अक्षर पहचानते ही बदली जिंदगी, लखनऊ की 115 महिलाओं में पढ़ाई से घटा मानसिक तनाव

Lucknow: लखनऊ की डालीगंज बस्ती में 17 हफ्ते के साक्षरता कार्यक्रम से महिलाओं की पढ़ने-लिखने की क्षमता बढ़ी और मानसिक परेशानी के संकेतकों में कमी दर्ज हुई।

Kumud Gupta
Published on: 8 Oct 2026 6:51 PM IST
अक्षर पहचानते ही बदली जिंदगी, लखनऊ की 115 महिलाओं में पढ़ाई से घटा मानसिक तनाव
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Lucknow: पढ़ना-लिखना सीखना केवल अक्षरों को पहचानना या अपना नाम लिखना भर नहीं है। यह किसी महिला को अपनी जिंदगी के छोटे-बड़े फैसले स्वयं लेने, बाजार में खरीदारी का हिसाब समझने, अस्पताल में अपनी परेशानी बताने और दूसरों पर निर्भरता कम करने का आत्मविश्वास भी दे सकता है। लखनऊ के डालीगंज में रेलवे लाइन के किनारे स्थित बस्ती की महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य के बीच ऐसा ही महत्वपूर्ण संबंध सामने आया है। करीब चार महीने तक चले साक्षरता कार्यक्रम में शामिल महिलाओं के पढ़ने-लिखने के कौशल में सुधार के साथ मानसिक परेशानी और सामाजिक अलगाव से जुड़े औसत अंकों में भी कमी दर्ज की गई। अध्ययन से संकेत मिलता है कि वयस्क महिलाओं को पढ़ाना केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सशक्तीकरण में भी सहायक हो सकता है।

किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) की शोधकर्ता डेबलीना रॉय और निशा यादव से जुड़े इस अध्ययन को स्वास्थ्य विज्ञान के प्रीप्रिंट मंच medRxiv पर प्रकाशित किया गया है। शोध में डालीगंज की बस्ती की 115 महिलाओं को शामिल किया गया। इनमें से 82 महिलाओं ने साक्षरता कार्यक्रम शुरू किया और 74 ने इसे पूरा किया। कार्यक्रम 17 सप्ताह तक चला। इस दौरान प्रतिभागियों को सप्ताह में छह दिन पढ़ना-लिखना सिखाया गया। अध्ययन की विशेषता यह थी कि इसमें केवल अक्षर और शब्दों की पहचान कराने के बजाय महिलाओं की रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी शिक्षा को भी महत्व दिया गया।

कार्यक्रम के अंत में साक्षरता के औसत अंक शुरुआती 25.5 से बढ़कर 55 हो गए। यानी औसत स्कोर में 29.5 अंकों का सुधार दर्ज किया गया। इसके साथ मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित एक स्क्रीनिंग प्रश्नावली के औसत अंक 12.5 से घटकर 9.2 रह गए। सामाजिक अलगाव को मापने वाले पैमाने पर भी औसत स्कोर 12 से घटकर आठ हो गया। इन परिणामों से संकेत मिलता है कि कार्यक्रम पूरा करने वाली महिलाओं में पढ़ने-लिखने की क्षमता बढ़ने के साथ मानसिक परेशानी और अकेलेपन की अनुभूति में भी कमी आई।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर समझना जरूरी है। अध्ययन में इस्तेमाल किया गया एसआरक्यू-20 मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों की पहचान के लिए विकसित एक स्क्रीनिंग उपकरण है। इसका स्कोर घटने का अर्थ मानसिक परेशानी के लक्षणों में कमी का संकेत हो सकता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी महिलाओं को पहले चिकित्सकीय रूप से अवसाद था और पढ़ाई से उनका अवसाद ठीक हो गया। अवसाद का चिकित्सकीय निदान अलग मूल्यांकन से किया जाता है। इसलिए इस अध्ययन का अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि साक्षरता कार्यक्रम के दौरान मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के औसत संकेतकों में सुधार देखा गया।

अध्ययन में अपनाई गई शिक्षण पद्धति भी उल्लेखनीय रही। महिलाओं को केवल किताबों और कॉपियों के माध्यम से पढ़ाने के बजाय कहानी, लोकगीत, चित्रकारी और खेल जैसी गतिविधियों को शिक्षा का हिस्सा बनाया गया। इससे पढ़ाई को उनके जीवन के अनुभवों से जोड़ने का प्रयास किया गया। वित्तीय साक्षरता की कक्षाओं में रुपये-पैसे का हिसाब, बचत और घरेलू खर्च जैसी व्यावहारिक जानकारियां भी दी गईं। ऐसी शिक्षा का महत्व उन महिलाओं के लिए अधिक हो सकता है, जिन्हें रोजमर्रा के कामों में लिखित जानकारी समझने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण विशेषता स्थानीय महिलाओं को प्रशिक्षित करके शिक्षण कार्य में शामिल करना था। स्थानीय भाषा, सामाजिक परिस्थितियों और प्रतिभागियों की समस्याओं को समझने वाली प्रशिक्षकों के साथ महिलाओं को अधिक सहज वातावरण मिला। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार इससे भरोसा और भागीदारी बढ़ाने में मदद मिली। जिन महिलाओं ने पहले औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, उनके लिए वयस्क अवस्था में दोबारा पढ़ाई शुरू करना आसान नहीं था। ऐसे में परिचित परिवेश और स्थानीय महिला प्रशिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

कार्यक्रम पूरा करने वाली कुछ महिलाओं ने अपने दैनिक जीवन में आए बदलावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अब वे बाजार में खरीदारी के दौरान हिसाब समझने और पैसों का लेनदेन करने में अधिक सक्षम महसूस करती हैं। कुछ प्रतिभागियों ने घरेलू बजट और बचत के बारे में बेहतर समझ विकसित होने की बात कही। अस्पताल में अपनी बात रखने, फॉर्म भरने और सार्वजनिक परिवहन से अकेले यात्रा करने में भी आत्मविश्वास बढ़ने के अनुभव सामने आए। ये अनुभव बताते हैं कि बुनियादी साक्षरता का उपयोग केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह दैनिक जीवन में निर्णय लेने की क्षमता से भी जुड़ सकता है।

साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संभावित संबंध को समझना भी महत्वपूर्ण है। जब कोई व्यक्ति लिखित जानकारी नहीं समझ पाता तो उसे कई सामान्य कामों के लिए दूसरों की सहायता लेनी पड़ सकती है। बैंक में फॉर्म भरना हो, दवा का नाम पढ़ना हो, मोबाइल पर संदेश समझना हो या बाजार में हिसाब देखना हो, ऐसी परिस्थितियों में निर्भरता और असहजता महसूस हो सकती है। पढ़ने-लिखने का कौशल बढ़ने पर इन कामों को स्वयं करने की क्षमता विकसित हो सकती है। इससे आत्मविश्वास और सामाजिक भागीदारी बढ़ने की संभावना रहती है। हालांकि मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालने वाले कारण अनेक होते हैं और केवल निरक्षरता को तनाव या अवसाद का कारण नहीं माना जा सकता।

लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के शिक्षक डॉ. पवन मिश्रा के अनुसार पढ़ाई-लिखाई महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ाने और तनाव से निपटने की क्षमता विकसित करने में सहायक हो सकती है। शिक्षा व्यक्ति को अपनी परिस्थितियों को समझने, समस्याओं का समाधान तलाशने और सामाजिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय होने के अवसर देती है। विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए इसका महत्व बढ़ जाता है, जिन्हें आर्थिक और सामाजिक कारणों से पहले पढ़ाई का अवसर नहीं मिल पाया।

अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिलाओं की भागीदारी और कार्यक्रम पूरा करने की दर भी है। प्रारंभिक अध्ययन में 115 महिलाएं शामिल थीं, लेकिन इनमें से 82 ने साक्षरता कार्यक्रम शुरू किया और 74 ने इसे पूरा किया। इसका अर्थ है कि सभी 115 महिलाओं को समान अवधि तक शिक्षण कार्यक्रम का अनुभव नहीं मिला। परिणामों की व्याख्या करते समय इस अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है। साथ ही यह भी देखना होगा कि कार्यक्रम शुरू नहीं करने या बीच में छोड़ देने वाली महिलाओं की परिस्थितियां कार्यक्रम पूरा करने वाली महिलाओं से किस तरह अलग थीं।

इस शोध की एक सीमा यह भी है कि उपलब्ध विवरण के आधार पर साक्षरता कार्यक्रम और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध अंतिम रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता। संभव है कि नियमित सामूहिक कक्षाओं, दूसरी महिलाओं से मेलजोल, प्रशिक्षकों के सहयोग और सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी ने भी मानसिक स्वास्थ्य के संकेतकों को प्रभावित किया हो। यदि भविष्य में ऐसे अध्ययन तुलना समूहों के साथ और लंबे समय तक किए जाएं तो यह अधिक स्पष्ट हो सकेगा कि मानसिक स्वास्थ्य में सुधार का कितना हिस्सा पढ़ने-लिखने की क्षमता बढ़ने से जुड़ा था और कितना सामाजिक सहभागिता या दूसरे कारणों से।

यह अध्ययन अभी प्रीप्रिंट के रूप में उपलब्ध है। इसका अर्थ है कि शोध को सार्वजनिक किया गया है, लेकिन इसे किसी वैज्ञानिक पत्रिका की औपचारिक विशेषज्ञ समीक्षा से गुजर चुका अध्ययन मानना उचित नहीं होगा, जब तक ऐसी समीक्षा और प्रकाशन की पुष्टि न हो। इसके बावजूद प्रस्तुत आंकड़े वयस्क साक्षरता कार्यक्रमों के संभावित सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी लाभों को समझने के लिए महत्वपूर्ण प्रारंभिक साक्ष्य उपलब्ध कराते हैं।

डालीगंज की इस बस्ती में 17 सप्ताह तक चले कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि वयस्क महिलाओं की शिक्षा को केवल अक्षर ज्ञान तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। पढ़ना-लिखना सीखने से महिलाओं को अपने दैनिक जीवन में अधिक स्वतंत्रता मिल सकती है और सामूहिक शिक्षा के माध्यम से सामाजिक जुड़ाव के अवसर भी बढ़ सकते हैं। अध्ययन में अक्षरों के ज्ञान के साथ मानसिक परेशानी के संकेतकों में जो सुधार दर्ज हुआ, वह इस संभावना की ओर ध्यान दिलाता है कि साक्षरता कार्यक्रम महिलाओं के आत्मविश्वास, सामाजिक भागीदारी और मानसिक स्वास्थ्य को एक साथ मजबूत करने का माध्यम बन सकते हैं।

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Kumud Gupta

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I am currently pursuing a Bachelor of Journalism and Mass Communication (BJMC) and am a 5th Semester student at KITM Group of Institutions, Khatima, Uttarakhand. I have a strong interest in content writing, particularly on crime, politics, social issues, and history.

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