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Lucknow: इन छोटे जूतों को भी नहीं पता था कि सफ़र इतना छोटा होगा
लखनऊ के पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर आजमगढ़ जा रही डबल डेकर बस पलटने से 5 लोगों की मौत और कई घायल। खून में भीगा एक मासूम का जूता अधूरे सपनों की दर्दनाक गवाही बना।
Lucknow Bus Accident_ Story of Small Shoes (Photo_ Ashutosh Tripathi).jpg
लखनऊ, गोसाईंगंज/पूर्वांचल एक्सप्रेसवे। यह तस्वीर सिर्फ़ एक सड़क हादसे की नहीं है… यह उन अधूरे रह गए सपनों की मूक गवाही है, जो अपने गंतव्य तक पहुँचने से पहले ही बिखर गए। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर पलटी उस डबल डेकर बस के साथ न जाने कितनी ज़िंदगियाँ भी उलट गईं। कोई अपने घर लौट रहा था, कोई नए सफ़र पर निकला था, कोई अपनी मंज़िल से बस कुछ घंटे दूर था। लेकिन सड़क ने सबको एक ही सन्नाटे में समेट लिया।
और उस सन्नाटे के बीच… खून में भीगा पड़ा था एक छोटा-सा जूता। किसी मासूम के नन्हे कदमों का साथी। शायद उसने ज़िद करके ये नए जूते दिलवाए होंगे। शायद आईने के सामने खड़े होकर मुस्कुराया होगा— “मम्मी, देखो… मेरे नए जूते!” उसे क्या पता था कि सफ़र इतना छोटा होगा… कि खुशियाँ पहनने से पहले ही उतर जाएँगी… और जूते अपने ही कदमों से बिछड़ जाएँगे।
हादसे का वह पल, जब सपने पलट गए
गोसाईंगंज थाना क्षेत्र में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर सवारियों से भरी डबल डेकर बस अनियंत्रित होकर पलट गई। बस आज़मगढ़ की ओर जा रही थी। उसमें बैठे यात्रियों की अपनी-अपनी मंज़िलें थीं, अपने-अपने सपने थे। कुछ अपनी गोद में भविष्य को लेकर चल रहे थे—बच्चे, जिनकी आँखों में अभी दुनिया बसनी बाकी थी।
लेकिन एक झटके में सब बदल गया।
इस भीषण हादसे में पाँच यात्रियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए। चीखें, टूटे शीशे, बिखरा सामान और सड़क पर फैली खामोशी—कुछ ही मिनटों में पूरा दृश्य किसी भयावह चित्र की तरह जम गया।
सड़क साफ़ हो जाएगी… पर खामोशी नहीं
कुछ ही घंटों में सड़क फिर से साफ़ कर दी जाएगी। बस का मलबा हटा दिया जाएगा। खून के धब्बे भी धुल जाएँगे। लेकिन उस छोटे जूते की खामोशी कौन मिटाएगा? उस माँ की सूनी गोद कौन भर पाएगा? उन पाँच परिवारों के उजड़े आँगन में फिर से रोशनी कौन लाएगा? हादसे अक्सर आँकड़ों में दर्ज हो जाते हैं— 5 मौतें, 12 घायल। पर दर्द कभी फाइलों में बंद नहीं होता। वह घरों में पसरे सन्नाटे में रहता है… अधूरी बातों में… और उन चीज़ों में, जो अपने मालिक का इंतज़ार करती रह जाती हैं।
आज पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर पड़ा वह छोटा जूता एक सवाल पूछ रहा है— क्या हमारी सड़कों पर रफ्तार हमेशा ज़िंदगी से बड़ी रहेगी? अब वह आवाज़ शायद कभी नहीं सुनाई देगी— “मम्मी, देखो… मेरे नए जूते!” और यही इस हादसे की सबसे बड़ी खबर है— कुछ सफ़र मंज़िल तक नहीं पहुँचते, वे याद बनकर रह जाते हैं।


