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लखनऊ के फ्लैटों में चल रहा था साइबर ठगी का खेल, 6 सिम बॉक्स और 192 स्लॉट मिले; आरोपी फरार
Lucknow News: लखनऊ में साइबर ठगी के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का खुलासा हुआ है। चार फ्लैटों से 6 अवैध सिम बॉक्स, 3 वीपीएन गेटवे और 192 सिम स्लॉट बरामद हुए।
फोटो-सोशल मीडिया
Lucknow News: साइबर अपराधियों ने पुलिस की पकड़ से बचने के लिए ठगी का नया तरीका अपनाया है। अब अपराधी खुद घटनास्थल पर मौजूद रहने के बजाय किराये के फ्लैटों में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगाकर विदेश से पूरा नेटवर्क संचालित कर रहे हैं। लखनऊ पुलिस ने ऐसे ही एक संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क का खुलासा किया है। शहर के चार ठिकानों पर 31 अक्टूबर को की गई छापेमारी में छह अवैध सिम बॉक्स, तीन वीपीएन गेटवे और 192 सिम स्लॉट सहित बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद हुए हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि जिन फ्लैटों में यह नेटवर्क स्थापित था, वहां कोई संचालक नहीं मिला। पुलिस को आशंका है कि इन उपकरणों के जरिए विदेश से आने वाली इंटरनेट कॉल को भारतीय मोबाइल नंबरों के माध्यम से स्थानीय कॉल की तरह दिखाकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट और दूसरी साइबर ठगी का शिकार बनाया जा रहा था। जांच में कंबोडिया, थाईलैंड और अन्य देशों से संचालन की आशंका भी सामने आई है। हालांकि, नेटवर्क को संचालित करने वाले लोगों की वास्तविक लोकेशन और ठगी की कुल रकम की पुष्टि अभी नहीं हुई है।
चार ठिकानों पर छापेमारी, तीन जगहों से मिले छह सिम बॉक्स
पुलिस कमिश्नर तरुण गाबा के निर्देशन में साइबर क्राइम थाना और साइबर क्राइम सेल की संयुक्त टीमों ने सुशांत गोल्फ सिटी के स्वाति अपार्टमेंट, पारा के आदर्श विहार स्थित आशीर्वाद बिल्डिंग, बीबीडी के गोल्ड लाइन अपार्टमेंट और चिनहट के आदर्श नगर स्थित जीजे पैराडाइज में छापेमारी की। सुशांत गोल्फ सिटी स्थित फ्लैट से सिम बॉक्स पहले ही हटाए जा चुके थे, जबकि बाकी तीन ठिकानों से छह 32-पोर्ट सिम बॉक्स बरामद हुए। इनके अलावा तीन वीपीएन गेटवे, 21 स्मार्ट स्विच, तीन स्मार्ट हब, चार इन्वर्टर और यूपीएस, 18 बैटरियां, एक लॉक टैबलेट, वाई-फाई राउटर, सीसीटीवी कैमरे और दूसरे नेटवर्किंग उपकरण भी मिले। छह सिम बॉक्स में कुल 192 सिम कार्ड लगाने की क्षमता थी। हालांकि, कितने सक्रिय सिम कार्ड इस्तेमाल हो रहे थे और इनसे कितनी कॉल की गईं, इसकी जांच जारी है। पुलिस ने साइबर क्राइम थाने में एफआईआर दर्ज कर उपकरणों की तकनीकी जांच शुरू कराई है। 
चारों ठिकाने किराये पर लेने वाले संदिग्ध की पहचान
पुलिस की जांच में एक महत्वपूर्ण जानकारी यह भी सामने आई है कि चारों ठिकाने कथित तौर पर सौगात अस्थाना नाम के व्यक्ति ने किराये पर लिए थे। पुलिस के अनुसार, उसने इन स्थानों पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का नेटवर्क तैयार कराया था। वाराणसी में हाल में पकड़े गए साइबर ठगी के आरोपियों से पूछताछ में भी उसका नाम सामने आने की जानकारी मिली है। जांचकर्ताओं को उससे संबंधित दो आधार कार्ड मिलने की बात सामने आई है, जिनमें एक पर कानपुर और दूसरे पर लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी का पता दर्ज है। पुलिस इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता और संबंधित व्यक्ति की भूमिका की जांच कर रही है। फ्लैट मालिकों द्वारा किरायेदारों का पुलिस सत्यापन नहीं कराए जाने का मामला भी जांच के दायरे में है। छापेमारी के दौरान कोई आरोपी गिरफ्तार नहीं हुआ। 
विदेशी कॉल को भारतीय नंबर में बदल देता है सिम बॉक्स
सिम बॉक्स एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जिसमें एक साथ कई मोबाइल सिम कार्ड लगाए जा सकते हैं। इसका इस्तेमाल इंटरनेट आधारित कॉल को मोबाइल नेटवर्क के जरिए आगे भेजने के लिए किया जाता है। अवैध नेटवर्क में अपराधी विदेश से इंटरनेट कॉल करते हैं, लेकिन सिम बॉक्स के जरिए वह कॉल भारत के किसी मोबाइल नंबर से की गई प्रतीत हो सकती है। इससे पीड़ित को कॉल के विदेशी स्रोत का तत्काल पता नहीं चल पाता। वीपीएन गेटवे का इस्तेमाल इंटरनेट कनेक्शन के वास्तविक नेटवर्क पते को छिपाने या ट्रैफिक को दूसरे रास्ते से भेजने में किया जा सकता है। ऐसे उपकरणों को दूर बैठकर नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए साइबर अपराधियों के लिए हर समय फ्लैट में मौजूद रहना जरूरी नहीं होता। यही कारण है कि पुलिस को उपकरण तो मिले, लेकिन उन्हें संचालित करने वाले लोग नहीं मिले। हालांकि, सिम बॉक्स या वीपीएन का इस्तेमाल अपने आप में हर परिस्थिति में अपराध नहीं है; इस मामले में जांच का विषय इनका कथित अवैध दूरसंचार और साइबर ठगी में उपयोग है।
डिजिटल अरेस्ट में ऐसे नेटवर्क के इस्तेमाल की आशंका
पुलिस को संदेह है कि इस नेटवर्क का इस्तेमाल डिजिटल अरेस्ट जैसी ठगी में किया जा रहा था। इस प्रकार की धोखाधड़ी में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय या दूसरी सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को फोन करते हैं। इसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग, पार्सल में प्रतिबंधित सामान मिलने या किसी आपराधिक मामले में नाम आने का भय दिखाकर पीड़ित से पैसे वसूले जाते हैं। कई मामलों में वीडियो कॉल पर कथित पूछताछ और गिरफ्तारी का नाटक भी किया जाता है। जब पीड़ित के मोबाइल पर भारतीय नंबर दिखाई देता है तो वह कॉल को अधिक विश्वसनीय समझ सकता है। लखनऊ पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि बरामद सिम बॉक्स का इस्तेमाल किन घटनाओं में हुआ और क्या इनके माध्यम से दूसरे राज्यों के लोगों को भी निशाना बनाया गया।
एक संदिग्ध मोबाइल नंबर से खुला पूरा नेटवर्क
पुलिस को इस नेटवर्क की जानकारी एक संदिग्ध मोबाइल नंबर की तकनीकी जांच के दौरान मिली। उसकी कॉल डिटेल रिकॉर्ड यानी सीडीआर तथा दूसरी तकनीकी सूचनाओं का विश्लेषण किया गया। दूरसंचार और इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों से प्राप्त विवरण के आधार पर कुछ हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्शन चिह्नित किए गए। इनकी लोकेशन की जांच से शहर के चार संदिग्ध ठिकानों का पता चला। एडीसीपी क्राइम किरन यादव और साइबर क्राइम अधिकारियों के अनुसार, बरामद उपकरणों की जांच से कॉलिंग पैटर्न, इस्तेमाल किए गए सिम कार्ड और नेटवर्क से जुड़े लोगों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है। पुलिस यह भी जांच रही है कि उपकरणों तक किन लोगों की दूर से पहुंच थी और नेटवर्क स्थापित करने के लिए किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।
सबसे बड़ी चुनौती विदेश में बैठे संचालकों तक पहुंचना
इस मामले में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बरामदगी को वास्तविक साइबर अपराधियों और ठगी की घटनाओं से जोड़ना है। स्थानीय स्तर पर फ्लैट किराये पर लेने वाले, सिम कार्ड उपलब्ध कराने वाले और इंटरनेट कनेक्शन लगवाने वाले लोगों की पहचान के साथ विदेशी संचालकों तक पहुंचना भी आवश्यक होगा। फिलहाल किसी विदेशी ठिकाने या व्यक्ति की भूमिका निर्णायक रूप से स्थापित नहीं हुई है। जांच में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, कॉल लॉग, इंटरनेट कनेक्शन का विवरण, सिम कार्ड की केवाईसी और बैंकिंग लेनदेन महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।
यह मामला साइबर अपराधों के बदलते स्वरूप को उजागर करता है। अब ठगी के लिए अपराधियों का पीड़ित के शहर या देश में मौजूद होना जरूरी नहीं रह गया है। इंटरनेट और दूरसंचार उपकरणों की मदद से दूसरे देश में बैठा व्यक्ति स्थानीय नंबर का इस्तेमाल कर लोगों को निशाना बना सकता है। ऐसे में किसी अनजान नंबर से खुद को सरकारी अधिकारी बताकर की जाने वाली कॉल पर केवल नंबर के भारतीय होने के आधार पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर धमकी या पैसे की मांग होने पर इसकी सूचना राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 अथवा cybercrime.gov.in पर दी जा सकती है।


