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मां के दूध का अमृत: KGMU के मिल्क बैंक ने 1,716 नवजातों को दिया जीवनदान
KGMU News: केजीएमयू के मिल्क बैंक में माताओं द्वारा दान किए गए स्तनदूध से हजारों प्रीमैच्योर और गंभीर नवजातों को जीवनदायी पोषण मिला, जिससे उन्हें संक्रमण से बचाने में मदद मिली।
KGMU Lucknow
KGMU News: कई बार एक मां का अतिरिक्त दूध किसी दूसरे नवजात के लिए जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाता है। यही संदेश दे रहा है किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) का कॉम्प्रिहेंसिव लैक्टेशन मैनेजमेंट सेंटर (मिल्क बैंक), जहां पिछले सात वर्षों में हजारों माताओं ने अपने अतिरिक्त स्तनदूध का दान कर उन बच्चों को नया जीवन दिया है, जो जन्म के बाद अपनी मां का दूध नहीं पी सके।
वर्ष 2019 से 2025 के बीच 2,399 माताओं ने मिल्क बैंक में 1,147.87 लीटर स्तनदूध दान किया। इस दूध को वैज्ञानिक प्रक्रिया से पाश्चुरीकृत (Pasteurized Donor Human Milk) कर अब तक 1,716 समयपूर्व जन्मे (प्रीमैच्योर), अनाथ और गंभीर रूप से बीमार नवजातों को उपलब्ध कराया गया। इस अवधि में कुल 939.13 लीटर पाश्चुरीकृत मानव दूध नवजातों को दिया गया, जिससे अनेक बच्चों को गंभीर संक्रमणों और कुपोषण से बचाया जा सका।
जब मां नहीं रही, तब मिल्क बैंक बना सहारा
ऐसे अनेक उदाहरण सामने आए हैं, जिन्होंने इस पहल के महत्व को और स्पष्ट किया है। एक नवजात बच्ची, जिसका जन्म केवल 940 ग्राम वजन के साथ हुआ था, जन्म के कुछ ही दिनों बाद अपनी मां को खो बैठी। अत्यंत गंभीर अवस्था में वेंटिलेटर पर भर्ती इस बच्ची के लिए मिल्क बैंक से उपलब्ध कराया गया पाश्चुरीकृत मानव दूध जीवनरक्षक साबित हुआ। चिकित्सकों के अनुसार इससे उसे आंतों के गंभीर संक्रमण और अन्य जटिलताओं से बचाने में मदद मिली।
एक अन्य मामले में गंभीर बीमारी के कारण एक मां को अस्पताल छोड़कर घर जाना पड़ा, जबकि उसका नवजात शिशु अस्पताल में भर्ती रहा। इस दौरान मिल्क बैंक से लगातार उपलब्ध कराए गए मानव दूध ने बच्चे के पोषण और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘अतिरिक्त दूध क्यों बर्बाद करें?’
लखनऊ की रहने वाली वैष्णवी सोनी ने अपने बच्चे की जरूरत पूरी होने के बाद कई बार मिल्क बैंक में दूध दान किया। उनका कहना है कि शुरुआत में उन्हें भी लगता था कि दूध दान करने से अपने बच्चे के लिए दूध कम पड़ जाएगा, लेकिन विशेषज्ञों की सलाह के बाद उन्हें समझ आया कि अतिरिक्त दूध दान करने से न केवल दूसरे बच्चों की जान बचती है, बल्कि इससे अपने शरीर में भी दूध बनने की प्रक्रिया बेहतर होती है।
हर वर्ष बढ़ रही है माताओं की भागीदारी
KGMU के आंकड़े बताते हैं कि मिल्क बैंक के प्रति जागरूकता लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2019 में जहां केवल 287 माताओं ने लगभग 108 लीटर दूध दान किया था, वहीं 2025 तक दान करने वाली माताओं की संख्या बढ़कर 460 हो गई और संग्रहित दूध 209.17 लीटर तक पहुंच गया। यह दर्शाता है कि स्तनदूध दान के प्रति समाज में सकारात्मक सोच विकसित हो रही है।
कैसे होता है दूध दान?
मिल्क बैंक में सबसे पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि मां का अपना शिशु पूरी तरह स्तनपान कर रहा हो। यदि उसके बाद भी अतिरिक्त दूध बन रहा हो, तभी उसे दान करने की सलाह दी जाती है। दूध दान करने वाली प्रत्येक महिला की चिकित्सकीय जांच की जाती है। संग्रहित दूध को वैज्ञानिक मानकों के अनुसार पाश्चुरीकृत कर माइक्रोबायोलॉजिकल जांच के बाद ही नवजातों को दिया जाता है।
भ्रम तोड़ना भी बड़ी चुनौती
KGMU के पीडियाट्रिक्स विभाग की प्रोफेसर डॉ. शालिनी त्रिपाठी के अनुसार शुरुआत में अधिकांश माताओं को यह डर रहता है कि दूध दान करने से उनके बच्चे के लिए दूध कम हो जाएगा या उन्हें कमजोरी महसूस होगी। लेकिन चिकित्सा विज्ञान इसके विपरीत तथ्य बताता है।
उनके अनुसार स्तनपान कराने या अतिरिक्त दूध निकालने से शरीर में प्रोलैक्टिन हार्मोन का स्राव बढ़ता है, जिससे दूध का उत्पादन और बेहतर होता है। इसलिए दूध दान करने से न तो बच्चे का पोषण प्रभावित होता है और न ही मां कमजोर होती है।
प्रीमैच्योर बच्चों के लिए क्यों अमृत है मां का दूध?
विशेषज्ञों के अनुसार समय से पहले जन्मे या अत्यंत कम वजन वाले बच्चों के लिए मां का दूध सबसे सुरक्षित और प्रभावी पोषण है। ऐसे बच्चों को यदि कृत्रिम दूध या कुछ परिस्थितियों में अनुपयुक्त विकल्प दिए जाएं, तो उनमें नेक्रोटाइजिंग एंटेरोकॉलाइटिस (Necrotizing Enterocolitis) जैसी गंभीर और जानलेवा आंत संबंधी बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। पाश्चुरीकृत मानव दूध इस जोखिम को काफी हद तक कम करता है और नवजात की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी मदद करता है।
कौन नहीं कर सकता दूध दान?
विशेषज्ञों के अनुसार निम्न परिस्थितियों में स्तनदूध दान नहीं किया जाता—
एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी या सिफिलिस जैसी संक्रामक बीमारियों से पीड़ित महिलाएं।
शराब, तंबाकू या अन्य नशीले पदार्थों का नियमित सेवन करने वाली महिलाएं।
कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी या ऐसी दवाएं ले रही महिलाएं जिनका प्रभाव शिशु पर पड़ सकता है।
स्तन या निप्पल में सक्रिय संक्रमण से पीड़ित महिलाएं।
जिन माताओं में पर्याप्त स्तनदूध नहीं बन रहा हो या जिनकी चिकित्सकीय स्थिति दूध दान की अनुमति नहीं देती।
एक लीटर प्रतिदिन का लक्ष्य
डॉ. शालिनी त्रिपाठी ने अधिक से अधिक माताओं से मिल्क बैंक से जुड़ने की अपील की है। उनके अनुसार वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 500 मिलीलीटर दूध ही एकत्र हो पा रहा है, जबकि लक्ष्य एक लीटर प्रतिदिन का है। उनका कहना है कि यदि अधिक माताएं आगे आएंगी तो कई और समयपूर्व जन्मे तथा गंभीर रूप से बीमार नवजातों को नया जीवन दिया जा सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि रक्तदान की तरह स्तनदूध दान भी जीवन बचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। थोड़ी-सी जागरूकता और सामाजिक संवेदनशीलता हजारों नवजातों के भविष्य को सुरक्षित बना सकती है।


