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एक महीने पहले ही लागू कर दिया नया कानून, लखनऊ में हजारों पुराने जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र के आवेदन लौटाए
New Birth Death Registration Rules: केंद्र का नया जन्म-मृत्यु पंजीकरण कानून 1 अक्टूबर 2026 से लागू होगा। लखनऊ में अगस्त से लौटाए जा रहे पुराने आवेदनों पर मौजूदा नियमों से कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
Birth Registration
New Birth Death Registration Rules: जन्म और मृत्यु का वर्षों पुराना पंजीकरण कराने के लिए तहसीलों के चक्कर लगा रहे लोगों को जिस नए केंद्रीय कानून का हवाला देकर पिछले करीब एक महीने से लौटाया जा रहा था, वह कानून अभी लागू ही नहीं हुआ है। केंद्र सरकार ने ‘जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2026’ को 1 अक्टूबर 2026 से लागू करने की अधिसूचना 16 सितंबर को जारी की है। इसके बावजूद लखनऊ सहित उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में अगस्त के अंतिम सप्ताह से ही दो वर्ष से अधिक पुराने जन्म और मृत्यु के पंजीकरण संबंधी आवेदन यह कहते हुए वापस किए जा रहे हैं कि अब ऐसे मामलों में प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी होगा। कानून की प्रभावी तारीख की आधिकारिक अधिसूचना देखने पर स्पष्ट है कि नई व्यवस्था 1 अक्टूबर से लागू होगी, उससे पहले लंबित और नए आवेदनों पर वर्तमान में लागू कानूनी व्यवस्था के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लखनऊ के जिलाधिकारी विशाख जी ने भी अब स्पष्ट किया है कि एक वर्ष से अधिक पुराने जन्म-मृत्यु पंजीकरण के आवेदनों का मौजूदा व्यवस्था के अनुसार निस्तारण कराया जाएगा और सभी एसडीएम को इस संबंध में निर्देश दिए जाएंगे।
इस मामले में भ्रम की शुरुआत 6 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद प्रकाशित संशोधन अधिनियम से हुई। संशोधन में स्पष्ट लिखा गया था कि अधिनियम तत्काल लागू नहीं होगा, बल्कि केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना जारी कर जिस तारीख को निर्धारित करेगी, उसी तारीख से प्रभावी होगा। इसके बावजूद संशोधित धारा को पढ़कर कुछ स्थानों पर प्रशासनिक स्तर पर यह मान लिया गया कि नया प्रावधान लागू हो चुका है। अब केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन भारत के महारजिस्ट्रार कार्यालय ने 16 सितंबर 2026 को अधिसूचना संख्या S.O. 5081(E) जारी करके इस भ्रम को समाप्त कर दिया है। अधिसूचना में केंद्र सरकार ने 1 अक्टूबर 2026 को संशोधन अधिनियम के लागू होने की तारीख निर्धारित की है। यानी 30 सितंबर तक नया एक से दो वर्ष और दो वर्ष से अधिक वाला विभाजन प्रभावी नहीं है।
1 अक्टूबर से बदलेगा नियम, एक से दो वर्ष के मामले SDM और दो वर्ष से पुराने मामले कोर्ट जाएंगे
नए कानून का सबसे बड़ा बदलाव विलंबित जन्म और मृत्यु पंजीकरण को दो अलग श्रेणियों में बांटना है। संशोधित धारा 13(3) के अनुसार जन्म अथवा मृत्यु की घटना के एक वर्ष बाद लेकिन दो वर्ष के भीतर पंजीकरण कराने पर जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी अथवा जिलाधिकारी द्वारा अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट का आदेश आवश्यक होगा। संबंधित अधिकारी जन्म या मृत्यु की सत्यता की जांच करने के बाद निर्धारित शुल्क के साथ पंजीकरण की अनुमति दे सकेगा। इसके विपरीत नई धारा 13(3A) के तहत घटना के दो वर्ष से अधिक समय बाद पंजीकरण कराने के लिए संबंधित क्षेत्राधिकार वाले प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश आवश्यक होगा। न्यायिक मजिस्ट्रेट को जन्म अथवा मृत्यु की सत्यता की जांच करने के बाद ही आदेश देना होगा। यह पूरी नई व्यवस्था 1 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगी।
इस बदलाव को समझने के लिए पुराने कानून को जानना जरूरी है। संशोधन लागू होने से पहले जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 13(3) में एक वर्ष से अधिक पुराने सभी मामलों के लिए प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट अथवा प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के आदेश का प्रावधान था। अलग-अलग राज्यों में नियमों और प्रशासनिक व्यवस्था के कारण कार्यकारी मजिस्ट्रेटों के स्तर पर ऐसे मामलों के निस्तारण को लेकर वर्षों से अलग स्थितियां बनी रहीं और मामला अदालतों तक भी पहुंचा। कर्नाटक हाईकोर्ट ने अगस्त 2026 के एक फैसले में पुराने और नए दोनों प्रावधानों का विस्तार से उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि 2026 के संशोधन के बाद एक से दो वर्ष वाले मामले DM, SDM अथवा अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट और दो वर्ष से पुराने मामले प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जाएंगे।
लखनऊ में 12 हजार से अधिक आवेदन लौटाने का दावा
लखनऊ में स्थिति इसलिए अधिक गंभीर हो गई क्योंकि अगस्त के अंतिम सप्ताह से तहसीलों ने कथित तौर पर बड़ी संख्या में आवेदन स्वीकार करने या उनका निस्तारण करने के बजाय वापस करना शुरू कर दिया। उपलब्ध प्रशासनिक जानकारी के अनुसार 12 हजार से अधिक आवेदन प्रभावित होने का दावा है। अकेले सदर तहसील में प्रतिदिन करीब 200 आवेदन पहुंचने और लगभग आठ हजार आवेदन लौटाए जाने की बात सामने आई है। मलिहाबाद, बीकेटी और सरोजनीनगर तहसीलों में भी दो वर्ष से अधिक पुराने मामलों में आवेदकों को अदालत जाने के लिए कहा जा रहा था। इन स्थानीय संख्याओं की कोई सार्वजनिक समेकित आधिकारिक सूची अभी उपलब्ध नहीं है, इसलिए 12 हजार और आठ हजार के आंकड़ों को तहसील स्तर से सामने आई जानकारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सबसे बड़ी प्रशासनिक समस्या यह रही कि जिन आवेदकों को अदालत जाने के लिए कहा गया, उनके लिए नई न्यायिक व्यवस्था उस समय प्रभावी ही नहीं थी। संशोधन अधिनियम में साफ था कि कानून केंद्र द्वारा बाद में अधिसूचित तारीख से लागू होगा। जब 16 सितंबर को केंद्र ने अधिसूचना जारी की तो उसमें भी प्रभावी तारीख तत्काल न रखकर 1 अक्टूबर निर्धारित की गई। इसका सीधा अर्थ है कि अगस्त के अंतिम सप्ताह अथवा सितंबर के दौरान केवल 2026 के संशोधन का हवाला देकर नए नियम को लागू मान लेना समयपूर्व था।
गजट अस्पष्ट नहीं था, लागू होने की तारीख अलग से तय होनी थी
मूल सूचना में इसे ‘गजट में स्पष्टता न होने से भ्रम’ कहा गया है, लेकिन कानूनी दस्तावेज देखने पर स्थिति कुछ अलग है। 6 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त Registration of Births and Deaths (Amendment) Act, 2026 की धारा 1(2) में स्पष्ट प्रावधान था कि अधिनियम उस तारीख से प्रभावी होगा जिसे केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित करेगी। यानी संशोधन के मूल गजट से ही यह स्पष्ट था कि प्रकाशन की तारीख और कानून लागू होने की तारीख एक नहीं हैं। बाद में 16 सितंबर की अधिसूचना ने 1 अक्टूबर को इसकी प्रभावी तारीख घोषित कर दिया। इसलिए समस्या कानून की भाषा से अधिक उसके प्रशासनिक स्तर पर समय से पहले क्रियान्वयन की दिखाई देती है।
जिलाधिकारी विशाख जी ने अब कहा है कि एक वर्ष से अधिक पुराने जन्म और मृत्यु के लंबित आवेदनों का निस्तारण कराया जाएगा और एसडीएम को आवश्यक निर्देश दिए जाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 1 अक्टूबर से नई व्यवस्था लागू होगी और दो वर्ष से अधिक पुराने मामलों का निस्तारण न्यायिक मजिस्ट्रेट के स्तर से होगा। इससे उन हजारों आवेदकों को राहत मिल सकती है जिनकी फाइलें पिछले सप्ताहों में वापस कर दी गई थीं। हालांकि प्रशासन के सामने अब यह भी प्रश्न है कि लौटाए गए आवेदन स्वतः बहाल किए जाएंगे या लोगों को दोबारा आवेदन करना पड़ेगा। यदि आवेदक को फिर से पूरी प्रक्रिया करनी पड़ती है तो प्रशासनिक गलती का बोझ नागरिक पर पड़ सकता है।
स्कूल में प्रवेश से लेकर उत्तराधिकार तक अटक रहे काम
जन्म प्रमाणपत्र अब केवल स्कूल प्रवेश का दस्तावेज नहीं है। उम्र और जन्मस्थान प्रमाणित करने, शिक्षा, सरकारी योजनाओं तथा विभिन्न नागरिक सेवाओं में इसकी आवश्यकता पड़ती है। 2023 के संशोधन के बाद जन्म प्रमाणपत्र को कई उद्देश्यों के लिए जन्म तिथि और जन्मस्थान के एकल प्रमाण के रूप में अधिक महत्व दिया गया है। पुराने जन्म का कभी पंजीकरण नहीं हुआ हो तो व्यक्ति को दशकों बाद भी इसकी आवश्यकता पड़ सकती है। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में ऐसे मामलों की संख्या अधिक हो सकती है क्योंकि पहले संस्थागत प्रसव और नागरिक पंजीकरण की पहुंच आज जैसी नहीं थी।
लखनऊ में प्रभावित परिवारों का कहना है कि कई स्कूल बच्चों के प्रवेश के लिए नगर निकाय अथवा सक्षम जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रार से जारी प्रमाणपत्र मांग रहे हैं। पुराना जन्म दर्ज न होने पर अभिभावक तहसील और नगर निकाय के बीच भटक रहे हैं। मृत्यु प्रमाणपत्र का मामला इससे भी अधिक गंभीर हो सकता है। बैंक खाते, बीमा, पेंशन, उत्तराधिकार, संपत्ति नामांतरण और दूसरे वित्तीय मामलों में मृत्यु प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है। वर्षों पुरानी मृत्यु का पंजीकरण न होने पर परिवार की संपत्ति और वित्तीय अधिकार तक अटक सकते हैं।
आखिर दो वर्ष से पुराने मामलों को न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास क्यों भेजा गया
2026 के संशोधन के पीछे मुख्य सोच बहुत पुराने जन्म और मृत्यु के पंजीकरण में सत्यापन की प्रक्रिया को अधिक कठोर बनाना है। जन्म अथवा मृत्यु के कई वर्षों बाद आवेदन आने पर अस्पताल का रिकॉर्ड, स्थानीय निकाय का तत्कालीन रिकॉर्ड, स्कूल दस्तावेज, परिवार रजिस्टर और दूसरे प्राथमिक साक्ष्य उपलब्ध न होने की आशंका बढ़ जाती है। गलत जन्म तिथि या फर्जी मृत्यु पंजीकरण का इस्तेमाल पहचान, आयु, संपत्ति, उत्तराधिकार और दूसरे कानूनी मामलों में किया जा सकता है। इसीलिए संसद ने दो वर्ष से अधिक पुराने मामलों को कार्यपालिका के बजाय प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सत्यापन के अधीन करने का फैसला किया है। एक से दो वर्ष की देरी वाले मामलों में DM, SDM अथवा अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट की व्यवस्था बरकरार रखी गई है।
यह बदलाव अचानक पैदा हुई व्यवस्था भी नहीं है। जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण में मजिस्ट्रेट की भूमिका पुराने कानून में पहले से थी। 2026 के संशोधन ने मुख्य रूप से एक वर्ष से अधिक पुराने मामलों को दो श्रेणियों में बांटकर अधिकार क्षेत्र स्पष्ट किया है। एक से दो वर्ष की देरी को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के स्तर पर रखा गया है, जबकि दो वर्ष से अधिक पुराने मामलों में न्यायिक जांच की बाध्यता बनाई गई है। इसलिए इसे ‘दो वर्ष बाद अब जन्म या मृत्यु प्रमाणपत्र बन ही नहीं सकेगा’ कहना गलत होगा। प्रमाणपत्र बन सकेगा, लेकिन 1 अक्टूबर के बाद उसके लिए पहले न्यायिक मजिस्ट्रेट से आदेश लेना होगा।
1 अक्टूबर के बाद तहसील सीधे दो वर्ष पुराने मामले का आदेश नहीं दे सकेगी
नई व्यवस्था लागू होने के बाद अधिकार क्षेत्र स्पष्ट रूप से समय के आधार पर बंट जाएगा। सामान्य अवधि के भीतर जन्म या मृत्यु की सूचना स्थानीय रजिस्ट्रार के स्तर पर दर्ज होगी। निर्धारित अवधि से विलंब होने पर कानून और राज्य के लागू नियमों के अनुसार अतिरिक्त प्रक्रिया होगी। एक वर्ष से अधिक लेकिन दो वर्ष के भीतर के मामले में DM, SDM या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट सत्यापन और आदेश दे सकेगा। लेकिन दो वर्ष से अधिक पुराने मामले में यही अधिकारी अंतिम आदेश नहीं दे सकेंगे; आवेदक को क्षेत्राधिकार वाले प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश प्राप्त करना होगा।
इसका मतलब यह भी है कि एक अक्टूबर के बाद प्रशासन और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट कार्यप्रणाली बनाना जरूरी होगा। नागरिक को यह जानकारी होनी चाहिए कि आवेदन पहले रजिस्ट्रार के पास देना है या सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष जाना है, सत्यापन रिपोर्ट कौन देगा, कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी होंगे और न्यायिक आदेश मिलने के बाद जन्म-मृत्यु रजिस्टर में प्रविष्टि कौन करेगा। यदि इन प्रक्रियाओं के लिए जिला स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हुए तो अगस्त-सितंबर जैसा भ्रम नई व्यवस्था लागू होने के बाद भी बना रह सकता है।
अभी 30 सितंबर तक पुराने कानून के अनुसार ही होना चाहिए निस्तारण
सबसे महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति वर्तमान तारीख की है। केंद्र सरकार की 16 सितंबर की अधिसूचना के अनुसार संशोधित अधिनियम 1 अक्टूबर 2026 को प्रभावी होगा। इसलिए उससे पहले केवल नए संशोधन का हवाला देकर किसी आवेदन को यह कहते हुए वापस करना कि दो वर्ष से अधिक पुराना मामला अब अनिवार्य रूप से नई धारा 13(3A) के तहत ही न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जाएगा, अधिनियम की घोषित प्रभावी तारीख से मेल नहीं खाता। 30 सितंबर तक उस समय लागू मौजूदा कानून और उत्तर प्रदेश की वैध प्रक्रियाओं के अनुसार आवेदनों का निस्तारण किया जाना चाहिए।
लखनऊ में पैदा हुई समस्या इसलिए केवल जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र की नहीं बल्कि किसी केंद्रीय कानून को उसकी वैधानिक प्रभावी तारीख से पहले प्रशासनिक स्तर पर लागू मान लेने की भी है। संसद ने अगस्त में कानून बनाया, लेकिन स्वयं कानून ने केंद्र सरकार को उसके लागू होने की तारीख अलग से तय करने का अधिकार दिया। केंद्र ने 16 सितंबर को अधिसूचना जारी कर वह तारीख 1 अक्टूबर निर्धारित कर दी। इसके बावजूद यदि 26 अगस्त के आसपास से ही दो वर्ष से पुराने आवेदन नए कानून के आधार पर लौटाए गए हैं तो प्रभावित आवेदनों की दोबारा समीक्षा जरूरी है। 1 अक्टूबर से दो वर्ष से अधिक पुराने जन्म और मृत्यु के पंजीकरण के लिए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश अनिवार्य हो जाएगा, लेकिन उससे पहले नए प्रावधान को लागू मानकर हजारों नागरिकों को लौटाना कानून की घोषित समयसीमा से पहले की प्रशासनिक कार्रवाई है।


