केदारताल ट्रैक पर आखिर कैसे गईं लखनऊ की दो सगी बहनों की जान? ट्रेकिंग एजेंसी पर उठे सवाल

Lucknow News: उत्तरकाशी के केदारताल ट्रैक पर बर्फीले तूफान में लखनऊ की वर्तिका और दीपिका वर्मा की मौत हो गई। घर पहुंचे शवों को देख परिवार में कोहराम मच गया। परिजनों ने ट्रेकिंग एजेंसी पर लापरवाही का आरोप लगाया

Ashutosh Tripathi
Published on: 5 Nov 2026 5:18 PM IST
केदारताल ट्रैक पर आखिर कैसे गईं लखनऊ की दो सगी बहनों की जान? ट्रेकिंग एजेंसी पर उठे सवाल
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Lucknow News: उत्तराखंड के उत्तरकाशी स्थित दुर्गम केदारताल ट्रैक पर भीषण बर्फबारी और हिमस्खलन की चपेट में आकर जान गंवाने वाली लखनऊ की दो सगी बहनों—वर्तिका वर्मा और दीपिका वर्मा—के पार्थिव शरीर गुरुवार जब उनके आवास पहुंचे, तो कोहराम मच गया। जो बेटियां पहाड़ों की ऊंचाइयों को फतह करने का हौसला लेकर घर से निकली थीं, उनके ताबूत देख परिजनों की चीत्कार से पूरा इलाका दहल उठा। इस हृदयविदारक हादसे के बाद पीड़ित परिवार ने ट्रेकिंग एजेंसी की घोर लापरवाही पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसने मौसम की चेतावनी के बावजूद दल को आगे भेज दिया और अनहोनी के बाद परिजनों को सूचना तक नहीं दी।

​घर पहुंचते ही मचा हाहाकार, बेसुध हुए पिता

​गुडंबा थाना क्षेत्र के गायत्रीपुरम स्थित आवास पर जैसे ही दोनों बहनों के शव एंबुलेंस से पहुंचे, चीख-पुकार मच गई और पूरे मोहल्ले में मातम पसर गया। बेटियों के निष्प्राण शरीरों को देख पिता श्रीनारायण वर्मा बेसुध होकर गिर पड़े। मूलरूप से बाराबंकी के सराय पांडेय निवासी और कृषि विभाग से सेवानिवृत्त श्रीनारायण वर्मा ने रोते हुए कहा, "वे दोनों सिर्फ मेरी बेटियां नहीं, मेरा नूर और जिगर का टुकड़ा थीं। हमेशा एक साथ रहती थीं, जहां भी जाती थीं साथ जाती थीं और आज दुनिया से रुखसत भी एक साथ ही हुईं।

मंजिल से महज 6 किमी दूर बिगड़ा मौसम, बर्फ में दबने से गई जान

​परिजनों के अनुसार, दोनों बहनों को ट्रेकिंग का गहरा शौक था और वे भारत व नेपाल के कई दुर्गम ट्रैक सफलतापूर्वक पूरे कर चुकी थीं। 26 अक्टूबर को वर्तिका और दीपिका लखनऊ से उत्तराखंड के लिए रवाना हुईं। 27 अक्टूबर को 7 अन्य ट्रेकर्स और 5 सपोर्ट स्टाफ सहित कुल 12 सदस्यीय दल के साथ गंगोत्री से केदारताल की चढ़ाई शुरू की। 29 अक्टूबर को तीन दिवसीय ट्रैक पूरा होना था। दल करीब 20-25 किमी का रास्ता तय कर चुका था और मंजिल से महज 6-7 किमी दूर था, तभी मौसम ने अचानक करवट ली। भारी बर्फबारी और हिमस्खलन के कारण रास्ता बंद हो गया और सभी ट्रेकर्स फंस गए।

​30 को मांगी गई थी मदद, बुधवार को मिले थे शव

​30 अक्टूबर को कच्ची ढांग के पास फंसे दल ने एजेंसी से आपात मदद की गुहार लगाई। इसके बाद प्रशासन और एसडीआरएफ ने रेस्क्यू अभियान शुरू किया। 31 अक्टूबर को सपोर्ट टीम के 4 सदस्यों और कैंप के 8 अन्य लोगों को सुरक्षित एयरलिफ्ट कर लिया गया, लेकिन भारी बर्फ में दबे होने के कारण चार लोग फंसे रह गए। बुधवार सुबह एसडीआरएफ ने सर्च ऑपरेशन के दौरान तीन शव बरामद किए, जिनमें दोनों बहनों के शव भी शामिल थे।


बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्यरत थीं दोनों बेटियां

​परिजनों ने बताया कि 25 वर्षीय भाई अतुल से बड़ी दोनों बहनें बेहद प्रतिभाशाली और आत्मनिर्भर थीं। बड़ी बहन वर्तिका गुरुग्राम की एक प्रतिष्ठित निजी कंपनी में कार्यरत थी और छोटी बहन दीपिका नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (NIFT) से पासआउट थीं और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में बतौर ग्राफिक डिजाइनर वर्क फ्रॉम होम कर रही थीं। दोनों बहनें महज दो महीने पहले ही फूलों की घाटी और हेमकुंड साहिब की ट्रेकिंग पूरी कर लौटी थीं।

​ट्रेकिंग एजेंसी पर गंभीर सवाल: चेतावनी के बावजूद भेजा, परिजनों से छिपाई खबर

हादसे के बाद परिवार ने ट्रेकिंग एजेंसी की भूमिका पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। परिजनों का सीधा आरोप है कि पहाड़ों पर खराब मौसम और बर्फबारी के अलर्ट के बावजूद एजेंसी ने ट्रेकर्स को आगे बढ़ने की अनुमति क्यों दी? इतनी बड़ी त्रासदी के बावजूद एजेंसी ने परिजनों को कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी। परिवार को इस अनहोनी का पता सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों से चला।

Ashutosh Tripathi
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Ashutosh Tripathi

Chief Photojournalist Mail ID - tripathiashutosh88@gmail.comtripathiashutosh88@gmail.com

आशुतोष त्रिपाठी जन्म 17 अप्रैल 1988 एक भारतीय फोटोग्राफर और फोटो जर्नलिस्ट हैं। पत्रकारिता जीवन की शुरुआत बतौर रिपोर्टर वॉइस ऑफ़ मूवमेंट में हुई, इसके बाद 2013 में नव भारत टाइम्स में एक युवा फोटो जर्नलिस्ट के रूप में कार्यरत थे। आशुतोष त्रिपाठी ने 2007 में एमिटी विश्वविद्यालय से मास्टर इन जर्नलिस्म एंड मास कम्युनिकेशन का कोर्स किया। 2010 में वौइस् ऑफ मूवमेंट अखबार में बतौर रिपोर्टर तीन साल काम किया। इसके बाद 2013 में नव भारत टाइम्स में एक युवा फोटो जर्नलिस्ट के रूप में कार्यरत थे। 2014 में एक फोटोग्राफर बने और एक साल बाद दैनिक भास्कर उत्तर प्रदेश में सीनियर फोटोजर्नलिस्ट के रूप में कार्यरत रहे। 2016 से लगातार newstrack.com में चीफ फोटोजर्नलिस्ट के पद पर कार्यरत हैं। 2015 में एक इनके द्वारा की गयी एक बुजुर्ग टाइपिस्ट की स्टोरी ने पूरी दुनिया ख्याति प्राप्त की। 2016 में इन्हें पत्रकारिता जगत में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए नारद पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था । 2017 में फोटोग्राफी क्लब ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित इंटरनेशनल फोटोग्राफी कम्पटीशन में इन्होंने दूसरा स्थान हासिल किया । 2019 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित कुंभ फोटोग्राफी प्रतियोगिता में इन्होंने तृतीय पुरुस्कार मिला था ।।

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