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जहरीली धातु के बीच भी बाकुची ने बढ़ाई औषधीय क्षमता, UV-B किरणों का दिखा अनोखा असर
Lucknow: लखनऊ विश्वविद्यालय और बीएचयू के शोध में बाकुची पर UV-B विकिरण और क्रोमियम तनाव के प्रभावों का अध्ययन किया गया। शोध में औषधीय यौगिकों और एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि में बदलाव मिला।
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Lucknow: जिन पराबैंगनी किरणों को सामान्यतः पौधों के लिए हानिकारक माना जाता है, उन्हीं के नियंत्रित अतिरिक्त संपर्क में एक औषधीय पौधे के बीजों में महत्वपूर्ण औषधीय यौगिकों की मात्रा बढ़ने के संकेत मिले हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के संयुक्त शोध में पाया गया है कि बाकुची नामक औषधीय पौधा अतिरिक्त यूवी-बी विकिरण और क्रोमियम प्रदूषण जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने भीतर कुछ जैव-सक्रिय पदार्थों की मात्रा बढ़ा सकता है। अध्ययन में बीजों की एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि में भी सुधार मिला। इतना ही नहीं, प्रदूषित मिट्टी में उगने के बावजूद पौधे ने क्रोमियम को बीजों तक पहुंचने से सीमित रखने की क्षमता दिखाई। वैज्ञानिकों के अनुसार यह खोज औषधीय पौधों की खेती, उनके संरक्षण और पर्यावरणीय तनाव के बीच उपयोगी रासायनिक पदार्थों के उत्पादन को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
लखनऊ विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. अवंतिका पांडेय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की प्रो. मधूलिका अग्रवाल और प्रो. शशिभूषण अग्रवाल ने यह अध्ययन किया है। शोधपत्र का शीर्षक Alteration in Metabolic Profile and Antioxidant Activity of Psoralea corylifolia L. Under Ultraviolet-B Radiation and Chromium Stress है। इसे जून 2026 में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक प्रकाशक स्प्रिंगर की पत्रिका Proceedings of the National Academy of Sciences, India – Section B: Biological Sciences में प्रकाशित किया गया। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि यदि कोई औषधीय पौधा एक साथ तेज पराबैंगनी विकिरण और भारी धातु के प्रदूषण का सामना करे तो उसके विकास, बीजों की रासायनिक संरचना, एंटीऑक्सीडेंट क्षमता और धातु के अवशोषण में किस तरह के बदलाव आते हैं।
बाकुची का वैज्ञानिक नाम Psoralea corylifolia है। यह दलहनी कुल का एक औषधीय पौधा है, जिसके बीजों का पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में लंबे समय से उपयोग होता रहा है। विशेष रूप से त्वचा संबंधी विकारों के उपचार में इससे प्राप्त कुछ रासायनिक यौगिकों का महत्व माना जाता है। इसके बीजों में बाकुचियोल, सोरालेन और आइसोसोरालेन जैसे जैव-सक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं। इनमें सोरालेन और उससे संबंधित यौगिक प्रकाश-संवेदनशील उपचारों से जुड़े हैं, जबकि बाकुचियोल पर त्वचा संबंधी प्रभावों को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं। हालांकि किसी पौधे में औषधीय पदार्थ मौजूद होने का अर्थ यह नहीं है कि उसके कच्चे बीजों या अर्क का बिना चिकित्सकीय निगरानी सेवन अथवा त्वचा पर प्रयोग सुरक्षित है।
शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक परिस्थितियों में बाकुची के पौधों पर चार प्रकार के प्रयोग किए। पहले समूह को सामान्य परिस्थितियों में उगाया गया। दूसरे समूह की मिट्टी में प्रति किलोग्राम 30 मिलीग्राम क्रोमियम मिलाया गया। तीसरे समूह को सामान्य वातावरण की तुलना में प्रतिदिन प्रति वर्गमीटर 7.2 किलोजूल अतिरिक्त यूवी-बी विकिरण दिया गया। चौथे समूह के पौधों को क्रोमियम और अतिरिक्त यूवी-बी दोनों के संयुक्त प्रभाव में रखा गया। इस व्यवस्था से वैज्ञानिक यह अलग-अलग समझ सके कि पौधे में दिखाई देने वाले परिवर्तन केवल विकिरण के कारण हुए, केवल क्रोमियम के कारण हुए या दोनों तनावों की संयुक्त प्रतिक्रिया का परिणाम थे।
अध्ययन में सबसे उल्लेखनीय बदलाव पौधे के बीजों में मौजूद द्वितीयक उपापचयी पदार्थों की मात्रा में दिखाई दिया। ये ऐसे रासायनिक यौगिक होते हैं जो पौधे की सामान्य वृद्धि के लिए आवश्यक प्राथमिक पदार्थों से अलग होते हैं, लेकिन पर्यावरणीय तनाव, कीटों, रोगों और दूसरे बाहरी प्रभावों से उसकी रक्षा में भूमिका निभा सकते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि अतिरिक्त यूवी-बी विकिरण के संपर्क में बाकुची के बीजों में कई महत्वपूर्ण जैव-सक्रिय यौगिकों की मात्रा बढ़ी। इनमें बाकुचियोल, सोरालेन और आइसोसोरालेन जैसे पदार्थ शामिल हैं। इससे संकेत मिलता है कि पौधा बाहरी तनाव के जवाब में अपनी रासायनिक रक्षा व्यवस्था को सक्रिय कर सकता है।
यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पौधों में औषधीय पदार्थों की मात्रा हमेशा एक जैसी नहीं रहती। मिट्टी की गुणवत्ता, तापमान, सूर्य के प्रकाश, पानी की उपलब्धता और दूसरे पर्यावरणीय कारकों से उनमें परिवर्तन हो सकता है। कई औषधीय पौधे प्रतिकूल परिस्थितियों में ऐसे रसायनों का अधिक उत्पादन करते हैं जो उनकी सुरक्षा में मदद करते हैं। वैज्ञानिकों की रुचि इसी प्रक्रिया को समझने में है, ताकि भविष्य में औषधीय पौधों की खेती के दौरान उपयोगी पदार्थों की मात्रा को नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से बढ़ाने की संभावनाओं का परीक्षण किया जा सके।
बाकुची पर किए गए प्रयोग में बीजों के अर्क की एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि में भी बदलाव मिला। एंटीऑक्सीडेंट ऐसे पदार्थ या प्रक्रियाएं हैं जो कुछ प्रतिक्रियाशील अणुओं के प्रभाव को सीमित करने में सहायता करती हैं। पौधों के भीतर ये प्रतिक्रियाएं पर्यावरणीय तनाव से निपटने की व्यवस्था का हिस्सा होती हैं। शोध में अतिरिक्त यूवी-बी के संपर्क वाले पौधों के बीजों के अर्क ने प्रयोगशाला परीक्षणों में बेहतर एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि दिखाई। हालांकि इस परिणाम को सीधे मनुष्य के शरीर में रोगों से सुरक्षा या कैंसर के उपचार की बढ़ी हुई क्षमता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। किसी पदार्थ की एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि और मनुष्य में उसके चिकित्सकीय प्रभाव के बीच महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर होता है।
अध्ययन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष क्रोमियम प्रदूषण से संबंधित है। क्रोमियम एक भारी धातु है, जो कुछ औद्योगिक गतिविधियों, चमड़ा प्रसंस्करण, धातु उद्योग और दूसरे स्रोतों के कारण मिट्टी तथा पानी में पहुंच सकती है। क्रोमियम के विभिन्न रासायनिक रूपों की विषाक्तता अलग-अलग होती है। विशेष रूप से हेक्सावैलेंट क्रोमियम स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। पौधों में क्रोमियम का अधिक अवशोषण उनकी वृद्धि, कोशिकाओं की कार्यप्रणाली और चयापचय प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। औषधीय पौधों के मामले में यह चिंता और बढ़ जाती है, क्योंकि उनके बीजों या दूसरे हिस्सों का उपयोग औषधीय उत्पाद बनाने के लिए किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि बाकुची ने क्रोमियम की मौजूदगी में भी अपने भीतर कुछ सुरक्षात्मक प्रतिक्रियाएं विकसित कीं। पौधे के अलग-अलग हिस्सों में धातु का वितरण एक जैसा नहीं था। विशेष रूप से बीजों में क्रोमियम का संचय सीमित पाया गया और अतिरिक्त यूवी-बी विकिरण के संपर्क में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हुई। इससे संकेत मिलता है कि पौधे की कुछ शारीरिक प्रक्रियाएं भारी धातु को उन हिस्सों तक पहुंचने से रोकने में भूमिका निभा सकती हैं, जहां औषधीय पदार्थों का संग्रह होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि क्रोमियम से प्रदूषित मिट्टी में उगाई गई बाकुची के बीज स्वतः सुरक्षित हो जाते हैं। औषधीय उपयोग के लिए धातु की वास्तविक मात्रा और लागू सुरक्षा मानकों का परीक्षण अनिवार्य होगा।
यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य समझना जरूरी है। पौधे में क्रोमियम का कम स्थानांतरण और पौधे का क्रोमियम प्रदूषण से पूरी तरह सुरक्षित होना दो अलग बातें हैं। किसी पौधे की जड़ों में धातु का अधिक संचय हो सकता है, जबकि बीजों तक अपेक्षाकृत कम मात्रा पहुंचे। इससे पौधा कुछ हद तक अपने प्रजनन अंगों को बचा सकता है, लेकिन जड़ों, पत्तियों या अन्य ऊतकों में धातु के कारण नुकसान फिर भी हो सकता है। इसीलिए शोधकर्ताओं ने पौधे की वृद्धि और उपज से जुड़े गुणों के साथ-साथ धातु के जैव-संचय तथा उसके विभिन्न अंगों तक पहुंचने की प्रक्रिया का भी अध्ययन किया।
शोध में सामने आए परिणामों को पौधों की सहनशीलता की उस क्षमता से भी जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें वे एक साथ कई पर्यावरणीय तनावों का सामना करते हैं। इसे सह-सहनशीलता कहा जाता है। सामान्यतः किसी पौधे पर एक ही प्रकार के तनाव का अध्ययन करना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन प्राकृतिक वातावरण में पौधों को कई समस्याओं का एक साथ सामना करना पड़ सकता है। तेज विकिरण, प्रदूषित मिट्टी, पानी की कमी और तापमान में बदलाव जैसी परिस्थितियां एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ा या घटा सकती हैं। बाकुची के अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि अतिरिक्त यूवी-बी और क्रोमियम का संयुक्त प्रभाव केवल दोनों के अलग-अलग प्रभावों का साधारण जोड़ नहीं है, बल्कि पौधे की जैव-रासायनिक प्रतिक्रिया भी बदल सकती है।
इस खोज का एक संभावित उपयोग औषधीय पौधों की नियंत्रित खेती में हो सकता है। यदि भविष्य के अध्ययन यह पुष्टि करते हैं कि यूवी-बी की किसी निर्धारित मात्रा से बाकुची के उपयोगी यौगिकों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और पौधे की वृद्धि तथा उपज पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, तो ऐसी जानकारी औषधीय पौधों की खेती में उपयोगी हो सकती है। हालांकि इसके लिए विकिरण की मात्रा, संपर्क की अवधि, पौधे की उम्र, मिट्टी की स्थिति और अंतिम उत्पाद की सुरक्षा को लेकर अलग-अलग परीक्षण आवश्यक होंगे। किसी एक प्रयोग में लाभकारी परिणाम मिलने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अधिक यूवी-बी हमेशा अधिक औषधीय पदार्थ पैदा करेगा। अत्यधिक विकिरण पौधों की कोशिकाओं और वृद्धि को नुकसान भी पहुंचा सकता है।
बाकुची जैसी औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण के संदर्भ में भी यह शोध महत्वपूर्ण है। जब किसी पौधे की मांग उसके औषधीय उपयोग के कारण बढ़ती है तो प्राकृतिक स्रोतों पर दबाव पड़ सकता है। ऐसे में वैज्ञानिक खेती, पौधे की गुणवत्ता का मानकीकरण और उपयोगी पदार्थों की मात्रा को समझना संरक्षण प्रयासों में सहायता कर सकता है। लेकिन प्रदूषित भूमि में औषधीय पौधों की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि तैयार उत्पादों में भारी धातुओं की मात्रा सुरक्षित सीमा के भीतर है।
इस अध्ययन से कैंसर के उपचार को लेकर भी एक आवश्यक अंतर स्पष्ट होता है। कुछ पौधों के जैव-सक्रिय पदार्थों पर प्रयोगशाला में कैंसर कोशिकाओं के संदर्भ में अध्ययन किए जाते हैं। लेकिन किसी पौधे में ऐसे पदार्थों की मात्रा बढ़ना अपने आप उसकी कैंसररोधी प्रभावशीलता बढ़ने का प्रमाण नहीं है। बीजों के अर्क की एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि बढ़ने से भी यह सिद्ध नहीं होता कि वह कैंसर की रोकथाम या उपचार में अधिक प्रभावी हो गया है। इसके लिए विशिष्ट कैंसर कोशिकाओं पर परीक्षण, विषाक्तता का मूल्यांकन, प्राणी अध्ययन और आवश्यक होने पर मानव नैदानिक परीक्षण करने पड़ेंगे।
लखनऊ विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय का यह संयुक्त अध्ययन पौधों की एक महत्वपूर्ण विशेषता सामने लाता है। बाहरी परिस्थितियां हमेशा केवल नुकसान ही नहीं पहुंचातीं। कुछ परिस्थितियों में नियंत्रित पर्यावरणीय तनाव पौधों की रक्षा प्रणाली को सक्रिय कर सकता है और उनके भीतर उपयोगी रासायनिक पदार्थों की मात्रा बदल सकता है। बाकुची में अतिरिक्त यूवी-बी विकिरण के संपर्क से औषधीय यौगिकों और एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि में हुई वृद्धि इसी संभावना का संकेत है। लेकिन इस खोज का वास्तविक महत्व केवल औषधीय पदार्थ बढ़ने में नहीं, बल्कि यह समझने में है कि पौधा प्रदूषण और विकिरण जैसी दो अलग चुनौतियों के बीच अपनी जैव-रासायनिक व्यवस्था को किस तरह बदलता है। भविष्य में यही जानकारी सुरक्षित औषधीय खेती, पौधों के संरक्षण और उच्च गुणवत्ता वाले वनस्पति उत्पाद विकसित करने के प्रयासों में उपयोगी हो सकती है।


