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बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ रही तो न करें नजरअंदाज, SGPGI में पात्र बच्चों को मुफ्त इलाज
Lucknow: ग्रोथ हार्मोन की कमी, टर्नर और प्राडर-विली सिंड्रोम जैसी स्थितियों में उपलब्ध है उपचार; बच्चों में थायरॉयड, समय से पहले या देर से यौवन और टाइप-1 डायबिटीज की पहचान पर विशेषज्ञों ने दिया जोर.
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Lucknow: बच्चे की लंबाई उम्र के अनुसार नहीं बढ़ रही है, उसका शारीरिक विकास दूसरे बच्चों की तुलना में धीमा है या यौवन के लक्षण असामान्य समय पर दिखाई दे रहे हैं, तो इसे हमेशा सामान्य शारीरिक अंतर समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कुछ बच्चों में ऐसी समस्याओं के पीछे हार्मोन संबंधी विकार हो सकते हैं, जिनकी समय पर पहचान और उपचार से विकास तथा स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है। लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में बच्चों के हार्मोन संबंधी रोगों के उपचार के लिए विशेष सेवाएँ उपलब्ध हैं। संस्थान में पात्र बच्चों को ग्रोथ हार्मोन थेरेपी निःशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है। इसके साथ ही टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों के लिए विशेष क्लिनिक तथा सपोर्ट ग्रुप भी संचालित किया जा रहा है।
एसजीपीजीआई में 17 और 18 अक्टूबर को आयोजित 'पीडियाट्रिक एंडो क्लीनिक्स 2026' में बच्चों के हार्मोन संबंधी रोगों की समय पर पहचान और उपचार पर विशेष जोर दिया गया। कार्यक्रम में विशेषज्ञ सेवाओं के विस्तार तथा चिकित्सा कर्मियों के प्रशिक्षण की आवश्यकता पर चर्चा की गई। बच्चों में लंबाई कम बढ़ना, थायरॉयड से संबंधित समस्याएँ, यौवन की शुरुआत में असामान्य बदलाव और कम उम्र में डायबिटीज जैसी स्थितियाँ बाल एंडोक्राइनोलॉजी के अंतर्गत आती हैं। इन रोगों की पहचान में देरी होने पर कुछ बच्चों के शारीरिक विकास और दैनिक जीवन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं।
बच्चों की लंबाई उनके आनुवंशिक गुणों, पोषण, सामान्य स्वास्थ्य और हार्मोन की कार्यप्रणाली सहित अनेक कारकों से प्रभावित होती है। हर कम लंबाई वाले बच्चे में हार्मोन की कमी नहीं होती। कई बच्चों की लंबाई माता-पिता की शारीरिक बनावट के अनुसार स्वाभाविक रूप से कम हो सकती है। कुछ बच्चों में विकास की गति सामान्य से धीमी होती है, लेकिन वे बाद में अपेक्षित लंबाई तक पहुँच सकते हैं। चिंता तब अधिक होती है जब बच्चे की लंबाई बढ़ने की गति लगातार कम हो, वह अपने पहले के विकास क्रम से पीछे जाने लगे या अन्य शारीरिक लक्षण भी दिखाई दें। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ बच्चे की लंबाई, वजन, विकास के पिछले रिकॉर्ड और पारिवारिक इतिहास का मूल्यांकन कर सकते हैं।
ग्रोथ हार्मोन शरीर के सामान्य विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह हार्मोन मस्तिष्क में स्थित पिट्यूटरी ग्रंथि से निकलता है और बच्चों की हड्डियों तथा अन्य ऊतकों के विकास को प्रभावित करता है। जिन बच्चों में ग्रोथ हार्मोन की वास्तविक कमी होती है, उनकी लंबाई बढ़ने की गति प्रभावित हो सकती है। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय मूल्यांकन के बाद ग्रोथ हार्मोन थेरेपी उपयोगी हो सकती है। लेकिन केवल बच्चे की लंबाई कम होने के आधार पर यह उपचार शुरू नहीं किया जाता। इसके लिए विकास संबंधी रिकॉर्ड, चिकित्सकीय परीक्षण और आवश्यकता के अनुसार हार्मोन संबंधी जाँच की जाती है।
एसजीपीजीआई में ग्रोथ हार्मोन की कमी के अतिरिक्त टर्नर सिंड्रोम और प्राडर-विली सिंड्रोम जैसी कुछ स्थितियों में भी पात्र बच्चों के लिए निःशुल्क ग्रोथ हार्मोन थेरेपी उपलब्ध कराई जा रही है। टर्नर सिंड्रोम एक आनुवंशिक स्थिति है, जो लड़कियों में विकास और अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है। प्राडर-विली सिंड्रोम भी एक आनुवंशिक स्थिति है, जिसमें विकास, मांसपेशियों की ताकत, भूख के नियंत्रण और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं। इन स्थितियों में ग्रोथ हार्मोन का उपयोग विशेषज्ञ द्वारा निर्धारित मानकों और नियमित निगरानी के अंतर्गत किया जाता है। प्रत्येक बच्चे को यह थेरेपी देना आवश्यक या उपयुक्त नहीं होता।
ग्रोथ हार्मोन थेरेपी का उपचार लंबे समय तक चल सकता है और इसमें नियमित जाँच की आवश्यकता होती है। चिकित्सक बच्चे की लंबाई बढ़ने की गति, वजन, उपचार की प्रतिक्रिया और संभावित दुष्प्रभावों की निगरानी करते हैं। इसलिए इसे सामान्य लंबाई बढ़ाने की दवा या सप्लीमेंट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। बिना विशेषज्ञ की सलाह के ग्रोथ हार्मोन का इस्तेमाल नुकसानदेह हो सकता है। एसजीपीजीआई में निःशुल्क उपचार की सुविधा उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है जिनके बच्चे चिकित्सकीय मानकों के अनुसार पात्र पाए जाते हैं। हालाँकि, उपलब्ध विवरण में पात्रता, पंजीकरण और दवा उपलब्धता की विस्तृत शर्तें नहीं दी गई हैं। परिवारों को इनकी पुष्टि संस्थान के संबंधित विभाग से करनी चाहिए।
बच्चों में समय से पहले या देर से यौवन शुरू होना भी चिकित्सकीय मूल्यांकन का विषय हो सकता है। लड़कियों और लड़कों में शारीरिक विकास की सामान्य समयसीमा अलग होती है। यदि यौवन के लक्षण अपेक्षा से बहुत पहले दिखाई देने लगें या निर्धारित आयु तक शुरू न हों, तो इसके पीछे हार्मोन संबंधी या अन्य कारण हो सकते हैं। इसी प्रकार थायरॉयड हार्मोन की कमी या अधिकता बच्चों के विकास, ऊर्जा, वजन और अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है। ऐसे मामलों में समय पर चिकित्सकीय जाँच से उचित उपचार की दिशा तय की जा सकती है।
एसजीपीजीआई में टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चों के लिए विशेष क्लिनिक और सपोर्ट ग्रुप भी संचालित किया जा रहा है। टाइप-1 डायबिटीज में शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता, जिसके कारण रक्त में ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित रखने के लिए इंसुलिन उपचार आवश्यक होता है। इस स्थिति में बच्चों और उनके परिवारों को नियमित रक्त शर्करा निगरानी, इंसुलिन के सुरक्षित उपयोग, भोजन और शारीरिक गतिविधियों के प्रबंधन के बारे में जानकारी की जरूरत होती है। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए यह समझना भी आवश्यक है कि पढ़ाई, खेल और दैनिक गतिविधियों के बीच बीमारी का प्रबंधन कैसे किया जाए।
डायबिटीज सपोर्ट ग्रुप का उद्देश्य बच्चों और उनके अभिभावकों को रोजमर्रा की चुनौतियों से निपटने में सहायता देना है। किसी बच्चे में टाइप-1 डायबिटीज का निदान होने पर परिवार को कई नई जिम्मेदारियाँ सँभालनी पड़ती हैं। इंसुलिन की नियमित व्यवस्था, रक्त शर्करा की जाँच, बीमारी के दौरान अतिरिक्त सावधानी और कम रक्त शर्करा की स्थिति पहचानना उपचार के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। ऐसे में विशेषज्ञों के साथ नियमित संपर्क और परिवारों के बीच अनुभव साझा करने की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।
एसजीपीजीआई में आयोजित 'पीडियाट्रिक एंडो क्लीनिक्स 2026' का प्रमुख संदेश यही है कि बच्चों के विकास से जुड़ी असामान्यताओं को समय पर पहचानना आवश्यक है। हर छोटे कद वाले बच्चे को ग्रोथ हार्मोन की जरूरत नहीं होती, लेकिन जिन बच्चों में वास्तविक हार्मोन संबंधी कमी या निर्धारित चिकित्सकीय स्थिति है, उनके लिए समय पर उपचार महत्वपूर्ण हो सकता है। संस्थान में पात्र बच्चों के लिए निःशुल्क ग्रोथ हार्मोन थेरेपी और टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित परिवारों के लिए सहयोग की व्यवस्था इसी दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।


