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युवाओं के फेफड़ों पर बढ़ता दबाव, KGMU की सांस रोग OPD में 40% तक युवा
KGMU Lucknow: World Lung Day 2026 पर युवाओं की फेफड़ों की सेहत पर चर्चा। KGMU की OPD में युवाओं की उल्लेखनीय मौजूदगी के बीच अस्थमा, संक्रमण, वेपिंग और प्रदूषण जैसे जोखिमों पर ध्यान जरूरी है।
KGMU Lucknow
KGMU Lucknow: सांस और फेफड़ों की बीमारी को केवल वृद्धावस्था की समस्या मानने की धारणा बदल रही है। KGMU के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में आने वाले मरीजों में युवाओं की उल्लेखनीय हिस्सेदारी दिखाई दे रही है। विभाग के डॉ. दर्शन बजाज के अनुसार ओपीडी में रोज लगभग 250 मरीज आते हैं और इनमें करीब 40 प्रतिशत युवा होते हैं। इनमें लगभग 20 से 25 प्रतिशत मरीज अस्थमा से पीड़ित बताए जा रहे हैं, जबकि टीबी और दूसरे फेफड़ों के संक्रमण भी मिलते हैं। ये KGMU की ओपीडी के चिकित्सकीय आंकड़े हैं, इसलिए इन्हें लखनऊ या उत्तर प्रदेश के सभी युवाओं में बीमारी की दर नहीं माना जाना चाहिए।
25 सितंबर को मनाए जा रहे World Lung Day 2026 का आधिकारिक विषय ‘A Lifetime of Lung Health’ यानी जीवनभर फेफड़ों की सेहत है। Forum of International Respiratory Societies ने इस वर्ष फेफड़ों की सेहत को गर्भावस्था और बचपन से लेकर युवावस्था, वयस्क जीवन और बुढ़ापे तक देखने पर जोर दिया है। अभियान में स्वच्छ हवा, तंबाकू और निकोटीन से बचाव, संक्रमण की रोकथाम, व्यावसायिक और पर्यावरणीय जोखिम तथा समय पर स्वास्थ्य सेवा को प्रमुख विषय बनाया गया है।
वेपिंग ‘सुरक्षित धुआं’ नहीं
युवाओं में ई-सिगरेट और वेपिंग को कई बार सामान्य सिगरेट से कम नुकसान वाला विकल्प समझ लिया जाता है, लेकिन फेफड़ों के लिए इसे जोखिममुक्त नहीं माना जा सकता। एरोसोल में निकोटीन के अलावा सूक्ष्म कण और दूसरे रसायन हो सकते हैं। इसी तरह हुक्के में पानी से धुआं गुजरने का अर्थ यह नहीं कि सभी हानिकारक पदार्थ छन जाते हैं। विश्व फेफड़ा दिवस के वैश्विक अभियान में भी तंबाकू और निकोटीन संपर्क को जीवनभर फेफड़ों की सेहत प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में रखा गया है।
30-40 वर्ष में फेफड़े का कैंसर संभव, लेकिन उम्र घटने का दावा सावधानी से
मैक्स अस्पताल लखनऊ के पल्मोनोलॉजी निदेशक डॉ. मनोज अग्रवाल के अनुसार 30-40 वर्ष की उम्र के लोगों में भी फेफड़े के कैंसर के मामले मिल रहे हैं और कुछ मरीज ऐसे हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। यह चिकित्सकीय रूप से संभव है। भारतीय विशेषज्ञ साहित्य में भी धूम्रपान न करने वाले लोगों में फेफड़े के कैंसर और वायु प्रदूषण, घरेलू धुएं तथा दूसरे पर्यावरणीय जोखिमों पर ध्यान दिया गया है। भारत में फेफड़े के कैंसर की जोखिम संरचना पश्चिमी देशों से कुछ अलग हो सकती है और अपेक्षाकृत कम उम्र के मरीज भी मिलते हैं।
लेकिन कुछ 30-40 वर्षीय मरीज मिलने को इस प्रमाण में बदलना कि ‘फेफड़े का कैंसर तेजी से युवाओं की बीमारी बन गया है’, अभी उचित नहीं होगा। इसके लिए उम्र के अनुसार लंबे समय के कैंसर रजिस्ट्री आंकड़ों की जरूरत होगी। धूम्रपान अब भी फेफड़े के कैंसर का प्रमुख स्थापित जोखिम है, जबकि वायु प्रदूषण और घरेलू धुएं सहित कई अन्य कारण भी महत्वपूर्ण हैं।
लगातार खांसी और सांस फूलना केवल मौसम समझकर न छोड़ें
लगातार खांसी, सांस फूलना, घरघराहट, सीने में जकड़न या बार-बार सांस का संक्रमण जैसे लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो उनका चिकित्सकीय मूल्यांकन महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि ऐसे प्रत्येक लक्षण का कारण कैंसर है। अस्थमा, संक्रमण, टीबी, एलर्जी और दूसरी कई सामान्य स्थितियां भी यही लक्षण पैदा कर सकती हैं।
इस वर्ष विश्व फेफड़ा दिवस का संदेश युवाओं के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है-फेफड़ों की सेहत वृद्धावस्था में अचानक तय नहीं होती, बल्कि बचपन से लेकर पूरे जीवन में सांस ली गई हवा, तंबाकू-निकोटीन का संपर्क, संक्रमण, कार्यस्थल के जोखिम और समय पर उपचार मिलकर उसका भविष्य तय करते हैं। KGMU की OPD में युवाओं की बड़ी मौजूदगी इसी बात की स्थानीय चेतावनी है, लेकिन इसे पूरी युवा आबादी की बीमारी दर मानने के बजाय समय रहते रोकथाम और सही जांच की जरूरत के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए।


