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UP MLC चुनाव में BJP का नया दांव, पुराने चेहरे छोड़ शिक्षक नेताओं पर भरोसा; 2027 से पहले बड़ा संदेश
UP MLC Election 2026: UP MLC चुनाव 2026 में पांच स्नातक और छह शिक्षक सीटों समेत 11 सीटों पर BJP-SP आमने-सामने हैं। जानिए प्रत्याशी, 2020 के नतीजे और चुनावी रणनीति।
Uttar Pradesh MLC Election
UP MLC Election 2026: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से करीब छह महीने पहले होने जा रहा विधान परिषद का स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र चुनाव सामान्य एमएलसी चुनाव से कहीं अधिक राजनीतिक महत्व ले चुका है। पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की कुल 11 सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान होगा, जबकि 27 अक्टूबर को मतगणना होगी। चुनाव की अधिसूचना 29 सितंबर को जारी हो चुकी है। नामांकन की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर, नामांकन पत्रों की जांच 7 अक्टूबर और नाम वापसी की अंतिम तारीख 9 अक्टूबर है। इन 11 मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 6 दिसंबर को समाप्त होना है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सामान्य मतदाताओं वाले निर्वाचन क्षेत्र नहीं हैं। पांच सीटों पर केवल पंजीकृत स्नातक और छह सीटों पर निर्धारित पात्रता पूरी करने वाले पंजीकृत शिक्षक मतदान करते हैं। इसलिए यहां विधानसभा या लोकसभा जैसा जातीय और बूथ आधारित गणित अकेले चुनाव तय नहीं करता। शिक्षण संस्थानों का नेटवर्क, शिक्षक संगठनों की भूमिका, प्रत्याशी की निजी पहुंच, स्नातक मतदाताओं का पंजीकरण, कार्यकर्ता तंत्र और दूसरी-तीसरी वरीयता तक मत हस्तांतरण की क्षमता महत्वपूर्ण होती है।
इसी वजह से भाजपा ने इस बार कुछ क्षेत्रों में अपने पारंपरिक संगठन के बाहर से आए ऐसे चेहरों को भी टिकट दिया है, जिनके पास अपना शिक्षक या चुनावी नेटवर्क है। वहीं समाजवादी पार्टी ने सभी 11 सीटों पर प्रत्याशी उतारकर मुकाबले को सीधे राजनीतिक संघर्ष में बदलने की कोशिश की है।
2020 में भाजपा ने जीती थीं छह सीटें
इस चुनाव का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष इसका समय है। 2020 में इन्हीं 11 सीटों के चुनाव में भाजपा ने छह सीटें जीती थीं, समाजवादी पार्टी को तीन और निर्दलीयों को दो सीटें मिली थीं।
स्नातक की पांच सीटों में भाजपा ने लखनऊ, मेरठ और आगरा जीती थीं, जबकि सपा ने वाराणसी और इलाहाबाद-झांसी पर कब्जा किया था। शिक्षक वर्ग की छह सीटों में भाजपा ने लखनऊ, मेरठ और बरेली-मुरादाबाद जीती थीं। सपा ने वाराणसी सीट जीती थी, जबकि निर्दलीयों के खाते में आगरा तथा गोरखपुर-फैजाबाद सीट गई थी।
गोरखपुर-फैजाबाद से ध्रुव कुमार त्रिपाठी जीते थे, जो अब भाजपा प्रत्याशी हैं। इस प्रकार 2026 में केवल सीट बचाने का मुकाबला नहीं है। पिछले छह वर्षों में कुछ सीटों पर प्रत्याशियों और संगठनों के राजनीतिक रिश्ते भी बदल चुके हैं।
भाजपा की पूरी रणनीति समझने के लिए सभी 11 प्रत्याशियों को देखना होगा
भाजपा ने मंगलवार को जिन छह प्रत्याशियों की घोषणा की है, वह उसकी पूरी सूची नहीं बल्कि दूसरी सूची है। पांच प्रत्याशी पार्टी मई में ही घोषित कर चुकी थी।
लखनऊ स्नातक से मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह, आगरा स्नातक से डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह, लखनऊ शिक्षक से उमेश द्विवेदी, मेरठ शिक्षक से श्रीचंद शर्मा और बरेली-मुरादाबाद शिक्षक से हरि सिंह ढिल्लों को पार्टी पहले ही दोबारा मैदान में उतार चुकी थी।
अब मेरठ स्नातक से दिनेश गोयल, वाराणसी स्नातक से केदारनाथ सिंह, इलाहाबाद-झांसी स्नातक से अशोक कुमार राठौर, वाराणसी शिक्षक से डॉ. प्रमोद मिश्रा, आगरा शिक्षक से हरिकिशोर तिवारी और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक से ध्रुव कुमार त्रिपाठी को उतारकर भाजपा ने सभी 11 सीटों के प्रत्याशी तय कर दिए हैं।
पहली सूची में मौजूदा सदस्यों को बनाए रखना निरंतरता की रणनीति दिखाता है, जबकि दूसरी सूची में पुराने संगठन के बाहर के प्रभावशाली शिक्षक नेताओं और चुनाव लड़ने का अनुभव रखने वालों को शामिल करना सामाजिक तथा संगठनात्मक विस्तार की रणनीति को दिखाता है।
इसलिए इसे पूरी तरह ‘कैडर छोड़ने’ की नीति कहना कुछ अधिक होगा, लेकिन छह बाद में घोषित सीटों पर ‘जिताऊ नेटवर्क’ को संगठनात्मक वरिष्ठता से अधिक महत्व मिलने का संकेत स्पष्ट है।
सपा ने भी सभी 11 सीटों पर उतारे प्रत्याशी
समाजवादी पार्टी ने भी सभी 11 निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्याशी उतार दिए हैं। वाराणसी शिक्षक से मौजूदा एमएलसी लाल बिहारी यादव, लखनऊ शिक्षक से सुशील कुमार, आगरा शिक्षक से प्रकाशचंद्र गुप्ता, गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक से कमलेश यादव, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक से दानिश अख्तर और मेरठ शिक्षक से नितिन तोमर मैदान में हैं।
स्नातक वर्ग में वाराणसी से मौजूदा एमएलसी आशुतोष सिन्हा, इलाहाबाद-झांसी से मौजूदा एमएलसी डॉ. मान सिंह यादव, आगरा से शशांक यादव, मेरठ से परमिंदर भाटी और लखनऊ से कांति सिंह को उतारा गया है।
इस प्रकार भाजपा जहां 2020 में जीती सीटों को बचाने के साथ सपा और निर्दलीयों की सीटों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, वहीं सपा के सामने अपनी तीनों मौजूदा सीटें बचाने और शिक्षक तथा स्नातक मतदाताओं में विस्तार करने की चुनौती है।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसी चुनावी बैठक के दौरान पुरानी पेंशन योजना को 2027 के घोषणा-पत्र में शामिल करने की बात भी कही है। इसे शिक्षक-कर्मचारी वर्ग से संवाद की पार्टी की राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में देखा जा सकता है।
करीब 9.82 लाख स्नातक और 2.52 लाख शिक्षक मतदाता
जनवरी 2026 में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची चुनाव का आकार समझने में मदद करती है। उस समय लखनऊ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में 2,11,756, वाराणसी में 2,69,372, इलाहाबाद-झांसी में 2,60,818, आगरा में 1,80,293 और मेरठ में 59,634 मतदाता दर्ज थे। इनका कुल योग करीब 9.82 लाख बैठता है।
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में बरेली-मुरादाबाद में 46,553, लखनऊ में 36,217, गोरखपुर-फैजाबाद में 52,257, वाराणसी में 32,549, आगरा में 51,532 और मेरठ में 33,163 मतदाता थे। यानी करीब 2.52 लाख शिक्षक मतदाता थे।
हालांकि ये जनवरी की अंतिम प्रकाशित सूची के आंकड़े हैं और मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया था कि नामांकन की अंतिम तारीख तक पात्र मतदाताओं के नाम जोड़े जा सकते हैं। इसलिए मतदान के समय अंतिम संख्या इससे अलग हो सकती है।
इन संख्याओं से एक दूसरी बात भी समझ में आती है। सामान्य विधानसभा चुनाव में लाखों मतदाताओं के बीच पार्टी की व्यापक लोकप्रियता निर्णायक हो सकती है, लेकिन शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में कई जगह कुल मतदाता 30 से 50 हजार के बीच हैं। ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में किसी शिक्षक संगठन का मजबूत नेटवर्क, विद्यालय-महाविद्यालय स्तर पर प्रत्याशी के व्यक्तिगत संबंध और मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाने की क्षमता बहुत अधिक महत्व रखती है।
2020 के मतदान में भी यही अंतर दिखाई दिया था। स्नातक क्षेत्रों में मतदान लगभग 36.74 से 42.86 प्रतिशत के बीच रहा था, जबकि शिक्षक क्षेत्रों में यह 58.99 से 73.94 प्रतिशत तक गया था। इसका अर्थ है कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे होने के साथ ज्यादा संगठित मतदान वाले क्षेत्र भी हैं।
मेरठ स्नातक: दिनेश गोयल पर फिर भरोसा
मेरठ स्नातक सीट पर भाजपा ने मौजूदा एमएलसी दिनेश गोयल को फिर मैदान में उतारा है, जबकि सपा ने परमिंदर भाटी को प्रत्याशी बनाया है।
2020 में इस सीट पर भाजपा ने लंबे समय से प्रभाव रखने वाले निर्दलीय हेम सिंह पुंडीर के सामने दिनेश गोयल को उतारा था और गोयल विजयी रहे। उपलब्ध 2020 परिणामों के अनुसार मतगणना के दौरान गोयल को 27 हजार से अधिक प्रथम वरीयता मत मिले थे और उन्होंने स्थापित निर्दलीय प्रभाव को तोड़ा था।
इसलिए उम्र को देखते हुए नया चेहरा उतारने की आंतरिक चर्चा के बावजूद भाजपा ने उस प्रत्याशी को बदलने का जोखिम नहीं लिया, जिसने छह वर्ष पहले एक मजबूत व्यक्तिगत नेटवर्क वाले प्रतिद्वंद्वी को हटाकर सीट भाजपा के खाते में डाली थी।
यह फैसला इस चुनाव में भाजपा की रणनीति का पहला सूत्र बताता है—जहां मौजूदा प्रत्याशी का अपना चुनावी आधार है, वहां पीढ़ीगत बदलाव से ज्यादा सीट बचाने को महत्व दिया गया है।
वाराणसी स्नातक: 2020 का मुकाबला फिर आमने-सामने
वाराणसी स्नातक क्षेत्र इस चुनाव की महत्वपूर्ण सीटों में है। 2020 में सपा के आशुतोष सिन्हा ने भाजपा के केदारनाथ सिंह को हराया था। सिन्हा को 26,535 और केदारनाथ सिंह को 22,685 मत मिले थे। दोनों के बीच 3,850 मतों का अंतर था।
भाजपा ने छह वर्ष बाद फिर केदारनाथ सिंह पर भरोसा किया है और सपा ने आशुतोष सिन्हा को दोबारा उतारा है। इसलिए यह लगभग सीधा पुनर्मुकाबला है।
केदारनाथ सिंह पहले भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और भाजपा संगठन में सक्रिय रहे हैं। यहां भाजपा का निर्णय केवल पुराने नेता को सम्मान देने का मामला नहीं माना जा सकता, क्योंकि पार्टी ऐसे प्रत्याशी को वापस लाई है जिसके पास पूरे निर्वाचन क्षेत्र में पुराना स्नातक नेटवर्क है और जो पिछले चुनाव में हार के बावजूद दूसरे स्थान पर था।
सपा के लिए आशुतोष सिन्हा अपनी 2020 की जीत बचाने मैदान में हैं। इसीलिए वाराणसी स्नातक का परिणाम दोनों दलों के लिए विशेष राजनीतिक संकेत देगा।
इलाहाबाद-झांसी स्नातक: 2020 में बदला समीकरण
इलाहाबाद-झांसी स्नातक क्षेत्र 2020 के सबसे उल्लेखनीय परिणामों में था। इस क्षेत्र में लंबे समय तक भाजपा समर्थित/भाजपा के यज्ञदत्त शर्मा का प्रभाव रहा, लेकिन 2020 में सपा के डॉ. मान सिंह यादव ने उन्हें हरा दिया।
प्रथम वरीयता मतों में मान सिंह को 19,421 और यज्ञदत्त शर्मा को 16,888 मत मिले थे। अब सपा ने मान सिंह को फिर उतारा है, जबकि भाजपा ने पुराने प्रत्याशी की जगह शिक्षक संगठन से जुड़े अशोक कुमार राठौर को चुना है, जो 2023 में भाजपा में शामिल हुए थे।
यह भाजपा की बदली रणनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण है। जहां पिछली व्यवस्था चुनाव हार चुकी है, वहां पार्टी केवल पुराने कैडर पर निर्भर रहने के बजाय शिक्षा क्षेत्र में अपना स्वतंत्र संपर्क रखने वाले व्यक्ति को आगे ला रही है।
आगरा और लखनऊ स्नातक: भाजपा ने विजेता नहीं बदले
आगरा स्नातक सीट पर भाजपा ने डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह को फिर प्रत्याशी बनाया है। 2020 में उन्होंने सपा के डॉ. असीम यादव को 6,095 मतों से हराया था। उन्हें 40,070 मत मिले थे, जबकि सपा प्रत्याशी को 33,975 मत मिले थे। इस बार सपा ने शशांक यादव को उतारा है।
लखनऊ स्नातक सीट पर भी भाजपा ने मौजूदा सदस्य अवनीश कुमार सिंह को फिर मौका दिया है, जबकि सपा की प्रत्याशी कांति सिंह हैं।
इन दोनों सीटों पर भाजपा की नीति स्पष्ट रूप से ‘विजेता को मत बदलो’ वाली दिखाई देती है। पार्टी ने मई में ही दोनों प्रत्याशियों के नाम घोषित कर उन्हें लंबी तैयारी का समय भी दिया।
शिक्षक सीटों पर भाजपा का नया प्रयोग
भाजपा की नई रणनीति सबसे स्पष्ट शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में दिखाई देती है। शिक्षक सीटों पर दशकों तक राजनीतिक दलों से अधिक शिक्षक संगठनों और उनके नेताओं का प्रभाव रहा है।
2020 में भाजपा ने इस संरचना को तोड़ते हुए छह में तीन शिक्षक सीटें—लखनऊ, मेरठ और बरेली-मुरादाबाद—जीती थीं। वाराणसी सपा के लाल बिहारी यादव ने जीती थी, आगरा से आकाश अग्रवाल निर्दलीय जीते थे और गोरखपुर-फैजाबाद से ध्रुव कुमार त्रिपाठी निर्दलीय निर्वाचित हुए थे।
अब भाजपा ने अपने तीन मौजूदा विजेताओं उमेश द्विवेदी, श्रीचंद शर्मा और हरि सिंह ढिल्लों को बनाए रखने के साथ दूसरी तरफ शिक्षक संगठनों के प्रभावशाली नेताओं को भी अपने टिकट पर उतारना शुरू किया है।
इससे मुकाबला केवल ‘भाजपा बनाम शिक्षक संगठन’ नहीं रह जाता, बल्कि शिक्षक संगठनों के प्रभावशाली हिस्सों को भाजपा के चुनाव चिह्न और संगठन के साथ जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
गोरखपुर-अयोध्या शिक्षक: ध्रुव त्रिपाठी अब भाजपा उम्मीदवार
गोरखपुर-फैजाबाद, जिसे वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में गोरखपुर-अयोध्या क्षेत्र भी कहा जाता है, शिक्षक सीट पर भाजपा ने ध्रुव कुमार त्रिपाठी को टिकट दिया है।
त्रिपाठी शिक्षक राजनीति का स्थापित नाम हैं और लगातार तीन बार इस क्षेत्र से विधान परिषद पहुंच चुके हैं। 2020 में भी उन्होंने निर्दलीय/शिक्षक संगठन के आधार पर सीट जीती थी।
अब उन्हें भाजपा प्रत्याशी बनाए जाने का अर्थ है कि पार्टी ने नया संगठन खड़ा करके उनके नेटवर्क से मुकाबला करने के बजाय उसी प्रभावशाली नेटवर्क को अपने साथ जोड़ लिया है। सपा ने यहां कमलेश यादव को उतारा है।
यह सीट इस बात की परीक्षा होगी कि शिक्षक संगठन की पुरानी व्यक्तिगत निष्ठा और भाजपा का व्यापक चुनावी संगठन एक-दूसरे को कितना पूरक बना पाते हैं।
वाराणसी शिक्षक: 418 वोट का पिछला अंतर
वाराणसी शिक्षक क्षेत्र में 2020 का परिणाम बेहद करीबी था। सपा के लाल बिहारी यादव को 7,248 और प्रमोद कुमार मिश्रा को 6,830 मत मिले थे। दोनों के बीच केवल 418 मतों का अंतर था।
भाजपा ने इस बार प्रमोद मिश्रा को अपना प्रत्याशी बनाया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार प्रमोद मिश्रा शिक्षक संगठन की राजनीति से जुड़े रहे हैं और पहले भी विधान परिषद पहुंच चुके हैं।
इस दृष्टि से भाजपा का गणित यह है कि जिस व्यक्ति का अपना शिक्षक मतदाता नेटवर्क है और जो पिछली बार मौजूदा सपा एमएलसी से केवल 418 मत पीछे रहा, उसे भाजपा संगठन का अतिरिक्त समर्थन देकर मुकाबले में उतारा गया है।
दूसरी ओर सपा ने मौजूदा सदस्य लाल बिहारी यादव को फिर टिकट दिया है। इसलिए वाराणसी शिक्षक क्षेत्र में चुनाव पार्टी संगठन के साथ दो स्थापित शिक्षक नेताओं के व्यक्तिगत नेटवर्क का भी मुकाबला होगा।
आगरा शिक्षक: कर्मचारी नेता हरिकिशोर तिवारी पर दांव
आगरा शिक्षक सीट पर 2020 में निर्दलीय आकाश अग्रवाल जीते थे। इस बार भाजपा ने 2024 में पार्टी में शामिल हुए कर्मचारी नेता हरिकिशोर तिवारी को मैदान में उतारा है, जबकि सपा ने प्रकाशचंद्र गुप्ता को प्रत्याशी बनाया है।
यहां भी भाजपा ने अपने पुराने कार्यकर्ता को टिकट देने के बजाय ऐसा चेहरा चुना है, जिसकी पहचान कर्मचारी-शिक्षक क्षेत्र के संगठनात्मक संपर्कों से जुड़ी है।
यह प्रयोग सफल होता है या नहीं, इसका परिणाम भाजपा की भविष्य की शिक्षक राजनीति पर असर डाल सकता है, क्योंकि पार्टी का उद्देश्य स्पष्ट रूप से परंपरागत शिक्षक संगठनों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपने राजनीतिक चिह्न के साथ प्रभावशाली स्थानीय नेटवर्कों को जोड़ना दिखाई देता है।
लखनऊ, मेरठ और बरेली-मुरादाबाद शिक्षक: पुराने विजेताओं पर भरोसा
लखनऊ शिक्षक सीट पर उमेश द्विवेदी, मेरठ शिक्षक पर श्रीचंद शर्मा और बरेली-मुरादाबाद शिक्षक पर हरि सिंह ढिल्लों भाजपा के मौजूदा सदस्य हैं और तीनों को फिर प्रत्याशी बनाया गया है।
सपा ने इनके सामने क्रमशः सुशील कुमार, नितिन तोमर और दानिश अख्तर को उतारा है।
2020 में शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धि यही तीन सीटें थीं। उससे पहले इन चुनावों में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ जैसे संगठनों का प्रभाव बहुत अधिक माना जाता था।
भाजपा की 2020 की तीन जीत ने पहली बार यह स्थापित किया कि मजबूत राजनीतिक दल भी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में व्यवस्थित संगठन और मतदाता संपर्क के जरिए पुराने शिक्षक संगठनों को चुनौती दे सकते हैं।
2026 में भाजपा उसी उपलब्धि को बचाने के साथ उन बाकी तीन शिक्षक सीटों तक विस्तार करना चाहती है, जिन्हें पिछली बार वह नहीं जीत पाई थी।
क्या भाजपा ने वास्तव में कैडर को पीछे कर दिया है?
छह नए नामों को देखकर यह निष्कर्ष आकर्षक लग सकता है कि भाजपा ने कैडर की जगह पूरी तरह ‘जिताऊ’ प्रत्याशियों की नीति अपना ली है, लेकिन सभी 11 प्रत्याशियों को साथ रखकर देखने पर तस्वीर थोड़ी अधिक जटिल है।
पांच प्रत्याशी—अवनीश कुमार सिंह, मानवेंद्र प्रताप सिंह, उमेश द्विवेदी, श्रीचंद शर्मा और हरि सिंह ढिल्लों—मौजूदा भाजपा एमएलसी हैं और उन्हें मई में ही दोबारा टिकट दे दिया गया था। दिनेश गोयल भी मौजूदा भाजपा एमएलसी हैं।
दूसरी ओर ध्रुव कुमार त्रिपाठी, प्रमोद मिश्रा, हरिकिशोर तिवारी और अशोक कुमार राठौर जैसे नाम यह बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में भाजपा के पास स्थापित विजेता नहीं था या जहां पिछले चुनाव में हार हुई थी, वहां पार्टी ने केवल पुराने संगठनात्मक दावेदारों में से चयन करने के बजाय ऐसे चेहरों को प्राथमिकता दी, जिनका अपना मतदाता या शिक्षक नेटवर्क है।
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि भाजपा ने अपनी जीती सीटों पर निरंतरता और हारी या बाहरी प्रभाव वाली सीटों पर विस्तारवादी ‘जिताऊ नेटवर्क’ का मिश्रित मॉडल अपनाया है।
ब्राह्मण प्रतिनिधित्व का सवाल भी चर्चा में
भाजपा की प्रत्याशी सूची में ब्राह्मण चेहरों की उल्लेखनीय मौजूदगी को कुछ राजनीतिक रिपोर्टें 2027 से पहले सामाजिक संदेश के रूप में देख रही हैं।
हालांकि किसी प्रत्याशी चयन के पीछे जाति को निर्णायक कारण बताना तब तक तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता, जब तक पार्टी स्वयं ऐसा न कहे।
उपलब्ध रिपोर्टिंग में छह बाद में घोषित नामों में तीन ब्राह्मण प्रत्याशियों और कुल 11 में पांच ब्राह्मण चेहरों का उल्लेख किया गया है। इसे राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा ब्राह्मण प्रतिनिधित्व के संकेत के रूप में पढ़ा जा रहा है।
हालांकि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की प्रकृति देखते हुए व्यक्तिगत और पेशेवर नेटवर्क भी प्रत्याशी चयन में महत्वपूर्ण कारक हैं।
2020 की सबसे बड़ी सीख: सामान्य चुनाव का वोट यहां सीधे नहीं चलता
2020 के नतीजे इस चुनाव का आकलन करते समय एक बड़ी सावधानी सिखाते हैं। उस समय भाजपा उत्तर प्रदेश की सत्ता में थी और उसका संगठन मजबूत था, फिर भी वाराणसी स्नातक और इलाहाबाद-झांसी स्नातक दोनों सीटें सपा ने जीत ली थीं।
शिक्षक वर्ग में भी छह में केवल तीन सीटें भाजपा के पास आई थीं, जबकि वाराणसी सपा और दो सीटें निर्दलीयों के पास गई थीं।
इसका कारण इन निर्वाचन क्षेत्रों की विशिष्ट मतदाता संरचना है। यहां मतदाता सूची अलग बनती है, मतदान प्रतिशत सामान्य चुनावों से अलग रहता है और शिक्षक सीटों पर संगठित पेशेवर नेटवर्क का महत्व बहुत अधिक होता है।
इसलिए 2024 लोकसभा या किसी विधानसभा चुनाव के मत प्रतिशत को सीधे इन 11 सीटों पर लागू करना उचित नहीं होगा।
2027 से पहले इस चुनाव का राजनीतिक महत्व क्यों?
इन 11 सीटों को 2027 विधानसभा चुनाव का प्रत्यक्ष पूर्वानुमान मानना सही नहीं होगा, क्योंकि मतदाता समूह सामान्य विधानसभा मतदाता से अलग है।
फिर भी यह चुनाव दोनों बड़े दलों की संगठनात्मक स्थिति के बारे में उपयोगी संकेत देगा। शिक्षक और स्नातक मतदाता समाज के उस हिस्से से आते हैं, जिसका शैक्षणिक संस्थानों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और स्थानीय बौद्धिक वर्गों से नियमित संपर्क रहता है।
भाजपा के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उसकी सीट संख्या 2019 के 62 से घटकर 33 होने के बाद उसका संगठन इन विशेष निर्वाचन क्षेत्रों में कितनी प्रभावी मतदाता लामबंदी कर पाता है।
दूसरी ओर सपा के लिए चुनौती यह होगी कि 2024 लोकसभा चुनाव के बाद मिली राजनीतिक गति को क्या वह ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में भी संगठनात्मक रूप दे सकती है, जहां केवल सामान्य राजनीतिक माहौल पर्याप्त नहीं है और मतदाता पंजीकरण से मतदान दिवस तक सूक्ष्म प्रबंधन आवश्यक होता है।
पुरानी पेंशन का मुद्दा भी महत्वपूर्ण
पुरानी पेंशन का मुद्दा भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। अखिलेश यादव ने विधान परिषद प्रत्याशियों की बैठक के साथ यह घोषणा जोड़ी कि सत्ता में आने पर पुरानी पेंशन योजना लागू की जाएगी। यह एक राजनीतिक वादा है, न कि वर्तमान नीति।
शिक्षक और कर्मचारी समूहों में पेंशन लंबे समय से महत्वपूर्ण विषय रहा है। इसलिए सपा इसे 2027 की व्यापक राजनीति और वर्तमान शिक्षक-स्नातक चुनाव के बीच सेतु की तरह इस्तेमाल कर रही है।
भाजपा की रणनीति दूसरी दिशा में दिखाई देती है। वह शिक्षक संगठनों के स्थापित नेताओं को अपने साथ जोड़कर पेशेवर नेटवर्क को संगठन में समाहित करने की कोशिश कर रही है।
भाजपा और सपा की दो अलग रणनीतियां
इस चुनाव को व्यापक रूप में देखें तो भाजपा और सपा दो अलग राजनीतिक प्रयोग करती दिखाई देती हैं।
भाजपा अपनी छह मौजूदा जीती सीटों पर अधिकांशतः स्थापित विजेताओं को बचाते हुए उन क्षेत्रों में बाहरी प्रभावशाली चेहरों को जोड़ रही है, जहां शिक्षक संगठन, निर्दलीय अथवा सपा मजबूत रही है।
सपा अपने तीन मौजूदा सदस्यों—आशुतोष सिन्हा, मान सिंह यादव और लाल बिहारी यादव—को फिर मैदान में उतारकर उनकी सीट बचाना चाहती है और बाकी क्षेत्रों में नए प्रत्याशियों के माध्यम से विस्तार का प्रयास कर रही है।
इसके साथ सपा पुरानी पेंशन और शिक्षक-कर्मचारी मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में ला रही है।
इसलिए मुकाबला केवल भाजपा और सपा के चुनाव चिह्नों का नहीं, बल्कि दो संगठनात्मक तरीकों का भी है। भाजपा स्थापित पेशेवर नेटवर्कों को अपने बड़े संगठन में समाहित कर रही है, जबकि सपा शिक्षक-कर्मचारी मुद्दों और अपने राजनीतिक आधार को मिलाकर नया समर्थन बनाने का प्रयास कर रही है।
11 सीटों का परिणाम किन सवालों का जवाब देगा?
23 अक्टूबर का मतदान और 27 अक्टूबर की मतगणना 2027 विधानसभा चुनाव का कोई सीधा जनमत-संग्रह नहीं होगी, लेकिन परिणाम कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों पर ठोस संकेत देंगे।
क्या भाजपा 2020 में जीती अपनी छह सीटें बचा पाती है? क्या वह वाराणसी और इलाहाबाद-झांसी की वे स्नातक सीटें वापस ले पाती है, जिन्हें सपा ने 2020 में उससे छीना था? क्या शिक्षक संगठनों से आए ध्रुव त्रिपाठी, प्रमोद मिश्रा और हरिकिशोर तिवारी जैसे चेहरों को भाजपा का चुनावी ढांचा अतिरिक्त लाभ देता है? क्या सपा अपने तीन मौजूदा गढ़ बचा पाती है? और क्या पुरानी पेंशन तथा शिक्षक-कर्मचारी मुद्दों पर उसका अभियान नए क्षेत्रों में मतों में बदलता है?
इन प्रश्नों के उत्तर परिणामों से मिलेंगे। मतदान से पहले किसी पक्ष को बढ़त देना उपलब्ध तथ्यों से स्थापित नहीं किया जा सकता।
लेकिन प्रत्याशी चयन से एक राजनीतिक परिवर्तन अभी से स्पष्ट है। उत्तर प्रदेश में स्नातक और शिक्षक विधान परिषद चुनाव कभी मुख्यतः शिक्षक संघों, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और सीमित संगठनात्मक नेटवर्कों का क्षेत्र हुआ करते थे।
2020 में भाजपा ने इस संरचना में बड़े राजनीतिक दल की शक्ति का प्रवेश कराया था। 2026 में वह इससे एक कदम आगे जाकर उन्हीं स्वतंत्र शिक्षक और कर्मचारी नेटवर्कों के प्रभावशाली चेहरों को अपने भीतर समेटने की कोशिश कर रही है।
सपा दूसरी ओर अपने 2020 के विजेताओं को बचाते हुए सभी 11 सीटों पर सीधी चुनौती दे रही है।
इस अर्थ में 2026 का विधान परिषद चुनाव केवल 11 सदस्यों को चुनने का चुनाव नहीं रह गया है। यह इस बात की भी परीक्षा है कि उत्तर प्रदेश के शिक्षित और शिक्षक मतदाताओं के इस विशेष निर्वाचन क्षेत्र में पार्टी संगठन, व्यक्तिगत प्रभाव, शिक्षक संघ और राजनीतिक मुद्दों में से कौन-सा तत्व किस अनुपात में असर डालता है।
2027 विधानसभा चुनाव के संदर्भ में इससे निकलने वाले संकेतों को सावधानी से पढ़ना होगा। शिक्षक और स्नातक मतदाता पूरे उत्तर प्रदेश के मतदाताओं का प्रतिनिधि नमूना नहीं हैं, इसलिए इनके परिणाम को सीधे विधानसभा की 403 सीटों पर लागू करना गलत होगा।
लेकिन संगठनात्मक तैयारी, शिक्षित वर्ग तक पहुंच, कर्मचारी-शिक्षक असंतोष या समर्थन और मतदाता को पंजीकरण से मतदान केंद्र तक ले जाने की क्षमता की दृष्टि से यह चुनाव भाजपा और सपा दोनों के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा अवश्य है।
और शायद इसी वजह से भाजपा ने जहां अपना मौजूदा विजेता है वहां कैडर और निरंतरता को बचाया है, लेकिन जहां उसे सीट हासिल करनी है वहां उसने एक नया सूत्र अपनाया है—पार्टी में कितना पुराना है, इससे पहले यह देखा जाए कि अपने साथ कितने मतदाता और कितना मजबूत नेटवर्क ला सकता है। यही इस बार भाजपा की प्रत्याशी सूची का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है।


