यूपेशनल थेरेपी सेवाएं दर्ज थीं। ये आंकड़े नीरज के मामले को एक व्यापक पुनर्वास व्यवस्था के संदर्भ में रखते हैं।

कृत्रिम हाथ लग जाना अंतिम मंजिल नहीं, असली काम अब प्रशिक्षण का

नीरज के मामले में एक महत्वपूर्ण चिकित्सकीय पहलू यह है कि कृत्रिम हाथ लगने के तुरंत बाद कोई व्यक्ति अपने पुराने हाथ की तरह हर काम करने नहीं लगता। खासकर दोनों ऊपरी अंग गंवाने वाले व्यक्ति में पुनर्वास अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। उसे अपने कृत्रिम हाथों की क्षमता और सीमाओं को समझते हुए नए तरीके से दैनिक गतिविधियां सीखनी पड़ती हैं। इसी कारण कृत्रिम अंग सेवाओं में केवल माप लेना और उपकरण फिट करना ही नहीं, बल्कि मूल्यांकन, फिटिंग और उसके इस्तेमाल का प्रशिक्षण भी शामिल होता है। सरकारी पुनर्वास केंद्रों की प्रोस्थेटिक एवं ऑर्थोटिक सेवाओं में भी आकलन, माप, उपकरण निर्माण, फिटिंग और प्रशिक्षण को एक ही पुनर्वास प्रक्रिया के हिस्से के रूप में रखा जाता है।

नीरज को अभी अपने कृत्रिम हाथों के संचालन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका लक्ष्य यह है कि वह धीरे-धीरे रोजमर्रा की अधिक से अधिक गतिविधियां स्वयं कर सकें। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने कृत्रिम हाथों के साथ दैनिक कार्यों का अभ्यास शुरू कर दिया है। इसलिए इस समय यह कहना कि नीरज पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुके हैं, जल्दबाजी होगी। अधिक सही स्थिति यह है कि कृत्रिम हाथ मिलने के बाद उनकी कार्यात्मक स्वतंत्रता की पुनर्वास यात्रा शुरू हुई है।

दोनों हाथ गंवाने के बाद सबसे बड़ी चुनौती केवल शारीरिक नहीं

किसी युवा व्यक्ति के दोनों हाथ अचानक चले जाना केवल शारीरिक अक्षमता नहीं पैदा करता। उसकी शिक्षा, रोजगार, सामाजिक संबंध, आत्मविश्वास और परिवार की आर्थिक स्थिति तक प्रभावित हो सकती है। सामान्य जीवन में जिन गतिविधियों के बारे में स्वस्थ व्यक्ति को सोचना भी नहीं पड़ता, वही काम ऐसे व्यक्ति के लिए बड़ी चुनौती बन जाते हैं। इसी कारण आधुनिक पुनर्वास चिकित्सा का लक्ष्य केवल बीमारी या चोट का इलाज करना नहीं बल्कि व्यक्ति को उसकी अधिकतम संभव कार्यात्मक स्वतंत्रता तक वापस पहुंचाना है।

KGMU का Rehabilitation and Artificial Limb Centre यानी RALC विश्वविद्यालय की पुनर्वास संरचना का हिस्सा है और PMR विभाग में फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, ऑर्थोसिस तथा प्रोस्थेसिस सेवाएं उपलब्ध हैं। नीरज जैसे मरीज में ऑक्यूपेशनल थेरेपी विशेष महत्व रख सकती है क्योंकि लक्ष्य केवल हाथ जैसा दिखने वाला उपकरण उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उपलब्ध कार्यक्षमता का इस्तेमाल करके रोजमर्रा की जिंदगी के काम फिर से सीखना है।

कृत्रिम हाथ भी कई तरह के, जरूरत के अनुसार होता है चुनाव

कृत्रिम ऊपरी अंग सामान्यतः एक ही प्रकार के नहीं होते। कुछ उपकरण मुख्य रूप से शरीर का स्वरूप संतुलित करने के लिए होते हैं, कुछ यांत्रिक तरीके से संचालित किए जाते हैं और अधिक उन्नत प्रणालियों में मांसपेशियों से मिलने वाले विद्युत संकेतों की मदद से संचालित होने वाले मायोइलेक्ट्रिक हाथ भी उपलब्ध हैं। अधिक उन्नत तकनीक सामान्यतः अधिक महंगी होती है और प्रत्येक मरीज के लिए जरूरी या उपयुक्त भी नहीं होती।

कौन सा कृत्रिम हाथ सबसे उपयोगी होगा, यह हाथ किस स्तर से कटा है, शेष अंग की स्थिति कैसी है, मरीज की उम्र और दैनिक जरूरतें क्या हैं, उसे किस प्रकार का काम करना है और उपकरण को नियमित रूप से संभालने की उसकी क्षमता कैसी है—इन सब पर निर्भर करता है। इसलिए किसी अत्यधिक महंगे कृत्रिम हाथ को ही हर मरीज के लिए ‘बेहतर’ मानना उचित नहीं है। पुनर्वास की सफलता इस बात से अधिक तय होती है कि चुना गया उपकरण व्यक्ति की जरूरत के अनुरूप कितना उपयोगी है और वह उसे कितनी अच्छी तरह इस्तेमाल करना सीख पाता है।

आर्थिक तंगी के कारण कृत्रिम अंग से वंचित रहना बड़ी चुनौती

नीरज की कहानी एक व्यापक समस्या की तरफ भी ध्यान खींचती है। दुर्घटना या बीमारी के बाद किसी व्यक्ति की जान बच जाने के बावजूद उसका पुनर्वास खर्च परिवार के लिए नई आर्थिक चुनौती बन सकता है। अस्पताल में प्रारंभिक उपचार के बाद कृत्रिम अंग, नियमित फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, उपकरण की मरम्मत और समय के साथ उसे बदलने की जरूरत पड़ सकती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में यही खर्च पुनर्वास को बीच में रोक सकता है।

इसीलिए सरकारी अस्पतालों, पुनर्वास केंद्रों, सामाजिक संस्थाओं और सहायता योजनाओं का तालमेल महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकारी पुनर्वास सेवाओं में कृत्रिम अंग और सहायक उपकरणों के आकलन, निर्माण, फिटिंग और प्रशिक्षण की व्यवस्था इस अंतर को कम कर सकती है। नीरज के मामले में केवल ₹9,500 का बाहरी सहयोग जुटाकर KGMU की चिकित्सा और पुनर्वास व्यवस्था के साथ जोड़ना दिखाता है कि अपेक्षाकृत सीमित आर्थिक मदद भी संस्थागत उपचार उपलब्ध होने पर किसी व्यक्ति के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है।

दुर्घटना के नौ महीने बाद शुरू हुआ जिंदगी का दूसरा अध्याय

नीरज के हादसे को लगभग नौ महीने हो चुके हैं। इस दौरान दोनों हाथ गंवाने के बाद उन्हें अपनी लगभग हर दैनिक जरूरत के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा। जुलाई में KGMU पहुंचने और अब कृत्रिम हाथ मिलने के बीच उनकी जिंदगी में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह आया है कि निर्भरता को स्थायी मान लेने के बजाय पुनर्वास का रास्ता खुला है।

KGMU के PMR विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार गुप्ता के अनुसार विभाग का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को आधुनिक पुनर्वास सेवाएं देकर उन्हें सम्मानजनक और अधिक आत्मनिर्भर जीवन की ओर लौटाना है। यह मामला चिकित्सा की उस भूमिका को सामने लाता है जो ऑपरेशन, दवा और अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद शुरू होती है। दुर्घटना में किसी अंग को गंवाने वाले व्यक्ति के लिए जीवन बचाना उपचार का पहला चरण है, लेकिन उसे दोबारा अपने काम करने, समाज में सक्रिय रहने और अपनी जिंदगी पर अधिक नियंत्रण हासिल करने योग्य बनाना पुनर्वास का अगला और उतना ही महत्वपूर्ण चरण है।

22 वर्षीय नीरज यादव के दोनों प्राकृतिक हाथ वापस नहीं आ सकते और कृत्रिम हाथ उनकी पूरी तरह जगह भी नहीं ले सकते, लेकिन आधुनिक पुनर्वास का उद्देश्य भी असंभव वादा करना नहीं बल्कि उपलब्ध क्षमता को अधिकतम करना है। नौ महीने पहले बिजली हादसे ने जिस युवा को सामान्य दैनिक गतिविधियों के लिए दूसरों पर निर्भर कर दिया था, अब वही नीरज कृत्रिम हाथों के साथ उन्हें दोबारा सीख रहे हैं। KGMU की चिकित्सा व्यवस्था, स्वयंसेवी संस्थाओं के ₹9,500 के सहयोग और पुनर्वास टीम के प्रशिक्षण ने उनके सामने एक नई संभावना खड़ी की है-हादसे से पहले वाली जिंदगी हूबहू लौटाने की नहीं, बल्कि बदली हुई परिस्थितियों में अधिक स्वतंत्र और सम्मानजनक जिंदगी फिर से बनाने की।

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