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UP के 214 अस्पतालों में दवाओं की कीमतों का बड़ा खेल, एक ही ब्रांड की एमआरपी में 27,390 रुपये का अंतर
Lucknow: यूपी के 214 अस्पतालों की फार्मेसियों की जांच में एक ही ब्रांड की दवाओं की एमआरपी में बड़ा अंतर मिला। फाइजर की इनोंजा में 27,390 रुपये तक का फर्क सामने आया।
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Lucknow: उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में दवाओं की कीमतों को लेकर खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की जांच में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। एक ही कंपनी, एक ही ब्रांड और समान क्षमता वाली दवाओं की अलग-अलग संस्थागत आपूर्ति में अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) अलग-अलग दर्ज मिला है। कहीं अंतर कुछ सौ रुपये का है तो कहीं एक ही दवा की कीमत में 27 हजार रुपये से अधिक का अंतर सामने आया है। सबसे बड़ा अंतर ब्लड कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली फाइजर कंपनी की इनोंजा दवा में मिला। इसकी एक आपूर्ति पर एमआरपी 3,02,610 रुपये और दूसरी पर 3,30,000 रुपये अंकित थी। यानी समान ब्रांड की दवा पर दर्ज अधिकतम खुदरा कीमत में 27,390 रुपये का अंतर था। एफएसडीए की ओर से 214 अस्पतालों की फार्मेसियों की जांच के दौरान सामने आए इन तथ्यों ने दवा कंपनियों की मूल्य निर्धारण व्यवस्था, अस्पतालों की खरीद प्रक्रिया और मरीजों से वसूली जाने वाली वास्तविक कीमतों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच में सामने आया कि अलग-अलग अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को संस्थागत आपूर्ति के रूप में भेजी गई दवाओं के पैकेटों पर एक समान एमआरपी नहीं थी। कई मामलों में कंपनी और ब्रांड एक ही होने के बावजूद कीमतों में उल्लेखनीय अंतर दर्ज था। इससे यह सवाल उठता है कि एक जैसी दवा अलग-अलग संस्थानों तक अलग-अलग अधिकतम खुदरा कीमत के साथ क्यों पहुंच रही है। क्या इसके पीछे निर्माण और मूल्य संशोधन की अलग-अलग तारीखें हैं, क्या कंपनियों ने अलग-अलग आपूर्ति के लिए अलग मूल्य निर्धारित किए या मूल्य नियंत्रण संबंधी नियमों का उल्लंघन हुआ है? इन सवालों के उत्तर के लिए दवाओं के बैच, निर्माण तिथि, संबंधित मूल्य सूची और वास्तविक खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड की जांच आवश्यक होगी।
सबसे अधिक अंतर फाइजर की इनोंजा नामक दवा में मिला है। इसमें इनोटुजुमैब ओजोगामाइसिन नामक औषधीय पदार्थ होता है, जिसका उपयोग विशेष प्रकार के रक्त कैंसर, विशेष रूप से बी-सेल एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया के कुछ मरीजों के उपचार में किया जाता है। यह अत्यधिक महंगी और विशेषज्ञ चिकित्सकीय निगरानी में दी जाने वाली दवा है। जांच में इसकी एक मिलीग्राम क्षमता वाली आपूर्ति पर 3,02,610 रुपये और दूसरी पर 3,30,000 रुपये एमआरपी दर्ज मिली। दोनों के बीच 27,390 रुपये का अंतर है। इतनी महंगी दवा के मामले में कीमत का यह अंतर मरीज और उसके परिवार के लिए बड़ी रकम हो सकता है। हालांकि यह जानना अभी बाकी है कि संबंधित अस्पतालों ने दवा कितने में खरीदी और मरीजों को वास्तव में कितने में उपलब्ध कराई।
जांच में रिलायंस लाइफ साइंसेज की टेनक्टे-प्लेज 40 मिलीग्राम दवा की कीमतों में भी बड़ा अंतर मिला। टेनेक्टेप्लेज नामक औषधीय पदार्थ का उपयोग कुछ आपातकालीन परिस्थितियों में रक्त के थक्के को घोलने के लिए किया जाता है। जांच के अनुसार इसकी अलग-अलग संस्थागत आपूर्ति पर 43,119.14 रुपये से लेकर 49,060 रुपये तक एमआरपी अंकित थी। दोनों के बीच 5,940.86 रुपये का अंतर सामने आया। आपातकालीन उपचार में इस्तेमाल होने वाली ऐसी दवाओं के मामले में कीमत की पारदर्शिता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि गंभीर स्थिति में मरीज या उसके परिजनों के पास अलग-अलग विक्रेताओं से कीमत की तुलना करने का पर्याप्त समय नहीं होता।
इसी कंपनी की ह्यूमन एल्बुमिन 20 प्रतिशत, एल्बुराल नामक दवा की कीमतों में भी उल्लेखनीय अंतर मिला। अलग-अलग आपूर्ति में इस दवा की एमआरपी 7,986 रुपये, 9,749 रुपये और 10,724 रुपये दर्ज थी। सबसे कम और सबसे अधिक कीमत के बीच 2,738 रुपये का अंतर है। ह्यूमन एल्बुमिन का इस्तेमाल चिकित्सकीय आवश्यकता के अनुसार कुछ गंभीर स्थितियों में किया जाता है। यह सामान्य घरेलू दवा नहीं है, बल्कि अस्पतालों में विशेष परिस्थितियों में दी जाने वाली औषधि है। ऐसे उत्पादों की कीमतों में अंतर का प्रभाव उन मरीजों पर पड़ सकता है जिन्हें उपचार के दौरान एक से अधिक इकाइयों की आवश्यकता होती है।
एफएसडीए की जांच में अन्य दवाओं और टीकों के मूल्य में भी अंतर सामने आया है। सनोफी की मेनैक्ट्रा वैक्सीन की एमआरपी में 250 रुपये, भारत सीरम्स की एंटी-डी 300 माइक्रोग्राम की कीमत में 297 रुपये और बायोलॉजिकल ई की एक वैक्सीन की एमआरपी में 335 रुपये का अंतर दर्ज हुआ। इन मामलों में अंतर कैंसर की दवा जितना बड़ा नहीं है, लेकिन सवाल समान है। एक ही ब्रांड और समान पैकिंग की दवा पर अलग-अलग कीमत क्यों अंकित है और क्या मूल्य निर्धारण की पूरी प्रक्रिया नियमानुसार हुई है?
इस जांच को समझने के लिए दवाओं की तीन अलग-अलग कीमतों के बीच अंतर करना जरूरी है। पहली कीमत वह है जिस पर दवा कंपनी या वितरक अस्पताल को उत्पाद उपलब्ध कराता है। इसे संस्थागत खरीद कीमत कहा जा सकता है। दूसरी कीमत पैकेट पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य है, जिसके ऊपर सामान्यतः दवा बेची नहीं जा सकती। तीसरी कीमत वह है जो मरीज से वास्तव में वसूली जाती है। ये तीनों कीमतें एक जैसी होना आवश्यक नहीं है। कोई अस्पताल दवा एमआरपी से कम कीमत पर खरीद सकता है और मरीज को अलग निर्धारित बिक्री मूल्य पर उपलब्ध करा सकता है। इसलिए केवल पैकेट पर दो अलग एमआरपी मिल जाने से यह साबित नहीं होता कि अस्पताल ने मरीज से अधिक पैसा वसूला है। लेकिन यह अंतर जांच का महत्वपूर्ण आधार अवश्य बनता है।
दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए देश में औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 लागू है। इसके तहत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) अनुसूचित दवाओं की अधिकतम अनुमत कीमत निर्धारित करता है। जिन दवाओं पर प्रत्यक्ष मूल्य सीमा लागू नहीं होती, उनकी एमआरपी में वृद्धि पर भी निगरानी रखी जाती है। सामान्यतः गैर-अनुसूचित दवाओं की एमआरपी पिछले 12 महीनों में 10 प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती। वहीं अनुसूचित दवाओं की कीमतों में संशोधन अलग नियमों और थोक मूल्य सूचकांक से जुड़ी व्यवस्था के अनुसार होता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर प्रकार की दवा की कीमत में किसी भी परिस्थिति में केवल 10 प्रतिशत वृद्धि की अनुमति है।
इन नियमों के कारण एफएसडीए की जांच में सामने आए मूल्य अंतर का आकलन केवल दो एमआरपी की तुलना से पूरा नहीं होगा। संबंधित दवा मूल्य नियंत्रण आदेश की किस श्रेणी में आती है, उसके लिए कोई विशेष अधिकतम मूल्य अधिसूचित है या नहीं, पैकेट कब तैयार हुए और कीमतों में बदलाव कब लागू हुआ, इन सभी तथ्यों की जांच करनी होगी। यदि किसी दवा की एमआरपी अनुमत सीमा से अधिक बढ़ाई गई हो या निर्धारित अधिकतम कीमत से ज्यादा पर बेची गई हो तो संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई हो सकती है। लेकिन किसी उल्लंघन की पुष्टि होने से पहले निर्माता और आपूर्ति शृंखला से जुड़े पक्षों का स्पष्टीकरण भी आवश्यक होगा।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अस्पतालों में मरीज सामान्य बाजार की तरह खरीदारी नहीं करते। चिकित्सक द्वारा लिखी गई दवा अक्सर तत्काल आवश्यक होती है। मरीज को यह भी पता नहीं होता कि उसी दवा का मूल्य दूसरे अस्पताल या फार्मेसी में कितना है। विशेष रूप से कैंसर, गंभीर संक्रमण, हृदयाघात और दूसरी जटिल बीमारियों में महंगी दवाओं की आवश्यकता पड़ने पर परिवार का ध्यान उपचार पर होता है, कीमतों की तुलना पर नहीं। ऐसी परिस्थितियों में मूल्य संबंधी जानकारी की पारदर्शिता मरीजों के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।
उत्तर प्रदेश में अस्पतालों की फार्मेसियों पर दवाओं की खरीद और बिक्री की कीमत सार्वजनिक करने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार एक नवंबर 2026 से अस्पतालों की फार्मेसियों में दवाओं की वास्तविक खरीद कीमत और बिक्री कीमत प्रदर्शित करने के निर्देश दिए गए हैं। यदि इस व्यवस्था का प्रभावी पालन होता है तो मरीजों को यह जानने में मदद मिलेगी कि अस्पताल ने दवा किस मूल्य पर खरीदी और उन्हें किस कीमत पर दी जा रही है। हालांकि केवल मूल्य सूची लगा देना पर्याप्त नहीं होगा। सूची का वास्तविक बिलों और उपलब्ध दवाओं से मिलान भी आवश्यक होगा।
एफएसडीए की जांच ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा है। यदि एक ही ब्रांड की दवा अलग-अलग अस्पतालों को अलग एमआरपी पर उपलब्ध कराई गई तो क्या यह केवल अलग-अलग समय पर हुए मूल्य संशोधन का परिणाम है या संस्थागत आपूर्ति के लिए अलग मूल्य व्यवस्था अपनाई गई? इसका उत्तर संबंधित कंपनियों के मूल्य रिकॉर्ड, वितरकों के बिल और अस्पतालों के खरीद दस्तावेजों से मिल सकता है। इसके साथ यह भी देखना होगा कि जिन दवाओं की एमआरपी में अंतर पाया गया, उनकी पैकिंग, क्षमता और मात्रा पूरी तरह समान थीं या नहीं। इन विवरणों में अंतर होने पर कीमतों की सीधी तुलना भ्रामक हो सकती है।
मरीजों के हित में इस जांच का अगला चरण अधिक महत्वपूर्ण होगा। यदि नियामक अधिकारी संबंधित दवाओं की खरीद कीमत, एमआरपी और वास्तविक बिक्री मूल्य की तुलना करें तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि मूल्य अंतर का लाभ किसे मिला और क्या किसी मरीज से नियमों के विरुद्ध राशि वसूली गई। साथ ही कंपनियों द्वारा निर्धारित कीमतों और अस्पतालों को दी गई छूट की व्यवस्था की भी समीक्षा हो सकती है। अभी उपलब्ध जानकारी से यह तय नहीं होता कि किसी विशेष अस्पताल या कंपनी ने कानून का उल्लंघन किया है। लेकिन जांच में सामने आए अंतर इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनके कारणों का स्पष्ट और सार्वजनिक उत्तर आवश्यक है।
उत्तर प्रदेश के 214 अस्पतालों की फार्मेसियों की जांच से सामने आया यह मामला केवल एक दवा की कीमत में 27,390 रुपये के अंतर का नहीं है। यह उस व्यापक व्यवस्था पर सवाल है जिसमें मरीज को अक्सर यह पता ही नहीं होता कि उसकी दवा की वास्तविक खरीद कीमत क्या है, पैकेट पर अंकित अधिकतम मूल्य किस आधार पर तय हुआ और अस्पताल उससे कितनी रकम ले रहा है। दवा की कीमतों में पारदर्शिता तभी सार्थक होगी जब नियामक जांच, कंपनियों की जवाबदेही और मरीजों को सही जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था एक साथ प्रभावी ढंग से काम करे।


