केजीएमयू में 250 करोड़ की दवा बिक्री, फिर भी मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ रहीं दवाएं

Lucknow News: केजीएमयू के एचआरएफ में सालाना 256 करोड़ रुपये की दवा बिक्री के बावजूद मरीजों को पूरी दवाएं नहीं मिल रहीं। प्रशासन ने शिकायत के लिए चिकित्सा अधीक्षक कार्यालय जाने को कहा।

Newstrack Network
Published on: 25 Oct 2026 10:24 PM IST
केजीएमयू में 250 करोड़ की दवा बिक्री, फिर भी मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ रहीं दवाएं
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फोटो-सोशल मीडिया

Lucknow News: उत्तर प्रदेश के प्रमुख चिकित्सा संस्थान किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों को रियायती दर पर दवाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विश्वविद्यालय के हॉस्पिटल रिवॉल्विंग फंड (एचआरएफ) के माध्यम से दवाओं और चिकित्सा सामग्री का सालाना कारोबार लगभग 250 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका है। इसके बावजूद मरीजों और उनके तीमारदारों की शिकायत है कि डॉक्टर की लिखी सभी दवाएं विश्वविद्यालय की फार्मेसी से नहीं मिल पातीं। कई बार घंटों कतार में खड़े रहने के बाद पता चलता है कि पर्चे की आधी से अधिक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। सबसे अधिक परेशानी उन मरीजों को होती है जिन्हें लिवर, किडनी, हृदय और सांस संबंधी गंभीर बीमारियों के लिए लंबे समय तक नियमित दवाएं लेनी पड़ती हैं। अस्पताल की रियायती फार्मेसी से दवा नहीं मिलने पर इन्हें बाहर के मेडिकल स्टोर का सहारा लेना पड़ता है, जहां वही दवा कई गुना अधिक कीमत पर मिल सकती है।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि एचआरएफ का लगभग 250 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार और राज्य सरकार से मिलने वाला सीधा दवा बजट एक ही चीज नहीं हैं। एचआरएफ के माध्यम से दवाओं तथा चिकित्सा सामग्री की खरीद-बिक्री होती है और उसके लिए अलग वित्तीय व्यवस्था संचालित की जाती है। इसलिए केवल बड़ी रकम के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि पूरी राशि उपलब्ध होने के बावजूद उसे खर्च नहीं किया गया, उचित नहीं होगा। वास्तविक सवाल यह है कि इतनी बड़ी खरीद और वितरण व्यवस्था के बावजूद मरीजों को डॉक्टर की लिखी आवश्यक दवाएं समय पर क्यों नहीं मिल पा रही हैं।

सितंबर 2026 में प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट में भी केजीएमयू के रियायती दवा केंद्रों पर दवाओं और सर्जिकल सामग्री की अनुपलब्धता की शिकायतें सामने आई थीं। इससे स्पष्ट है कि यह समस्या केवल एक दिन या किसी एक मरीज तक सीमित नहीं रही है।

दस दवाओं की पर्ची लेकर पहुंचे, मिलीं केवल चार

हरदोई निवासी राकेश लिवर की बीमारी का उपचार कराने के लिए केजीएमयू पहुंचे थे। चिकित्सक से परामर्श के बाद वह निर्धारित दवाएं लेने एचआरएफ फार्मेसी की कतार में लग गए। उनके अनुसार लगभग ढाई घंटे तक प्रतीक्षा करने के बाद जब उनकी बारी आई तो दस में से केवल चार दवाएं ही उपलब्ध हो सकीं।

राकेश का कहना था कि यदि इतनी देर कतार में खड़े रहने के बावजूद सभी दवाएं नहीं मिलतीं, तो मरीज के सामने बाहर से खरीदने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं बचता। अस्पताल में मिलने वाली रियायती दवाओं के मुकाबले निजी मेडिकल स्टोर से खरीदारी करने पर खर्च बढ़ जाता है।

उनकी शिकायत केवल दवाओं की अनुपलब्धता तक सीमित नहीं है। गंभीर बीमारी का इलाज करा रहे मरीजों को चिकित्सकीय परामर्श, जांच और दवा लेने के लिए बार-बार अस्पताल आना पड़ता है। इनमें बहुत से मरीज प्रदेश के दूरदराज जिलों से आते हैं। ऐसे में दवा के लिए दो से तीन घंटे का अतिरिक्त इंतजार उनके यात्रा खर्च, समय और शारीरिक परेशानी को भी बढ़ाता है।

लिवर की कुछ गंभीर बीमारियों में नियमित दवाएं अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। विशेष रूप से प्रत्यारोपण करा चुके मरीजों के लिए निर्धारित प्रतिरक्षा-दमनकारी दवाओं की निरंतर उपलब्धता आवश्यक होती है। हालांकि राकेश की बीमारी और उन्हें लिखी गई दवाओं का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं है, इसलिए उनके मामले में दवा न मिलने से किसी विशिष्ट चिकित्सकीय जटिलता का दावा नहीं किया जा सकता।

न्यूरो के मरीज को दूसरी दवा लेने को कहा, बाहर ढाई हजार रुपये का खर्च

हरदोई के बिलग्राम निवासी सुरेंद्र पाल लंबे समय से तंत्रिका संबंधी बीमारी का इलाज करा रहे हैं। उन्होंने बताया कि चिकित्सक की लिखी दवाएं एचआरएफ फार्मेसी से अक्सर पूरी नहीं मिलतीं। इस बार भी उन्हें पर्चे पर लिखी दवाओं के स्थान पर दूसरी दवाएं लेने का प्रस्ताव दिया गया।

सुरेंद्र के अनुसार उन्होंने उपलब्ध कराई जा रही दवाएं लेने के बजाय वापस कर दीं। उनका कहना था कि चिकित्सक के पर्चे की दवाएं निजी मेडिकल स्टोर से खरीदने पर लगभग 2,500 रुपये खर्च होंगे।

यह मामला दवा उपलब्धता के साथ एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने लाता है। यदि फार्मेसी पर डॉक्टर द्वारा लिखे गए ब्रांड की दवा उपलब्ध नहीं है, लेकिन उसी सक्रिय औषधीय घटक, शक्ति और उपयुक्त स्वरूप की दूसरी दवा मौजूद है, तो कुछ परिस्थितियों में विकल्प संभव हो सकता है। लेकिन ऐसी दवा मरीज को बिना उचित चिकित्सकीय पुष्टि के नहीं बदलनी चाहिए।

तंत्रिका रोगों, मिर्गी और कुछ अन्य गंभीर बीमारियों में दवा की खुराक, स्वरूप और नियमितता विशेष महत्व रख सकती है। इसलिए दवा उपलब्ध न होने पर मरीज को खुद से उपचार बदलने के बजाय संबंधित चिकित्सक से उचित विकल्प की पुष्टि करानी चाहिए।

मरीजों को 60 से 70 प्रतिशत सस्ती दवा देने के लिए बनी थी एचआरएफ व्यवस्था

केजीएमयू में हॉस्पिटल रिवॉल्विंग फंड की व्यवस्था का उद्देश्य मरीजों को बाजार के मुकाबले कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण दवाएं और सर्जिकल सामग्री उपलब्ध कराना है। इसके अंतर्गत दवा कंपनियों के साथ निर्धारित दरों पर खरीद के समझौते किए जाते हैं, जिससे अस्पताल मरीजों को अपेक्षाकृत सस्ती दर पर दवाएं उपलब्ध करा सके।

विश्वविद्यालय की ओर से अलग-अलग समय पर बताया गया है कि एचआरएफ केंद्रों पर कई दवाएं और सर्जिकल उपकरण बाजार मूल्य से लगभग 60 से 70 प्रतिशत कम कीमत पर मिल सकते हैं। हालांकि प्रत्येक दवा पर समान छूट मिलना आवश्यक नहीं है।

इस व्यवस्था का सबसे अधिक लाभ आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को होता है। गंभीर बीमारियों में दवाओं का खर्च एक बार का नहीं होता। कई मरीजों को महीनों या वर्षों तक नियमित उपचार लेना पड़ता है। ऐसे में बाजार से महंगी दवाएं खरीदना परिवार की आर्थिक स्थिति पर लगातार दबाव डाल सकता है।

लेकिन रियायत का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब मरीज को निर्धारित दवा समय पर उपलब्ध हो। केवल सस्ते मूल्य की घोषणा पर्याप्त नहीं है। दवा उपलब्ध ही न हो तो मरीज के लिए उस छूट का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं रह जाता।

2025-26 में 256 करोड़ रुपये की बिक्री, प्रशासन का दावा—80 प्रतिशत तक पहुंची दवाओं की उपलब्धता

केजीएमयू के एचआरएफ की वित्तीय स्थिति को लेकर उपलब्ध नवीनतम जानकारी के अनुसार दवाओं और संबंधित चिकित्सा सामग्री की बिक्री वर्ष 2023-24 में लगभग 111 करोड़ रुपये थी, जो बाद के वर्षों में बढ़कर करीब 256 करोड़ रुपये हो गई। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे सस्ती दवाओं की उपलब्धता बढ़ने और अधिक मरीजों के लाभान्वित होने का संकेत बताया है।

कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने मार्च 2026 में दावा किया था कि एचआरएफ में दवाओं की उपलब्धता पहले लगभग 20 से 30 प्रतिशत थी, जो बढ़कर करीब 80 प्रतिशत हो चुकी है। उनके अनुसार प्रतिदिन एचआरएफ से दवाएं खरीदने वाले ओपीडी मरीजों की संख्या भी लगभग 2,500 से बढ़कर 4,100 हो गई थी।

इन आंकड़ों से विश्वविद्यालय की रियायती दवा व्यवस्था के विस्तार का संकेत मिलता है। लेकिन मरीजों की ताजा शिकायतें यह प्रश्न भी उठाती हैं कि क्या बढ़ी हुई उपलब्धता सभी विभागों और सभी आवश्यक दवाओं के लिए समान रूप से है।

कुल 80 प्रतिशत दवाओं की उपलब्धता का दावा और किसी मरीज को पर्चे की दस में से केवल चार दवाएं मिलना परस्पर असंभव परिस्थितियां नहीं हैं। संस्थान स्तर पर अधिकांश दवाएं उपलब्ध होने के बावजूद किसी खास विभाग, फार्मेसी या मरीज की जरूरत की दवाएं कम पड़ सकती हैं। वास्तविक स्थिति जानने के लिए विभागवार मांग और उपलब्धता का परीक्षण आवश्यक है।

11,500 दवाओं और सर्जिकल उत्पादों के लिए नई खरीद प्रक्रिया

जनवरी 2026 में केजीएमयू प्रशासन ने एचआरएफ की आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करने के लिए लगभग 11,500 प्रकार की दवाओं और सर्जिकल सामग्री को नई दर अनुबंध व्यवस्था में शामिल करने की जानकारी दी थी। इनमें लगभग 6,500 दवाएं और 5,000 सर्जिकल उपकरण तथा इम्प्लांट शामिल थे।

इस योजना के अंतर्गत कैंसर, हृदय, पेट, सांस, कान-नाक-गला और अन्य विभागों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने का प्रस्ताव था। निविदा प्रक्रिया में दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निर्माण करने वाली कंपनियों से लाइसेंस, औषधीय संरचना और गुणवत्ता परीक्षण संबंधी विवरण मांगे जाने की भी जानकारी दी गई थी।

हालांकि किसी दवा को निविदा सूची में शामिल कर लेना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह हर समय सभी फार्मेसी काउंटरों पर उपलब्ध होगी। इसके लिए दर अनुबंध की स्वीकृति, आपूर्तिकर्ता से समय पर सामान प्राप्त होना, पर्याप्त भंडारण और विभिन्न विभागों तक उसका वितरण आवश्यक है।

28 काउंटर होने के बावजूद बाहर से दवा खरीदने की शिकायत

केजीएमयू में एचआरएफ केंद्रों की संख्या भी लगातार बढ़ाई गई है। अप्रैल 2025 में 17 काउंटर होने की जानकारी प्रकाशित हुई थी। अगस्त 2025 में यह संख्या बढ़कर 22 हो गई। सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट में विश्वविद्यालय परिसर में 28 एचआरएफ केंद्रों के संचालन का उल्लेख किया गया है। इसलिए मूल खबर में बताई गई लगभग 15 फार्मेसियों की संख्या को वर्तमान आधिकारिक संख्या मानना उचित नहीं होगा।

इसके बावजूद सितंबर में बहराइच निवासी रूबीना के मामले में सर्जरी के लिए आवश्यक कुछ चिकित्सा सामग्री एचआरएफ से न मिलने की शिकायत सामने आई थी। इसी तरह प्रयागराज के रक्त कैंसर से पीड़ित नाजिम ने बताया था कि नियमित उपचार के दौरान कुछ दवाएं अस्पताल से मिल जाती हैं, लेकिन कई दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ती हैं।

इन शिकायतों पर एचआरएफ के अध्यक्ष प्रो. कुमार शांतनु ने कहा था कि प्रत्येक दवा या ब्रांड के लिए विश्वविद्यालय के पास दर अनुबंध होना आवश्यक नहीं है। उनके अनुसार किसी विशेष ब्रांड के उपलब्ध न होने का अर्थ हमेशा उस औषधीय घटक की अनुपलब्धता नहीं होता।

यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे मरीजों की परेशानी समाप्त नहीं होती। यदि डॉक्टर की लिखी दवा उपलब्ध नहीं है तो मरीज को तत्काल यह जानकारी मिलनी चाहिए कि चिकित्सकीय रूप से स्वीकार्य और रियायती दर पर उपलब्ध विकल्प कौन-सा है।

दवाओं की निगरानी और खरीद व्यवस्था पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल

केजीएमयू की दवा आपूर्ति से संबंधित समस्याएं केवल स्टॉक की कमी तक सीमित नहीं रही हैं। जून 2026 में एचआरएफ के खरीद और वितरण रिकॉर्ड को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए थे।

एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि लगभग 40 ऐसे व्यक्तियों के नाम पर महंगी दवाओं की खरीद संबंधी प्रविष्टियां मिली थीं जिनकी मृत्यु हो चुकी होने या अस्पताल के रिकॉर्ड में मौजूद नहीं होने की आशंका थी। उसी दौरान एचआरएफ की डिजिटल निगरानी व्यवस्था में कमियों की बात भी सामने आई थी। यह आरोप जांच का विषय था, इसलिए इसे सिद्ध घोटाला नहीं कहा जा सकता।

जून में ही विश्वविद्यालय के लिम्ब सेंटर स्थित एचआरएफ स्टोर से लगभग पांच लाख रुपये मूल्य की ऐसी दवाएं मिलने की खबर आई थी जो एक्सपायर होने के करीब थीं। आरोप था कि संबंधित दवाएं समय पर मरीजों तक नहीं पहुंचीं और उनके प्रबंधन में लापरवाही हुई।

इन पुराने मामलों से वर्तमान दवा संकट के किसी विशिष्ट कारण की पुष्टि नहीं होती, लेकिन ये दवा खरीद, भंडारण और वितरण की व्यवस्था में पारदर्शिता तथा निगरानी के महत्व को रेखांकित करते हैं।

दवा क्यों नहीं मिलती—कमी स्टॉक में है या खरीद के अनुबंध में?

केजीएमयू की वर्तमान समस्या का समाधान समझने के लिए दवाओं की अनुपलब्धता के कारणों को अलग-अलग देखना आवश्यक है।

किसी दवा के न मिलने का कारण यह हो सकता है कि संबंधित कंपनी से उसकी आपूर्ति समय पर नहीं हुई। दूसरी संभावना यह है कि दवा विश्वविद्यालय की स्वीकृत दर अनुबंध सूची में ही शामिल न हो। तीसरी स्थिति में दवा मुख्य भंडार में उपलब्ध हो सकती है, लेकिन संबंधित विभाग के काउंटर पर उसका स्टॉक समाप्त हो गया हो।

इसके अतिरिक्त डॉक्टर द्वारा किसी विशिष्ट ब्रांड की दवा लिखे जाने और फार्मेसी में उसी औषधीय घटक के दूसरे ब्रांड की उपलब्धता के कारण भी समस्या पैदा हो सकती है।

इन्हीं कारणों से फार्मेसी पर दवा उपलब्ध नहीं होने की सूचना मिलने के बाद मरीज को सही विकल्प बताने की व्यवस्था आवश्यक है। दवा की खुराक या औषधीय स्वरूप में किसी भी परिवर्तन का निर्णय संबंधित चिकित्सक की सलाह से होना चाहिए।

केजीएमयू प्रशासन का पक्ष—पर्चे के साथ शिकायत करें मरीज

केजीएमयू के प्रवक्ता प्रो. केके सिंह ने कहा है कि एचआरएफ के अंतर्गत हजारों प्रकार की दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। उनके अनुसार पिछले कुछ दिनों में दवाएं नहीं मिलने की कोई विशेष शिकायत उनके संज्ञान में नहीं आई थी।

उन्होंने बताया कि यदि किसी मरीज को विश्वविद्यालय की फार्मेसी से डॉक्टर की लिखी दवा नहीं मिल रही है तो वह संबंधित पर्चे के साथ चिकित्सा अधीक्षक कार्यालय में शिकायत दर्ज करा सकता है। इसके बाद आवश्यक दवाएं मंगाने की कार्रवाई की जा सकती है।

प्रशासन का यह पक्ष महत्वपूर्ण है। हालांकि दूरदराज से आने वाले मरीजों के लिए शिकायत दर्ज कराना और उसके बाद दवा उपलब्ध होने की प्रतीक्षा करना भी अतिरिक्त परेशानी का कारण बन सकता है। ऐसे में शिकायत दर्ज होने के बाद दवा उपलब्ध कराने की समयसीमा तथा मरीज को उसकी सूचना देने की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

दवा के लिए भटकते मरीजों के सामने इलाज जारी रखने की चुनौती

गंभीर बीमारी के इलाज में दवा की नियमित उपलब्धता केवल सुविधा का प्रश्न नहीं है। कुछ दवाओं को चिकित्सक की सलाह के बिना अचानक बंद करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। विशेष रूप से प्रत्यारोपण के बाद दी जाने वाली दवाओं, मिर्गी के उपचार और कई हृदय संबंधी उपचारों में नियमितता महत्वपूर्ण होती है।

इसलिए एचआरएफ से दवा न मिलने पर मरीज को चिकित्सकीय परामर्श के बिना निर्धारित उपचार बंद नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से उसी औषधीय घटक, उचित खुराक और उपयुक्त स्वरूप वाली वैकल्पिक दवा की पुष्टि करानी चाहिए।

केजीएमयू जैसे बड़े सार्वजनिक चिकित्सा संस्थान में रोजाना हजारों मरीज इस उम्मीद से आते हैं कि उन्हें विशेषज्ञ उपचार के साथ कम कीमत पर आवश्यक दवाएं भी उपलब्ध होंगी। दवा की कीमत में 60 से 70 प्रतिशत तक की संभावित रियायत इन परिवारों के लिए बड़ा सहारा है, लेकिन अधूरी दवाएं मिलने पर उपचार का खर्च अचानक बढ़ सकता है।

लगभग 250 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंची एचआरएफ व्यवस्था और लगातार बढ़ते फार्मेसी काउंटरों के बावजूद मरीजों को बाहर के मेडिकल स्टोर पर जाना पड़ रहा है। इसलिए सवाल केवल दवाओं की खरीद पर खर्च हुई रकम का नहीं, बल्कि इस बात का है कि डॉक्टर की लिखी आवश्यक दवा सही समय पर सही मरीज तक पहुंच रही है या नहीं। यही केजीएमयू की दवा वितरण व्यवस्था की प्रभावशीलता का वास्तविक पैमाना है।

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