लखनऊ के वैज्ञानिकों ने खोजा मलेरिया पर दोहरा वार करने वाला रसायन, चूहों में 95% तक घटे परजीवी

Malaria Treatment Research: लखनऊ के CSIR-CDRI वैज्ञानिकों ने मलेरिया के दो चरणों पर असर करने वाले नए हाइब्रिड यौगिक तैयार किए। चूहों में एक यौगिक से परजीवी 95% तक घटे।

Newstrack Network
Published on: 30 Oct 2026 8:31 PM IST
लखनऊ के वैज्ञानिकों ने खोजा मलेरिया पर दोहरा वार करने वाला रसायन, चूहों में 95% तक घटे परजीवी
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फोटो-सोशल मीडिया

Malaria Treatment Research: मलेरिया के उपचार के लिए नई और अधिक प्रभावी दवाओं की खोज में लखनऊ स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई) के वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण प्रारंभिक सफलता मिली है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने ऐसे नए हाइब्रिड रासायनिक यौगिक तैयार किए हैं, जिन्होंने प्रयोगशाला में मलेरिया के परजीवियों के दो अलग-अलग विकास चरणों पर प्रभाव दिखाया है। इनमें से एक यौगिक ने संक्रमित चूहों पर किए गए परीक्षण में चार दिन तक दवा देने के बाद रक्त में परजीवियों की मात्रा 95 प्रतिशत तक कम कर दी। शोध की विशेषता यह है कि इन यौगिकों ने खून में सक्रिय मलेरिया परजीवियों के साथ लिवर में विकसित होने वाले परजीवियों के विरुद्ध भी गतिविधि दिखाई। वैज्ञानिकों को दवा प्रतिरोधी परजीवियों पर भी प्रभाव के संकेत मिले हैं। इससे भविष्य में ऐसी दवाएं विकसित करने की संभावना सामने आई है जो मलेरिया संक्रमण के एक से अधिक चरणों को निशाना बना सकें। हालांकि यह सफलता अभी प्रयोगशाला और पशुओं पर किए गए प्रारंभिक परीक्षणों तक सीमित है। मनुष्यों में इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता का कोई प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है।

यह शोध सीडीआरआई के वैज्ञानिक डॉ. सतीश मिश्रा और डॉ. कोनेनी वी. सशिधरा के नेतृत्व वाले समूहों ने मिलकर किया है। औषधीय रसायन विज्ञान, आणविक सूक्ष्मजीव विज्ञान, औषधि की शरीर में गतिविधि और कंप्यूटर आधारित आणविक अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं ने इसमें योगदान दिया है। शोधपत्र 17 अक्टूबर 2026 को अमेरिकन केमिकल सोसाइटी की अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका 'जर्नल ऑफ मेडिसिनल केमिस्ट्री' में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ। इसमें अलका राज पांडेय, सूर्य प्रताप सिंह, रोहिणी नंदी और शबीर अली एच. सहित अनेक वैज्ञानिकों के नाम शामिल हैं। शोध का शीर्षक है, Design, Synthesis and Dual-Stage Antimalarial Evaluation of β-Carboline–Metronidazole Hybrids: Structure–Activity Relationship and Molecular Docking Correlations।

मलेरिया में लिवर और खून, दोनों पर हमला क्यों जरूरी?

मलेरिया प्लाज्मोडियम नामक परजीवी से होने वाला संक्रमण है, जो संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से मनुष्यों में पहुंचता है। लेकिन मच्छर के काटते ही व्यक्ति को बुखार नहीं होने लगता। परजीवी सबसे पहले शरीर में प्रवेश करके लिवर तक पहुंचता है, जहां वह अपनी संख्या बढ़ाता है। इसके बाद उसका अगला चरण रक्त की लाल कोशिकाओं में शुरू होता है। यहीं परजीवी बढ़ते हैं और लाल रक्त कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। इसी रक्त चरण के दौरान सामान्यतः बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द, कमजोरी और अन्य लक्षण सामने आते हैं।

मलेरिया की अधिकांश प्रचलित उपचार पद्धतियां रक्त में सक्रिय परजीवियों को समाप्त करने पर केंद्रित होती हैं। लेकिन संक्रमण की पूरी जैविक प्रक्रिया को रोकने के लिए लिवर में होने वाले शुरुआती विकास चरण पर प्रभाव डालना भी महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि किसी दवा में दोनों चरणों के विरुद्ध गतिविधि हो, तो वह भविष्य में उपचार या संक्रमण नियंत्रण की रणनीति के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। मलेरिया का लिवर चरण और कुछ विशेष प्रजातियों में दोबारा सक्रिय होने वाले निष्क्रिय परजीवी एक जैसी चीजें नहीं हैं। प्लाज्मोडियम विवैक्स और प्लाज्मोडियम ओवेल में लिवर के भीतर कुछ निष्क्रिय परजीवी बाद में संक्रमण दोबारा पैदा कर सकते हैं। सीडीआरआई के इस शोध में लिवर चरण के विरुद्ध गतिविधि का परीक्षण किया गया है, लेकिन इससे अभी यह प्रमाणित नहीं होता कि नया यौगिक उन निष्क्रिय परजीवियों को भी समाप्त कर सकता है।

दो रासायनिक संरचनाओं को मिलाकर बनाई नई श्रृंखला

सीडीआरआई के वैज्ञानिकों ने बीटा-कार्बोलिन और मेट्रोनिडाजोल से संबंधित रासायनिक संरचनाओं को मिलाकर नए हाइब्रिड यौगिक तैयार किए। बीटा-कार्बोलिन कई जैविक गतिविधियों के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान का विषय रहा है, जबकि मेट्रोनिडाजोल एक स्थापित रोगाणुरोधी दवा है जिसका उपयोग कुछ जीवाणु और प्रोटोजोआ संक्रमणों में किया जाता है।

लेकिन दोनों की संरचनाओं को मिलाकर तैयार किया गया नया यौगिक मेट्रोनिडाजोल की सामान्य खुराक या बाजार में उपलब्ध उसकी किसी स्वीकृत मलेरिया दवा के समान नहीं है। नई रासायनिक संरचना बनने पर उसकी गतिविधि, शरीर में व्यवहार और विषाक्तता अलग हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने इन दोनों हिस्सों को एस्टर तथा एमाइड जैसे रासायनिक बंधों के माध्यम से जोड़कर अनेक नए यौगिक बनाए। इसके बाद उनकी संरचना में बदलाव करके परीक्षण किया गया कि कौन-सा संयोजन परजीवी के खिलाफ अधिक प्रभावी है। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को संरचना और जैविक गतिविधि के बीच संबंध का अध्ययन कहते हैं।

इस प्रकार शोध केवल दो पहले से उपलब्ध पदार्थों को मिलाने का प्रयोग नहीं था। इसमें नए रासायनिक अणुओं को तैयार करना, उनकी शुद्धता और संरचना की जांच करना, परजीवियों पर प्रभाव देखना तथा शरीर में उनके व्यवहार को समझने का प्रयास शामिल था।

दवा प्रतिरोधी परजीवियों पर भी मिली उत्साहजनक गतिविधि

नई दवा की खोज में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मलेरिया परजीवी में विकसित होने वाली दवा प्रतिरोधक क्षमता है। समय के साथ कुछ परजीवी उन दवाओं के प्रति कम संवेदनशील हो सकते हैं जो पहले प्रभावी थीं। ऐसे मामलों में उपचार कठिन हो सकता है।

सीडीआरआई के वैज्ञानिकों ने अपने नए यौगिकों का परीक्षण प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम की दो प्रयोगशाला प्रजातियों पर किया। इनमें Pf3D7 क्लोरोक्वीन के प्रति संवेदनशील और PfK1 क्लोरोक्वीन प्रतिरोधी प्रजाति है।

शोधपत्र के अनुसार कुछ हाइब्रिड यौगिकों ने रक्त चरण के परजीवियों के खिलाफ काफी कम सांद्रता पर प्रभाव दिखाया। इनमें एक परीक्षण में आईसी-50 का न्यूनतम स्तर लगभग 0.05 माइक्रोमोलर पाया गया। आईसी-50 वह सांद्रता है जिस पर किसी परीक्षण में परजीवी की गतिविधि अथवा वृद्धि लगभग आधी हो जाती है।

कम आईसी-50 किसी यौगिक की संभावित प्रभावशीलता का महत्वपूर्ण प्रयोगशाला संकेत हो सकता है। लेकिन केवल इसी आंकड़े से यह तय नहीं किया जा सकता कि मनुष्य में उसकी कितनी खुराक देनी होगी या वह किसी स्थापित मलेरिया दवा से बेहतर होगी।

शोध में कुछ यौगिकों ने कोशिकाओं पर अपने प्रभाव और परजीवियों पर गतिविधि के बीच अनुकूल अंतर भी दिखाया। इसे वैज्ञानिक 'सिलेक्टिविटी इंडेक्स' कहते हैं। कुछ यौगिकों में यह सूचकांक 100 से अधिक पाया गया। यह शुरुआती सुरक्षा मूल्यांकन के लिए उपयोगी संकेत है, लेकिन इससे मनुष्यों में दवा पूरी तरह सुरक्षित होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

चार दिन तक दी 50 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम की खुराक

शोध का सबसे चर्चित परिणाम चूहों पर किए गए परीक्षण से जुड़ा है। वैज्ञानिकों ने प्लाज्मोडियम बर्गेई एएनकेए से संक्रमित स्विस चूहों पर नए यौगिकों की प्रभावशीलता का अध्ययन किया।

इनमें '8kkk' नाम से पहचाने गए एक प्रयोगात्मक यौगिक ने विशेष रूप से अच्छा परिणाम दिया। संक्रमित चूहों को चार दिनों तक 50 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर वजन की खुराक देने पर रक्त में परजीवियों का स्तर नियंत्रण समूह की तुलना में 95 प्रतिशत तक कम पाया गया।

यह परिणाम वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि प्रयोगशाला में प्रभाव दिखाने वाला यौगिक जीवित पशु में भी परजीवियों के विरुद्ध गतिविधि बनाए रख सकता है।

लेकिन इस आंकड़े की व्याख्या सावधानी से करनी होगी। 95 प्रतिशत परजीवी कम होने का अर्थ यह नहीं है कि 95 प्रतिशत चूहे पूरी तरह ठीक हो गए या नई दवा मलेरिया को 95 प्रतिशत मामलों में ठीक कर सकती है। शोध में यह संख्या निर्धारित परीक्षण परिस्थितियों के अंतर्गत परजीवी की मात्रा में कमी दर्शाती है।

इसके अतिरिक्त प्लाज्मोडियम बर्गेई मुख्यतः कृंतकों में प्रयोगात्मक मलेरिया अध्ययन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मनुष्यों में गंभीर मलेरिया पैदा करने वाला प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम अलग प्रजाति है। इसलिए चूहों के परिणामों को सीधे मानव रोगियों पर लागू नहीं किया जा सकता।

लिवर के चरण पर भी प्रभाव, कुछ यौगिकों ने प्राइमाक्वीन से बेहतर गतिविधि दिखाई

इस शोध की दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि लिवर चरण से संबंधित है। वैज्ञानिकों ने नए हाइब्रिड यौगिकों का परीक्षण प्लाज्मोडियम बर्गेई के लिवर चरण पर भी किया। कुछ यौगिकों ने प्रयोगशाला की निर्धारित परिस्थितियों में प्राइमाक्वीन की तुलना में अधिक प्रभाव दिखाया।

प्राइमाक्वीन मलेरिया उपचार में इस्तेमाल की जाने वाली स्थापित दवा है। इसका विशेष महत्व कुछ प्रजातियों में लिवर के निष्क्रिय परजीवियों को समाप्त करने से जुड़ा है। हालांकि इस दवा के उपयोग में ग्लूकोज-6-फॉस्फेट डिहाइड्रोजनेज यानी जी-6-पीडी की कमी वाले मरीजों के लिए विशेष सावधानियां आवश्यक होती हैं।

नए हाइब्रिड यौगिकों की तुलना प्राइमाक्वीन से किया जाना इसलिए महत्वपूर्ण है कि वैज्ञानिक लिवर चरण पर प्रभाव डालने वाले नए रासायनिक विकल्पों की खोज कर रहे हैं। लेकिन प्रयोगशाला में अधिक गतिविधि दिखाने का अर्थ यह नहीं है कि नया यौगिक रोगियों में प्राइमाक्वीन से अधिक प्रभावी या सुरक्षित सिद्ध हो चुका है।

अभी इस बात की भी पुष्टि नहीं हुई है कि नया रसायन मनुष्य में लिवर के भीतर पर्याप्त मात्रा में पहुंचता है, कितने समय तक सक्रिय रहता है और वहां उसकी सुरक्षा संबंधी स्थिति क्या होगी। इन सवालों का जवाब आगे के औषधीय और नैदानिक परीक्षणों से ही मिल सकेगा।

परजीवी के एक महत्वपूर्ण एंजाइम को निशाना बनाने के संकेत

सीडीआरआई के वैज्ञानिकों ने केवल परजीवी की संख्या में कमी नहीं देखी, बल्कि यह समझने का भी प्रयास किया कि नया यौगिक काम कैसे करता है।

इसके लिए आणविक डॉकिंग और फ्लोरीमेट्री जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। आणविक डॉकिंग एक कंप्यूटर आधारित अध्ययन है, जिसमें यह अनुमान लगाया जाता है कि कोई रासायनिक अणु किसी प्रोटीन की संरचना के साथ किस प्रकार जुड़ सकता है।

शोध में संकेत मिले कि कुछ हाइब्रिड यौगिक मलेरिया परजीवी के 'प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम लैक्टेट डिहाइड्रोजनेज' यानी PfLDH नामक एंजाइम से मजबूती से जुड़ सकते हैं। यह एंजाइम परजीवी की ऊर्जा संबंधी चयापचय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यदि कोई रसायन इस एंजाइम के काम को प्रभावी ढंग से बाधित कर सके, तो परजीवी के जीवित रहने और बढ़ने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

हालांकि यहां भी वैज्ञानिक अंतर महत्वपूर्ण है। किसी प्रोटीन से मजबूत जुड़ाव के संकेत मिलना और जीवित परजीवी के भीतर उसी प्रोटीन को निष्क्रिय करना दो अलग बातें हैं। शोध में इस एंजाइम से संपर्क के प्रमाण मिले हैं, लेकिन नए यौगिक की पूरी क्रियाविधि को अंतिम रूप से स्थापित करने के लिए अतिरिक्त अध्ययन आवश्यक हैं।

दवा शरीर में कैसे व्यवहार करती है, इसका भी किया अध्ययन

किसी नए रसायन की प्रभावशीलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह प्रयोगशाला में परजीवी को कितनी तेजी से प्रभावित करता है। यह भी आवश्यक है कि वह शरीर में प्रवेश करने के बाद उचित मात्रा में अवशोषित हो, संबंधित अंगों तक पहुंचे और पर्याप्त समय तक सक्रिय रहे।

इसीलिए शोधकर्ताओं ने कुछ यौगिकों के फार्माकोकाइनेटिक गुणों का अध्ययन भी किया। इसमें यह समझने का प्रयास किया गया कि पदार्थ शरीर में किस प्रकार अवशोषित होता है और उसका वितरण तथा निष्कासन कैसे होता है।

शोधपत्र में इन गुणों का एक विशिष्ट प्रारंभिक विवरण दिया गया है। हालांकि उपलब्ध परिणामों से अभी मनुष्यों के लिए उपयुक्त खुराक, उपचार की अवधि अथवा दीर्घकालिक सुरक्षा तय नहीं की जा सकती।

भविष्य में यदि इस यौगिक को आगे विकसित किया जाता है तो उसकी विषाक्तता, संभावित दुष्प्रभाव, शरीर के विभिन्न अंगों पर असर, दूसरी दवाओं के साथ प्रतिक्रिया और उपयुक्त खुराक का विस्तृत मूल्यांकन करना होगा।

अभी नई दवा नहीं बनी, मनुष्यों पर परीक्षण बाकी

सीडीआरआई की इस उपलब्धि को औषधि खोज की शुरुआती लेकिन महत्वपूर्ण सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। किसी प्रयोगात्मक यौगिक का चूहों में अच्छा परिणाम देना और उसका बाजार में उपलब्ध दवा बन जाना लंबी वैज्ञानिक प्रक्रिया के दो अलग चरण हैं।

सबसे पहले प्रयोगशाला और पशुओं पर अतिरिक्त सुरक्षा तथा प्रभावशीलता के अध्ययन आवश्यक होंगे। इसके बाद यदि संबंधित नियामक संस्थाएं अनुमति देती हैं तो मनुष्यों पर चरणबद्ध नैदानिक परीक्षण किए जा सकते हैं।

पहले चरण में सामान्यतः सुरक्षा, सहनशीलता और शरीर में दवा के व्यवहार का अध्ययन होता है। बाद के चरणों में मरीजों पर उसकी प्रभावशीलता, उचित खुराक तथा स्थापित उपचारों से तुलना की जाती है। पर्याप्त प्रमाण मिलने पर ही किसी दवा को नियमित उपयोग की अनुमति दी जा सकती है।

मलेरिया के मामले में यह प्रक्रिया और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि बीमारी अलग-अलग प्लाज्मोडियम प्रजातियों से होती है। मरीज की उम्र, गर्भावस्था, बीमारी की गंभीरता और परजीवी में मौजूद दवा प्रतिरोध के अनुसार इलाज की जरूरत बदल सकती है।

इसलिए सीडीआरआई के नए यौगिक को फिलहाल उपलब्ध मलेरिया दवाओं का विकल्प नहीं माना जा सकता। मरीजों को स्थापित चिकित्सकीय दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही उपचार लेना चाहिए।

मलेरिया उन्मूलन में क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है ऐसी खोज?

मलेरिया नियंत्रण की सबसे बड़ी चुनौतियों में मच्छरों के माध्यम से संक्रमण का लगातार फैलना और कुछ क्षेत्रों में परजीवियों का दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित करना शामिल हैं।

इस बीमारी के नियंत्रण के लिए मच्छरों से बचाव, समय पर जांच, प्रभावी दवाएं और सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी आवश्यक हैं। लेकिन यदि नए ऐसे रसायन विकसित किए जा सकें जो परजीवी के एक से अधिक चरणों पर प्रभाव डालें, तो वे भविष्य में उपचार रणनीतियों को अधिक व्यापक बनाने में योगदान दे सकते हैं।

सीडीआरआई का शोध इसी संभावना की ओर संकेत करता है। इसकी विशेषता एक साथ तीन पहलुओं की जांच है—खून में सक्रिय संवेदनशील परजीवी, दवा प्रतिरोधी परजीवी और लिवर में होने वाला विकास चरण।

इसके अतिरिक्त वैज्ञानिकों ने रसायन की संरचना और उसकी गतिविधि के बीच संबंध समझने का प्रयास किया है। इससे आगे ऐसे नए यौगिक विकसित किए जा सकते हैं जिनमें प्रभावशीलता बढ़ाने और संभावित दुष्प्रभाव कम करने की गुंजाइश हो।

फिलहाल परिणाम उत्साहजनक हैं, लेकिन मलेरिया के विरुद्ध वास्तविक चिकित्सकीय सफलता का निर्धारण आगे के अध्ययनों से होगा।

मलेरिया अनुसंधान के लिए डॉ. सतीश मिश्रा को राष्ट्रीय सम्मान

इस वैज्ञानिक उपलब्धि के साथ सीडीआरआई के लिए एक और महत्वपूर्ण अवसर जुड़ा है। लखनऊ में आयोजित सोसाइटी ऑफ बायोलॉजिकल केमिस्ट्स (इंडिया) की 95वीं वार्षिक बैठक में संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. सतीश मिश्रा को प्रतिष्ठित 'प्रो. ए.एन. भादुड़ी मेमोरियल लेक्चर अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया।

यह सम्मान मलेरिया परजीवी के विकास, उसकी जैविक प्रक्रियाओं और संक्रमण के संचरण से संबंधित उनके उल्लेखनीय शोध के लिए प्रदान किया गया। सीडीआरआई की अकादमिक इकाई ने भी 30 अक्टूबर को इस सम्मान की पुष्टि की है।

यह पुरस्कार जैव रसायन विज्ञान तथा उससे संबंधित क्षेत्रों में विशिष्ट शोध कार्य के लिए दिया जाता है। परजीवी संक्रमण से संबंधित अनुसंधान को इसके चयन में विशेष महत्व दिया जाता है।

सीडीआरआई में 28 से 30 अक्टूबर तक आयोजित इस सम्मेलन में देश के विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं। सम्मेलन का मुख्य विषय बदलती स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान के लिए जैव रसायन विज्ञान और प्रयोगशाला अनुसंधान को व्यावहारिक चिकित्सा से जोड़ना है। मलेरिया के अतिरिक्त कैंसर, कोशिकीय चयापचय और अन्य गंभीर बीमारियों के जैविक कारणों तथा उपचार की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई है।

सम्मेलन में बीआरआईसी-इनस्टेम के वैज्ञानिक डॉ. सुनील लक्ष्मण को कोशिकीय मेटाबॉलिज्म के क्षेत्र में किए गए कार्य के लिए 'श्रीनिवासैया मेमोरियल अवॉर्ड' से सम्मानित किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

लखनऊ की प्रयोगशाला से निकली उम्मीद, लेकिन आगे की राह लंबी

सीडीआरआई का नया शोध इस बात का उदाहरण है कि औषधि विकास में जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान का संयुक्त अध्ययन किस प्रकार नई संभावनाएं पैदा कर सकता है। एक ओर वैज्ञानिकों ने नए रासायनिक यौगिक तैयार किए, दूसरी ओर उनके प्रभाव को अलग-अलग मलेरिया परजीवियों और चूहों के प्रयोगात्मक मॉडल में जांचा।

चूहों में 95 प्रतिशत तक परजीवी घटने का परिणाम महत्वपूर्ण है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कुछ यौगिकों ने रक्त और लिवर, दोनों चरणों में गतिविधि दिखाई। यदि भविष्य के अध्ययनों में इन गुणों की पुष्टि होती है और सुरक्षा संबंधी सभी मानक पूरे होते हैं, तो यह अनुसंधान मलेरिया के विरुद्ध नई उपचार पद्धतियों के विकास में योगदान दे सकता है।

इस खोज की उपलब्धि नई दवा तैयार हो जाना नहीं, बल्कि ऐसा संभावित औषधीय यौगिक मिलना है जिस पर आगे गंभीर वैज्ञानिक परीक्षण किए जा सकते हैं। मलेरिया जैसी जटिल बीमारी के विरुद्ध प्रभावी दवा विकसित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण शुरुआती कदम है।

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