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BJP के गढ़ में कैसे घुस गई सपा? 5 सीटों पर जीत ने खोली भगवा खेमे की पोल, 2027 से पहले बढ़ी टेंशन!
UP MLC Election Result 2026: यूपी विधान परिषद चुनाव में बीजेपी ने 11 में से 6 और समाजवादी पार्टी ने 5 सीटों पर जीत दर्ज की। टिकट बंटवारे, बागियों और स्थानीय समीकरणों ने कैसे बदला चुनावी गणित? जानिए 2027 के लिए इसके सियासी मायने।
UP MLC Election Result 2026
UP MLC Election Result 2026: वाराणसी से लखनऊ और आगरा से प्रयागराज तक विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। भाजपा भले ही कुल सीटों के लिहाज से सपा से आगे निकल गई हो, लेकिन पांच सीटों पर समाजवादी पार्टी की जीत और खासकर भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में हुए उलटफेर ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल सिर्फ हार-जीत का नहीं है, बल्कि टिकट वितरण, जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और मोदी-योगी के नाम पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता का भी है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी नतीजों को समझने के लिए हमेशा विधानसभा सीटों का हिसाब पर्याप्त नहीं होता। कभी-कभी छोटे चुनाव भी बड़े राजनीतिक संकेत दे जाते हैं। विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव भी कुछ ऐसा ही संदेश दे रहे हैं।
इन चुनावों में भाजपा ने कुल 11 में से छह सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी पांच सीटों पर विजयी रही। इसलिए यह कहना गलत होगा कि भाजपा चुनाव हार गई, लेकिन यह भी सही नहीं होगा कि उसने आसानी से अपनी राजनीतिक ताकत साबित कर दी। असली कहानी उन सीटों में छिपी है, जहां भाजपा को अपने पुराने प्रभाव, संगठन और सत्ता की ताकत के बावजूद चुनौती मिली।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सपा ने उन क्षेत्रों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, जहां भाजपा को मजबूत माना जाता रहा है। वाराणसी में स्नातक और शिक्षक दोनों सीटें सपा के खाते में गईं। लखनऊ स्नातक सीट पर भाजपा को झटका लगा। आगरा शिक्षक सीट पर सपा ने कब्जा जमाया और इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीट पर भी समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की।
यह परिणाम भाजपा के लिए केवल पांच सीटों का नुकसान नहीं है। यह उस राजनीतिक धारणा को चुनौती है, जिसके तहत माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा के सामने विपक्ष के लिए उत्तर प्रदेश में बड़ी चुनौती खड़ी करना आसान नहीं होगा। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आए इन नतीजों ने बता दिया है कि मुकाबला एकतरफा होने वाला नहीं है।
टिकट का खेल: अखिलेश यादव ने भाजपा की नाराजगी को बनाया अपना हथियार
इस चुनाव की सबसे दिलचस्प कहानी सिर्फ उन प्रत्याशियों की नहीं है, जिन्होंने जीत दर्ज की, बल्कि उन चेहरों की भी है, जिन्हें भाजपा ने टिकट नहीं दिया और जिन्होंने दूसरी पार्टी का दामन थामकर भाजपा के सामने ही चुनौती खड़ी कर दी।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस चुनाव में ऐसी रणनीति अपनाई, जिसने भाजपा के सामने संगठनात्मक चुनौती खड़ी कर दी। उन्होंने भाजपा के दो असंतुष्ट चेहरों को समाजवादी पार्टी में शामिल कराकर सीधे चुनाव मैदान में उतार दिया। इनमें डॉ. आकाश अग्रवाल और डॉ. संजयन त्रिपाठी शामिल थे।
यह रणनीति बताती है कि अखिलेश यादव ने केवल अपने परंपरागत कार्यकर्ताओं और नेताओं के भरोसे चुनाव लड़ने के बजाय भाजपा के भीतर पैदा हुई नाराजगी को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की।
आगरा: भाजपा से टिकट मांगा, नहीं मिला तो सपा में गए और जीतकर दिखा दिया
आगरा खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया। डॉ. आकाश अग्रवाल पहले से ही इस सीट पर सक्रिय थे। वह 2020 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीतकर विधान परिषद पहुंचे थे। शिक्षकों के बीच उनकी अपनी पहचान और पकड़ थी। इस बार उनकी नजर भाजपा के टिकट पर थी। उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें अपना उम्मीदवार बनाएगी, लेकिन भाजपा ने उनकी जगह इंजीनियर हरिकिशोर तिवारी को प्रत्याशी घोषित कर दिया।
टिकट नहीं मिलने के बाद आकाश अग्रवाल ने भाजपा का रास्ता छोड़ दिया और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। अखिलेश यादव ने भी इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। उन्होंने पहले से घोषित सपा प्रत्याशी चंद्रप्रकाश गुप्ता की जगह आकाश अग्रवाल को टिकट दे दिया।
यानी भाजपा ने जिस चेहरे को टिकट देने से इनकार किया, उसी चेहरे को सपा ने अपना उम्मीदवार बनाकर उसके सामने खड़ा कर दिया। इसका नतीजा भी भाजपा के लिए निराशाजनक रहा। आकाश अग्रवाल ने 14,046 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की। भाजपा के हरिकिशोर तिवारी को उनके मुकाबले हार का सामना करना पड़ा।
इस नतीजे को केवल एक सीट की हार कहकर नहीं टाला जा सकता। यहां भाजपा को दोहरी चुनौती मिली। पहली चुनौती ऐसे प्रत्याशी से मिली, जिसकी शिक्षकों के बीच पहले से पहचान थी। दूसरी चुनौती उस नाराजगी से मिली, जिसे पार्टी समय रहते दूर नहीं कर सकी।
आकाश अग्रवाल की जीत ने यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या भाजपा का टिकट वितरण स्थानीय स्तर पर नेताओं और मतदाताओं की वास्तविक पसंद को ध्यान में रखकर किया जा रहा है? अगर पार्टी के पास पहले से मौजूद और चुनाव जीतने वाला चेहरा था, तो उसे टिकट न देने के पीछे क्या राजनीतिक गणित था?
भाजपा के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2020 में यह सीट निर्दलीय के पास थी। इस बार आकाश अग्रवाल सपा के टिकट पर जीतकर विधान परिषद पहुंचे हैं। यानी भाजपा ने यहां अपनी कोई पुरानी सीट गंवाई हो, ऐसा नहीं है, लेकिन सपा ने एक प्रभावशाली स्थानीय चेहरे के जरिए अपनी ताकत जरूर बढ़ाई है।
गोरखपुर-फैजाबाद: योगी के गढ़ में भाजपा की सांसें अटकीं, बागी और निर्दलीय ने बिगाड़ा गणित
अगर आगरा में भाजपा को टिकट वितरण की कीमत चुकानी पड़ी तो गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में पार्टी को अपने ही राजनीतिक गढ़ में कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ा। यह सीट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव वाले क्षेत्र में आती है। ऐसे में भाजपा के लिए यहां जीत केवल एक विधान परिषद सीट बचाने का मामला नहीं था, बल्कि अपने प्रभाव क्षेत्र में संगठनात्मक ताकत साबित करने की भी चुनौती थी।
इस सीट पर भाजपा के डॉ. ध्रुव कुमार त्रिपाठी मैदान में थे। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने पहले कमलेश कुमार यादव को प्रत्याशी बनाया था। बाद में भाजपा से नाराज होकर अलग हुए डॉ. संजयन त्रिपाठी को सपा में शामिल कराकर उम्मीदवार घोषित कर दिया गया।
संजयन त्रिपाठी को टिकट दिए जाने के साथ ही चुनाव का समीकरण बदल गया। भाजपा के सामने अब केवल सपा का अधिकृत प्रत्याशी नहीं था, बल्कि उसके भीतर से निकला एक ऐसा चेहरा भी था, जो पहले भाजपा के टिकट का दावेदार रहा था। इसी सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव ने भी मजबूत चुनौती पेश की।
नतीजों में भाजपा के ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने 16,790 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की। निर्दलीय राजीव यादव को 14,580 मत मिले, जबकि सपा के डॉ. संजयन त्रिपाठी को 9,503 मत प्राप्त हुए। ध्रुव त्रिपाठी ने 2,210 मतों के अंतर से मुकाबला जीता।
इस परिणाम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा के खिलाफ पड़े वोट एक ही उम्मीदवार के पक्ष में एकजुट नहीं हुए। निर्दलीय राजीव यादव और सपा के संजयन त्रिपाठी के बीच मतों का बंटवारा हुआ। अगर विपक्षी खेमे के वोट एक जगह इकट्ठा होते तो भाजपा की मुश्किलें और बढ़ सकती थीं।
हालांकि, यह कहना कि सपा के दोनों प्रत्याशियों को मिले वोट सीधे जोड़ दिए जाते तो भाजपा निश्चित रूप से हार जाती, चुनावी गणित को जरूरत से ज्यादा सरल बनाना होगा। एमएलसी चुनाव में मतदाताओं की वरीयता और दूसरी वरीयता के मतों की गणना भी निर्णायक होती है।
लेकिन इतना साफ है कि मुख्यमंत्री के प्रभाव वाले इलाके में भाजपा को आसान जीत नहीं मिली। जिस सीट पर भाजपा अपनी संगठनात्मक ताकत को लेकर आश्वस्त हो सकती थी, वहां उसे कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ा।
यहां अखिलेश यादव की रणनीति का एक दूसरा पहलू भी सामने आया। भाजपा के असंतुष्ट नेताओं को सपा में लाकर टिकट देना राजनीतिक संदेश देने के लिहाज से तो सफल रहा, लेकिन गोरखपुर में वह रणनीति जीत में तब्दील नहीं हो सकी। दूसरी तरफ निर्दलीय राजीव यादव की मजबूत मौजूदगी ने भाजपा के खिलाफ बने असंतोष को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया।
वाराणसी: मोदी के संसदीय क्षेत्र में भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश
अब बात उस क्षेत्र की, जहां के नतीजों ने भाजपा के लिए सबसे असहज स्थिति पैदा की। वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण वाराणसी भाजपा के लिए केवल एक लोकसभा सीट नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व का केंद्र भी है। यहां भाजपा का संगठन लंबे समय से सक्रिय रहा है। ऐसे में विधान परिषद की दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी की जीत ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज कर दी।
वाराणसी खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र पर समाजवादी पार्टी ने अपने पुराने और अनुभवी नेता लाल बिहारी यादव को मैदान में उतारा था। उनके सामने भाजपा के प्रमोद मिश्रा थे। लाल बिहारी यादव शिक्षक राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। शिक्षक समुदाय के बीच उनका अपना आधार है। यह मुकाबला केवल भाजपा और सपा के बीच नहीं था, बल्कि एक तरफ शिक्षक राजनीति के पुराने अनुभव और दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के संगठन की ताकत थी।
आखिरकार लाल बिहारी यादव ने 11,612 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की। भाजपा के प्रमोद मिश्रा को 6,060 मत मिले।
लेकिन भाजपा के लिए असली झटका अभी बाकी था। वाराणसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा ने केदारनाथ सिंह पर भरोसा जताया था, जबकि समाजवादी पार्टी ने आशुतोष सिन्हा को मैदान में उतारा था। मतगणना के शुरुआती दौर से ही आशुतोष सिन्हा ने बढ़त बना ली। जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, भाजपा की मुश्किलें बढ़ती गईं।
इस सीट पर मतगणना के दौरान विवाद भी हुआ। भाजपा प्रत्याशी केदारनाथ सिंह ने मतगणना में अनियमितता का आरोप लगाते हुए दोबारा गिनती की मांग की और धरने पर बैठ गए। सपा की ओर से भी मतगणना को लेकर आपत्तियां सामने आईं। लंबे समय तक चली गिनती के बाद आखिरकार आशुतोष सिन्हा ने जीत दर्ज की।
अंतिम परिणाम के अनुसार आशुतोष सिन्हा को 50,529 मत मिले, जबकि भाजपा के केदारनाथ सिंह को 33,530 मत प्राप्त हुए। इस तरह वाराणसी में भाजपा को शिक्षक और स्नातक दोनों सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।
यह नतीजा भाजपा के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि वाराणसी के साथ पूर्वांचल के कई दूसरे क्षेत्रों में भी 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राजनीतिक चुनौती मिली थी। ऐसे में 2026 के एमएलसी चुनाव में दोनों सीटों पर सपा की जीत इस बात का संकेत देती है कि भाजपा को अपने पुराने प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी संगठन और मतदाता संपर्क पर नए सिरे से काम करना होगा।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पर्याप्त सबक लिया? अगर लिया होता तो क्या वाराणसी जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में दोनों सीटों पर ऐसी स्थिति बनती?
हालांकि, स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता विधानसभा चुनाव के सामान्य मतदाताओं से अलग होते हैं। इसलिए इन नतीजों को सीधे पूरे वाराणसी या पूर्वांचल के विधानसभा चुनाव का जनादेश नहीं माना जा सकता। फिर भी यह संकेत नजरअंदाज करने लायक नहीं है।
लखनऊ: भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री की सक्रियता भी नहीं बचा सकी पार्टी की सीट
वाराणसी के बाद लखनऊ की कहानी भाजपा के लिए कम चिंताजनक नहीं है। यहां मुकाबला सिर्फ दो उम्मीदवारों के बीच नहीं था, बल्कि भाजपा के संगठनात्मक प्रभाव और समाजवादी पार्टी की नई राजनीतिक सक्रियता के बीच भी था।
लखनऊ खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र पर भाजपा ने मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह को फिर से मैदान में उतारा था। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने कांति सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाया।
यहां जातीय समीकरण की चर्चा भी खूब हुई। कांति सिंह पटेल और अवनीश कुमार सिंह को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग सामाजिक समीकरणों की चर्चा थी। कांति सिंह के पक्ष में कुर्मी मतदाताओं का समर्थन मिलने की बात भी सामने आई। हालांकि, केवल जातीय समीकरण के आधार पर उनकी जीत का पूरा विश्लेषण करना सही नहीं होगा। स्नातक मतदाताओं में रोजगार, शिक्षा, स्थानीय संपर्क और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान भी महत्वपूर्ण होती है।
भाजपा की तरफ से प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने भी चुनाव में सक्रियता दिखाई। संगठन ने पूरी ताकत लगाई, लेकिन परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं आया।
अंतिम परिणाम में कांति सिंह को 56,905 वोट मिले, जबकि भाजपा के अवनीश कुमार सिंह को 39,778 वोट प्राप्त हुए। कांति सिंह ने 17,127 मतों के अंतर से जीत दर्ज की।
इस जीत का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि लखनऊ खंड स्नातक सीट पर 2020 में भाजपा ने समाजवादी पार्टी से सीट छीन ली थी। अब छह साल बाद सपा ने इसे वापस हासिल कर लिया है।
कांति सिंह की यह पहली विधान परिषद जीत भी नहीं है। वह 2014 में इसी लखनऊ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से सपा के टिकट पर जीतकर विधान परिषद पहुंची थीं। इस बार उनकी वापसी ने भाजपा के सामने संगठन और प्रत्याशी चयन, दोनों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यहां एक और राजनीतिक पहलू है। कांति सिंह के पति डॉ. एसपी सिंह पटेल प्रतापगढ़ से समाजवादी पार्टी के सांसद हैं। यानी परिवार की राजनीतिक सक्रियता और क्षेत्र में संपर्क का फायदा भी उनके चुनावी अभियान में महत्वपूर्ण रहा होगा।
भाजपा के लिए यह परिणाम एक चेतावनी है कि प्रदेश की राजधानी में भी केवल सत्ता और संगठन के प्रभाव से चुनाव नहीं जीता जा सकता। मतदाता के बीच उम्मीदवार की स्वीकार्यता और स्थानीय समीकरणों को नजरअंदाज करने की कीमत चुकानी पड़ सकती है।
प्रयागराज-झांसी: भाजपा के पुराने राजनीतिक क्षेत्र में सपा की चुनौती
अब बात उस सीट की, जिसका राजनीतिक और सामाजिक महत्व प्रयागराज से लेकर बुंदेलखंड तक फैला हुआ है। इलाहाबाद-झांसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के डॉ. मान सिंह यादव ने जीत दर्ज की। उनके सामने भाजपा के अशोक कुमार राठौर थे।
यह मुकाबला इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं का फैलाव काफी बड़ा है। प्रयागराज, झांसी और आसपास के इलाकों के शिक्षित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होता।
डॉ. मान सिंह यादव ने 60,358 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की, जबकि भाजपा के अशोक कुमार राठौर को 21,815 वोट मिले। इस तरह सपा ने यहां बड़ी बढ़त के साथ जीत हासिल की।
इस नतीजे का राजनीतिक अर्थ समझना जरूरी है। भाजपा के लिए यह केवल एक सीट गंवाने का मामला नहीं है, बल्कि उस क्षेत्र में संगठन की पकड़ को लेकर भी सवाल है, जहां पार्टी लंबे समय से अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश करती रही है।
प्रयागराज की राजनीति में जातीय समीकरण, शिक्षा जगत, बेरोजगारी, युवा मतदाता और स्थानीय संगठनों का प्रभाव हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। स्नातक चुनाव में सपा की बड़ी जीत इन मुद्दों पर भाजपा के सामने चुनौती खड़ी करती है।
हालांकि, इसे विधानसभा चुनाव का सीधा संकेत मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर है कि समाजवादी पार्टी ने भाजपा के सामने एक मजबूत विकल्प के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।
पूरे चुनाव का हिसाब: भाजपा छह, सपा पांच; लेकिन राजनीतिक संदेश कहीं बड़ा
अगर पूरे चुनाव के परिणामों को एक साथ देखें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। उत्तर प्रदेश की 11 विधान परिषद सीटों में पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें थीं। 23 अक्टूबर को मतदान हुआ और 27 अक्टूबर से मतगणना शुरू हुई। सभी परिणाम सामने आने के बाद भाजपा ने छह और समाजवादी पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की।
सीटवार अंतिम परिणाम इस प्रकार रहे:
| निर्वाचन क्षेत्र | विजयी प्रत्याशी | पार्टी |
| मेरठ स्नातक | दिनेश कुमार गोयल | भाजपा |
| आगरा स्नातक | मानवेंद्र प्रताप सिंह | भाजपा |
| इलाहाबाद-झांसी स्नातक | डॉ. मान सिंह यादव | सपा |
| लखनऊ स्नातक | कांति सिंह | सपा |
| वाराणसी स्नातक | आशुतोष सिन्हा | सपा |
| लखनऊ शिक्षक | उमेश द्विवेदी | भाजपा |
| मेरठ शिक्षक | श्रीचंद शर्मा | भाजपा |
| बरेली-मुरादाबाद शिक्षक | डॉ. हरि सिंह ढिल्लों | भाजपा |
| गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक | ध्रुव कुमार त्रिपाठी | भाजपा |
| वाराणसी शिक्षक | लाल बिहारी यादव | सपा |
| आगरा शिक्षक | डॉ. आकाश अग्रवाल | सपा |
इन आंकड़ों में एक दिलचस्प पहलू है। भाजपा ने छह सीटों में से चार शिक्षक और दो स्नातक सीटें जीतीं। वहीं सपा ने दो शिक्षक और तीन स्नातक सीटों पर कब्जा किया।
इसका मतलब है कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन भाजपा से बेहतर रहा। पांच स्नातक सीटों में सपा ने तीन और भाजपा ने दो सीटें जीतीं। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा ने चार और सपा ने दो सीटें हासिल कीं।
यानी शिक्षित मतदाताओं के बीच सपा की बढ़ती स्वीकार्यता का सवाल अब भाजपा के सामने है। यह भी ध्यान रखना होगा कि शिक्षक और स्नातक मतदाता एक ही तरह का सामाजिक या राजनीतिक समूह नहीं हैं। फिर भी दोनों श्रेणियों में सपा की पांच जीत उसके लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
पिछले चुनाव के मुकाबले भी सपा ने अपनी स्थिति मजबूत की है। 2020 में इन 11 सीटों में भाजपा ने छह, सपा ने तीन, शिक्षक दल ने एक और निर्दलीय ने एक सीट जीती थी। इस बार भाजपा की संख्या छह पर ही रही, जबकि सपा तीन से बढ़कर पांच पर पहुंच गई। शिक्षक दल और निर्दलीय कोई सीट नहीं जीत सके।
यानी भाजपा अपनी कुल सीटें बरकरार रखने में सफल रही, लेकिन विपक्ष के रूप में समाजवादी पार्टी ने दो सीटों का इजाफा कर अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाई।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा का दबदबा कायम, लेकिन आगरा की हार ने छोड़ा सवाल
इस चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तस्वीर पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश से कुछ अलग दिखाई दी। आगरा, मेरठ और बरेली-मुरादाबाद के निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा ने अपना प्रभाव बनाए रखा। आगरा स्नातक सीट पर मानवेंद्र प्रताप सिंह, मेरठ स्नातक सीट पर दिनेश कुमार गोयल, मेरठ शिक्षक सीट पर श्रीचंद शर्मा और बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट पर डॉ. हरि सिंह ढिल्लों ने जीत दर्ज की।
लेकिन आगरा शिक्षक सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। यहां डॉ. आकाश अग्रवाल की जीत ने यह साबित किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी स्थानीय प्रत्याशी और व्यक्तिगत जनाधार का महत्व पार्टी के चुनाव चिह्न से कम नहीं है।
इसलिए पश्चिमी यूपी को पूरी तरह भाजपा के पक्ष में और पूर्वांचल को पूरी तरह सपा के पक्ष में बांटना सही नहीं होगा। एक ही क्षेत्र में अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजे अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों की कहानी बताते हैं।
क्या पिछड़े और सवर्ण मतदाताओं में भाजपा के प्रति नाराजगी बढ़ रही है?
अब इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल है कि क्या भाजपा के सामाजिक समीकरण में बदलाव आ रहा है?
भाजपा की राजनीति का एक बड़ा आधार सवर्ण और गैर-यादव पिछड़े मतदाताओं का गठजोड़ रहा है। इसके साथ पार्टी ने दलितों के विभिन्न वर्गों में भी अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश की है। लेकिन एमएलसी चुनाव के नतीजे यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या यह सामाजिक गठजोड़ पहले की तरह मजबूत बना हुआ है?
लखनऊ में कांति सिंह की जीत को कुर्मी मतदाताओं के समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। आगरा में आकाश अग्रवाल की जीत बताती है कि स्थानीय शिक्षक मतदाताओं के बीच पार्टी से अलग हुए चेहरे भी प्रभावी हो सकते हैं। वाराणसी में लाल बिहारी यादव और आशुतोष सिन्हा की जीत सपा के शिक्षक तथा स्नातक मतदाताओं के बीच प्रभाव को दिखाती है।
इन नतीजों के आधार पर यह कहना कि सवर्ण और पिछड़े पूरी तरह भाजपा से दूर हो गए हैं, अतिशयोक्ति होगी। एमएलसी चुनाव के लिए मतदाता सूची सीमित और अलग प्रकृति की होती है। जातिवार मतदान का आधिकारिक आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है, जिससे यह साबित किया जा सके कि किस समुदाय ने किस पार्टी को कितने वोट दिए।
लेकिन भाजपा के लिए चिंता की बात यह है कि जिन सामाजिक समूहों के समर्थन पर पार्टी अपनी राजनीतिक मजबूती का दावा करती रही है, उनके बीच नाराजगी और असंतोष की संभावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पार्टी के सामने चुनौती केवल जातीय समीकरण बचाने की नहीं है। उसे यह भी देखना होगा कि उसके पुराने कार्यकर्ता और स्थानीय प्रभावशाली नेता टिकट वितरण से संतुष्ट हैं या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि पार्टी का संगठन ऊपर से मजबूत दिखाई दे रहा है, लेकिन स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ता जा रहा है? आकाश अग्रवाल और संजयन त्रिपाठी जैसे उदाहरण इसी सवाल को सामने लाते हैं।
केशव प्रसाद मौर्य का बयान भी बहुत कुछ कहता है
चुनाव परिणाम सामने आने के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का बयान भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा था कि सपा उन जगहों पर जीत गई, जहां उसे नहीं जीतना था।
इस बयान को दो तरीके से समझा जा सकता है। पहला, भाजपा को अपने कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में सपा की जीत की उम्मीद नहीं थी। दूसरा, पार्टी के भीतर भी यह स्वीकार किया जा रहा है कि कुछ सीटों पर चुनावी समीकरण उसके अनुमान से अलग रहे।
दरअसल, जब कोई पार्टी अपने मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में हारती है तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि आखिर चूक कहां हुई? क्या उम्मीदवार गलत चुना गया? क्या स्थानीय संगठन ने पूरी ताकत नहीं लगाई? क्या मतदाताओं में नाराजगी थी? या फिर विपक्ष ने ऐसी रणनीति अपनाई, जिसका अंदाजा पार्टी को नहीं था?
एमएलसी चुनाव के नतीजे भाजपा को इन सभी सवालों पर विचार करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
आंकड़ों की राजनीति और 2027 का असली इम्तिहान
इन चुनावों में लगभग 14.81 लाख मतदाता पंजीकृत थे। यह सामान्य विधानसभा चुनाव जैसा व्यापक जनादेश नहीं था। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता अलग होते हैं और उनकी राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग हो सकती हैं। इसलिए इन नतीजों को सीधे विधानसभा चुनाव का परिणाम मानना सही नहीं होगा।
लेकिन राजनीति में हर चुनाव अपने पीछे कुछ संकेत छोड़ता है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा के सामने उत्तर प्रदेश में अपनी रणनीति सुधारने की चुनौती थी। 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए संगठन विस्तार, सामाजिक समीकरण और बूथ स्तर पर मजबूती को लेकर पार्टी लगातार काम कर रही है।
इसके बावजूद एमएलसी चुनाव में सपा ने पांच सीटें जीतकर भाजपा को यह बता दिया है कि विपक्ष को कमजोर समझना राजनीतिक भूल हो सकती है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य है। विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष का पद बनाए रखने के लिए समाजवादी पार्टी को 10 सदस्यों की संख्या की जरूरत थी। इन पांच सीटों पर जीत के बाद पार्टी की परिषद में संख्या 12 तक पहुंचने जा रही है। यानी यह जीत केवल चुनावी आंकड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि सदन के भीतर भी सपा की राजनीतिक स्थिति मजबूत करने वाली है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह होगी कि वह इस परिणाम को महज शिक्षक और स्नातक मतदाताओं का चुनाव बताकर नजरअंदाज न करे। उसे यह समझना होगा कि आकाश अग्रवाल जैसे प्रत्याशी पार्टी से बाहर जाकर जीत कैसे हासिल कर लेते हैं? संजयन त्रिपाठी जैसे नेता पार्टी छोड़ने की स्थिति में क्यों पहुंचते हैं? वाराणसी जैसे क्षेत्र में दोनों सीटें सपा के खाते में कैसे चली जाती हैं? और लखनऊ में संगठन की पूरी ताकत लगाने के बाद भी कांति सिंह भाजपा के मौजूदा एमएलसी को इतने बड़े अंतर से कैसे हरा देती हैं?
ये सवाल सिर्फ एमएलसी चुनाव तक सीमित नहीं हैं। इनका संबंध भाजपा की संगठनात्मक कार्यशैली और 2027 के लिए तैयार की जा रही राजनीतिक रणनीति से भी है।
भाजपा के सामने दोहरी चुनौती, अखिलेश यादव के लिए खुला अवसर
समाजवादी पार्टी के लिए यह चुनाव एक राजनीतिक अवसर लेकर आया है। अखिलेश यादव ने भाजपा के असंतुष्ट नेताओं को अपने साथ जोड़कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि उनकी पार्टी अब केवल अपने पारंपरिक नेताओं के भरोसे नहीं है। वह दूसरी पार्टियों के भीतर पैदा हो रही राजनीतिक नाराजगी को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकती है।
आगरा में आकाश अग्रवाल इसका सबसे सफल उदाहरण हैं। वाराणसी में लाल बिहारी यादव और आशुतोष सिन्हा की जीत ने पार्टी के पुराने आधार को मजबूत किया है। लखनऊ में कांति सिंह की जीत ने भाजपा से छीनी गई सीट वापस दिलाई है। इलाहाबाद-झांसी में मान सिंह यादव की जीत ने पार्टी को एक और बड़ी सफलता दी है।
लेकिन सपा के सामने भी चुनौती कम नहीं है। उसे इन नतीजों को विधानसभा चुनाव तक ले जाना होगा। शिक्षक और स्नातक मतदाताओं का समर्थन सामान्य विधानसभा मतदाताओं के समर्थन में अपने आप नहीं बदलता। इसके लिए उसे गांव, कस्बे, बूथ और हर विधानसभा क्षेत्र में अपना संगठन मजबूत करना होगा।
दूसरी तरफ भाजपा के पास अभी भी छह सीटों की बढ़त, मजबूत संगठन, सरकार और व्यापक राजनीतिक नेटवर्क मौजूद है। लेकिन चुनावी राजनीति में सबसे बड़ी गलती तब होती है, जब कोई पार्टी अपनी पिछली जीत को भविष्य की गारंटी मान लेती है।
एमएलसी चुनाव के नतीजे भाजपा को यही चेतावनी दे रहे हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव अब केवल मोदी और योगी के नाम पर लड़ने से नहीं जीता जा सकता। प्रत्याशी चयन, स्थानीय नेतृत्व, जातीय समीकरण, नाराज कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की समस्याओं पर भी उतनी ही गंभीरता से काम करना होगा।
क्योंकि चुनाव में जनता और मतदाता केवल बड़े नेताओं का चेहरा नहीं देखते, वे अपने क्षेत्र के उम्मीदवार और उसके काम को भी परखते हैं।
आखिरकार इस पूरे चुनाव का राजनीतिक निष्कर्ष यही है कि भाजपा सीटों के हिसाब से जरूर आगे रही, लेकिन सपा ने अपने प्रदर्शन से मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। भाजपा ने छह सीटें बचाईं, मगर सपा ने तीन से पांच तक का सफर तय कर लिया।
अब सवाल यह नहीं है कि एमएलसी चुनाव में कौन बड़ी पार्टी बनी। असली सवाल यह है कि क्या भाजपा ने इस चुनाव से सबक लिया है या फिर 2027 में भी टिकट वितरण, स्थानीय नाराजगी और सामाजिक समीकरणों की वही गलतियां दोहराई जाएंगी?
क्योंकि विधानसभा चुनाव में मुकाबला सिर्फ 11 एमएलसी सीटों का नहीं होगा। वहां 403 विधानसभा सीटों का फैसला होना है। और उस चुनाव में भाजपा के सामने अखिलेश यादव पहले से ज्यादा तैयारी के साथ मैदान में उतरने की कोशिश करेंगे।
दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम-भाजपा के लिए यह कहावत टिकट वितरण और सामाजिक समीकरणों के मामले में एक राजनीतिक चेतावनी बनती दिखाई दे रही है।


