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लखनऊ बना विदेशी नागरिकों को ठगने वाले फर्जी कॉल सेंटरों का नया ठिकाना, अलीगंज से अमेरिका तक फैले नेटवर्क की तलाश
Lucknow News: लखनऊ के अलीगंज में अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने वाले फर्जी कॉल सेंटर का खुलासा हुआ है। पुलिस ने 16 आरोपियों को पकड़ा और डेटा, डिजिटल उपकरण व विदेशी हैंडलरों की जांच शुरू की।
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Lucknow News: राजधानी में अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने वाले फर्जी अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटरों का लगातार खुलासा अब अलग-अलग गिरोहों की कार्रवाई भर नहीं रह गया है, बल्कि पुलिस के सामने एक बड़े संगठित साइबर नेटवर्क की आशंका खड़ी कर रहा है। अलीगंज के कपूरथला स्थित रिध्या प्लाजा में पकड़े गए कॉल सेंटर की जांच अब वहां काम करने वाले 16 आरोपियों से आगे बढ़कर उन लोगों तक पहुंच रही है जो अमेरिकी नागरिकों का डेटा, तकनीकी संसाधन और ठगी के बाद रकम वसूलने की व्यवस्था उपलब्ध कराते थे। पुलिस के मुताबिक यह सेंटर करीब चार महीने से चल रहा था और कर्मचारियों का काम मुख्य रूप से अमेरिकी नागरिकों को जाल में फंसाकर अगले चरण की टीम तक पहुंचाना था। जांच में प्रतिदिन करीब 40 लोगों को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है। अलग-अलग शुरुआती पुलिस और मीडिया रिपोर्टों में ठगी की कुल रकम को लेकर अभी अंतर है-कुछ में करीब 100 करोड़ और कुछ में 120 करोड़ रुपये से अधिक का अनुमान लगाया गया है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले 120 करोड़ रुपये को प्रमाणित अंतिम रकम मानना उचित नहीं होगा। पुलिस ने मौके से मिले लैपटॉप और मोबाइल समेत डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच शुरू कराई है, जिससे पीड़ितों, विदेशी नंबरों, इंटरनेट कॉल, चैट और नेटवर्क के दूसरे सदस्यों के बारे में अधिक ठोस जानकारी मिलने की उम्मीद है।
अमेरिकी नागरिक के कंप्यूटर पर पहले फर्जी चेतावनी, फिर शुरू होता था डर का खेल
पुलिस जांच में सामने आया तरीका सामान्य फोन कॉल वाली ठगी से कहीं अधिक संगठित था। अमेरिकी नागरिकों के कंप्यूटर पर पहले वायरस, सुरक्षा खतरे या संदिग्ध गतिविधि से जुड़ा फर्जी ‘पॉप-अप’ संदेश दिखाई देता था। पीड़ित के संपर्क करने पर कॉल कथित तकनीकी सहायता केंद्र तक पहुंचती और वहां बैठे कर्मचारी खुद को माइक्रोसॉफ्ट या वैश्विक तकनीकी सहायता सेवा से जुड़ा बताते थे। इसके बाद पीड़ित को भरोसा दिलाया जाता कि उसके कंप्यूटर में गंभीर सुरक्षा समस्या है। कुछ मामलों में कंप्यूटर पर बाल यौन शोषण सामग्री देखे जाने जैसी अत्यंत गंभीर और डर पैदा करने वाली गतिविधि का झूठा दावा भी किया जाता था। पुलिस के अनुसार पीड़ित से रिमोट एक्सेस लेने के बाद आरोपी उसके कंप्यूटर तक पहुंच बनाते और कथित सुरक्षा जांच के नाम पर डर बढ़ाते थे। इस तरह तकनीकी समस्या के बहाने शुरू हुई बातचीत को धीरे-धीरे कानूनी कार्रवाई या सुरक्षा एजेंसियों के भय में बदला जाता था।
जांच में ठगी के काम को अलग-अलग चरणों में बांटे जाने के संकेत भी मिले हैं। अलीगंज में पकड़े गए कर्मचारियों का प्रमुख काम संभावित पीड़ित से पहली बातचीत करना, उसे भरोसे या भय में लेना और आगे की टीम के लिए तैयार करना बताया जा रहा है। डीसीपी उत्तरी अमित कुमार आनंद के मुताबिक पकड़े गए लोग नेटवर्क के शुरुआती स्तर पर काम करते थे। पैसे वसूलने का अंतिम चरण दूसरी टीम संभालती थी और उसके दूसरे स्थानों से संचालित होने के संकेत मिले हैं। यही कारण है कि पुलिस की जांच का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब यह है कि लखनऊ के कॉल सेंटर, विदेशी पीड़ित, डेटा उपलब्ध कराने वाले लोग और रकम वसूलने वाले विदेशी हैंडलर आपस में किस माध्यम से जुड़े थे। इस कड़ी का खुलना पूरे नेटवर्क के आकार और वास्तविक ठगी की रकम निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होगा।
36 लैपटॉप और 20 मोबाइल खोल सकते हैं नेटवर्क का राज
पुलिस ने कॉल सेंटर से बरामद डिजिटल उपकरणों को जांच का प्रमुख आधार बनाया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार 36 लैपटॉप और 20 मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच कराई जा रही है। इनमें सेव विदेशी फोन नंबर, कॉल लॉग, इंटरनेट कॉलिंग का रिकॉर्ड, चैट, ई-मेल, दूरस्थ कंप्यूटर नियंत्रण से संबंधित विवरण और कर्मचारियों के आपसी संपर्क नेटवर्क की जांच महत्वपूर्ण होगी। इससे यह भी पता चल सकता है कि संभावित अमेरिकी पीड़ितों की सूचियां कहां से आती थीं और क्या उन्हें किसी डेटा ब्रोकर, विदेशी सहयोगी या दूसरे साइबर गिरोह से प्राप्त किया जाता था। पकड़े गए कर्मचारियों से पूछताछ में डेटा के मूल स्रोत को लेकर अभी स्पष्ट उत्तर नहीं मिला है। इसीलिए डिजिटल उपकरणों से मिलने वाला साक्ष्य इस जांच का निर्णायक हिस्सा बन सकता है।
चार महीने और प्रतिदिन करीब 40 संभावित लक्ष्यों के आंकड़े को सीधे वास्तविक पीड़ितों की संख्या नहीं माना जाना चाहिए। यदि 120 दिनों के आधार पर गणना की जाए तो लगभग 4,800 संपर्क बनते हैं, लेकिन प्रत्येक कॉल सफल ठगी में बदली हो, इसका अभी प्रमाण नहीं है। एक अन्य रिपोर्ट में पुलिस पूछताछ के आधार पर लगभग पांच हजार अमेरिकी नागरिकों से संपर्क और करीब 100 करोड़ रुपये की ठगी का दावा सामने आया है। इसलिए ‘रोज 40 अमेरिकी नागरिकों को ठगते थे’ के बजाय ‘रोज करीब 40 अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाते थे’ अधिक सटीक तथ्यात्मक प्रस्तुति है। वास्तविक पीड़ितों की संख्या और कुल रकम बैंकिंग, डिजिटल तथा अमेरिकी पक्ष से प्राप्त रिकॉर्ड के मिलान के बाद ही प्रमाणित हो सकेगी।
छापे से करीब एक घंटे पहले फरार हुआ कथित सरगना प्रियांशु
अलीगंज मामले का कथित मुख्य संचालक प्रियांशु कुशवाहा उर्फ शिवा पुलिस की छापेमारी से करीब एक घंटे पहले वहां से निकल गया था। उसकी तलाश में पुलिस की टीमें गुजरात और पश्चिम बंगाल भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। जांच में गुजरात से जुड़े आशीष और नेहल नाम के दो लोगों की भूमिका भी सामने आई है, जिन पर कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण और कॉल सेंटर के संचालन से जुड़े काम संभालने का आरोप है। पुलिस के मुताबिक कर्मचारियों को लक्ष्य भी दिए जाते थे और सेंटर रात के समय अमेरिकी समय क्षेत्र के अनुरूप सक्रिय रहता था। इससे संकेत मिलता है कि यह केवल कुछ लोगों द्वारा फोन करके की जाने वाली ठगी नहीं, बल्कि भर्ती, प्रशिक्षण, तकनीकी व्यवस्था और लक्ष्य आधारित कामकाज वाला संगठित ढांचा था।
इस मामले में ‘चार्ल्स’ नाम भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसकी भूमिका को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। इससे पहले लखनऊ के समिट बिल्डिंग में पकड़े गए अंतरराष्ट्रीय फर्जी कॉल सेंटर की जांच में भी चार्ल्स नाम सामने आने की खबरें थीं। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि अलग-अलग सेंटरों में सामने आए नाम, तकनीकी तरीके, भर्ती करने वाले लोग और विदेश में रकम प्राप्त करने वाले हैंडलर किसी साझा नेटवर्क का हिस्सा हैं या अलग-अलग गिरोह एक ही प्रचलित साइबर ठगी मॉडल का इस्तेमाल कर रहे थे। जब तक डिजिटल और वित्तीय जांच से इन सेंटरों के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं होता, केवल समान कार्यप्रणाली के आधार पर इन्हें एक ही गिरोह घोषित करना जल्दबाजी होगी।
तीन महीने में बार-बार मिले विदेशी नागरिकों को ठगने वाले कॉल सेंटर
अलीगंज का मामला इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले भी लखनऊ में इसी तरह के कई सेंटर पकड़े जा चुके हैं। एक जुलाई को विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर चल रहे ‘सोलारिस सॉल्यूशन’ नाम के कथित फर्जी अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर पर साइबर सेल और साइबर क्राइम थाने की संयुक्त टीम ने छापा मारा था। उस कार्रवाई में 119 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के मुताबिक वहां अमेरिकी नागरिकों को प्रमुख रूप से निशाना बनाया जाता था और तकनीकी सहायता, प्रतिष्ठित कंपनियों तथा अमेरिकी संस्थाओं के नाम का इस्तेमाल कर उन्हें झांसे में लिया जाता था। पुलिस ने वहां से बड़ी संख्या में लैपटॉप और मोबाइल सहित डिजिटल उपकरण जब्त किए थे।
इसके कुछ ही दिनों बाद गोमतीनगर विस्तार के ओमेक्स आर-2 परिसर में एक और कथित फर्जी कॉल सेंटर पकड़ा गया और सात लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद विभूतिखंड स्थित साइबर हाइट्स में भी इसी तरह की कार्रवाई हुई। पुलिस इन मामलों में यह जांच करती रही है कि भर्ती करने वाले लोगों, तकनीकी ढांचे और वित्तीय माध्यमों में कोई समान कड़ी है या नहीं। अब अलीगंज के रिध्या प्लाजा से 16 लोगों की गिरफ्तारी के बाद तीन महीने के भीतर राजधानी में इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं। अलीगंज की कार्रवाई को भी पुलिस ने हाल के महीनों में पकड़े गए ऐसे अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी केंद्रों की श्रृंखला का हिस्सा बताया है।
कम खर्च, प्रशिक्षित युवा और बेहतर इंटरनेट-लखनऊ क्यों बन रहा ठिकाना?
इन लगातार खुलासों ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि आखिर विदेशी नागरिकों को निशाना बनाने वाले कॉल सेंटर लखनऊ को अपना ठिकाना क्यों बना रहे हैं। पुलिस जांच से जुड़े अधिकारियों ने पहले के मामलों में इसके पीछे अपेक्षाकृत कम परिचालन खर्च, आसानी से उपलब्ध युवा और अंग्रेजी बोलने वाला कार्यबल, आधुनिक व्यावसायिक इमारतें, तेज इंटरनेट और बड़े शहर की भीड़ में पहचान छिपाने की सुविधा जैसे कारणों की ओर संकेत किया है। कई सेंटर ऐसे व्यावसायिक और आवासीय परिसरों में मिले जहां सामान्य कार्यालय या कंपनी के रूप में काम करना आसान था। रात में काम करना भी अपने-आप संदेह पैदा नहीं करता क्योंकि वैध अंतरराष्ट्रीय बीपीओ और कॉल सेंटर भी अमेरिकी समय क्षेत्र के अनुसार रात की पाली में चलते हैं। यही आवरण अवैध नेटवर्क के लिए उपयोगी हो सकता है।
अलीगंज का सेंटर जिस तरह पकड़ा गया, वह भी उल्लेखनीय है। 18 सितंबर की सुबह करीब चार बजे नियमित गश्त के दौरान एक पुलिसकर्मी को रिध्या प्लाजा के बाहर खड़े व्यक्ति पर संदेह हुआ। पूछताछ में उसके जवाब मेल नहीं खाए। निगरानी करने पर इमारत का शटर खुला और कई लोग अंदर जाते दिखाई दिए, जिसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना देकर कार्रवाई की गई। पुलिस ने वहां से 12 पुरुषों और चार महिलाओं सहित 16 लोगों को पकड़ा। यानी इतने बड़े कथित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का स्थानीय सिरा किसी पूर्व नियोजित साइबर खुफिया अभियान के बजाय नियमित पुलिस गश्त में पैदा हुए संदेह से सामने आया।
अलीगंज मामले की अगली और सबसे महत्वपूर्ण परत अब रकम और डेटा की है। केवल कॉल करने वाले कर्मचारियों की गिरफ्तारी से यह नेटवर्क पूरी तरह नहीं टूटेगा, क्योंकि पुलिस की अपनी शुरुआती जांच बताती है कि संभावित पीड़ितों का डेटा कहीं और से आता था और रकम वसूलने वाला समूह भी अलग था। प्रियांशु उर्फ शिवा की गिरफ्तारी, जब्त उपकरणों की फोरेंसिक जांच और अमेरिकी पीड़ितों से जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड ही यह स्पष्ट कर पाएंगे कि चार महीने में वास्तव में कितने लोग ठगे गए, कितनी रकम विदेश में वसूली गई, वह किन माध्यमों से आगे पहुंची और समिट बिल्डिंग, ओमेक्स, साइबर हाइट्स तथा अलीगंज में पकड़े गए नेटवर्कों के बीच कोई साझा कड़ी थी या नहीं। फिलहाल 100 से 120 करोड़ रुपये की ठगी और प्रतिदिन करीब 40 अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने के आंकड़े पुलिस की शुरुआती जांच और आरोपियों से पूछताछ से निकले दावे हैं, अंतिम रूप से प्रमाणित वित्तीय आंकड़े नहीं।


