उद्घाटन के 74 दिन बाद भी ‘बीमार’ लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे, अब 30 मीटर धंसी सड़क की पटरी

Lucknow Kanpur Expressway: लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर लगातार सामने आ रही सड़क धंसने, स्लिपेज, दरार, जलभराव और कंक्रीट गिरने की घटनाओं के बीच IIT खड़गपुर की जांच रिपोर्ट पर नजर है।

Newstrack Network
Published on: 26 Sept 2026 12:39 AM IST
Lucknow Kanpur Expressway
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Lucknow Kanpur Expressway: करीब ₹4,200 करोड़ की लागत से बना और 13 जुलाई 2026 को उद्घाटित हुआ छह लेन का लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे अभी ढाई महीने भी पूरे नहीं कर पाया है, लेकिन सड़क धंसने, मिट्टी खिसकने, दरार पड़ने, पानी जमा होने, एलिवेटेड हिस्से से कंक्रीट गिरने और पानी रिसने जैसी घटनाओं की लंबी श्रृंखला इसके निर्माण और निगरानी पर लगातार सवाल खड़े कर रही है। ताजा मामला उन्नाव के तौरा गांव के पास किलोमीटर संख्या 48 का है, जहां गुरुवार को लखनऊ से कानपुर जाने वाली दिशा में करीब 30 मीटर लंबाई में सड़क किनारे की पटरी धंस गई। निर्माण एजेंसी ने इसकी मरम्मत कराई है। इसी बीच लखनऊ में एलिवेटेड हिस्से के किलोमीटर संख्या 14 के आसपास डिवाइडर में दरार और एप्रोच स्लैब की ऊपरी परत उखड़ने की शिकायत सामने आई है। NHAI का कहना है कि डिवाइडर की दरार मामूली है और मुख्य संरचना को कोई नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन दो महीने से लगातार अलग-अलग हिस्सों में सामने आ रही कमियों ने इस परियोजना को सामान्य रखरखाव से आगे निर्माण गुणवत्ता, जल निकासी, मिट्टी और सड़क की परतों की तकनीकी जांच का विषय बना दिया है।

इस मामले में एक शब्द का सुधार भी जरूरी है। तौरा के पास धंसे 30 मीटर हिस्से को कुछ खबरों में ‘फुटपाथ’ कहा गया है, जबकि एक्सप्रेसवे के संदर्भ में इसे सामान्य शहरी फुटपाथ समझना सही नहीं होगा। उपलब्ध तस्वीर और विवरण इसे सड़क की साइड पटरी अथवा शोल्डर से जुड़ा हिस्सा बताते हैं। इसका अर्थ यह भी नहीं कि मुख्य छह लेन वाली पूरी कैरिजवे 30 मीटर धंस गई है। फिर भी शोल्डर या सड़क किनारे का धंसाव मामूली मामला नहीं है, क्योंकि यह सड़क के नीचे मिट्टी, जल निकासी और किनारे के ढांचे की स्थिरता से जुड़ा हो सकता है। खासकर उस एक्सप्रेसवे पर जहां जुलाई के आखिर में NHAI स्वयं करीब 300 मीटर लंबाई में स्लिपेज की पुष्टि कर चुका है।

13 जुलाई को उद्घाटन, 26 जुलाई को ही 300 मीटर हिस्से में स्लिपेज

लखनऊ-कानपुर के बीच करीब 63 किलोमीटर लंबा छह लेन का प्रवेश-नियंत्रित एक्सप्रेसवे 13 जुलाई 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में खोला गया था। इसका उद्देश्य दोनों शहरों के बीच यात्रा समय को करीब 35 से 40 मिनट तक लाना है। परियोजना की लागत अलग-अलग चरणों और गणना के आधार पर विभिन्न रिपोर्टों में करीब ₹3,700 करोड़ से ₹4,500 करोड़ तक बताई गई है, जबकि उद्घाटन के बाद प्रमुख रिपोर्टों और बाद की NHAI कार्रवाई के संदर्भ में करीब ₹4,200 करोड़ का आंकड़ा व्यापक रूप से सामने आया। इसलिए इसे एक निश्चित अंतिम लेखा लागत की जगह परियोजना की प्रचलित अनुमानित लागत समझना अधिक उचित है।

लेकिन उद्घाटन के केवल 13 दिन बाद 26 जुलाई को किलोमीटर 64 के आसपास दाहिनी तरफ करीब 300 मीटर लंबाई में स्लिपेज दिखाई दिया। यह कोई विपक्षी आरोप या केवल सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों का मामला नहीं रहा, क्योंकि 5 अगस्त को केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की आधिकारिक सूचना में NHAI ने स्वयं इस 300 मीटर स्लिपेज की पुष्टि की। इसके बाद प्रभावित स्थान पर यातायात मोड़ा गया, मरम्मत शुरू हुई और विस्तृत तकनीकी जांच के आदेश दिए गए।

NHAI ने ठेकेदार, सलाहकार और अपने अधिकारियों तक पर शुरू की कार्रवाई

लगातार खामियां सामने आने के बाद NHAI ने अगस्त की शुरुआत में असामान्य रूप से कड़ी कार्रवाई की थी। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार निर्माण से जुड़ी कमियों के लिए कंसेशनायर, स्वतंत्र इंजीनियर और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई। NHAI ने गुणवत्ता सुनिश्चित करने की प्रणाली मजबूत करने और प्रभावित हिस्से की तकनीकी जांच कराने का निर्णय भी लिया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार निर्माण कंपनी PNC Infratech को ‘नॉन-परफॉर्मर’ घोषित करने की कार्रवाई की गई, परियोजना निदेशक को हटाया गया और टोल वसूली रोक दी गई। टोल को तब तक स्थगित रखने का निर्णय सामने आया जब तक खामियां पूरी तरह दूर कर मार्ग को सुरक्षित प्रमाणित नहीं किया जाता। यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि परियोजना में सामने आई समस्याओं को केवल नियमित मानसूनी रखरखाव बताना अब पूरी तस्वीर नहीं होगी। स्वयं NHAI की आधिकारिक कार्रवाई यह दिखाती है कि कमियों को पर्याप्त गंभीर मानकर ठेकेदार, निगरानी सलाहकार और अधिकारियों तक की जवाबदेही की प्रक्रिया शुरू की गई।

अब किमी-48 पर 30 मीटर धंसी पटरी

24 सितंबर को हुई बारिश के बाद गुरुवार को तौरा गांव के पास किलोमीटर संख्या 48 पर सड़क की साइड पटरी करीब 30 मीटर के दायरे में धंसी मिली। निर्माण एजेंसी ने प्रभावित हिस्से की मरम्मत की। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सड़क पर जलभराव से निपटने के लिए कार्यदायी संस्था PNC को डिवाइडर में लगे कंक्रीट ब्लॉक में पानी निकालने के लिए छेद तक कराने पड़ रहे हैं।

यदि किसी नई सड़क पर बारिश का पानी नियोजित निकास मार्ग से बाहर जाने के बजाय डिवाइडर या सड़क के किनारे जमा हो रहा है तो तकनीकी जांच में केवल ऊपर दिखाई देने वाले गड्ढे या दरार को भरना पर्याप्त नहीं होगा। यह देखना होगा कि सड़क का क्रॉस-फॉल, नाली व्यवस्था, डिवाइडर ड्रेनेज, मिट्टी का संपीडन और पानी बाहर निकालने की पूरी व्यवस्था डिजाइन के अनुसार काम कर रही है या नहीं। सड़क के नीचे या किनारे की मिट्टी में लगातार पानी जाने पर उसकी वहन क्षमता कम हो सकती है और किनारे का हिस्सा बैठ सकता है। तौरा में धंसाव का वास्तविक कारण IIT और NHAI की तकनीकी जांच के बिना निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता, लेकिन लगातार जलभराव और उसके बाद शोल्डर धंसने का क्रम ड्रेनेज की जांच को महत्वपूर्ण बनाता है।

किमी-14 पर डिवाइडर में दरार, NHAI बोला-मुख्य संरचना सुरक्षित

सरोजनीनगर के सैनिक स्कूल के आसपास एलिवेटेड हिस्से में भी नई शिकायत सामने आई है। किलोमीटर संख्या 14 के पास एप्रोच स्लैब की ऊपरी परत उखड़ने और पास के डिवाइडर में दरार दिखाई देने के बाद निर्माण एजेंसी ने मरम्मत शुरू की। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जिस हिस्से की मरम्मत हुई थी, उसी के आसपास दरार दिखाई दी है।

NHAI परियोजना निदेशक नवरत्न के अनुसार एप्रोच स्लैब की बहुत मामूली परत निकली है और इससे मुख्य संरचनात्मक हिस्से को नुकसान नहीं हुआ है। डिवाइडर की दरार को भी विभाग ने मामूली बताते हुए भरवाने की बात कही है। यहां ‘डिवाइडर में दरार’ और ‘एलिवेटेड पुल की संरचना में दरार’ को एक नहीं समझना चाहिए। यदि दरार केवल डिवाइडर अथवा गैर-संरचनात्मक हिस्से में है तो उसका तकनीकी महत्व मुख्य गर्डर, पियर या डेक की संरचनात्मक दरार से बिल्कुल अलग होगा। फिलहाल उपलब्ध जानकारी मुख्य संरचना को नुकसान की पुष्टि नहीं करती।

14 सितंबर को एलिवेटेड हिस्से से गिरी थी कंक्रीट

हालांकि एलिवेटेड हिस्से को लेकर चिंता केवल डिवाइडर की ताजा दरार के कारण नहीं है। 14 सितंबर को कानपुर से लखनऊ आने वाली दिशा में बंथरा के पास एलिवेटेड हिस्से की स्लैब से कंक्रीट गिरने के बाद बनी टोल प्लाजा से किसान पथ की ओर लगभग 10 किलोमीटर हिस्से में एक लेन बंद करनी पड़ी थी। संबंधित हिस्से में कंक्रीट हटाकर उच्च गुणवत्ता वाले सीमेंट के साथ लगभग तीन मीटर के क्षेत्र में दोबारा काम कराया गया। बाद में बारिश के दौरान आजाद विहार कॉलोनी के पास एलिवेटेड हिस्से से पानी रिसने की शिकायत भी आई, जिसे अब बंद किए जाने की जानकारी दी गई है।

कंक्रीट का स्थानीय हिस्सा गिरना अपने आप पूरे एलिवेटेड ढांचे के असुरक्षित होने का प्रमाण नहीं है। कंक्रीट में स्थानीय स्पॉलिंग, सतह की खराबी, निर्माण जोड़ या पानी के प्रवेश सहित अलग-अलग कारण हो सकते हैं। लेकिन नई परियोजना में उद्घाटन के कुछ ही सप्ताह बाद ऐसी घटना होने पर कारण की तकनीकी पहचान जरूरी है, क्योंकि मरम्मत का स्वरूप इसी पर निर्भर करेगा।

कानपुर से लखनऊ आने वाली एलिवेटेड लेन 27-28 सितंबर तक बंद

14 सितंबर की घटना के बाद बंद की गई कानपुर से लखनऊ आने वाली एलिवेटेड लेन को पहले 25 सितंबर तक खोलने की योजना थी, लेकिन अब डामरीकरण और शेष कार्य के कारण इसे 27 या 28 सितंबर को खोले जाने की संभावना बताई गई है। तब तक कानपुर से लखनऊ आने वाले वाहन बनी टोल के पास रैंप से नीचे उतरकर पुराने लखनऊ-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग का इस्तेमाल कर रहे हैं। दूसरी ओर लखनऊ से कानपुर जाने वाला यातायात एलिवेटेड मार्ग से जारी है।

इसलिए यह कहना कि पूरा लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे बंद है, गलत होगा। प्रतिबंध एलिवेटेड हिस्से की एक दिशा से संबंधित है और शेष मार्ग पर यातायात जारी है। NHAI के अनुसार एक्सप्रेसवे से प्रतिदिन करीब 15 हजार वाहन गुजर रहे हैं। इतनी बड़ी यातायात मात्रा को देखते हुए मरम्मत और जांच दोनों में सुरक्षा तथा यातायात संचालन का संतुलन आवश्यक है।

सबसे ज्यादा शिकायतें कोरारी के आसपास, तीन किमी हिस्सा जांच के केंद्र में

ग्रीनफील्ड हिस्से में सबसे अधिक समस्याएं उन्नाव के कोरारी क्षेत्र और किलोमीटर 63-64 के आसपास सामने आई थीं। सड़क धंसने, दरार और मिट्टी खिसकने की शिकायतों के बाद प्रारंभिक जांच में करीब तीन किलोमीटर का क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित बताया गया। NHAI की आधिकारिक सूचना ने भी किलोमीटर 64 के पास करीब 300 मीटर स्लिपेज की पुष्टि की थी।

यह तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण अंतर है कि पूरी 63 किलोमीटर सड़क को खराब घोषित नहीं किया जा सकता। समस्याएं अलग-अलग स्थानों पर और अलग प्रकृति की सामने आई हैं। कहीं मुख्य सड़क अथवा शोल्डर बैठा, कहीं मिट्टी खिसकी, कहीं जल निकासी की समस्या, कहीं एलिवेटेड हिस्से में कंक्रीट और कहीं डिवाइडर की दरार है। इन सभी को एक ही कारण से जोड़ना तब तक उचित नहीं होगा जब तक तकनीकी जांच ऐसा न कहे।

IIT खड़गपुर ने करीब 80 नमूने लिए, अब रिपोर्ट पर नजर

लगातार शिकायतों के बाद NHAI ने IIT खड़गपुर के प्रोफेसर के.एस. रेड्डी की अगुवाई में विशेषज्ञ टीम से तकनीकी जांच कराई। टीम ने अगस्त के पहले सप्ताह में ग्रीनफील्ड हिस्से का निरीक्षण किया और सड़क तथा उसकी नीचे की परतों से करीब 80 नमूने एकत्र किए। 22 सितंबर तक रिपोर्ट NHAI को प्राप्त नहीं हुई थी और जांच को 43 दिन से अधिक हो चुके थे।

अब रिपोर्ट 25 सितंबर को NHAI मुख्यालय को सौंपे जाने की संभावना बताई गई है। रिपोर्ट में सड़क की बिटुमिनस परत, बेस और सब-बेस, मिट्टी का संपीडन, पानी की निकासी, शोल्डर और उन स्थानों की संरचना की जांच महत्वपूर्ण होगी जहां स्लिपेज और धंसाव सामने आया। रिपोर्ट आने से पहले किसी एक कारण-जैसे घटिया सामग्री, बारिश, खराब मिट्टी या गलत ड्रेनेज-को सभी समस्याओं का निश्चित कारण घोषित करना वैज्ञानिक रूप से जल्दबाजी होगी।

बारिश अकेली जिम्मेदार या निर्माण में कमी, रिपोर्ट से होगा साफ

सड़क निर्माण में मानसून हमेशा एक कठिन परीक्षा होता है। भारी बारिश के दौरान सड़क के नीचे पानी प्रवेश करे और निकासी पर्याप्त न हो तो मिट्टी की मजबूती प्रभावित हो सकती है। दूसरी तरफ यदि मिट्टी का संपीडन, ढलान सुरक्षा और जल निकासी शुरू से डिजाइन और निर्माण के अनुरूप हो तो सड़क को सामान्य मानसूनी परिस्थितियों का सामना करने के लिए ही बनाया जाता है। इसलिए ‘बारिश हुई इसलिए नई सड़क धंस गई’ अपने आप पर्याप्त तकनीकी स्पष्टीकरण नहीं है।

यही प्रश्न IIT की जांच को महत्वपूर्ण बनाता है। क्या पानी ऐसी जगह पहुंचा जहां उसे नहीं पहुंचना चाहिए था, क्या किनारे की मिट्टी पर्याप्त रूप से संकुचित थी, क्या सड़क की परतों की मोटाई और सामग्री निर्धारित मानकों के अनुरूप थी, क्या ढलान और जल निकासी व्यवस्था सही थी और क्या निर्माण के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण में कमी हुई-इन सवालों का उत्तर प्रयोगशाला और मैदानी परीक्षण के आधार पर मिलना चाहिए।

15 साल रखरखाव की जिम्मेदारी निर्माण एजेंसी की

NHAI परियोजना निदेशक के अनुसार कार्यदायी संस्था को एक्सप्रेसवे के रखरखाव की 15 वर्ष की जिम्मेदारी निभानी है और वर्तमान मरम्मत उसी व्यवस्था के तहत की जा रही है। इसका अर्थ है कि अभी दिखाई दे रही कमियों की मरम्मत का वित्तीय भार सामान्य परिस्थितियों में सीधे यात्रियों पर अलग परियोजना के रूप में नहीं डाला जाना चाहिए, बल्कि अनुबंध की शर्तों के तहत कंसेशनायर को दोष सुधारना होगा।

यह व्यवस्था सड़क निर्माण के Hybrid Annuity Model जैसे अनुबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें निजी पक्ष केवल सड़क बनाकर हट नहीं जाता बल्कि निर्धारित अवधि तक संचालन और रखरखाव से भी जुड़ा रहता है। लेकिन रखरखाव की जिम्मेदारी निर्माण के समय गुणवत्ता सुनिश्चित करने का विकल्प नहीं हो सकती। किसी खराब हिस्से को बार-बार भरना और मूल तकनीकी कारण का स्थायी समाधान करना दो अलग बातें हैं।

सवाल इसलिए बड़ा क्योंकि NHAI पहले ही मान चुका है ‘कमियां’

इस परियोजना की चर्चा में एक तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जुलाई के अंत में जब सड़क की तस्वीरें और वीडियो सामने आए थे तो शुरुआत में कुछ कमियों को नियमित या एहतियाती रखरखाव के रूप में समझाया गया था।लेकिन इसके बाद 5 अगस्त की आधिकारिक कार्रवाई में NHAI ने ‘issues’, ‘deficiencies in project execution and supervision’ जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हुए ठेकेदार, स्वतंत्र इंजीनियर और अधिकारियों पर कार्रवाई शुरू की। इसलिए अब यह कहना कि एक्सप्रेसवे पर जो कुछ हुआ वह केवल सामान्य रखरखाव था, NHAI की अपनी बाद की कार्रवाई से मेल नहीं खाता।

दूसरी तरफ यह कहना भी अभी जल्दबाजी होगी कि पूरा एक्सप्रेसवे संरचनात्मक रूप से असुरक्षित है। ऐसी कोई अंतिम तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है। सही स्थिति इन दोनों अतियों के बीच है-परियोजना में वास्तविक और NHAI द्वारा स्वीकार की गई गंभीर कमियां सामने आई हैं, लेकिन उनकी सीमा, मूल कारण और पूरे मार्ग की संरचनात्मक स्थिति का अंतिम निर्धारण विशेषज्ञ जांच से होना है।

63 किमी की सड़क पर दो महीने में शिकायतों की लंबी श्रृंखला

इस परियोजना की समयरेखा अपने आप इसकी गंभीरता समझाती है। 13 जुलाई को उद्घाटन हुआ, 26 जुलाई को लगभग 300 मीटर स्लिपेज सामने आया, अगस्त की शुरुआत में NHAI ने कार्रवाई की और IIT खड़गपुर की तकनीकी जांच शुरू हुई, सितंबर में एलिवेटेड हिस्से से कंक्रीट गिरने के बाद एक दिशा की लेन बंद करनी पड़ी, पानी रिसने की शिकायत आई, किमी-14 पर डिवाइडर और एप्रोच स्लैब की समस्या सामने आई और अब किमी-48 पर करीब 30 मीटर सड़क की साइड पटरी धंस गई। इन घटनाओं की प्रकृति अलग-अलग है, इसलिए इन्हें तकनीकी रूप से एक ही खराबी नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतनी नई परियोजना में इतने कम समय में लगातार शिकायतें सामने आना अपने आप गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी की विस्तृत समीक्षा का पर्याप्त आधार है।

एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि एक्सप्रेसवे के निर्माण का बड़ा हिस्सा उद्घाटन से काफी पहले पूरा हो चुका था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मुख्य निर्माण जून 2025 तक लगभग तैयार था, जबकि औपचारिक उद्घाटन जुलाई 2026 में हुआ। यदि यह समयरेखा तकनीकी रिकॉर्ड से भी पुष्ट होती है तो जांच में यह देखना उपयोगी होगा कि करीब एक वर्ष तक सीमित यातायात वाली सड़क की सतह, जल निकासी और मिट्टी पर मानसून तथा रखरखाव का क्या असर पड़ा और उद्घाटन से पहले अंतिम गुणवत्ता परीक्षण किस स्तर पर हुए।

IIT रिपोर्ट केवल दोष बताए नहीं, जिम्मेदारी भी तय कर सकती है

IIT खड़गपुर की रिपोर्ट का महत्व इसलिए केवल इतना नहीं है कि वह बताएगी सड़क कहां-कहां ठीक करनी है। यदि जांच में सामग्री, संपीडन, डिजाइन, ड्रेनेज या निर्माण पर्यवेक्षण में कमी मिलती है तो उससे यह भी स्पष्ट हो सकता है कि जिम्मेदारी निर्माण एजेंसी, स्वतंत्र इंजीनियर, डिजाइन, गुणवत्ता निगरानी या किसी अन्य स्तर पर थी। NHAI पहले ही परियोजना निष्पादन और पर्यवेक्षण से जुड़े पक्षों के खिलाफ अनुशासनात्मक प्रक्रिया शुरू कर चुका है।

यदि दूसरी ओर विशेषज्ञ जांच यह पाती है कि कुछ समस्याएं स्थानीय मिट्टी, असाधारण बारिश या किसी ऐसे कारक से हुईं जिसका निर्माण गुणवत्ता से सीधा संबंध नहीं है, तो वह निष्कर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। सड़क निर्माण जैसे तकनीकी मामले में तस्वीर देखकर भ्रष्टाचार या घटिया निर्माण का अंतिम निष्कर्ष निकालना जितना अनुचित है, उतना ही लगातार सामने आती वास्तविक कमियों को ‘सामान्य प्रक्रिया’ कहकर नजरअंदाज करना भी।

उद्घाटन से ज्यादा महत्वपूर्ण अब एक्सप्रेसवे की उम्र

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश की राजधानी और राज्य के सबसे बड़े औद्योगिक शहरों में से एक को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण परियोजना है। करीब 63 किलोमीटर लंबा प्रवेश-नियंत्रित मार्ग दोनों शहरों के बीच यात्रा समय को लगभग 35 से 40 मिनट तक लाने के उद्देश्य से बनाया गया है। यदि यह मार्ग अगले कई दशकों तक सुरक्षित और टिकाऊ रहता है तो इसका आर्थिक लाभ उद्घाटन के शुरुआती महीनों की परेशानियों से कहीं बड़ा होगा। लेकिन यदि शुरुआती कमियां केवल सतही मरम्मत से ढकी गईं और उनके मूल कारण नहीं सुधारे गए तो रखरखाव लागत और सुरक्षा दोनों पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।

तौरा के पास 30 मीटर सड़क पटरी का धंसना अपने आप यह साबित नहीं करता कि पूरा ₹4,200 करोड़ का लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे विफल हो गया है, ठीक वैसे ही जैसे इसे केवल ‘छोटी-मोटी सामान्य कमी’ कह देना अब उपलब्ध तथ्यों के अनुरूप नहीं है। उद्घाटन के 13 दिन बाद NHAI द्वारा स्वयं दर्ज 300 मीटर स्लिपेज, ठेकेदार और स्वतंत्र इंजीनियर के खिलाफ कार्रवाई, IIT खड़गपुर से करीब 80 नमूनों की जांच, सितंबर में एलिवेटेड स्लैब से कंक्रीट गिरना, जल निकासी की समस्या, डिवाइडर की दरार और अब किमी-48 पर साइड पटरी का धंसाव एक व्यापक तकनीकी तस्वीर बनाते हैं। अब निर्णायक दस्तावेज IIT खड़गपुर की रिपोर्ट होगी। उसी से पता चलेगा कि एक्सप्रेसवे को केवल कुछ स्थानों पर मरम्मत चाहिए या उसकी मिट्टी, जल निकासी, सड़क की परतों और गुणवत्ता नियंत्रण में ऐसे मूल दोष हैं जिनका स्थायी सुधार करना होगा। ₹4,200 करोड़ की सड़क के लिए असली कसौटी यह नहीं कि खराब हिस्सा कितनी जल्दी भर दिया गया, बल्कि यह है कि वह खराब हुआ क्यों और दोबारा न हो इसके लिए क्या बदला गया।

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