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Lucknow News: लखनऊ में 450 साल पुरानी परंपरा की धूम, सिंदूर खेला के साथ मां दुर्गा को दी गई विदाई
Lucknow News: लखनऊ में विजयादशमी पर बंगाली समाज ने सिंदूर खेला की परंपरा निभाई। लाल जोड़े में सजी महिलाओं ने मां दुर्गा को विदाई देकर सुख-समृद्धि की कामना की।
Lucknow Sindoor Khela (Image Credit-Ashutosh Tripathi)
लखनऊ। शारदीय नवरात्र के पांच दिवसीय पूजन के बाद विजयादशमी पर लखनऊ में बंगाली समाज ने पारंपरिक हर्षोल्लास और उमंग के साथ ‘सिंदूर खेला’ का उत्सव मनाया। गोमती नगर स्थित रविंद्र पल्ली और कैसरबाग के ऐतिहासिक बंगाली क्लब में आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान में सुहागिन महिलाओं ने मां दुर्गा को विदाई देकर एक-दूसरे को सिंदूर लगाया और परिवार की सुख-समृद्धि व पति की दीर्घायु की कामना की।
लाल पाड़ साड़ियों और दुल्हन की तरह लाल जोड़े में सजी महिलाओं ने पूरे उत्साह के साथ एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर विजयादशमी की शुभकामनाएं दीं। पंडालों में लाल रंग की छटा ऐसी बिखरी मानो सिंदूर की होली खेली जा रही हो। महिलाओं ने मां दुर्गा को पान के पत्तों से सिंदूर अर्पित किया और उन्हें पान व पारंपरिक मिठाइयों का भोग लगाकर अगले वर्ष पुनः आगमन की प्रार्थना की।
मायके से विदा हुईं मां, सिंदूर से भरी गई मांग
सिंदूर खेल रही महिलाओं ने बताया कि बंगाली समाज की धार्मिक मान्यता के अनुसार मां दुर्गा हर साल अपने मायके आती हैं। विजयादशमी के दिन जब उनकी ससुराल के लिए विदाई होती है, तो विवाहित महिलाएं उनकी मांग सिंदूर से भरती हैं। इसी सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए सुहागिनें एक-दूसरे की सुखी वैवाहिक जिंदगी और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
450 साल पुरानी है विदाई की यह परंपरा
बंगाली समाज की तनुश्री घोष ने बताया कि सिंदूर खेला की परंपरा लगभग 450 साल पुरानी है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजा जा रहा है। 450 वर्षों से चली आ रही रीति के अनुसार, विजयादशमी के दिन मां दुर्गा के साथ-साथ मां लक्ष्मी, मां सरस्वती, भगवान कार्तिकेय और भगवान श्रीगणेश का विधि-विधान से पूजन व श्रृंगार किया गया। इसके बाद विसर्जन से पहले मां को मिष्ठान्न अर्पित कर मंगलकामना की गई।
वर्ष में केवल एक दिन बनता है यह दुर्लभ प्रसाद
उत्सव के समापन पर रविंद्र पल्ली पंडाल में एक विशेष और दुर्लभ प्रसाद का वितरण किया गया। समाज की अदिति बोस ने बताया कि दूध, दही, केला, चूड़ा (पोहा) और बताशे को मिलाकर यह खास प्रसाद तैयार किया जाता है। मान्यता है कि इस प्रसाद को ग्रहण कर जो भी मनोकामना मांगी जाती है, मां दुर्गा उसे अवश्य पूर्ण करती हैं। यह प्रसाद पूरे साल में सिर्फ विजयादशमी के दिन 'सिंदूर खेला' के अवसर पर ही तैयार और वितरित किया जाता है; इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य दिन न तो इसे बनाया जा सकता है और न ही ग्रहण किया जाता है।


