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यौन अपराधों की जांच में बदलेगी यूपी पुलिस की भाषा, अब नहीं लिखा जाएगा ‘इज्जत लुटी’
Lucknow: यूपी पुलिस यौन अपराधों की जांच में संवेदनशील और कानूनी भाषा का इस्तेमाल करेगी। FIR से केस डायरी तक पीड़ित की गरिमा और आरोपित के कानूनी अधिकारों का ध्यान रखा जाएगा।
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Lucknow: यौन अपराधों की जांच में उत्तर प्रदेश पुलिस अब केवल साक्ष्य और कानून ही नहीं, बल्कि अपनी भाषा को लेकर भी अधिक जवाबदेह होगी। प्राथमिकी से लेकर केस डायरी और आरोपपत्र तक पुलिस को ऐसे शब्दों से बचने के निर्देश दिए गए हैं, जो पीड़ित व्यक्ति को अपमानित करते हों, उसके चरित्र पर सवाल उठाते हों या अदालत का फैसला आने से पहले किसी आरोपित को अपराधी घोषित करते हों। पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने इस संबंध में नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। इनके तहत ‘इज्जत लूट ली’, ‘अबला’, ‘बेचारी’, ‘चरित्रहीन’, ‘वासना का शिकार’ जैसे शब्दों के स्थान पर संवेदनशील और कानूनी रूप से सटीक भाषा इस्तेमाल करने को कहा गया है। वहीं आरोपित के लिए ‘दरिंदा’, ‘राक्षस’ और ‘वासनापरस्त’ जैसे विशेषणों से भी बचने के निर्देश हैं। इस पहल का उद्देश्य यौन अपराधों की जांच को अधिक तथ्यपरक बनाना और न्याय की प्रक्रिया में पीड़ित व्यक्ति को दोबारा मानसिक आघात पहुंचने से रोकना है।
डीजीपी की ओर से जारी परिपत्र में कहा गया है कि यौन अपराधों से जुड़े पुलिस दस्तावेजों में शब्दों का चयन केवल औपचारिकता नहीं है। पुलिस जिस भाषा में किसी घटना को दर्ज करती है, उसका प्रभाव जांच की दिशा, साक्ष्यों की व्याख्या और न्यायिक प्रक्रिया पर पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, किसी महिला के साथ हुए यौन अपराध को उसकी ‘इज्जत लुटने’ की घटना बताना अपराध को महिला की शारीरिक स्वायत्तता और अधिकारों के उल्लंघन के बजाय उसके सामाजिक सम्मान से जोड़ देता है। इसी तरह किसी पीड़िता को ‘बेचारी’ या ‘अबला’ कहना उसे अधिकारों से संपन्न व्यक्ति के बजाय असहाय व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। नए दिशानिर्देशों में इस प्रकार की रूढ़िबद्ध धारणाओं से बचने पर जोर दिया गया है।
परिपत्र के अनुसार पुलिस को यौन अपराधों से जुड़े मामलों में ‘पीड़िता’, ‘पीड़ित व्यक्ति’ या संदर्भ के अनुसार ‘उत्तरजीवी’ जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। ‘इज्जत लूट ली’ के स्थान पर घटना की प्रकृति के अनुरूप यौन हिंसा, यौन उत्पीड़न अथवा शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा के उल्लंघन जैसी अभिव्यक्तियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि पुलिस को केवल सामान्य शब्दों से घटना का वर्णन करने के बजाय शिकायत में बताए गए वास्तविक कृत्य और संबंधित कानूनी प्रावधान भी स्पष्ट रूप से दर्ज करने होंगे। संवेदनशील भाषा का अर्थ अपराध की गंभीरता को कम करके लिखना नहीं, बल्कि उसे बिना पूर्वाग्रह और बिना अपमानजनक विशेषणों के सही ढंग से प्रस्तुत करना है।
इस व्यवस्था में आरोपित व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होने वाली भाषा पर भी ध्यान दिया गया है। पुलिस दस्तावेजों में किसी व्यक्ति को जांच या न्यायिक निर्णय से पहले ‘दरिंदा’, ‘राक्षस’, ‘वासनापरस्त’ या ‘निश्चित रूप से दोषी’ बताने से बचने को कहा गया है। इसके स्थान पर ‘आरोपित व्यक्ति’ या ‘अभियुक्त’ जैसे कानूनी शब्दों का प्रयोग किया जाएगा। इसका आधार निष्पक्ष जांच और निर्दोषता की कानूनी धारणा है। प्राथमिकी में आरोप दर्ज होते हैं, जबकि आरोपपत्र में जांच के दौरान एकत्र साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन का पक्ष प्रस्तुत किया जाता है। किसी व्यक्ति के अपराधी होने का अंतिम निर्णय अदालत करती है। इसलिए पुलिस की भाषा ऐसी नहीं होनी चाहिए जो न्यायिक निर्णय से पहले ही दोष सिद्ध होने का संकेत दे।
दिशानिर्देशों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पीड़िता के निजी जीवन को लेकर की जाने वाली टिप्पणियों से संबंधित है। पुलिस को निर्देश दिए गए हैं कि यौन अपराध की जांच में किसी महिला के कपड़ों, रहन-सहन, मित्रता, वैवाहिक स्थिति, सोशल मीडिया के इस्तेमाल या पूर्व संबंधों के आधार पर उसके चरित्र का मूल्यांकन नहीं किया जाए। ऐसे तथ्यों को केवल इसलिए अपराध से जोड़ना उचित नहीं है कि वे किसी प्रचलित सामाजिक धारणा के अनुरूप नहीं हैं। जांच में कोई व्यक्तिगत जानकारी वास्तविक घटना, कानूनी प्रश्न या साक्ष्य से सीधे संबंधित हो तो उसे आवश्यक सीमा तक दर्ज किया जा सकता है, लेकिन उसके आधार पर पीड़ित व्यक्ति को दोषी ठहराने या उसकी विश्वसनीयता पर रूढ़िबद्ध टिप्पणी करने से बचना होगा।
यौन अपराधों की जांच में शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी को लेकर भी सावधानी बरतने के निर्देश दिए गए हैं। कई मामलों में पीड़ित व्यक्ति भय, सामाजिक दबाव, धमकी, मानसिक आघात या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण तुरंत शिकायत नहीं कर पाता। इसलिए शिकायत में देरी को अपने आप आरोप गलत होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार घटना के दौरान प्रतिरोध नहीं करना, शरीर पर चोट के निशान नहीं मिलना या आरोपित व्यक्ति को पहले से जानना भी अपने आप सहमति सिद्ध नहीं करता। सहमति का प्रश्न कानून और मामले की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर जांचा जाना चाहिए। किसी व्यक्ति के साथ पूर्व परिचय या पहले से संबंध होने का अर्थ यह नहीं है कि उसने हर परिस्थिति में यौन गतिविधि के लिए सहमति दी थी।
बच्चों से जुड़े यौन अपराधों में भाषा को लेकर विशेष सावधानी बरतने को कहा गया है। लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम यानी पॉक्सो कानून के अंतर्गत बच्चे की कथित सहमति वयस्कों के मामलों की तरह कानूनी बचाव नहीं बन सकती। इसलिए किसी नाबालिग के मामले में ‘सहमति से गई थी’ या ‘अपनी मर्जी से संबंध बनाए’ जैसी अभिव्यक्तियों का इस्तेमाल करते समय कानून की इस मूल व्यवस्था की अनदेखी नहीं की जा सकती। पुलिस को बच्चों के लिए ‘बाल पीड़ित’ या ‘बाल उत्तरजीवी’ जैसे सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करने और उनकी पहचान गोपनीय रखने के निर्देश दिए गए हैं।
पुलिस दस्तावेजों में पहचान की गोपनीयता भी इस पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़ित व्यक्ति का नाम, पता, तस्वीर या ऐसी अन्य जानकारी सार्वजनिक करने पर कानूनी प्रतिबंध लागू हो सकते हैं, जिनसे उसकी पहचान उजागर हो जाए। विशेष रूप से बच्चों के मामलों में पहचान की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुलिस को केस डायरी, रिपोर्ट, बयान और अन्य अभिलेख तैयार करते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के साथ पीड़ित व्यक्ति की निजता का भी संरक्षण हो।
यह पहल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक प्रक्रिया में लैंगिक रूढ़ियों और पूर्वाग्रहपूर्ण भाषा को समाप्त करने के लिए दिए गए मार्गदर्शन की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2023 में हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स जारी की थी। इसमें बताया गया था कि महिलाओं के बारे में प्रचलित कई शब्द और धारणाएं न्यायिक तर्क को प्रभावित कर सकती हैं। न्यायिक व्यवस्था में भाषा का उद्देश्य तथ्यों को स्पष्ट करना और निष्पक्ष निर्णय में सहायता करना होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति के बारे में सामाजिक पूर्वाग्रहों को दोहराना। पुलिस की जांच न्यायिक प्रक्रिया का प्रारंभिक और महत्वपूर्ण चरण है, इसलिए इस स्तर पर भी भाषा की संवेदनशीलता आवश्यक है।
यौन अपराधों की जांच में शब्दों के प्रयोग का प्रश्न केवल सम्मानजनक व्यवहार तक सीमित नहीं है। कई बार किसी घटना के विवरण में प्रयुक्त भाषा अनजाने में जांचकर्ता की धारणा को प्रकट कर देती है। उदाहरण के लिए, यदि पुलिस किसी शिकायतकर्ता के बयान में अनावश्यक रूप से उसके कपड़ों या निजी संबंधों पर जोर देती है, तो इससे जांच का ध्यान आरोपित घटना और उससे संबंधित साक्ष्यों से हट सकता है। इसी तरह यदि आरोपित के लिए पहले से दोष सिद्ध करने वाली भाषा इस्तेमाल की जाए तो निष्पक्ष जांच के सिद्धांत पर प्रश्न उठ सकते हैं। नए दिशानिर्देश दोनों प्रकार की स्थितियों से बचने का प्रयास हैं।
हालांकि इन निर्देशों की वास्तविक सफलता केवल परिपत्र जारी होने से तय नहीं होगी। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में थानों, महिला सहायता डेस्क, विवेचना अधिकारियों और अभियोजन से जुड़े कर्मचारियों को नई शब्दावली और उसके कानूनी महत्व का प्रशिक्षण देना भी आवश्यक होगा। प्राथमिकी दर्ज करने से लेकर आरोपपत्र तैयार करने तक अलग-अलग स्तरों पर पुलिसकर्मी दस्तावेज तैयार करते हैं। यदि इन सभी स्तरों पर एक समान समझ विकसित नहीं हुई तो पुराने शब्द और पूर्वाग्रहपूर्ण अभिव्यक्तियां व्यवहार में बनी रह सकती हैं। इसलिए इस पहल का असर पुलिस के दैनिक कामकाज और दस्तावेजों की नियमित समीक्षा में दिखाई देना चाहिए।
पुलिस के सामने एक व्यावहारिक चुनौती यह भी होगी कि शिकायतकर्ता द्वारा बोले गए शब्दों और पुलिस की अपनी आधिकारिक भाषा के बीच उचित अंतर बनाए रखा जाए। किसी व्यक्ति के बयान को दर्ज करते समय उसकी बात का वास्तविक अर्थ और महत्वपूर्ण तथ्य सुरक्षित रखना जरूरी है। वहीं पुलिस द्वारा तैयार किए जाने वाले विवरण, विश्लेषण और निष्कर्ष में अपमानजनक या रूढ़िबद्ध भाषा से बचना आवश्यक है। इस संतुलन से न केवल पीड़ित व्यक्ति की गरिमा सुरक्षित रह सकती है, बल्कि साक्ष्यों की शुद्धता और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी बनी रह सकती है।
उत्तर प्रदेश पुलिस की इस पहल का व्यापक संदेश यह है कि यौन अपराध किसी व्यक्ति के सम्मान या चरित्र का प्रश्न नहीं, बल्कि उसके शरीर, स्वतंत्रता, सुरक्षा और कानूनी अधिकारों से जुड़ा अपराध है। इसी तरह किसी गंभीर अपराध का आरोप लगना किसी व्यक्ति को अदालत के निर्णय से पहले दोषी घोषित करने का आधार नहीं बनता। यदि नए दिशानिर्देशों का पालन वास्तव में प्राथमिकी, केस डायरी और आरोपपत्र तक सुनिश्चित किया गया तो यह बदलाव केवल पुलिस के शब्दों में नहीं, बल्कि यौन अपराधों की जांच के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी दिखाई दे सकता है।


